गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ३९ )
यह अब फिर तुमने मेरे मुखसे पुरातन योगको सुना है
यह गुप्तसे भी गुप्त अत्यन्त कल्याणकारक सम्पूर्ण वेदोंका
सार है ॥ ४ ॥
वरेण्य उवाच ।
सांप्रतं चावतीर्णोऽसि गर्भतस्त्वं गजानन ॥
प्रोक्तवान्कथमेतं त्वं विष्णवे योगमुत्तमम् ॥५॥
वरेण्यराजा बोला हे गजानन ! इस समय आप गर्भसे तौ
उत्पन्न हुएहो, फिर तुमने विष्णुसे यह योग किसप्रकारसे वर्णन
किया ॥ ५ ॥
गणेश उवाच ।
अनेकानि च ते जन्मान्यतीतानि ममापि च ॥
संस्मरे तानि सर्वाणि न स्मृतिस्तव वर्तते ॥६॥
गणेशजी बोले हे राजन् ! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत
चुके हैं, मैं उन्हें सबको जानता हूं, पर तुम नहीं जानते ॥६॥
मत्त एव महाबाहो जाता विष्ण्वादयः सुराः ॥
मय्येव च लयं यान्ति प्रलयेषु युगेयुगे ॥ ७ ॥
हे महाभुज ! मुझसेही विष्णुआदि देवता उत्पन्न हुए हैं,
और युगयुगमें प्रलयके समय मुझमेंही लय होजाते हैं ॥ ७ ॥