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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 63

( ६२ ) गणेशगीता अ० ४.
बारह प्राणायामसे उत्तम धारणा होती है दो धारणासे योग
सिद्ध होता है, योगी निरंतर धारणाका अभ्यास करै ॥ ३४ ॥
एवं यः कुरुते राज स्त्रिकालज्ञः स जायते ॥
अनायासेन तस्य स्याद्दृश्यं लोकत्रयं नृप ॥३५॥
हे राजन् ! जो इस प्रकार साधना करते हैं, उन्हें त्रिकाल-
का ज्ञान हो जाता है, और अनायास उनके वशमें त्रिलोकी
हो जाती है ॥ ३५ ॥
ब्रह्मरूपं जगत्सर्वं पश्यति स्वान्तरात्मनि ॥
एवं योगश्च संन्यास समानफलदायिनौ ॥३६॥
अपने अन्तरात्मामें सब जगतको ब्रह्मरूप देखता है उसे
इस प्रकारसे कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों समान फलके
देनेहारे हैं ॥ ३६ ॥
जन्तूनां हितकर्तारं कर्मणां फलदायिनम् ॥
मांज्ञात्वामुक्तिमाप्नोतित्रैलोक्यस्येश्वरंविभुम् ३७
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषत्सु योगामृतार्थ-
शास्त्रे गणेशपुराणे उ० गजाननवरेण्यसम्वादे वैध-
संन्यासयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥