गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) गणेशगीता-अ० ४
केवलं कर्मणां न्यासं संन्यासं न विदुर्बुधाः ॥
कुर्वन्ननिच्छया कर्म योगी ब्रह्मैव जायते ॥ ६ ॥
पंडितजन केवल कर्मसंन्यासकोही संन्यास नहीं कहते यदि
योगी अनिच्छासे कर्म करे तो वह ब्रह्मही हो जाता है ॥६॥
निर्मलो यतचित्तात्मा जितगो योगतत्परः ॥
आत्मानं सर्वभूतस्थं पश्यन्कुर्वन्न लिप्यते ॥७॥
शुद्धचित्त, आत्माके वश करनेहारे जितेन्द्री योगमें तत्पर
सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित आत्माको देखनेहारे, कर्म करते
हुए भी लिप्त नहीं होते ॥ ७ ॥
तत्त्वविद्योगयुक्तात्मा करोमीति न मन्यते ॥
एकादशानींद्रियाणि कुर्वति कर्म संख्यया ॥८॥
तत्त्वका जानेनहारा योगयुक्त आत्मा पुरुष मैं करता हूं ऐसा
ही नहीं मान्ता, परन्तु मनसहित एकादश इन्द्रिय कर्म करती
हैं ऐसा मानते हैं ॥ ८ ॥
तत्सर्वमर्पयेद्ब्रह्मण्यपि कर्म करोति यः ॥
न लिप्यते पुण्यपापैर्भानुर्जलगतो यथा ॥ ९ ॥
और जो कर्म करनेहारा सब कर्म ब्रह्ममें अर्पणकर देताहै,