ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अहांसे इतना धनुर्धर । होता विश्व-क्रमका विस्तार ।
व्यर्थ अभिष्ठ जिस प्रकार । होता निर्दैवीका ॥ ८१ ॥
कैसे वह रूप देखना । अपनेमें आप अपना ।
हिमसे है हिम जमना । हिम-रूपमें ॥ ८२ ॥
और एक जो उसका । लक्षण है जाननेका ।
उससे पुनर्जन्मका । होता है अंत ॥ ८३ ॥
किंतु उससे मिलते जैसे । भरकर सर्वत्र ज्ञानसे ।
महा-प्रलयमें नीर जैसे । भरा रहता है ॥ ८४ ॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥
वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको प्राप्त करते हैं—
जिस पुरुषका मन । छोड़ गये मोह मान ।
वर्षांतमें जैसे घन । आकाशको ॥ ८५ ॥
जो है अकिंचन निष्ठुर । उससे ऊबता है घर ।
वैसे ही उसको विकार । तज जाते हैं ॥ ८६ ॥
उखडता फला हुवा केल । वैसे आत्म-लाभसे प्रबल ।
क्रिया कलाप होते उन्मूल । अपने आप ॥ ८७ ॥
वृक्ष है जब जलता । पक्षी-गण उड़ जाता ।
वैसे उसको तजता । विकल्प सारा ॥ ८८ ॥
जो मान मोहासह संग-दोष
उखाड निष्काम अध्यात्म निष्ठ ।
निर्द्वन्द्व जो हो सुख दुःख मुक्त
वे प्राज्ञ पाते वह नित्य धाम ॥ ५ ॥
५९५ पुरुषोत्तमयोग
जैसे सकल दोष ऋण । अंकुरती पृथ्वी अर्जुन ।
उस भेद बुद्धिका भान । नहीं होता उसे ॥ ८९ ॥
जब सूर्यका उदय होता । रातका अस्तित्व न रहता।
वैसे देहाहंकार भागता । अविद्या सह ॥ २९० ॥
जैसे जीवको आयुष्य हीन । छोडता शरीर उसी क्षण ।
वैसे तजता द्वैत अर्जुन । उस पुरुषको ॥ ९१ ॥
पारसको लोहेका अकाल होता । रविसे कभी अंधार न मिलता ।
द्वैत-बुद्धिका दर्शन नहीं होता । उसको कभी ॥ ९२ ॥
अजी ! सुख दुःखका आकार । द्वंद्व होते देहमें गोचर ।
उसके सन्मुख धनुर्धर । नहीं होते कभी ॥ ९३ ॥
स्वप्नका राज्य या मरण । हर्ष या शोकका कारण ।
न होता जागृतिमें जान । उसी भांति ॥ ९४ ॥
वैसे सुख दुःख रूप । द्वंद्व जो पुण्य औ' पाप ।
न घेरते उसे साप । गरुड़को जैसे ॥ ९५ ॥
तथा अनात्म-वर्ग नीर । छोड़ आत्म-रसका क्षीर ।
करता है जो स-विचार । राज हंस-सा ॥ ९६ ॥
वर्षा कर जैसे पृथ्वीपर । अपने ही रसको भास्कर ।
खींचता रश्मियां फैलाकर । अपने ही बिंबमें ॥ ९७ ॥
आत्म-भ्रांतिके लिये ही वैसे । बिखुरे वस्तु सभी ओरसे ।
एकत्र किये ज्ञान दृष्टिसे । अखंड जो ॥ ९८ ॥
तथा निर्णयमें आत्माका । विवेक डूबता उनका ।
प्रवाह डूबता गंगाका । सिंधुमें जैसे ॥ ९९ ॥
या होनेसे आप संपूर्ण । न रहा आशाका कारण ।
न करता इच्छा गगन । परे जानेकी ॥ ३०० ॥
जैसे हैं अग्निका डोंगर । न लेता बीज अंकुर ।
उसके मनमें विकार । न आते वैसे ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९६
निकलते ही मंदराचल । हुवा क्षीर-सागर निश्चल ।
उसमें कामोर्मियोंका उबाल । नहीं होता ॥ २ ॥
षोडश कलायुत चंद्र-पूर्ण । न दीखे किसी ओरसे अपूर्ण ।
वैसे अपेक्षाका न्यून उत्पन्न । न होता उसमें ॥ ३ ॥
निरूपका कैसे करूं वर्णन । आंधीमें नहीं टिकता रजकण ।
वैसे नहीं आते विषय अर्जुन । उसके सम्मुख ॥ ४ ॥
एवं जिन्होंने किये ऐसे । यज्ञ ज्ञानाख्य हुताशसे ।
यहां वे मिलते हैं वैसे । मानो स्वर्णमें स्वर्ण ॥ ५ ॥
मेरा वह परम पद—
वहां कहा तो कहां । पूछेगा यदि यहां ।
न पहुंचता जहां । नाशका नाम ॥ ६ ॥
दृश्यत्वसे जो देखा जाता । या ज्ञेयत्वसे जाना जाता ।
अमुक ऐसे कहा जाता । ऐसा नहीं जो ॥ ७ ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥
किंतु जो दीपके प्रकाशसे । या चन्द्राग्निके प्रकाशनेसे ।
अधिक क्या कहूं मैं इससे । न प्रकाशता सूर्यसे भी ॥ ८ ॥
ऐसे प्रकाशसे जो दीखता । उससे वह नहीं दीखता ।
जिससे विश्व दर्शित होता । उससे वह लोप ॥ ९ ॥
खोता जब शुक्तिापन । भासता रजतपन ।
या लोपसे सर्पपन । दीखता डोरा ॥ ३१० ॥
श्रेष्ठ जो चंद्र-सूर्यादिक । बडे हैं प्रकाश दायक ।
उसके अंधारमें देख । प्रकाशते हैं ॥ ११ ॥
प्रकाशता नहीं सूर्य उसको अग्नि चंद्र भी ।
न लौटता वहां जाके मेरा उत्तम धाम जो ॥ ६ ॥
५९७ पुरुषोत्तमयोग
तेजकी वह महा-रास । सर्व-भूतात्मक निवास ।
चंद्र-सूर्यका भी मानस । उजलाता है ॥ १२॥
तभी चंद्र सूर्य हैं स्फुलिंग । उस प्रकाशके हैं अंग ।
सभी तेज हैं उसके भाग । जो है तेजस्वी ॥ १३ ॥
तथा होते ही जिसका उदय । लोपता विश्व सह चंद्र-सूर्य ।
जैसे होते ही सूर्यका उदय । लोपते चंद्र तारा ॥ १४ ॥
अथवा आते ही जागृति काल । मिटता है स्वप्न-राज्य विशाल ।
तथा नहीं रहता मृग-जल । सूर्यास्तमें जैसे ॥ १५ ॥
उस तत्वके पास । नहीं कोई आभास ।
परम धाम खास । मेरा वह ॥ १६ ॥
जो जो कोई वहां गये । लौट कर नहीं आये ।
सागरमें मिल गये । स्रोत जैसे ॥ १७ ॥
अथवा नमकका कुंजर । डूब गया लवण सागर ।
कभी न आयेगा लौटकर । उसी भांति ॥ १८ ॥
या पहुंची जो अंतराल । नहीं लौटती अग्नि-ज्वाल ।
तप्त लोहेपे पड़ा जल । न लौटता जैसे ॥ १९ ॥
वैसे मुझसे हुवा मिलन । ज्ञानाग्निमें शुध्द जो अर्जुन ।
नहीं होगा पुनरागमन । उसका कभी ॥ ३२० ॥
ब्रह्म लीन हो कर जो नहीं लौटते वे मूलतः अभिन्न है या भिन्न ?--
कहता प्रज्ञा-भूमि-पति पार्थ । जी जी प्रसाद किंतु एक बात ।
विनय करता हूं देना चित्त । कृपा पूर्वक ॥ २१ ॥
प्रभुसे जो स्वयं एक होते । तथा लौटकर नहीं आते ।
वे प्रभुसे हैं अभिन्न होते । अथवा भिन्न ॥ २२ ॥
यदि भिन्न ही है अनादि सिध्द । तो नहीं आते यह असंबध्द ।
सुमनमें जाकर ही षट्पद । सुमन होगा कैसे ? ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९८
अजी ! लक्ष्यसे जो भिन्न ऐसे । बाण लक्ष्य स्पर्श कर जैसे ।
लौटकर आते ही हैं जैसे । आयेंगे ही ॥ २४ ॥
या वे तू ही है स्वभावसे । किसको मिलना किससे ।
अपनेको आप शस्त्रोंसे । कैसे चितेरें ॥ २५ ॥
यदि हैं तुझसे अभिन्न जीव । तेरा ही संयोग वियोग देव ।
नहीं कहा जाता है अवयव । शरीरसे जैसे ॥ २६ ॥
तथा जो सदा भिन्न हैं तुझसे । नहीं मिल सकते कभी वैसे ।
फिर लौटते हैं या नहीं वहांसे । यह बात है व्यर्थ ॥ २७ ॥
तब तेरा रूप देख कर । नहीं आते हैं जो लौट कर ।
वह कौन कह कृपा कर । विश्वतोमुख देव ॥ २८ ॥
वह संदेह जो अर्जुनका । सुन शिरोमणि सर्वज्ञका ।
तुष्ट हुवा अपने शिष्यका । बोध देख कर ॥ २९ ॥
कहते हैं तब महामते । मुझे पाकर जो न लौटते ।
उनमें दोनों भांतिके होते । भिन्न औ' अभिन्न ॥ ३० ॥
जीव मुझसे अभिन्न भिन्न हैं-
देखा तो यदि गहराईसे । मैं हूं वे समरसैक्यसे ।
तथा देखे तो ऐसे या वैसे । मुझसे भिन्न ॥ ३१ ॥
जैसे पानीसे भिन्न सकल । दीखते हैं उठते कलोल ।
नहीं तो तरंग केवल । पानी ही पानी ॥ ३२ ॥
अथवा स्वर्णसे हैं भिन्न । दीखते हैं सब भूषण ।
किंतु वह स्वर्ण ही स्वर्ण । संपूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥
वैसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे । अभिन्न सदा हैं मुझसे ।
भिन्नता दीखती जिससे । वह है अज्ञान ॥ ३४ ॥
देखें यदि आत्म-दृष्टिसे । मुझे छोड़ दूसरा कैसे ।
भिन्नाभिन्न व्यवहारसे । जानेगा जो ॥ ३५ ॥
५९९ पुरुषोत्तमयोग
सारा ही आकाश निगलकर । व्याप्त होता ब्रह्मांड भास्कर ।
तब कहां प्रति-बिंब और । कहां रश्मि-जाल ॥ ३६ ॥
अथवा कल्पांतमें भरा नीर । उसमें कैसे ओघ धनुर्धर ।
कैसे होंगे मुझमें अविकार । अंशादि तब ॥ ३७ ॥
किंतु जैसे ओघके कारण । ऋजु नीर दीखे वक्र बन ।
रविको भिन्न पन अर्जुन । आता नीरमें ॥ ३८ ॥
गगन वर्तुल या चौकोर । कैसे मिलेगा पांडुकुमार ।
घट मठसे घिर आकार । दीखेगा वैसे ॥ ३९ ॥
अजी ! निद्राका ले आधार । स्वप्नमें राजा बनकर ।
अकेलेसे ही जग भर । होता राज्य ॥ ४० ॥
या मिलनेसे कस हीन । शुध्द स्वर्ण जैसे अर्जुन ।
कसमें उतरता निम्न । वैसे मैं स्वमायामें ॥ ४१ ॥
उससे फैलता है अज्ञान । कोऽहं भावका उठता प्रश्न ।
विचारके कहता मन । मैं देह हूं ऐसे ॥ ४२ ॥
ममैकांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥
शरीर है जितना आत्मज्ञान भी है अपना—
ऐसे शरीर है जितना । आत्म-ज्ञान भी आपना ।
जिससे है अनुभवना । मेरा अल्पांश ॥ ४३ ॥
वायु संयोगसे है सागर । उमडता ले तरंगाकार ।
वह समुद्रांश धनुर्धर । दीखता अल्प ॥ ४४ ॥
वैसे जडको चेतना देता । देहाहंता प्रकट करता ।
मैं जीव हूं ऐसा भास होता । जीव लोकका ॥ ४५ ॥
जगमें अंश मेरा ही हुआ जीव सनातन ।
खींचता है प्रकृतीसे मन औ' पांच इंद्रियां ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ६००
किंतु जो जीवका बोध देता । हलनल प्रकट करता ।
तभी वह शब्द अर्थ देता । लोकमें जीव ॥ ४६ ॥
जन्मना तथा मरना । इसको सच मानना ।
मेरा संसार कहना । यह जीवलोक ॥ ४७ ॥
ऐसे जीवलोकमें अर्जुन । करता मेरा अवलोकन ।
जैसे चन्द्रमा नीरमें जान । जो उदकातीत ॥ ४८ ॥
जैसे कभी कोई स्फटिक । केशर पर पड देख ।
प्रकट होता लाल देख । किंतु न होता लाल ॥ ४९ ॥
वैसे अनादिपन नहीं टूटता । अकर्तापन मेरा नहीं भंगता ।
किंतु कर्ता भोक्ता ऐसा भासता । यह भ्रम है जान ॥ ३५० ॥
या आत्मा है जो निर्विकार । प्रकृतिसे हो एकाकार ।
प्रकृतिके धर्मानुसार । देखता अपनेमें ॥ ५१ ॥
मन सह सभी इंद्रिय । करते प्रकृतिका कार्य ।
उन्हें अपना धनंजय । होना प्रवृत्त ॥ ५२ ॥
स्वप्नमें जैसे कोई परिव्राजक । आप अपना कुटुंब होके देख ।
भागदौड़ करता मोह मूलक । जैसे वैसे भी ॥ ५३ ॥
वैसे है अपनी ही विस्मृति । आत्मा आप ही होता प्रकृति ।
उसीको मान सुभद्रापति । भजता उसीको ॥ ५४ ॥
मन रथ पर चढ़कर । श्रवण द्वारसे हो बाहर ।
शब्द-काननमें भयंकर । घुसता है वह ॥ ५५ ॥
वैसे ही प्रकृतिकी रास । त्वचाके हाथमें दे खास ।
स्पर्श-द्वारसे है प्रवास । करता वनमें ॥ ५६ ॥
अजी ! कभी किसी अवसर । नेत्र-द्वारसे पड़ बाहर ।
चढ़ता है रूपका डोंगर । स्वैर-भावसे ॥ ५७ ॥
वैसे ही रसनाका पथ । चलकरके वह पार्थ ।
रस भरने उदरार्थ । लगता वह ॥ ५८ ॥
६०१ पुरुषोत्तमयोग
(76)
अथवा पथ कर घ्राण । देहेश करता गमन ।
फिर जो गंधके दारुण । अरण्य लांघता ॥ ५९ ॥
ऐसे वह इंद्रिय नायक । करके मनको सहायक ।
शोधते जाता है शब्दादिक । विषय सारे ॥ ३६० ॥
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥
जाते समय जीव इंद्रियोंके साथ जाता है—
किंतु ऐसे कर्ता भोक्ता । जिवन-रूप दीखता ।
जैसे तनमें करता । यह प्रवेश ॥ ६१ ॥
अजी! कोई विलासी तथा धनिक । जाना जाता है उसी समय देख ।
बसता है जब वह हो स्थाइक । राजधानीमें ॥ ६२ ॥
वैसे बढ़ता कर्तृत्व अहंकार । विषयेंद्रिय-तांडव धनुर्धर ।
जाना जाता है तभी पाता शरीर । जब यह जीव ॥ ६३ ॥
अथवा छोड़ता है शरीर । तब इंद्रियां निकाल कर ।
अपने ही साथ धनुर्धर । ले जाता है ॥ ६४ ॥
जैसे अपमानित अथिति । ले जाता है सुकृत-संपत्ति ।
या ले जाता है गुड्डेकी गति । सूत्र-तंतू ॥ ६५ ॥
अथवा प्रकाश अस्तमान । ले जाता है सबका दर्शन ।
अथवा है सुगंध पवन । ले जाता जैसे ॥ ६६ ॥
वैसे मन सह इंद्रियां । देह-राज है धनंजय ।
शरीर तजते समय । ले जाता है ॥ ६७ ॥
जैसे पुष्पादिसे वायु ले जाता गंध खींचके ।
वैसे लेकर ये ईश छोड़ता धरता तन ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०२
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥
यहां अथवा स्वर्गमें फिर । लेता जिस देहका आधार ।
करता है वैसा ही विस्तार । मन-इंद्रियोंका ॥ ६८ ॥
जैसे बुझते ही ज्योति । ले जाती अपनी दीप्ति ।
फिर जब है जलती । वैसा ही प्रकाश ॥ ६९ ॥
किंतु ऐसे है जो परिवर्तन । करते अविवेकीके नयन ।
जानते इतना तो अर्जुन । सामान्य बात ॥ ३७० ॥
आत्मा है जो शरीरमें आया । उसीने विषय भोग किया ।
या वही शरीर छोड़ गया । इतना जानते ॥ ७१ ॥
वैसे आना तथा जाना । करना है या भोगना ।
देहका कार्य है माना । उसने आत्माका ॥ ७२ ॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्तिज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥
योगी आत्म-धर्म आत्मामें तथा देह-धर्म देहमें देखता है—
किंतु छोटासा देह उत्पन्न । तथा देख उसमें चेतन ।
या उसमें देख आंदोलन । कहते वह आया ॥ ७३ ॥
श्रोत्र जिह्वा त्वचा चक्षु घ्राण औ' साथ हो मन ।
आधार इनका लेके सारे विषय भोगता ॥ ९ ॥
तजता धरता देह भोगता गुण-युक्त जो ।
न देखते इसे मूढ देखते ज्ञान चक्षु ही ॥ १० ॥
यत्नसे देखते योगी इसको हियमें बसे ।
चित्त-हीन अशुद्धात्मा यत्नसे भी न देखते ॥ ११ ॥
६०३ पुरुषोत्तमयोग
वैसे ही इंद्रियां उसके साथ । करती अपना व्यापार पार्थ ।
उसको कहते लोग यथार्थ । मोगना ऐसे ॥ ७४ ॥
भोग-क्षीणसे पीछे स्वाभाविक । शरीर गिरता है यह देख ।
वह गयारे गया ऐसे चीख-। कहते हैं बंसे ॥ ७५ ॥
जैसे देखके वृक्ष हिलता । कहते हैं पवन बहता ।
किंतु जहां वृक्ष नहीं होता । नहीं क्या पवन ॥ ७६ ॥
या रखकर सम्मुख दर्पण । उसमें कर अपना दर्शन ।
भासता आप हुवा है उत्पन्न । उससे पूर्व नहीं क्या ॥ ७७ ॥
या परे हटाके दर्पण । अपना लोप हुवा मान ।
आप नहीं ऐसे अर्जुन । ऐसा मानना क्या ॥ ७८ ॥
शब्द है जैसे आकाशका । किंतु माना जाता मेघका ।
या चंद्रके वेग अभ्रका । करता आरोप ॥ ७९ ॥
वैसे शरीरका आवगमन । निर्विकार आत्मापे आरोपण ।
करते हैं वे भ्रमसे अर्जुन । निश्चय-पूर्वक ॥ ३८० ॥
आत्मामें यहां आत्म-धर्म । तथा देहमें देह-धर्म ।
जानते जो इसका मर्म । वे हैं दूसरे ही ॥ ८१ ॥
ज्ञानसे हैं जिसके नयन । देखते हैं आत्म भेदके तन ।
मेघ-भेदमैं सूर्य-कीरण । ग्रीष्ममें जैसे ॥ ८२ ॥
वैसे ही कर विवेक विस्तार । ज्ञानियोंकी बुद्धि होती है स्थिर ।
देखते आत्माको वैसे ही धीर । इस भांतिसे ॥ ८३ ॥
जैसे तारागणसे भरा गगन । जलमें पडा है दीखता अर्जुन ।
किंतु नहीं पडा टूटके गगन । यह जानते वैसे ॥ ८४ ॥
गगनके स्थानपे है गगन । यह केवळ है आभास जान ।
वैसे हैं आत्म-शरीर भिन्न । मानते हैं वे ॥ ८५ ॥
कलकल बहते पानीमें चंचल । दिखती है चांदनीकी जो हलचल ।
चांदनी होती चंद्रके साथ निश्चल । जानके देखते हैं ॥ ८६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०४
या डबरा ही भरता सूखता । सूर्य जैसेका वैसा है रहता ।
वैसे ही शरीर आता औ' जाता । देखते हैं ऐसे ॥ ८७ ॥
घट मठ बनाये । वैसे ही तोड़ दिये ।
आकाश रह गये । सदा अखंड ॥ ८८ ॥
वैसे अखंड आत्म-सत्ता । तन है जो आता जाता ।
अज्ञान-दृष्टिसे कल्पित । जानते हैं ज्ञानी ॥ ८९ ॥
चैतन्य न बढ़ता न घटता । वह कर्म न करता कराता ।
ऐसे आत्म-ज्ञानसे है जानता । शुद्ध-रूपसे ॥ ३९० ॥
तथा स्वाधीन होगा संपूर्ण ज्ञान । प्रज्ञा परमाणुका अंतदर्शन ।
सकल शास्त्रोंका रहस्य अर्जुन । किसी समय ॥ ९१ ॥
किंतु है ऐसी इसकी उत्पत्ति । मनमें न रही यदि विरक्ति ।
होती कभी सर्वात्मकी प्राप्ति । विद्वत्तासे ॥ ९२ ॥
मुखमें भरा है सदैव ज्ञान । अंतःकरणमें विषयोंका स्थान ।
इससे न होगी प्राप्ति अर्जुन । मेरी कभी ॥ ९३ ॥
करनेसे ग्रंथ पठन । टूटेगा भव-बंधन ।
करनेसे ग्रंथ स्पर्शन । होगा क्या पाठ ? ॥ ९४ ॥
आंखमें पट्टी बांधकर । नाकसे मोति सूंघकर ।
समझेगा क्या धनुर्धर । उसका मूल्य ॥ ९५ ॥
वैसे चित्तमें अहंताका स्थान । जिह्वा पर शास्त्र संपूर्ण ।
इससे नहीं होगा मेरा ज्ञान । करोड़ों जन्मोंमें ॥ ९६ ॥
मैं अकेला सबमें भरा हुवा हूं—
एक हूं मैं सबमें व्याप्त । भूतमात्रमें हूं समस्त ।
कहता हूं मैं यही बात । स्पष्ट रूपसे ॥ ९७ ॥
६०५ पुरुषोत्तमयोग
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
वैसे सूर्य सह जो संपूर्ण । विश्वकी रचना है अर्जुन ।
प्रकाश वह मेरा ही जान । आद्यंत है जो ॥ ९८ ॥
जल सोखकर लेता सविता । जलांश जो बादमें है रहता ।
चंद्रमें रहती है जो पांडुसुता । जोस्ना वह मेरी ॥ ९९ ॥
तथा दहन पचन सिद्धि । करता रहता निरवधि ।
हुताग्नै वह तेजोवृद्धि । जान मेरी ही ॥ ४०० ॥
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
प्रवेश किया मैंने भूतलमें । तभी यह महासिंधु जलमें ।
नहीं पिघला है युग-युगमें । मृत्तिका पिंड ॥ १ ॥
तथा भूत ही स-चराचर । धरा है धरतीने अपार ।
पृथ्वी-तलमें प्रवेश कर । उसको धरा मैंने ॥ २ ॥
गगनमें मैं पांडुसुत । चंद्रके रूपसे अमृत ।
भरा हुवा मैं स्वचलित । बना सरोवर ॥ ३ ॥
वहांसे निकलते रश्मिकर । उनको धरकर मैं अपार ।
सभी वनस्पतियोंका आगर । भरता रहता मैं ॥ ४ ॥
इससे सस्यादिक सकल । करते धान्यादिका सुकाल ।
तथा अन्नादिसे प्रतिपाल । करता सबका ॥ ५ ॥
सकल जन जीवनका जीवन 'वैश्वानर' मैं हूं—
ऐसे उत्पन्न किया हुवा अन्न । जिस भांति करके मैं दीपन ।
जिससे जीवका हो समाधान । करता हूं ऐसे ॥ ६ ॥
सूर्यमें जलता तेज विश्वको है प्रकाशता ।
चंद्रमें अग्निमें वैसे मेरा ही तेज जान तू ॥ १२ ॥
धृतिके बलसे भूत धरता मैं धरा बना ।
पोसता वनस्पतीको रससे भर सोम मैं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०६
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥
प्राणिमात्रके नाभि-कंदपर । अंगीठी बनके पांडुकुमार ।
जलता हूं मैं दीप्ति बनकर । जठरमें सदैव ॥ ७ ॥
धौंकनी बनाकर प्राणापान । फूंकता रहता हूं रात दिन ।
पचा डालता मैं कितना अन्न । इसी उदरमें ॥ ८ ॥
शुष्क अथवा स्निग्ध । सुपक्व या विदग्ध ।
किंतु मैं चतुर्विध । पचाता अन्न ॥ ९ ॥
ऐसे मैं ही हूं सकल जन । जीवनका हूं सार-जीवन ।
औ' जीवनका मुख्य-साधन । वैश्वानर मैं हूं ॥ ४१० ॥
कहूं क्या इससे अधिक पार्था । मेरी सर्व-व्यापककी कथा ।
विश्वमें दूसरा नहीं सर्वथा । मेरे बिन कुछ भी ॥ ११ ॥
संसारमें कुछ सुखी और कुछ दुखी क्यों ? -
किंतु इसका कारण । सदा सुखी हैं कुछ जन ।
तथा कुछ दुःख मगन । दीखते यहां ॥ १२ ॥
अजी ! संपूर्ण नगरमें जैसे । दीप जलते एक ही दीपसे ।
किंतु कुछ जलते उसमेंसे । कुछ बुझते क्यों ? ॥ १३ ॥
यहां करता ऐसा संशय । तेरा मन यदि धनंजय !
अबका है उत्तम समय । संदेह निवृत्तिका ॥ १४ ॥
मैं भर रहा यहां संपूर्ण । इसमें अन्यथा नहीं जान ।
जिसका जैसा अंतःकरण । दीखता वैसे ॥ १५ ॥
जैसे आकाशध्वनि है जो एक । गूंजता नाद बन अनेक ।
भिन्न भिन्न वाद्योंमेंसे तू देख । धनंजय ॥ १६ ॥
वैश्वानर बना मैं ही जीवोंके तन में बसा ।
पचाता अन्न चारो ही प्राण अपान फूंकके ॥ १४ ॥
५०७ पुरुषोत्तमयोग
या एक सूर्य जैसे अर्जुन । लोक चेष्टासे होकर भिन्न ।
उपयोग होता अनुदिन । देखता है तू ॥ १७ ॥
नाना बीज धर्मानुरूप । वृक्ष-रस बनता आप ।
वैसे बदलता स्वरूप । जीवमें मेरा ॥ १८ ॥
जैसे नीलमणिका हार । सर्पत्व लेता भयंकर ।
सुखद होता निरंतर । जब दूसरेको ॥ १९ ॥
अथवा जैसे स्वातीका उदक । सीपमें मोति औ, व्यालमें विष ।
वैसे सु ज्ञानियोंको मैं हूं सुख । दुख अज्ञानियोंको ॥ ४२० ॥
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥
सबके हृदयमें जो आत्म-स्फुरण है वह मैं हूं—
वैसे ही होती हृदय मध्यमें । अमुक हूं ऐसी उर्मी सभमें ।
वह स्फुरण जो दिन रातमें । होता मैं हूँ ॥ २१ ॥
किंतु संत संगमें होता । या योग-ज्ञानमें बैठता ।
गुरु-चरण उपासता । वैराग्यसे ॥ २२ ॥
ऐसे ही सत्कर्ममें नित । अज्ञान नष्ट होता पार्थ ।
उसका होता अहं स्थित । आत्म-रूपमें ॥ २३ ॥
वे अपने आपको देख । पाते मुझ आत्मामें सुख ।
मेरे बिन भिन्न न देख । कभी कहीं ॥ २४ ॥
सर्वान्तरोंमें करता निवास
देता स्मृति ज्ञान विवेक मैं ही ।
मैं ही अकेला चिर वेद-वेद्य
वेदज्ञ मैं वेद रहस्य कर्ता ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०८
अजी ! होता है जब सूर्योदय । देखता जैसे सूर्यको ही सूर्य ।
वैसे मेरे ज्ञानका धनंजय । कारण मैं ही ॥ २५ ॥
सबके अज्ञानका कारण भी मैं—
या शरीर सेवामें हो तत्पर । संसार गौरवको सुनकर ।
अहंकार देहमें डूबकर । रहा है जिनका ॥ २६ ॥
वे हैं स्वर्ग संसारार्थ । दौड़ते कर्ममें पार्थ ।
तथा होते हैं दुःखार्थ । मेरे ही कारण ॥ २७ ॥
यह होता भी है अर्जुन । मेरे कारण है अज्ञान ।
जागृत ही देखता स्वप्न । या निद्रा लेता ॥ २८ ॥
जिन बादलोंने सूर्यको छिपाया । उसी सूर्यसे बादल देखा गया ।
मेरे अज्ञानसे वैसे देख लिया । विषय जीवोंने ॥ २९ ॥
जैसे निद्रा या जागृतिका । प्रबोध कारण मूलका ।
वैसे ज्ञानाज्ञान जीवोंका । कारण मैं हूं ॥ ४३० ॥
जैसे सर्पत्वका कारण डोर । वह डोर ही मूल धनुर्धर ।
वैसे ज्ञानाज्ञानका व्यवहार । मुझसे होता ॥ ३१ ॥
तभी मैं. जैसे हूं वैसे । मुझको न जाननेसे ।
वेदके न जाननेसे । उसकी हुई शाखाएं ॥ ३२ ॥
तो भी वेदोंके शाखा-भेदसे । मैं ही एक जाना जाता वैसे ।
सभी ओरकी नदियां जैसे । मिलती सिंधुमें ॥ ३३ ॥
वैसे महा-सिद्धांतके पास पार्थ । श्रुतियां खो जाती हैं शब्द सहित ।
अथवा आकाशमें गंध सहित । वायु-लहरियां ॥ ३४ ॥
वैसे हैं समस्त श्रुतिजात । होते लजाकर जैसे शांत ।
उसका मैं करता यथार्थ । अर्थ प्रकट ॥ ३५ ॥
फिर श्रुति सह जो अशेष । विश्व खो जाता यहां निःशेष ।
वह निज ज्ञान भी विशेष । जानता मैं ही ॥ ३६ ॥
६०९ पुरुषोत्तमयोग
(77)
जैसे निद्रितको कर जागृत । तब न जानता स्वप्नका द्वैत ।
किंतु करना एकत्व प्रतीत । अपना ही जो ॥ ३७ ॥
वैसे अपना अद्वयपन । जानता हूं मैं द्वैतके बिन ।
उसका भी हूं बोध कारण । जाननेका मैं ही ॥ ३८ ॥
आगसे मिला कपूर । न राख न वैश्वानर ।
न रखता धनुर्धर । उसी भांति ॥ ३९ ॥
वैसे समूल अविद्या खाता । वह ज्ञान भी जो डूब जाता ।
जब नहीं ऐसा न रहता । तब है भी कैसे ॥ ४४०॥
मार्ग सह विश्व ले गया जो अर्जुन । उस चोरको पकड़ेगा कैसे कौन ।
ऐसी व्यवस्था है जो विशुद्ध तू जान । वह मैं हूँ ॥ ४१ ॥
ऐसी जो जड़ाजड़ व्याप्ति । कहता है कैवल्यपति ।
अपने रूपकी पूर्ति । निरुपाधिक मैं ॥ ४२ ॥
वह बोध है ऐसा संपूर्ण । बिंबित हुवा पार्थमें जान ।
नभके पूर्ण-चंद्रसमान । क्षीरार्णवमें ॥ ४३ ॥
या जैसे दर्पणमें बिंबत होता । उसके सम्मुख जो चित्र रहता ।
वैसे कृष्ण औ' पार्थ अनुभावता । एक ही बोध ॥ ४४ ॥
फिर भी है वह वस्तु-स्वभाव । बढ़ता जाता प्रिय अनुभव ।
तभी वह अनुभवका राव । कहता अर्जुन ॥ ४५ ॥
कहनेमें अब व्यापकत्व । कहगया निरुपाधिकत्व ।
प्रसंगवश स्वस्वरूपत्व । कहनेमें देव ॥ ४६ ॥
कहना वह एक बार । पूर्णरूपसे कृपाकर ।
श्रीकृष्ण यह सुनकर । कहता भला ॥ ४७ ॥
हमको भी पांडुसुता । इसको कहना भाता ।
किंतु ऐसा प्रश्न कर्ता । मिलता नहीं ॥ ४८ ॥
आज मनोरथका फल । मिला है तू यहां केवल ।
खुलकर यह सकल । पूछनेको ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१०
द्वैत-गुरु-शिष्यसंवाद-से अद्वैतके पारका अनुभव—
अद्वैतके पारका जो भोगना । वह भोग-सुख अनुभवना ।
पूछ कर देता है तू अर्जुन । मुझको मेरा ॥ ४५० ॥
सम्मुख होता है जब दर्पण । आप करता अपना दर्शन ।
वैसे शुद्ध संवादमें अर्जुन । शिरोमणि है तू ॥ ५१ ॥
तेरा अजानसे पूछना । हमको कहते बैठना ।
ऐसा नहीं इसे जानना । सखा मेरे ॥ ५२ ॥
ऐसा कह दिया आलिंगन । कृपा-दृष्टिसे अवलोकन ।
फिर किया हरिने कथन । अर्जुनसे क्या ॥ ५३ ॥
जैसे दो होंठोंसे एक बोलना । दो ही चरणसे एक चलना ।
वैसे दोनोंका पूछना कहना । तेरा मेरा ॥ ५४ ॥
ऐसे हम तुम यहां । देखना एक ही जहां ।
पूछना कहना यहां । दोनों एक ॥ ५५ ॥
लुब्ध हुये देव मोहसे । अर्जुनके आलिंगनसे ।
फिर कहते संकोचसे । यह नहीं उचित ॥ ५६ ॥
इक्षुदंड रसकी भेली । नासती लवणसे भली ।
संवाद-सुख क्रीडा भली । नासेगी जैसे ॥ ५७ ॥
अजी पहलेसे हममें नहीं । नर-नारायणमें द्वैत कहीं ।
लीन हो अब मेरा मुझमें ही । यह आयेगा ॥ ५८ ॥
इस सोचसे अकस्मात । श्रीकृष्ण कहता है पार्थ ।
तूने प्रश्न किया उचित । वह कैसा ॥ ५९ ॥
अर्जुन या कृष्णमें लीन । लौट कर आया वह सुन ।
अपना ही किया हुवा प्रश्न । अब सम्मुख ॥ ४६० ॥
यहां गद्गद हो बोलता । अर्जुन जी ! जी ! कहता ।
निरुपाधिक जो होता । अपना कह ॥ ६१ ॥
६११ पुरुषोत्तमयोग
शार्गधर सुन बोला तब । वही कहने लिये अब ।
कहने लगा जो दोनों भाग । अपनी उपाधिके ॥ ६२ ॥
भगवानकी उपाधिकता—
पूछा था निरुपाधिक । कहता है उपाधिक ।
ऐसा प्रश्न स्वाभाविक । उठेगा यहां ॥ ६३ ॥
अजी ! छासको अलग करना । कहा जाता मक्खन निकालना ।
हीन कस धातु सब जलना । स्वर्ण-शुद्धि ॥ ६४ ॥
या काईको दूर करना । विशुध्द जलको पा लेना ।
तथा बादलोंका हटना । आकाश शुध्द ॥ ६५ ॥
ऊपरसे ढका चोकर । फटकके किया तो दूर ।
शुध्द अनाजका स्वीकार । होता आप ॥ ६६ ॥
वैसे उपाधि उपाहित । विचारनेसे व्यवस्थित ।
किसीसे न पूछते ज्ञात । होता निरुपाधिक ॥ ६७ ॥
जिस भांति मौन रहकर । बाला प्यारसे सकुचाकर ।
पति नाम शब्द मारकर । कहती वैसे ॥ ६८ ॥
जो है न कहने जैसा । कहना पडा है ऐसा ।
तभी उपाधिसे वैसा । कहता श्रीहरी ॥ ६९ ॥
प्रतिपदाकी चंद्ररेखा । दिखाना हो तो वृक्ष-शाखा ।
दिखाते वैसे उपाधिका । करते वर्णन ॥ ४७० ॥
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
पुरुष लोकमें है दो क्षर तथैव अक्षर ।
क्षर हैं सब ये भूत अक्षर स्थिर है वह ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१२
क्षराक्षर पुरुष विचार—
श्री कृष्णने फिर बात की । इस संसार नगरकी ।
बसति है दो पुरुषोंकी । केवल मात्र ॥ ७१ ॥
गगनमें जैसे संपूर्ण । बसते हैं रात औ, दिन ।
संसार नगरमें मान । वैसे ये दो हैं ॥ ७२ ॥
तीसरा भी एक पुरुष रहता । वह इनका नाम नहीं सहता
गांव सह वह इन्हे निगलता । होता जब प्रकट ॥ ७३ ॥
रहने दो तीसरेकी वार्ता । सुनो अब इन दोकी कथा ।
इस संसार ग्राममें पार्था । बसने आये जो ॥ ७४ ॥
एक है अंधा पगला लूला । दूजा सर्वांग पूर्ण है भला ।
ग्राम-गुणोंसे संग केवल । हुवा उनका ॥ ७५ ॥
उनमें है एक क्षर । दूसरा जो है अक्षर ।
दोनोंसे यह संसार । भरा है ठसाठस ॥ ७६ ॥
सुन अब क्षर है कौन । अक्षरका क्या लक्षण ।
अभिप्राय यह संपूर्ण । कहूंगा तुझको ॥ ७७ ॥
जहां है महदकार । वहांसे हे धनुर्धर ।
यहां है जो तृणांकुर । वहां तक ॥ ७८ ॥
जो है बड़ा या थोर । चलता या है स्थिर ।
या जो होता गोचर । मन-बुद्धिसे ॥ ७९ ॥
जो कुछ पंच-भूतसे बनता । नाम-रूपमें आकर फंसता ।
तथा टकसालसे निकलता । गुणत्रयोंकी ॥ ४८० ॥
शिक्का जो है भूताकृतिका । बनाया जाता जो स्वर्णका ।
बनता है वह कालका । द्यूत-बीज ॥ ८१ ॥
जानना ही जो विपरीत । तथा जो कुछ होता ज्ञान ।
वह प्रति-क्षण समाप्त । होता बनके ॥ ८२ ॥
६१३ पुरुषोत्तमयोग
निकाल कर भ्रांतिका नग । खड़ा किया है सृष्टिका अंग ।
पहचाना जाता है जो जग । इस नामसे ॥ ८३ ॥
जो अष्टधा भिन्न ऐसे । दिखाया सातमें जैसे ।
क्षेत्र-द्वारा छत्तीससे । दिखाया है जो ॥ ८४ ॥
पिछला कहना कितना । इसीमें कहा है अर्जुन ।
वृक्षाकार रूप कारण । प्रस्तुत यहां ॥ ८५ ॥
यह सब है जो साकार । देह-कल्पनासे नगर ।
बन गया तदनुसार । चैतन्य आप ॥ ८६ ॥
जैसे कूपमें बन आप ही बिंब । सिंह करता प्रतिबिंबसे क्षोभ ।
फिर उसी क्षेत्रसे है समारंभ । करता कूदनेका ॥ ८७ ॥
या सलिलमें पूर्वका जो होता । व्योम पर व्योम प्रतिबिंबित ।
वैसे अद्वैत होकर भोगता । द्वैत आप ॥ ८८ ॥
अर्जुन ! जो इस प्रकार । पुर कल्पनासे साकार ।
करता आत्मा निद्रा घोर । विस्मृतिकी वहां ॥ ८९ ॥
स्वप्नमें शय्या देख जैसे । स्वप्नमें सो जाते हैं वैसे ।
नगरमें शयन ऐसे । होता आत्माका ॥ ४९० ॥
फिर वह निद्रा मदमें । सुखी या दुखी माननेमें ।
अहंकारकी समाधिमें । बकता जाता ॥ ९१ ॥
यह जनक या यह माता । यह पुत्र वित्त तथा कांता ।
मैं काला गोरा हीन या शास्ता । मेरा है यह सब ॥ ९२ ॥
ऐसे स्वप्नाश्व पर हो सवार । दौड़ता जो स्वर्ग और संसार ।
उस जीवका नाम धनुर्धर । है क्षर पुरुष ॥ ९३ ॥
अब तू सुन यह पार्थ । क्षेत्रज्ञ है जो कहलाता ।
या जिसको जीव कहता । सारा विश्व ॥ ९४ ॥
अपना रूप जो भूल जाता । सर्व-भूतत्व अनुसरता ।
वह चैतन्य है कहलाता । क्षर पुरुष ॥ ९५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१४