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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 130 में से

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पृष्ठ 43

( ४२ ) गणेशगीता अ० ३ ।
जनाः स्युरितरे राजन्मम मार्गानुयायिनः ॥
तथैव व्यवहारं ते स्वेषु चान्येषु कुर्वते ॥ १६ ॥
हे राजन् ! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी
होजाँय, इसी प्रकारका व्यवहार वे अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें
करते हैं ॥ १६ ॥
कुर्वन्ति देवताप्रीतिं कांक्षन्तः कर्मणां फलम् ॥
प्राप्नुवन्तीह ते लोके शीघ्रं सिद्धिं हि कर्मजाम् १७
और जो कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवताओंकी
उपासना करते हैं, उन उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र
सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
चत्वारो हि मया वर्णा रजःसत्त्वतमोंऽशतः ॥
कर्मांशतश्च संसृष्टा मृत्युलोके मयाऽनघ ॥१८॥
हे पापरहित ! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व रज
तम इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है ॥१८ ॥
कर्त्तारमपि तेषां मामकर्त्तारं विदुर्बुधाः ॥
अनादिमीश्वरं नित्यमलिप्तं कर्मजैर्गुणैः ॥१९॥
यद्यपि मैं इनका कर्ता हूं परन्तु पंडित जन मुझे अकर्ता
जानते हैं अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त
मानते हैं ॥ १९ ॥