सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 130 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 64

भाषाटीकासमेत । ( ६३ )
सब प्राणियोंका हितकारी कर्मका फल देनेहारा त्रिलोकीका
ईश्वर व्यापक मैं हूं मुझे जाननेसे ही प्राणी मुक्त होजाते हैं॥३७॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिष० योगामृतार्थशास्त्रे
गणेशपुराणे उ० गजाननवरेण्यसंवादे पण्डितज्वा-
लाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां वैषम्ययोगो नाम
चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
श्रौतस्मार्तानि कर्माणि फलं नेच्छन्समाचरेत् ॥
शस्तः स योगी राजेन्द्र अक्रियाद्योगमाश्रितात् १
श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! जो श्रुति और स्मृतिमें कहे
हुए कर्मोंको फलकी इच्छा न करके आरम्भ करता है, वह
योगी कर्मसंन्यासियोंमें श्रेष्ठ है ॥ १ ॥
योगप्राप्त्यै महाबाहो हेतुः कर्मैव मे मतम् ॥
सिद्धियोगस्य संसिद्धयै हेतू शमदमौ मतौ ॥ २ ॥
हे महाभुज ! मेरे मतमें योगप्राप्तिके निमित्त कर्म ही श्रेष्ठ
है, योगसिद्धिकी सिद्धिके निमित्त शमदमही कारण हैं ॥२॥
इंद्रियार्थांश्च संकल्प्य कुर्वन्स्वस्य रिपुर्भवेत् ॥
एताननिच्छन्यः कुर्वन्सिद्धिं योगी च सिद्ध्यति ३