गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ४१ )
वर्णाश्रमान्मुनीन्साधून्पालये बहुरूपधृक् ॥
एवं यो वेत्ति संभूतिर्मम दिव्या युगेयुगे ॥१२॥
अनेक रूप धारण कर वर्ण आश्रम और साधुओंको
पालन करताहूं, इस प्रकारसे जो युगयुगमें मेरी दिव्य विभू-
तिको जानत है ॥ १२ ॥
तत्तत्कर्म च वीर्यं च मम रूपं समासतः ॥
त्यक्ताहंममताबुद्धिं न पुनर्भूः स जायते ॥१३॥
उन मेरे कर्म वीर्य और रूपका सेवन करता हुआ अहंकार
और ममता बुद्धि त्याग न करै तो मुक्त होजाता है ॥ १३ ॥
निरीहा निर्भयारोषा मत्परा मद्यपाश्रयाः ॥
विज्ञानतपसा शुद्धा अनेके मामुपागताः ॥१४॥
इच्छारहित निर्भय क्रोधहीन मुझमेंही भाव और मेरीही
उपासना करनेहारे विज्ञान और तपस्यासे शुद्ध होकर अनेक
प्राणी मुझको प्राप्त होगये हैं ॥ १४ ॥
येन येन हि भावेन संसेवन्ते नरोत्तमाः ॥
तथातथा फलं तेभ्यःप्रयच्छाम्यव्ययःस्फुटम् १५
श्रेष्ठ जन मुझे जिस जिस भावसे सेवन करते हैं,मैं अविन-
श्वर प्रत्यक्ष उनको वैसा वैसाही फल देताहूं ॥ १५ ॥
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