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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 130 में से

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पृष्ठ 44

भाषाटीकासमेत । ( ४३ )
निरीहं योऽभिजानाति कर्म बध्नाति नैव तम् ॥
चक्रुः कर्माणि बुद्ध्वैवं पूर्वपूर्व मुमुक्षवः ॥२०॥
जो मुझे इच्छारहित जानता है उसको कर्मबंधन नहीं होता
इस कारण पूर्वमें मुमुक्षु जन यह बिचारकर कर्म करते थे २०
वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद्दृढात् ॥
अज्ञानबन्धनाज्जन्तुर्बुद्ध्वायं मुच्यतेऽखिलात् २१
वासनासे युक्त जो कि संसारका दृढ कारण है यही अज्ञा-
नका बंधन है इसे जानकर प्राणी मुक्त होता है ॥ २१ ॥
तदकर्म च कर्मापि कथयाम्यधुना तव ॥
यत्र मौनं गता मोहादृषयो बुद्धिशालिनः ॥२२॥
क्या कर्म और क्या अकर्म है यह मैं तुमसे कहताहूं इसके
जाननेमें ऋषिभी मोहको प्राप्त होजाते हैं ॥ २२ ॥
तत्त्वं मुमुक्षुणा ज्ञेयं कर्माकर्मविकर्मणाम् ॥
त्रिविधानीह कर्माणि सुनिम्नैषां गतिःप्रिय२३॥
कर्म अकर्म और विकर्म इसका तत्त्व मुक्तिकी इच्छा
करनेवालोंको जानना अवश्य है, वेतीनही कर्म हैं हे प्रिय !