गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५० ) गणेशगीता अ ३.
ततः सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति ॥
अतिपापरतो जन्तुस्ततस्तस्मात्प्रमुच्यते ॥४४॥
सत्संगसे ज्ञान मिलनेसे यह सब प्राणियोंको अपनेमेंही
देखता है, इससे अतिपापी प्राणीभी मुक्त होजाता है ॥४४॥
द्विविधान्यपि कर्माणि ज्ञानाग्निर्दहति क्षणात् ॥
प्रसिद्धोऽग्निर्यथा सर्वं भस्मतां नयति क्षणात्४५
जिस प्रकारसे प्रसिद्ध जलती अग्नि सब लकडियोंको
क्षणमें भस्म कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानअग्निमें पाप पुण्य
दोनों प्रकारके कर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥
न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप ॥
आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेनयोगिनः४६
हे राजन् ज्ञानकी समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं, योग
सिद्ध महात्मा उस ज्ञानको काल उपस्थित होनेपर स्वयंही
प्राप्त करता है ॥ ४६ ॥
भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात् ॥
लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ४७
भक्तिमान्, इन्द्रिय जीतनेमें तत्पर पुरुषही ज्ञानको प्राप्त
कर सकता है,और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोडे समयमेंही मुक्तिको
प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥