गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८ ) गणेशगीता-अ० ३.
श्रीगजानन उवाच ।
पुरा सर्गादिसमये त्रैगुण्यं त्रितनूरुहम् ॥
निर्माय चैनमवदं विष्णवे योगमुत्तमम् ॥ १ ॥
श्रीगणेशजी बोले प्रथम सृष्टि उत्पन्न करनेके समय तीन
गुणोंसे युक्त तीन शरीरमें रहनेहारा उत्तम योगको निर्माण
करके प्रथम विष्णुके निमित्त यह योग वर्णन किया था ॥१॥
अर्यम्णे सोऽब्रवीत्सोऽपि मनवे निजसूनवे ॥
ततः परंपरायातं विदुरेनं महर्षयः ॥ २ ॥
विष्णुने यही योग सूर्यसे कहा सूर्यने अपने पुत्र मनुसे कहा
इसके उपरान्त परंपरासे प्राप्त हुए इस योगको महर्षि जानते
रहे ॥ २ ॥
कालेन बहुना चायं नष्टः स्याच्चरमे युगे ॥
अश्रद्धेयो ह्यविश्वास्यो विगीतव्यश्च भूमिप ॥३॥
हे राजन् ! पिछले युगमें जब कि श्रद्धाहीन अविश्वासी और
निन्दित जन हुए तब यह बहुत काल उपरान्त नष्ट हुआ था ३
एवं पुरातनं योगं श्रुतवानसि मन्मुखात् ॥
गुह्याद्गुह्यतरं वेदरहस्यं परमं शुभम् ॥ ४ ॥