गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५८ ) गणेशगीता अ० ४.
वरेण्य बोले भगवन् ! तीन लोक तथा देवता ओर गन्धर्व
योनिमें यथार्थ सुख क्या है, हे विद्याविशारद् ! कृपाकर आप
यह मुझसे वर्णन कीजिये ॥ २० ॥
श्रीगजानन उवाच ।
आनन्दमश्नुतेऽसक्तः स्वात्मारामो निजात्मनि॥
अविनाशि सुखं तद्धि न सुखं विषयादिषु॥२१॥
श्रीगणेशजी बोले-जो अपनी आत्मामें ही रमण करते
और कहीं आसक्त नहीं हैं, वह आनन्द भोगते हैं उसीका नाम
अविनाशी सुख है, विषयादिकोंमें सुख नहीं है ॥ २१ ॥
विषयोत्थानि सौख्यानि दुःखानां तानि हेतवः॥
उत्पत्तिनाशयुक्तानि तत्रासक्तो न तत्त्ववित् २२
विषयोंसे उत्पन्न हुए सुख दुःखके ही कारण हैं, और उत्पत्ति
तथा नाशवाले हैं, तत्त्ववित् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २२॥
कारणे सति कामस्य क्रोधस्य सहते च यः ॥
तौ जेतुं वर्ष्मविरहात्स सुखं चिरमश्नुते ॥२३॥
जो इस शरीरके रहते ही काम क्रोध आदिसे उपजनेवाले
वेगको रोग सकता है वही योगी है और बहुत कालतक
सुख भोगता है ॥ २३ ॥