गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
( ५२ ) गणेशगीता-अ० ४.
इस कारण ज्ञानरूप खड्गसे मनके अज्ञानसे उत्पन्न हुई
संशयको बलसे काटकर मनुष्यको योगका आश्रय लेना
उचित है ॥ ५० ॥
ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ-
शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ०श्रीगजाननवरेण्यसम्वादे पण्डित-
ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां विज्ञानप्रति-
पादनोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
वरेण्य उवाच ।
संन्यस्तिश्चैव योगश्च कर्मणां वर्ण्यते त्वया ॥
उभयोर्निश्चितं त्वेकं श्रेयो यद्वद मे प्रभो ॥१॥
वरेण्य बोले हे भगवन् ! आप कर्मसंन्यास अर्थात् निष्काम
भावसे कर्म करते करते विशुद्धचित्त होनेपर कर्मत्याग कर-
नेको ज्ञानका कारण कहकर फिर कर्मयोगको ज्ञानका कारण
कहतेहो, इससे मुझे सन्देह होता है इन दोनोंमें जो हित हो
सो कहो ॥ १ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने ॥
तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते २
भाषाटीकासमेत । ( ५३ )
श्रीगणेशजी बोले कि, अधिकारियोंके भेदसे कर्मयोग
और कर्मसंन्यास दोनों मुक्तिके साधन हैं, उन दोनोंमें कर्म-
संन्याससे कर्मयोग श्रेष्ठ है ॥ २ ॥
द्वन्द्वदुःखसहोऽद्वेष्टा यो न कांक्षति किञ्चन ॥
मुच्यते बंधनात्सद्यो नित्यं संन्यासवान्सुखम् ३
जो द्वंद्व और दुःखभी सहकर किसीसे द्वेष नहीं करते;
और किसी बातकी इच्छा नहीं करते, ऐसे प्राणी अनायाससे
तत्काल कर्म बन्धनसे मुक्त होते हैं ॥ ३ ॥
वदंति भिन्नफलकौ कर्मणस्त्यागसंग्रहौ ॥
मूढाल्पज्ञास्तयोरेकं संयुञ्जीत विचक्षणः ॥ ४ ॥
कर्मसंन्यास और कर्मयोगको अज्ञानीही पृथक् २ कहते
हैं परन्तु पंडितगण उन्हें एकही कहते हैं ॥ ४ ॥
यदेव प्राप्यते त्यागात्तदेव योगतः फलम् ॥
संग्रहं कर्मणो योगं यो विंदति स विंदति ॥५॥
जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल कर्मयोगसे
प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको जो यथार्थ जानता
है वही ज्ञाता है ॥ ५ ॥
( ५४ ) गणेशगीता-अ० ४
केवलं कर्मणां न्यासं संन्यासं न विदुर्बुधाः ॥
कुर्वन्ननिच्छया कर्म योगी ब्रह्मैव जायते ॥ ६ ॥
पंडितजन केवल कर्मसंन्यासकोही संन्यास नहीं कहते यदि
योगी अनिच्छासे कर्म करे तो वह ब्रह्मही हो जाता है ॥६॥
निर्मलो यतचित्तात्मा जितगो योगतत्परः ॥
आत्मानं सर्वभूतस्थं पश्यन्कुर्वन्न लिप्यते ॥७॥
शुद्धचित्त, आत्माके वश करनेहारे जितेन्द्री योगमें तत्पर
सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित आत्माको देखनेहारे, कर्म करते
हुए भी लिप्त नहीं होते ॥ ७ ॥
तत्त्वविद्योगयुक्तात्मा करोमीति न मन्यते ॥
एकादशानींद्रियाणि कुर्वति कर्म संख्यया ॥८॥
तत्त्वका जानेनहारा योगयुक्त आत्मा पुरुष मैं करता हूं ऐसा
ही नहीं मान्ता, परन्तु मनसहित एकादश इन्द्रिय कर्म करती
हैं ऐसा मानते हैं ॥ ८ ॥
तत्सर्वमर्पयेद्ब्रह्मण्यपि कर्म करोति यः ॥
न लिप्यते पुण्यपापैर्भानुर्जलगतो यथा ॥ ९ ॥
और जो कर्म करनेहारा सब कर्म ब्रह्ममें अर्पणकर देताहै,
भाषाटीकासमेत । ( ५५ )
वह इस प्रकार पापपुण्यसे लिप्त नहीं होता जैसा सूर्यका बिम्ब
जलमें पडता है और वह उससे लिप्त नहीं होता ॥ ९ ॥
कायिकं वाचिकं बौद्धमैन्द्रियं मानसं तथा ॥
त्यक्ताशां कर्म कुर्वन्ति योगज्ञाश्चित्तशुद्धये १०॥
योगके जाननेवाले चित्तशुद्धिके निमित्त मन वचन बुद्धि
इन्द्रिय मनसे अनुराग त्यागकर कर्म करते हैं ॥ १० ॥
योगहीनो नरः कर्म फलेहया करोत्यलम् ॥
बध्यते कर्मबीजैः स ततो दुःखं समश्नुते॥११॥
योगहीन मनुष्य कर्मोंको फलकी इच्छासे करता है,वह कर्म
बीजसे बंधता है, और इसीसे दुःखको प्राप्त होता है ॥११॥
मनसा सकलं कर्म त्यक्त्वा योगी सुखं वसेत् ॥
न कुर्वन्कारयन्वापि नन्दञ्श्वभ्रे सुपत्तने ॥१२॥
योगीको उचित है मनसे सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर,सुखसे
रहे, व उत्तम नगरमें वास करता हुआ भी न कुछ करे
न करावे ॥ १२ ॥
न क्रिया न च कर्तृत्वं कस्यचित्सृज्यते मया ॥
न क्रियाबीजसंपर्कःशक्त्यातात्क्रियतेऽखिलम् १३
( ५६ ) गणेशगीता-अ० ४.
और ऐसा जाननेमें न कोई क्रिया करता हूं, न कोई कर्तृत्व-
पना मुझमें है, न मेरा क्रियाके बीजसे कुछ संबंध है, यह सब
कुछ शक्ति अर्थात् प्रकृतिसे स्वयं होता रहता है ॥ १३ ॥
कस्यचित्पुण्यपापानि न स्पृशामि विभुर्नृप ॥
ज्ञानमूढा विमुह्यन्ते मोहेनावृतबुद्धयः ॥ १४ ॥
मैं विभु आत्मा किसीके पुण्य और पापोंको स्पर्श नहीं
करताहूं, हे राजन् ! मोहसे मलीन बुद्धिवाले ज्ञानके न होनेसे
मूर्खही मोहको प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥
विवेकेनात्मनोऽज्ञानं येषां नाशितमात्मना ॥
तेषां विकाशमायाति ज्ञानमादित्यवत्परम् १५॥
जिन्होंने ज्ञानद्वारा आत्मासेही अपना अज्ञान नाश किया
है उनका ज्ञान सूर्यकी समान परम प्रकाशित होता है ॥१५॥
मन्निष्ठा मद्धियोऽत्यन्तं मच्चित्ता मयि तत्पराः ॥
अपुनर्भवमायान्ति विज्ञानान्नाशितैनसः ॥ १६ ॥
जिनकी निष्ठा और बुद्धि मुझहीमें है, जिनका चित्त मुझमें
अत्यन्त आसक्त है, जो सदा मेरे परायण हैं वह विज्ञानद्वारा
पापनाश करके मुक्त होजाते हैं ॥ १६ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ५७ )
ज्ञानविज्ञानसंयुक्ते द्विजे गवि गजादिषु ॥
समेक्षणा महात्मानः पण्डिताः श्वपचे शुनि १७॥
ज्ञानविज्ञानयुक्त महात्मा पंडितजन ब्राह्मण,गौ,हस्ती आदि
प्राणी, चांडाल, श्वान इन सबमें समान दृष्टि रखते हैं ॥१७॥
वश्यः स्वर्गो जगत्तेषां जीवन्मुक्ताः समेक्षणाः ॥
यतोऽदोषं ब्रह्म समं तस्मात्तैर्विषयीकृतम् ॥१८॥
जिनका मन समतामें स्थित है, इस लोकमें जीते ही वे
संसार और स्वर्गको जीत चुके हैं कारण कि ब्रह्म निर्दोष
और समान है, इसकारण वे ब्रह्ममें स्थित हैं ॥ १८ ॥
प्रियाप्रिये प्राप्य हर्षद्वेषौ ये प्राप्नुवन्ति न ॥
ब्रह्माश्चिता असंमूढा ब्रह्मज्ञाः समबुद्धयः ॥१९॥
जो महात्मा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें हर्षशोक नहीं
करते, वे ज्ञानयुक्त ब्रह्ममें स्थित ब्रह्मके जाननेवालेके समान
बुद्धिमान् हैं ॥ १९ ॥
वरेण्य उवाच ।
किं सुखं त्रिषु लोकेषु देवगन्धर्वयोनिषु ॥
भगवन्कृपया तन्मे वद विद्याविशारद ॥ २० ॥
( ५८ ) गणेशगीता अ० ४.
वरेण्य बोले भगवन् ! तीन लोक तथा देवता ओर गन्धर्व
योनिमें यथार्थ सुख क्या है, हे विद्याविशारद् ! कृपाकर आप
यह मुझसे वर्णन कीजिये ॥ २० ॥
श्रीगजानन उवाच ।
आनन्दमश्नुतेऽसक्तः स्वात्मारामो निजात्मनि॥
अविनाशि सुखं तद्धि न सुखं विषयादिषु॥२१॥
श्रीगणेशजी बोले-जो अपनी आत्मामें ही रमण करते
और कहीं आसक्त नहीं हैं, वह आनन्द भोगते हैं उसीका नाम
अविनाशी सुख है, विषयादिकोंमें सुख नहीं है ॥ २१ ॥
विषयोत्थानि सौख्यानि दुःखानां तानि हेतवः॥
उत्पत्तिनाशयुक्तानि तत्रासक्तो न तत्त्ववित् २२
विषयोंसे उत्पन्न हुए सुख दुःखके ही कारण हैं, और उत्पत्ति
तथा नाशवाले हैं, तत्त्ववित् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २२॥
कारणे सति कामस्य क्रोधस्य सहते च यः ॥
तौ जेतुं वर्ष्मविरहात्स सुखं चिरमश्नुते ॥२३॥
जो इस शरीरके रहते ही काम क्रोध आदिसे उपजनेवाले
वेगको रोग सकता है वही योगी है और बहुत कालतक
सुख भोगता है ॥ २३ ॥
भाषाटीकासमेत । (५९)
अन्तर्निष्ठोऽन्तःप्रकाशोऽन्तःसुखोऽन्तरतिर्लभेत्
असंदिग्धोऽक्षयं ब्रह्म सर्वभूतहितार्थकृत् ॥२४॥
जिनके हृदयमें भक्ति है ज्ञानसे जिनके सब संदेह मिटकर
प्रकाश होगया है, जिसे कोई संदेह नहीं, जो सब प्राणियोंका
हित करता है, वही अक्षय ब्रह्मको प्राप्त करता है ॥ २४ ॥
जेतारःषड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा ॥
तेषां समंततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो२५॥
जो कामक्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम
और जितेन्द्रियपनमें सावधान हैं, उन आत्मज्ञानियोंको समता
बुद्धिके कारण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है ॥ २५ ॥
आसनेषु समासीनस्त्यक्त्वेमान्विषयान्बहिः ॥
संस्तभ्य भ्रुकुटीमास्ते प्राणायामपरायणः ॥२६
इन सब बाह्य विषयोंको त्यागकर एकान्तमें आसनमें
स्थितहो,दृष्टिको भोहके मध्यमें स्थापनकर प्राणायाम करै२६॥
प्राणायामं तु संरोधं प्राणापानसमुद्भवम् ॥
वदन्ति मुनयस्तं च त्रिधाभूतं विपश्चितः॥२७॥
प्राण और अपान वायुके रोकनेको प्राणायाम कहते हैं,
( ६० ) गणेशगीता अ० ४.
ऋषियोंने जो कि बडे चतुर और मुनि हैं, उसके तीन भेद
कहे हैं ॥ २७ ॥
प्रमाणं भेदतो विद्धि लघुमध्यममुत्तमम् ॥
दशभिद्वर्यधिकैर्वर्णैः प्राणायामो लघुः स्मृतः२८
प्रमाणके भेदसे प्राणायाम लघु, मध्यम और उत्तम ऐसे
तीनप्रकारका है, बारह अक्षरका प्राणायाम लघु कहाता है२८
चतुर्विंशत्यक्षरो यो मध्यमः स उदाहृतः ॥
षट्त्रिंशल्लघुवर्णो य उत्तमः सोऽभिधीयते॥२९॥
चौवीस अक्षरका मध्यम और ३६ छत्तीस अक्षरोंका
उत्तम है ॥ २९ ॥
सिंहं शार्दूलकं वापि मत्तेभं मृदुतां यथा ॥
नयन्ति प्राणिनस्तद्वत्प्राणापानौ सुसाधयेत्३०
सिंह व्याघ्र अथवा मतवाले हाथीको जैसे मनुष्य नम्र
करके अपने आधीन करता है, इसी प्रकार प्राण और अपान
वायुको साधै ॥ ३० ॥
पीडयन्ति मृगांस्तेन लोकान्वश्यंगतान्नृप ॥
दहत्येनस्तथा वायुः संस्तब्धोन च तत्तनुम् ३१
भाषाटीकासमेत । (६१)
हे राजन् ! जिस प्रकार अपने वशमें करे सिंहादि मृगोंको
तथा लोकोंको पीडा नहीं देते हैं, इसी प्रकार यह वायु
प्राणायामसे स्थित होकर पापोंको भस्म करता है, परन्तु
शरीरको नहीं जलाता ॥ ३१ ॥
यथायथा नरः कश्चित्सोपानावलिमाक्रमेत् ॥
तथातथा वशीकुर्यात्प्राणापानौ हि योगवित् ३२
जिस प्रकार क्रमसे मनुष्य चढनेकी सीढियोंको अतिक्र-
मण करता है, इसी प्रकार क्रमसे प्राणापानको वशमें
करना उचित है ॥ ३२ ॥
पूरकं कुम्भकं चैव रेचकं च ततोऽभ्यसेत् ॥
अतीतानागतज्ञानी ततः स्याज्जगतीतले ॥३३॥
पूरक कुंभक और रेचकका अभ्यास करके यह प्राणी इस
जगतमें भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालका ज्ञाता हो जाताहै ३३
प्राणायामैर्द्वादशभिरुत्तमैर्धारणा मता ॥
योगस्तु धारणे द्वेस्याद्योगीशस्ते सदाभ्यसेत् ३४
१ पूरक-वायुको ऊपर खेचना, कुंभक-वायुका रोध करना ।
रेचक-वायुका त्याग करना यह तीन नाड़ी हैं।
( ६२ ) गणेशगीता अ० ४.
बारह प्राणायामसे उत्तम धारणा होती है दो धारणासे योग
सिद्ध होता है, योगी निरंतर धारणाका अभ्यास करै ॥ ३४ ॥
एवं यः कुरुते राज स्त्रिकालज्ञः स जायते ॥
अनायासेन तस्य स्याद्दृश्यं लोकत्रयं नृप ॥३५॥
हे राजन् ! जो इस प्रकार साधना करते हैं, उन्हें त्रिकाल-
का ज्ञान हो जाता है, और अनायास उनके वशमें त्रिलोकी
हो जाती है ॥ ३५ ॥
ब्रह्मरूपं जगत्सर्वं पश्यति स्वान्तरात्मनि ॥
एवं योगश्च संन्यास समानफलदायिनौ ॥३६॥
अपने अन्तरात्मामें सब जगतको ब्रह्मरूप देखता है उसे
इस प्रकारसे कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों समान फलके
देनेहारे हैं ॥ ३६ ॥
जन्तूनां हितकर्तारं कर्मणां फलदायिनम् ॥
मांज्ञात्वामुक्तिमाप्नोतित्रैलोक्यस्येश्वरंविभुम् ३७
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषत्सु योगामृतार्थ-
शास्त्रे गणेशपुराणे उ० गजाननवरेण्यसम्वादे वैध-
संन्यासयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६३ )
सब प्राणियोंका हितकारी कर्मका फल देनेहारा त्रिलोकीका
ईश्वर व्यापक मैं हूं मुझे जाननेसे ही प्राणी मुक्त होजाते हैं॥३७॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिष० योगामृतार्थशास्त्रे
गणेशपुराणे उ० गजाननवरेण्यसंवादे पण्डितज्वा-
लाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां वैषम्ययोगो नाम
चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
श्रौतस्मार्तानि कर्माणि फलं नेच्छन्समाचरेत् ॥
शस्तः स योगी राजेन्द्र अक्रियाद्योगमाश्रितात् १
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! जो श्रुति और स्मृतिमें कहे
हुए कर्मोंको फलकी इच्छा न करके आरम्भ करता है, वह
योगी कर्मसंन्यासियोंमें श्रेष्ठ है ॥ १ ॥
योगप्राप्त्यै महाबाहो हेतुः कर्मैव मे मतम् ॥
सिद्धियोगस्य संसिद्धयै हेतू शमदमौ मतौ ॥ २ ॥
हे महाभुज ! मेरे मतमें योगप्राप्तिके निमित्त कर्म ही श्रेष्ठ
है, योगसिद्धिकी सिद्धिके निमित्त शमदमही कारण हैं ॥२॥
इंद्रियार्थांश्च संकल्प्य कुर्वन्स्वस्य रिपुर्भवेत् ॥
एताननिच्छन्यः कुर्वन्सिद्धिं योगी च सिद्ध्यति ३
( ६४ ) गणेशगीता-अ० ५.
इन्द्रियोंके निमित्त संकल्प कर कर्म करनेवाला अपना शत्रु
होता है, और जो इनकी इच्छा न कर कर्म करता है वही
योगी सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
सुहृत्त्वे च रिपुत्वे च उद्धारे चैव बंधने ॥
आत्मनैवात्मनो ह्यात्मा नात्मा भवति कश्चन ४
एकमात्र आत्माही आत्माका मित्र और शत्रु है, यही
ज्ञान होनेसे उद्धार करता है, और यही अज्ञान होनेसे बन्धनमें
डालता है, दूसरा कोई नहीं ॥ ४ ॥
मानेऽपमाने दुःखे च सुखे सुहृदि साधुषु ॥
मित्रेऽमित्रेऽप्युदासीने द्वेष्ये लोष्टे च काञ्चने।५॥
मान, अपमान, सुख, दुःख, साधु, आप्त, मित्र, अमित्र,
उदासीन, द्वेषी, मट्टीका ढेला और सुवर्ण इत्यादिमें ॥ ५ ॥
समो जितात्मा विज्ञानी ज्ञानींद्रियजयावहः ॥
अभ्यसेत्सततं योगं यदा युक्ततमो हि सः ॥६॥
समान बुद्धि रखनेवाला, जितेन्द्रिय, विज्ञानी, जितात्मा,
सदा योगका अभ्यास करता रहे. जब तक उसको योगकी
प्राप्ति हो ॥ ६ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६५ )
ततः श्रान्तो व्याकुलो वा क्षुधितो व्यग्रचित्तकः ।
कालेऽतिशीतेऽत्युष्णे वानिलाग्न्यम्बुसमाकुले ७
तप्त हो, श्रान्त हो, व्याकुल, क्षुधित, व्यग्रचित्त, अति-
शीतकाल वा अति उष्णकाल,अग्नि वायु और जलकी अधि-
काईवाला देश ॥ ७ ॥
सध्वनावतिजीर्णे गोः स्थाने साग्नौ जलान्तिके ॥
कूपकूले श्मशाने च नद्यां भित्तौ च मर्मरे ॥८॥
जिस स्थानमें ध्वनि, वा कलकलशब्द अधिक हो, गोठ,
अग्निके निकट, जलके निकट, कूपके निकट, श्मशान, नदी,
भीतिके निकट तथा जहां शुष्क पर्णका शब्द सुन पडता है,
अतिजीर्ण स्थान ॥ ८ ॥
चैत्ये सवल्मिके देशे पिशाचादिसमावृते ॥
नाभ्यसेद्योगविद्योगं योगध्यानपरायणः ॥ ९ ॥
चैत्य (बडी बाडियोंमें) वल्मीक (बांबई) तथा पिशाचादि-
युक्त स्थानमें योगाभ्यास करनेवाला योगी योगाभ्यास न
करै ॥ ९ ॥
स्मृतिलोपश्च मूकत्वं बाधिर्यं मन्दता ज्वरः ॥
जडता जायते सद्यो दोषाज्ञानाद्धि योगिनः १०
३
( ६६ ) गणेशगीता-अ० ५.
स्मृतिका लोप होना, गूँगापन, बधिरता, मन्दता, ज्वर,
जडता यह सब कुछ दोष अज्ञानसे योगीको होते हैं ॥ १० ॥
एते दोषाः परित्याज्या योगाभ्यसनशालिना ॥
अनादरे हि चैतेषां स्मृतिलोपादयो ध्रुवम्॥११॥
योगाभ्यासीको यह सब दोष त्याग करने चाहिये, इनमें
जो आलस्य करे तो अवश्य स्मृतिलोपादि दोष होते हैं, इससे
उपरोक्त स्थानोंमें योगसाधन न करै ॥ ११ ॥
नातिभुञ्जन्सदा योगी नामुञ्जन्नातिनिद्रितः ॥
नातिजाग्रत्सिद्धिमेति भूप योगं सदाभ्यसन् १२
योगी सदा थोडा भोजन करै, विना भोजन किये भी न
रहै, न बहुत सोवै, न बहुत जागै, इस प्रकार सदा योगाभ्यास
करनेसे सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ १२ ॥
संकल्पजांस्त्यजेत्कामान्नियताहारजागरः ॥
नियम्य खगणं बुद्ध्या विरमेत शनैः शनैः १३॥
सम्पूर्ण इच्छा और कामनाओंको त्याग करे, थोडा
भोजन करै, जागरणशील हो, बुद्धिसे सब इंद्रियोंको वशकर
शनैः शनैः विरामको प्राप्त हो ॥ १३ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६७ )
ततस्ततः कृषेदेतद्यत्र यत्रानुगच्छति ॥
धृत्यात्मवशगं कुर्याच्चित्तं चञ्चलमाहतः ॥१४॥
जिस जिस स्थानमें मन जाय उस उस स्थानसे उसे
खींचे और धैर्यतासे उसे अपने वश करै, कारण कि वह महा-
चंचल है ॥ १४ ॥
एवं कुर्वन्सदा योगी परां निर्वृतिमृच्छति ॥
विश्वस्मिन्निजमात्मानंविश्वंचस्वात्मनीक्षते १५
योगी सदा इसप्रकार करनेसे परम शांतिको प्राप्त होता
है, जो संसारको अपनी आत्मामें और आत्माको संसारमें
देखते हैं ॥ १५ ॥
योगेन यो मामुपैति तमुपैम्यहमादरात् ॥
मोच्यामि न मुञ्चामि तमहं मां स न त्यजेत् १६
योगसे जो मुझको प्राप्त होता है, उसको मैं आदरसे प्राप्त
होता हूं, और जो मुझको नहीं छोडता है उसको मैं नहीं
छोडताहूं, संसारसे मुक्त कर देता हूं ॥ १६ ॥
सुखे सुखेतरे द्वेषे क्षुधि तोषे समस्तृषि ॥
आत्मसाम्येन भूतानि सर्वगं मां च वेत्ति यः १७॥
(६८) गणेशगीता-अ० ५.
सुख, दुःख, द्वेष, क्षुधा, शांति, तृपा इनमें जो आत्माके समान
सब प्राणियोंको देखता है, और जो मुझे जानता है ॥ १७ ॥
जीवन्मुक्तः स योगीन्द्रः केवलं मयि संगततः ॥
ब्रह्मादीनां च देवानां स वंद्यः स्याज्जगत्त्रये॥१८॥
ऐसे योगी जो केवल मुझमें संगति करनेवाले हैं, वे
जीवन्मुक्त हैं, वह त्रिलोकीमें ब्रह्मादिक देवताओंसे नमस्कार
करने योग्य हैं ॥ १८ ॥
वरेण्य उवाच ।
द्विविधोऽपि हि योगोऽयमसंभाव्यो हि मे मतः॥
यतोऽन्तःकरणं दुष्टं चञ्चलं दुर्ग्रहं विभो ॥१९॥
वरेण्यने कहा भगवन् ! यह दोनों प्रकारकी योगसिद्धि मैं
महाकठिन देखता हूं कारण कि मन बडा दुष्ट और चंचल है
इसका निग्रह करना कठिन है ॥ १९ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः संप्रकल्पयेत् ॥
घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात् २०॥
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! जो निग्रह करनेमें कठिन, इस
भाषाटीकासमेत । ( ६९ )
मनका निग्रह करता है, वह घटीयंत्रके समान घूमनेवाले
इस संसार चक्रसे मुक्त हो जाता है ॥ २० ॥
विषयैः क्रकचैरेतत्संस्सृष्टं चक्रकं दृढम् ॥
जनश्छेत्तुं न शक्नोति कर्मकीलैः सुसंवृतम्॥२१॥
विषयरूपी आरोंसे यह दृढ चक्र बना हुआ है और कर्म-
रूपी कीलोंसे जडा हुआ है इसकारण साधारण मनुष्य इसके
छेदन करनेको समर्थ नहीं होते ॥ २१ ॥
अतिदुःखं च वैराग्यं भोगाद्वैतृष्ण्यमेव च ॥
गुरुप्रसादः सत्संग उपायास्तज्जये अमी ॥२२॥
अतिशय दुःख वैराग्य, भोग तृष्णाका त्याग, गुरुकी
प्रसन्नता, सत्संग, यह इसके जीतनेके उपाय हैं ॥ २२ ॥
अभ्यासाद्वा वशीकुर्यान्मनो योगस्य सिद्धये ॥
वरेण्य दुर्लभो योगो विनास्य मनसो जयात्२३
योगसिद्धिके निमित्त अभ्याससे मनको अपने वशमें करै,
हे वरेण्य ! विना मनके जीते योग महाकठिन है ॥ २३ ॥
वरेण्य उवाच ।
योगभ्रष्टस्य को लोकः का गतिःकिं फलं भवेत् ॥
विभो सर्वज्ञ मे छिंधि संशयं बुद्धिचक्रभृत् २४॥
( ७० ) गणेशगीता-अ० ५.
वरेण्य बोले भगवन् ! योगभ्रष्टको किस लोककी प्राप्ति
और उसकी क्या गति होती है, क्या फल होता है हे सर्वज्ञ !
हे बुद्धिरूपी चक्रके धारण करनेवाले ! यह मेरा संदेह छेदन
कीजिये ॥ २४ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
दिव्यदेहधरो योगाद्द्रष्टः स्वभोगमुत्तमम् ॥
भुक्त्वा योगिकुलेजन्म लभेच्छुद्धिमतां कुले २५
श्रीगणेशजी बोले हे राजा ! योगभ्रष्ट पुरुष भी दिव्य देह
धारणकर स्वर्गमें जाते हैं, वहां कर्मोंके फल उत्तम सुख भोग
कर शुद्धता युक्त योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं ॥ २५ ॥
पुनर्योगी भवत्येष संस्कारात्पूर्वकर्मजात् ॥
नहि पुण्यकृतां कश्चिन्नरकं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥
और फिर भी यह पूर्व जन्मोंके संस्कारसे योगी होता है
कोई भी पुण्यकर्म करनेवाला नरकको नहीं जाता ॥ २६ ॥
ज्ञाननिष्ठात्तपोनिष्ठात्कर्मनिष्ठान्नराधिप ॥
श्रेष्ठो योगी श्रेष्ठतमो भक्तिमान्मयि तेषु यः २७
ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ-
शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे
योगावृत्तिप्रशंसनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ७१ )
हे राजन् ! ज्ञाननिष्ठासे तपकी निष्ठावालोंसे कर्मनिष्ठासे जो
योगसे मुझमें भक्ति करता है वह श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे
श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे पंडित-
ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां योगावृत्ति-
प्रशंसनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
श्रीगजानन उवाच ॥
ईदृशं विद्धि मे तत्त्वं मद्गतेनान्तरात्मना ॥
यज्ज्ञात्वा मामसंदिग्धं वेत्सि मोक्ष्यसि सर्वगम् १
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! इस प्रकार मुझमें मन
लगाकर मेरा तत्त्व जानो जिसके जाननेसे मुझे सर्वगत और
यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे ॥ १ ॥
तत्तेऽहं शृणु वक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ॥
अस्ति ज्ञेयं यतो नान्यन्मुक्तेश्च साधनं नृप॥२॥
हे राजन् ! लोकोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे वह तत्त्व मैं
तुमसे वर्णन करता हूं जिसके जाननेसे दूसरे मुक्तिके साधन
जाननेकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ २ ॥
ज्ञेया मत्प्रकृतिः पूर्वं ततः स्याज्ज्ञानगोचरः ॥
ततो विज्ञानसंपत्तिर्मयि ज्ञाते नृणां भवेत् ॥३॥