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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 130 में से

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पृष्ठ 54

भाषाटीकासमेत । ( ५३ )
श्रीगणेशजी बोले कि, अधिकारियोंके भेदसे कर्मयोग
और कर्मसंन्यास दोनों मुक्तिके साधन हैं, उन दोनोंमें कर्म-
संन्याससे कर्मयोग श्रेष्ठ है ॥ २ ॥
द्वन्द्वदुःखसहोऽद्वेष्टा यो न कांक्षति किञ्चन ॥
मुच्यते बंधनात्सद्यो नित्यं संन्यासवान्सुखम् ३
जो द्वंद्व और दुःखभी सहकर किसीसे द्वेष नहीं करते;
और किसी बातकी इच्छा नहीं करते, ऐसे प्राणी अनायाससे
तत्काल कर्म बन्धनसे मुक्त होते हैं ॥ ३ ॥
वदंति भिन्नफलकौ कर्मणस्त्यागसंग्रहौ ॥
मूढाल्पज्ञास्तयोरेकं संयुञ्जीत विचक्षणः ॥ ४ ॥
कर्मसंन्यास और कर्मयोगको अज्ञानीही पृथक् २ कहते
हैं परन्तु पंडितगण उन्हें एकही कहते हैं ॥ ४ ॥
यदेव प्राप्यते त्यागात्तदेव योगतः फलम् ॥
संग्रहं कर्मणो योगं यो विंदति स विंदति ॥५॥
जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल कर्मयोगसे
प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको जो यथार्थ जानता
है वही ज्ञाता है ॥ ५ ॥