ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
स्व-शन उसका सु-कुमार । मानो मुख है प्रेमका घर ।
माधुर्यमें आये हैं अंकुर । ऐसे वे दांत ॥ ६१ ॥
आगे आगे चूता स्नेह-निर्झर । पीछे पीछे चलते हैं अक्षर ।
तब होता शब्दोंका अवतार । पहले आती कृपा ॥ ६२ ॥
उसका बोलना ही नहीं । बोलना चाहता जो कहीं ।
तो बोलना किसीको नहीं । चुभेगा कभी ॥ ६३ ॥
बोलनेमें होता क्या अधिक । चुभता क्या कोई बोल एक ।
होता क्या कोई सुन साशंका । रहता सावधान ॥ ६४ ॥
प्रतिपादित बात टूटेगी । किसीमें भीति उदित होगी ।
अन्य-बात उपेक्षित होगी । यही मनमें ॥ ६५ ॥
किसीका मन नहीं दुखाना । किसीकी भृकुटी न ऊठना ।
मनमें ही सोझता रहना । स्वस्थतासे ॥ ६६ ॥
कोई उनसे विनय करता । तब जो वह बोलने लगता ।
सुननेवाला है अनुभवता । यह है माय-बाप ॥ ६७ ॥
मानो नाद-ब्रह्मने लिया आकार । अथवा है गंगा-जलके तुषार ।
पतिव्रताका निर्मल मनोहर । वार्धक्य आया ॥ ६८ ॥
वैसा सत्य और कोमल । हित-मित किंतु सरल ।
मानो बोल होते कल्लोल । अमृतके हैं ॥ ६९ ॥
उपरोध विवाद बल । प्राणि-तापदायक बोल ।
उपहास शब्दका शूल । तथा मर्म-स्पर्शी ॥ २७० ॥
हठ आवेश कपट छल । आशा शंका प्रतारणा-बोल ।
ये अवगुण तज सरल । बोलता वह ॥ ७१ ॥
ज्ञानी-अहिंसकका देखना—
वैसे ही उसकी पार्थ । होती है दृष्टि सतत ।
भृकुटिसे होती मुक्त । सर्वत्र ही ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५२
प्राणिमात्र है ब्रह्मका स्थान । उसे होगी दृष्टिकी चुभन ।
इसीलिये है वह अर्जुन । न देखता कभी ॥ ७३ ॥
कहीं कभी किसी समय । हृदयसे हो कृपामय ।
खुले नयन सुखमय । तभी देखा ॥ ७४ ॥
चंद्र-बिंबसे स्रवती धार । न होती यदि वह गोचर ।
किंतु उससे होते चकोर । परिपुष्ट ॥ ७५ ॥
प्राणिमात्रका ऐसा होता । जब किसीको है देखता ।
ऐसी अवलोकन-प्रथा । न जाने कूर्मी-भी ॥ ७६ ॥
उसकी दृष्टि ऐसी है । सब भूतोंके प्रति है ।
उसके हाथ कैसे हैं । कहता अब ॥ ७७ ॥
ज्ञानी-अहिंसककी कार्य-प्रणाली--
होकर सदैव कृतार्थ । रहे सिद्धके मनोरथ ।
वैसे उसके होते हाथ । निष्व्यापार ॥ ७८ ॥
जैसे अंधेने छोड़ा देखना । निरिंधन अग्निका बुझना ।
अथवा गूंगेका मौन लेना । वैसे उसका ॥ ७९ ॥
इस भांति कुछ कहीं । उसको करना नहीं ।
आते हैं सब ही वहीं । बैठने हेतु ॥ २८० ॥
लगेगा झटका पवनको । या नख लगेंगे आकाशको ।
इस भावसे वह हाथको । हिलाता ही नहीं ॥ ८१ ॥
शरीरसे प्राणियोंको हटाना । या आंखोंसे धुर धुरे उड़ाना ।
या पशु पक्षियोंको देखना । इसी भावसे ॥ ८२ ॥
ऐसी है जिसकी बात । न लेता दंड या बेंत ।
कैसा लेगा वह पार्थ । हाथमें शस्त्र ॥ ८३ ॥
लीलासे कमलसे खेलना । सुमन-मालाको भी झेलना ।
उसको भी गोफिया मानना । स्वभाव उसका ॥ ८४ ॥
४५३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
अपने शरीरके रोम हिलेंगे । इसलिये हाथ न सहलायेंगे ।
नखोंके लपट लिपट जायेंगे । उंगुलियों पर ॥ ८५ ॥
करनेको है जहां अभाव । बन गया है ऐसा स्वभाव ।
हाथोंका है तब निज-भाव । जुड़ जाते वे ॥ ८६ ॥
या उठते हैं अभय देने । आर्त दीनकी सेवा करने ।
गिरनेवालोंको संभालने । कभी कभी ॥ ८७ ॥
यह भी वह बलसे करता । आर्तका भय दुख हरता ।
उस हस्त-स्पर्शकी शीतलता । न जाने चंद्रमा भी ॥ ८८ ॥
उसका वह स्पर्श पाकर । लगे मलयानिलय कठोर ।
सहलाता हो प्रेम विभोर । पशुको भी ॥ ८९ ॥
हाथ जो रीता सदा खुला । चंदनांग जैसे निर्मल ।
न फलनेपे भी निष्फल । कह सकते नहीं ॥ २९० ॥
रहने दो यह वाग्जाल । जाने उसके करतब ।
जैसे है सज्जनोंका शील । स्वभाव वैसे ॥ ९१ ॥
ज्ञानीके अहिंसक मनका स्वरूप—
अब कहूंगा मनका लक्षण । यह कहना भी है विलक्षण ।
अब तक किया जो निरूपण । किसका विलास ॥ ९२ ॥
शाखा नहीं हैं क्या तरूवर । जल बिन होता क्या सागर ।
या तेज बिन क्या तेजाकार । संभव है क्या ॥ ९३ ॥
अवयव और शरीर । नहीं क्या एक ही आधार ।
अथवा रस और नीर । भिन्न है क्या ॥ ९४ ॥
इसीलिये यहां सर्व । कहे हैं जो बाह्य भाव ।
मन ही वे सावयव । ऐसे जानना ॥ ९५ ॥
जिस बीजका किया रोपन । फैला वही शाखा रूप बन ।
वैसे इंद्रियोंसे प्रसरण । होता मनका ही ॥ ९६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५४
अजी ! मनमें ही जो नहीं । अहिंसाका नाम भी कहीं ।
बाहर प्रगटे भी वही । कहो कैसे ॥ ९७ ॥
होती है जिसकी चाह पार्थ । वृत्ति वह मनमें उदित ।
होती वह फिर प्रकाशित । वाचादि इंद्रियोंसे ॥ ९८ ॥
मनमें जो है ही नहीं । वाचादिसे क्या कभी कहीं ।
बीज बिन अंकुर कहीं । उगता है क्या ॥ ९९ ॥
उगम ही जहां सूख जाता । प्रवाह कहो कैसे बहता ।
जीव आने पर भी क्या होता । कहीं उद्योग ॥ ३०० ॥
मनका जब ममत्व टूटता । इंद्रियोंका व्यापार ही मिटता ।
सूत्रधार बिना नहीं चलता । गुड़ियाका खेल ॥ १ ॥
मन है वैसे पांडव । उसका मूल इंद्रिय भाव ।
व्यापार करता यही सर्व । इंद्रियों द्वारा ॥ २ ॥
किंतु जो समयके अनुसार । वासना रूप बनके अंदर ।
कार्य था वह रूपसे बाहर । आता इंद्रियोंसे ॥ ३ ॥
इसीलिये मनमें यथार्थ । होती है अहिंसा विकसित ।
पक्व सुगंध हो उल्लसित । फैलता वैसे ॥ ४ ॥
इन्द्रियां ही मनकी 'संपदा । बेचती हैं सर्वत्र सर्वदा ।
और है जो अहिंसाका धंदा । करती रहती हैं ॥ ५ ॥
जब आता समुद्रमें उभार । भरते हैं आखात चहूं ओर ।
स्व-संपत्तिसे चित्त बार बार । भरता इन्द्रियोंको ॥ ६ ॥
अजी ! जैसे सदा पंडित । बालकका पकड हाथ ।
अक्षर करता है व्यक्त । अपने आप ॥ ७ ॥
वैसे अपना दयालूपन । हाथ पैरमें लाता है मन ।
करता फिर वहां उत्पन्न । अहिंसाके ॥ ८ ॥
इससे किया मैंने अर्जुन । इन्द्रियोंका अहिंसा-वर्णन ।
इससे है मनका दर्शन । होता स्पष्ट ॥ ९ ॥
४५५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इस भांति तन मन वचन । करता है दंड-त्याग अर्जुन ।
इसका ही होगा वहां दर्शन । सदा सर्वत्र ॥ ३१० ॥
ऐसा पुरुष है चर । ज्ञानका ही है मंदिर ।
यह है वह धनुर्धर । स्वयं ज्ञान-मूर्ति ॥ ११ ॥
करते जो अहिंसाका श्रवण । या ग्रंथोंमें होता है निरूपण ।
करना हो तो उसका दर्शन । इसीमें होगा ॥ १२ ॥
अहिंसा विवेचनमें वाग्विस्तारकी क्षमायाचना
कहना था देवका एक वचन । किया मैंने सुविस्तृत विवेचन ।
इसलिये करता क्षमा-याचन । आपसे मैं ॥ १३ ॥
हराभरा चारा देख जानवर । भूल जाता है लौट आना जो घर ।
पवन-गतिमें उड़ता अंबर । इससे दूर जाता पंछी ॥ १४ ॥
वैसे है प्रेमकी स्फूर्ति । खिलाती है रस-वृत्ति ।
बहते जाती है मति । स्वैर भावसे ॥ १५ ॥
वैसे भी नहीं अवधार । स-कारण किया विस्तार ।
वैसे शब्दके हैं अक्षर । केवल तीन ॥ १६ ॥
अजी ! शब्द है अहिंसा साधारण । उसपे पडा मतोंका आवरण ।
करनेसे उन मतोंका खंडन । स्पष्ट होता भाव ॥ १७ ॥
वैसे प्राप्त जो मत-मतांतर । उसका निरसन नहीं कर ।
अपनी भी बात कही दो-चार । न चलेगा वहां ॥ १८ ॥
अजी ! रत्न-पारखियोंके गांवमें । गांठसे गंडकी खोले बेचनेमें ।
अधुरा भान स्तवन करनेमें । न करें क्या स्तुति शारदाकी ॥ १९ ॥
सुगंध मंद है कर्पूरमें । कहते हैं जिस समाजमें ।
आटेको कपूर कहनेमें । धैर्य हो कसे ॥ ३२० ॥
इसीलिए सभामें ऐसे । मात्र बातूनी बननेसे ।
मिले आपका प्रेम कैसे । तभी बोला प्रभु ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५६
सामान्य और विशेष एक । मिलाया हुवा जो आप देख ।
उसको कानसे मुख तक । न ले जायेंगे ॥ २२ ॥
ग्रसता संदेहका खल-मल । जब शुध्द-प्रमेय जो निर्मल ।
पैरोंकी स्फूर्ति आती उसी पल । पीछे भागनेकी ॥ २३ ॥
अजी ! जल-कुंभीसे । ढके हुए नीरसे ।
कभी न करे जैसे । क्रीडा हंस ॥ २४ ॥
चांदनी जो बादल पारसे । उसको नहीं देखता जैसे ।
आंख उठाकर कौतुकसे । चकोर पक्षी कभी ॥ २५ ॥
वैसे आप नहीं लेंगे पास । इस ग्रंथको इच्छासे खास ।
करेंगे सक्रोध उपहास । सा-शंक निरूपणपे ॥ २६ ॥
न कर संदेह निवारण । किया हो तो मैंने निरूपण ।
उससे कभी आपका मन । मिलेगा क्या मुझको ? ॥ २७ ॥
तथा मेरा जो यह् संपूर्ण । कहनेका है सब कारण ।
आपका प्रसाद प्रति-क्षण । सदा सन्मुख हो ॥ २८ ॥
गीतार्थ आपको प्रिय मान । गीताको किया आश्रय-स्थान ।
तथा मान मैं प्राण-समान । बोलता हूं आपसे ॥ २९ ॥
आप अपना जो सर्वस्व देंगे । अपना स्वत्व यह् छुडालेंगे ।
ग्रंथ नहीं यह् बंधक मानेंगे । सर्व-भावसे ॥ ३३० ॥
अपने सर्वस्वका लोभ धरेंगे । या बंधकका अनादर करेंगे ।
गीता तथा मेरी भी आप मानेंगे । एक ही गति ॥ ३१ ॥
चाहता हूं मैं केवल । कृपा आपकी निर्मल ।
इसीलिये मैं ये बोल । बोलता हूं ॥ ३२ ॥
बैठे हैं आप रसिक जन । आपके योग्य देना व्याख्यान ।
तभी मतांतरका कथन । किया सब ॥ ३३ ॥
इससे कथा-विस्तार भया । श्लोकार्थसे कुछ दूर गया ।
सो मैंने क्षमायाचन किया । आपत्य-भावसे ॥ ३४ ॥
४५७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(58)
अजी ! कौरमें जब कंकड आता । उसको दूर करना ही पडता ।
उसे निकालनेमें समय जाता । दूषण है क्या यह ? ॥ ३५ ॥
बालक जब चोरसे बचकर । आता है अपने घर कर देर ।
माता नहीं बोलती डांट कर । प्रसन्न हो कहती आया ! ॥ ३६ ॥
किंतु यह बात ऐसी नहीं है । आपने सहा जो भला किया है।
भगवानने जो आगे कहा है । वह सुनिये अब ॥ ३७ ॥
कहता उन्मेख सुलोचन । सावध हो तू अर्जुन ।
कहूंगा अब तुझे ज्ञान । परिपूर्ण जो ॥ ३८ ॥
४ ज्ञानका लक्षण, शांति-
बिन आक्रोश जहां । क्षमा होती है कहां ।
ज्ञान होता है वहां । जान निश्चित ॥ ३९ ॥
गहरे सरोवरमें जैसे । कमलिनी बढती है वैसे ।
या सुदैवीके घरमें जैसे । बढती संपत्ति ॥ ३४० ॥
उसी भांतिसे हे पार्थ । बढती क्षमा यथार्थ ।
उसके लक्षण सार्थ । कहते अब ॥ ४१ ॥
जैसे प्रिय-भूषण । करते हैं धारण ।
वैसे है जो सहन । करता सर्व ॥ ४२ ॥
त्रिविध तापोंका संपूर्ण । हुवा उनपे आक्रमण ।
तो भी उसका चित्त जान । नहीं होता चंचल ॥ ४३ ॥
अपेक्षित पाके मन । होता है जैसे प्रसन्न ।
अनपेक्षितका जान । वही आदर ॥ ४४ ॥
मानापमानको जो सहता । सुख दुःखको है समा लेता ।
निंदा-स्तुतिको भी मानता । एक समान ॥ ४५ ॥
उष्मासे जो न तपता । शीतसे जो न कांपता ।
न किसीसे है डरता । किसी समय ॥ ४६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५८
अपने शिखरोंका जो भार । नहीं जानता है गिरिवर ।
भूमिका बोझ वराहावतार । नहीं जानता जैसे ॥ ४७ ॥
अनेक भूतोंके भारसे । पृथ्वी नहीं दबती जैसे ।
वह भी अनेक द्वंद्वोंसे । दबता नहीं ॥ ४८ ॥
नदी नद अनेक आते । जल-प्रवाह तीव्र लाते ।
समुद्र उसे समा लेते । अपनेमें जैसे ॥ ४९ ॥
वैसे उसके पास कभी कहीं । न सहना ऐसे कुछ भी नहीं ।
सहता जो कुछ है सभी कहीं । स्मरण भी न रखता ॥ ३५० ॥
उसको जो कुछ भी मिलता । उसको अपना कर लेता ।
सहनेका वहां नहीं पता । रहता कहीं ॥ ५१ ॥
यह जो अनाक्रोश क्षमा । जिसके पास प्रियोत्तम ।
जान तू वह है महिमा । ज्ञानका ही ॥ ५२ ॥
ऐसा पुरुष अर्जुन । ज्ञानका मानो जीवन ।
अब करें विवेचन । आर्जवका ॥ ५३ ॥
५ ज्ञानका लक्षण, ऋजुता --
जान तू आर्जव है ऐसे । प्राणका सौजन्य हो जैसे ।
सबपे यह समान-से । रहता जान ॥ ५४ ॥
जैसे मुख देखकर प्रकाश । नहीं देता जिस भांति चंडांश ।
विश्वको एकसा ही अवकाश । जैसे देता गगन ॥ ५५ ॥
ऐसे होता इसका मन । सबसे एक ही समान ।
तथा वैसा होता वर्तन । एकसा ही ॥ ५६ ॥
जगतसे उसका परिचय । निकट का नाता है अतिशय ।
भाषा नहीं वहां आप-परया । सुननेमें आती ॥ ५७ ॥
मेल मिलाप सबसे । पानीका रहता जैसे ।
चित्तमें विकल्प ऐसे । रहता नहीं ॥ ५८ ॥
४५९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
चलता है जैसे पवन । वैसा है उसका मन ।
संदेह लोभ कभी न । करता वह ॥ ५९ ॥
माताके सम्मुख बालक । आता है जैसे निःशंक ।
वैसे ही लोगोंके सम्मुख । उसके विचार ॥ ३६० ॥
कमलिनी जैसे ही सु-विकसित । न करती सुगंध संकुचित ।
वैसे ही नहीं रहता गुपित । अंतःकरण उसका ॥ ६१ ॥
निर्मलता जो रत्नोंकी । रत्नसे भी किरणोंकी ।
आगे होती है मनकी । तथा है कृति ॥ ६२ ॥
सदा वह संकल्प रहित । रहता आत्मानुभव तृप्त ।
नहीं लीपता उसका चित्त । तथा तजता नहीं ॥ ६३ ॥
झेंप कभी दृष्टिमें । संदिग्धता वाणीमें ।
हीन-बुद्धि मनमें । नहीं आती ॥ ६४ ॥
इंद्रियां सभी प्रांजल । निष्प्रपंच औ' निर्मल ।
पंच-प्राण सर्व-काल । रहते मुक्त ॥ ६५ ॥
जैसे अमृतकी धार । वैसे उसका अंतर ।
या इन चिन्होंका घर । होता है वह ॥ ६६ ॥
ऐसा पुरुष धनुर्धर । ऋजुताका है अवतार ।
या ज्ञानने किया घर । उसमें सदैव ॥ ६६ ॥
६ ज्ञानका लक्षण, आचार्योपासना-गुरुभक्ति—
अब मैं इसके अनंतर । कहता गुरु-भक्ति-प्रकार ।
उनको सुन चित्त देकर । धनंजय तू ॥ ६८ ॥
मानो सभी प्रकारके सुदैव । जन्म देती है यह गुरु-सेवा ।
तथा पाता शोकाकुल जीव । ब्रह्म-पद परम ॥ ६९ ॥
कहता हूं आचार्योपासना । प्रकट रूपमें मैं अर्जुन ।
चित्त देकर इसे सुनना । निष्ठा-पूर्वक ॥ ३७० ॥
ज्ञानेश्वरी ४६०
समर्पण भाव-
जैसे सकल जल समृद्धि । लेके घुसती गंगा उदधि ।
या ब्रह्म-पदमें वेद-बुद्धि । करती प्रवेश ॥ ७१ ॥
था लपेटकर संपूर्ण जीवित । सर्वस्व गुण अवगुण सहित ।
करती है अपने सह अर्पित । पतिव्रता पतिको ॥ ७२ ॥
वैसे ही सर्वस्व अपना । गुरु-कुलको समर्पना ।
गुरु-भक्ति गृह बनाना । अपनेको ही ॥ ७३ ॥
गुरु-गृह वियोग-
जो है गुरु-गृहका देश । उससे भरता मानस ।
विरहिणीका मानस । प्रियसे जैसे ॥ ७४ ॥
गुरु-गृहसे जो आता पवन । देख उसका करके सम्मान ।
सनम्र कहता कर नमन । घर पधारिये ॥ ७५ ॥
गुरु-गृहका पागलपन । भाता उस ओरका वचन ।
अमानत जो रखता प्राण । गुरु-गृहमें ही ॥ ७६ ॥
गुरु-आज्ञाने मानो पकड़ा । देहको गावमें है जकड़ा ।
पगहासे गोठेमें बछडा । उसी भांति ॥ ७७ ॥
कब यह बंधन हटेगा । गुरुका दर्शन कब होगा ।
उसको निमिष भी बनेगा । युगसे बडा ॥ ७८ ॥
मानो गुरु-ग्रामसे कोई आया । अथवा गुरुने ही भेज दिया ।
हतायुको आयुष्य मिल गया । ऐसा होता है ॥ ७९ ॥
या सूकता हुवा अंकुर । पा लेता है जलकी धार ।
या अल्पोदकसे सागर । आयी मछली ॥ ३८० ॥
या रंकने पाया निधान । या अंधेने पाये नयन ।
भिक्षुकने पाया महान । इंद्र-पद जैसे ॥ ८१ ॥
नाम सुन ऐसे गुरु-कुलका । महा-सुख बढ़ता उसका ।
मानो आलिंगन गगनका । लिया जैसे ॥ ८२ ॥
४६१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
गुरुकुलमें ऐसी जिसकी । ममता देखता तू उसकी ।
सेवा करता ज्ञान सदाकी । जान तू पार्थ ॥८३॥
गुरुकी मानस पूजा—
तथा जो हृदय-मध्यमें । डूबकर गुरु-प्रेममें ।
लीन होना उपासनामें । गुरुकी नित ॥ ८४ ॥
हृदय-शुद्धिका जो मंदिर । आराध्य जो वहां गुरुबर ।
सर्व-भावसे हे परिवार । बनता आप ॥ ८५ ॥
अथवा हे ज्ञानका मंदिर । उसमें आनंद पीठपर ।
ध्यानामृत-स्नान निरंतर । करता गुरु लिंगका ॥ ८६ ॥
उदय होते ही बोधार्क । बुद्धिके अक्षत सात्विक ।
भरके चढ़ाता त्रंबक- । पर लक्षावधि ॥ ८७ ॥
शुद्ध- त्रिकालमें निरंतर । जीव-दशा धूप जलाकर ।
जलाके ज्ञानारती कर्पूर । उतारता है ॥ ८८ ॥
सामरस्यका रस-पूर्ण । नैवेद्य कर समर्पण ।
आप बन पूजा-ब्राह्मण । गुरुको लिंग ॥ ८९ ॥
गुरुकी मधुरा-भक्ति—
अथवा जीवकी शैया पर । गुरु-पतिका आश्रय कर ।
प्रेम-भोग लेता निरंतर । बुद्धिसे जो ॥ ३९० ॥
कभी किसी समयमें ऐसे । अनुराग भरे हृदयसे ।
गुरु-स्मरण होता है जिसे । कहे क्षीर-सागर ॥ ९१ ॥
जहां ध्येय-ध्यान अति सुख । शेष-शैया पर जो निर्दोष ।
पहुढा है जो उसको देख । माना है श्री गुरु ॥ ९२ ॥
गुरुकी सेव्य-सेवक तथा वात्सल्य-भक्ति—
चरण-सेवामें वहां लीन । लक्ष्मीको अपना रूप मान ।
गरुड हो करता नमन । आप ही जो ॥ ९३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६२
नाभीमें स्वयं जन्म लेता । गुरु-प्रेममें जो रमता ।
ध्यान-सुख अनुभवता । चितमें सदा ॥ ९४ ॥
कभी अपने भाव-बलसे । माता मान श्रीगुरुको जैसे ।
स्तन-पानके भावोन्मादसे । लेटता गोदमें ॥ ९५ ॥
या देख चैतन्य-तरुकी छाया । बनाके गुरु-कामधेनु गाय ।
बछडा बन आप पीछे गया । कल्पनामें गुरुके ॥ ९६ ॥
या मान गुरु-कृपा स्नेह-नीर । स्वयं बन उसमें जलचर ।
करता भक्ति-क्रीडा-विहार । कभी कल्पनासे ॥ ९७ ॥
होती गुरु-कृपा अमृत-वृष्टि । आप होता है सेवा-वृत्तिकी सृष्टि ।
इस प्रकारके संकल्पमें तुष्टि । पाता रहता वह ॥ ९८ ॥
बनता कुक्षि पक्ष बिन चेंदुवा । अपने मनमें वह है पांडव ।
उसके अथाह प्रेम-वैभव । इस भांतिके ॥ ९९ ॥
गुरुको पक्षिणी कर । चारा लेता चंचु पर ।
गुरुका जहाज कर । तरता आप ॥ ४०० ॥
गुरु-चिंतन, प्रसाद-सेवन --
जैसा भरा हुवा पूर्ण सागर । प्रसवता लहरपे लहर ।
वैसे ही ध्यानसे ध्यान-विचार । उमडते आते ॥ १ ॥
सदैव वह इस भांति । अंतरमें श्री गुरु-मूर्ति ।
भोगता अब बाह्यावर्ती । कैसे सुन तू ॥ २ ॥
करता मनमें निश्चय एक । करूंगा मैं गुरु-सेवा नेक ।
जिससे कहे गुरु स-कौतुक । कुछ मांग ले तू ॥ ३ ॥
देख ऐसी सबी उपासना । कहेंगे श्री गुरु हो प्रसन्न ।
तब करूंगा नम्र प्रार्थना । इस भांति मैं ॥ ४ ॥
कहूंगा श्री गुरुवर । मुझे देना ऐसा वर ।
बनूं सारा परिवार । मैं ही आपका ॥ ५ ॥
४६३ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग
तथा उपयोगी वस्तु आपके । उपकरण सभी यहांके ।
मेरे ही रूप बने उसके । आपकी कृपासे ॥ ६ ॥
ऐसा म मांगूंगा वर । हां कहेंगे गुरु वर ।
फिर वह परिवार । बनूंगा मैं ॥ ७ ॥
गुरु-जीवनमें संपूर्ण समरसता—
उपकरण जात सकल । बन जाऊंगा मैं ही केवल ।
शुश्रूशा होगी तब सकल । वैभव-युक्त बन ॥ ८ ॥
गुरुवर माय अनेकोंकी । किंतु कर लूंगा मैं एककी ।
रज बनके पद-तलकी । उनकी कृपासे ॥ ९ ॥
पगलाऊंगा गुरु-अनुराग । लेंगे वे एक पत्नी-योग ।
मुझमें गुरु-अनुराग । लेगा क्षेत्र-संन्यास ॥ ४१० ॥
कितना ही बहे समीर । चार दिशाओंके अंदर ।
वैसे गुरु-कृपा-पंजर । बनूंगा मैं ॥ ११ ॥
अपने गुणोंका कर भूषण । गुरु-सेवा-स्वामिनीके चरण ।
सजाऊंगा बन मैं आच्छादन । भक्ति-पूर्वक ॥ १२ ॥
गुरु-स्नेहकी होगी वृष्टि । तले मैं पृथ्वी बन तुष्टि ।
पावुं ऐसी इच्छाकी सृष्टि । करता रहता ॥ १३ ॥
तथा श्रीगुरुका भवन । आप ही मैं सर्वस्व बन ।
करूंगा दास्य अनु दिन । वहांका सारा ॥ १४ ॥
आने जानेमें दातार । करेंगे देहरी पार ।
बनूंगा उसका द्वार । तथा द्वार-पाल ॥ १५ ॥
मैं गुरु-पादुका बनूंगा । उनको मैं ही चढ़ाऊंगा ।
छत्र-चामर भी बनूंगा । बारिबारिसे ॥ १६ ॥
बनूंगा मैं पथ-दर्शक । चंवर-धर हस्तक ।
औ' हाथमें ले दीपक । चलूंगा मैं ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६४
उनकी झारी बनूंगा । कुल्लेका पानी भी दूंगा ।
कुल्ल-पडगा भी बनूंगा । बनूंगा सर्वस ॥ १८ ॥
बांधूंगा हडप मैं । झेलूंगा थूक भी मैं ।
करूंगा दासता मैं । स्नानादीकी ॥ १९ ॥
बनूंगा गुरुका आसन । अलंकारिक परिधान ।
उपचारार्थ मैं चंदन । बन जाऊंगा ॥ ४२० ॥
बनूंगा रसोईदार । वैसे ही मैं उपहार ।
आरती मैं बनकर । उतारूं श्री गुरुको ॥ २१ ॥
श्री गुरु करेंगे आरोगन । मै ही बनूंगा पंगत-जन ।
मैं दूंगा भोजनोत्तर पान । आगे बढकर ॥ २२ ॥
उठाऊंगा मैं जूठन । सेज पर बिछावन ।
तथा चरण-सेवन । करूंगा मैं ही ॥ २३ ॥
आप बनूंगा मैं सिंहासन । करेंगे श्री गुरु आरोहण ।
तब होगा पूर्णत्व ही जान । सेवा-धर्मका ॥ २४ ॥
तथा श्री गुरूका मन । करेगा किसीका ध्यान ।
विषय जो विलक्षण । बन जाऊं मैं ॥ २५ ॥
श्रवणांगणमें श्री गुरूके । बनूंगा शब्द लक्षके ।
स्पर्श होगा जहां अंगांगके । बनूंग मैं वह ॥ २६ ॥
तथा श्रीगुरुके नयन । स्नेह-पूर्ण अवलोकन ।
करेंगे जो रूप-दर्शन । बनूंगा मैं आप ॥ २७ ॥
उनकी रसनाको जो रुचेगा । सभी वे रस मैं बन जाऊंगा ।
सुगंध-रूपसे मैं ही करूंगा । घ्राण-सेवा ॥ २८ ॥
ऐसे ब्रह्म-मनोगत । श्रीगुरु-सेवा समस्त ।
बनकर वस्तु जात । करूंगा मैं ॥ २९ ॥
जब तक रहेगा यह शरीर । तब तक होगी सेवा भी सुंदर ।
देहांत पर होगा जो चमत्कार । सुनो बुध्दिका ॥ ४३० ॥
४६५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(59)
रज कण बनाके मैं तन । एकत्र करुंग उसी स्थान ।
पड़ेंगे श्री गुरुके चरण । जिस स्थानपे ॥ ३१ ॥
मेरे श्री गुरु स-कौतुक । करेंगे स्पर्श जो उदक ।
वहां ले जाऊंगा मैं ठीक । प्रवाहमें आप ॥ ३२ ॥
श्री गुरुकी जहां होती आरती । या गुरु-गृहमें जली ज्योति ।
बनाऊंगा उन दीपोंकी दीप्ति । अपने तेजसे ॥ ३३ ॥
झलते हैं जहां उनपे चंवर । लय करुंग वहां मैं प्राण-सार ।
पाऊंगा ऐसा मैं सेवाका आधार । श्रीगुरु चरणका ॥ ३४॥
करेंगे जहां जहां भी गुरु वास । वहां लय करूं शून्यमें आकाश ।
शरीर-गत पंच-तत्व विशेष । ले जाऊं श्री चरणोंमें ॥ ३५॥
जीकर या मरकर सतत । करूं ऐसे श्री गुरु-सेवा-व्रत ।
नहीं छोडूंगा औरोंको निश्चित । कल्पांतमें भी ॥ ३६ ॥
ऐसा जो धैर्य-संपन्न । सेवा-निरत है मन ।
होता है सीमा-विहीन । वह अपार ॥ ३७ ॥
रात्र-दिवस न जानता । अल्प बहुत न कहता ।
गुरु-आज्ञासे है खिलता । अधिकाधिक वह ॥ ३८ ॥
कार्य जो उसके निमित्त । होता गगनसे विस्तृत ।
करता अकेला समस्त । एक ही समयमें ॥ ३९ ॥
हृदयसे आगे दौड़ता । शरीर काजमें लगता ।
मनसे ही दौड़ा करता । काम करनेमें ॥ ४४० ॥
कभी कभी किसी काल । सुन श्री गुरुके बोल ।
करें अपना सकल । न्योच्छावर ॥ ४१ ॥
गुरु-सेवामें जो कृश । गुरु-प्रेममें संतोष ।
गुरु आज्ञामें निवास । करता आप ॥ ४२ ॥
गुरु-कुलमें जो स्व-कुलीन । गुरु-बंधु सौजन्य-सुजन ।
गुरु-सेवा व्यसनमें लीन । निरंतर जो ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६६
गुरु-संप्रदाय है धर्म । वही उसका वर्णाश्रम ।
गुरु-सेवा ही नित्य-कर्म । उसके लिये ॥ ४४ ॥
गुरु-क्षेत्र गुरु-देवता । गुरु ही माता तथा पिता ।
इसके बिना न जानता । मार्ग अन्य ॥ ४५ ॥
श्री गुरुका ही है द्वार । उसका सर्वस्व-सार ।
गुरु-दास सहोदर । मानता प्रेमसे ॥ ४६ ॥
सदैव जिसका वक्त्र । गाता गुरु-नाम-मंत्र ।
गुरु-वाक्य बिन शास्त्र । न छूता जो ॥ ४७ ॥
श्री गुरुका पादोदक । जैसे भी हो जो उदक ।
सब तीर्थसे अधिक । मानता वह ॥ ४८ ॥
श्री गुरुका वह जूठन । सहसा पाकर प्रसन्न ।
होकर समाधि भी लीन । मानता वह ॥ ४९ ॥
गुरु-चरणके जो रज-कण । उडाता ज्यों सहज श्रीचरण ।
तदर्थ कैवल्य-सुख-दान । करता वह लीलासे ॥ ४५० ॥
अजी ! करना कितना विस्तार । गुरु-भक्तिका नहीं ओर-छोर ।
लहराया गुरु-भक्ति-सागर । कहा गया इतना ॥ ५१ ॥
जिसे प्रेम है इस भक्तिका । औत्सुक्य भी इस विषयका ।
रस न आता बिना सेवाका । चित्तमें अन्य ॥ ५२ ॥
तत्व-ज्ञानका वह आधार । ज्ञान लेता उससे आकार ।
ऐसा वह प्रत्यक्ष ईश्वर । ज्ञान उसका भक्त ॥ ५३ ॥
जान देता वहां साक्षात्कार । प्रत्यक्ष हो ज्ञान मुक्त-द्वार ।
विश्वमें वह अपरंपार । होता इस भांति ॥ ५४ ॥
गुरु-सेवामें मेरा आदर । अंतःकरणमें भर-पूर ।
इसलिये किया है विस्तार । इस विषयका ॥ ५५ ॥
वैसे मैं लूला हूं हाथोंसे । अंधा हूं भजन-ध्यानसे ।
लंगडा हूं गुरु-शुश्रूषासे । ऐसा मंद बुद्धि ॥ ५६ ॥
४६७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
गुरु गुण-गानेमें मै हूं मूक । आलसी ऐसा उदर पोषक ।
मनमें गुरु-अनुराग नेक । रहा सदैव ॥ ५७ ॥
यही है एक कारण । यह शरीर पोषण ।
करना पड़ा रक्षण । कहता ज्ञानदेव ॥ ५८ ॥
करके यह विस्तार सहन । दिया सेवा अवसरका दान ।
अब करूंगा सार्थ कथन । केवल-मात्र ॥ ५९ ॥
अजी ! सुनो सुनो श्रीकृष्ण । वह भूत-भार-सहिष्णु ।
कहता है वह श्रीविष्णु । सुनता पार्थ ॥ ४६० ॥
६ ज्ञानका लक्षण, पावित्र्य—
अजी ! शुचित्व जो है ऐसा। जिसके पास दीखे ऐसा।
तन मन बना हो जैसा । कर्पूरसे ही ॥ ६१॥
अथवा रत्नका है अंकुर । जैसे स्वच्छ अंदर बाहर ।
वैसे ही प्रकाशता भास्कर । अंतरबाह्य ॥ ६२ ॥
कर्मसे शरीर निर्मल । ज्ञानसे हृदय उज्ज्वल ।
अंतर्बाह्य ऐसा सोज्वल । परिशुद्ध ॥ ६३ ॥
मृत्तिका और जल । होता बाहर मेल ।
निर्मल होते बोल । वेदके जैसे ॥ ६४ ॥
चाहे जब बुद्धिका बल । करता दर्पण उज्ज्वल ।
सोंदणी करता उज्वल । कपडेका दाग ॥ ६५ ॥
इस भांति उसका शरीर । कर्मसे हुआ शुद्ध बाहर ।
तथा ज्ञान-दीप है अंतर । तभी परिशुद्ध ॥ ६६ ॥
वैसे सुन तू पांडु-सुता । अंदर जो शुद्ध न होता ।
बाहर जो कर्म करता । वह है उपहास ॥ ६७ ॥
जैसा लाश पर लादा आभूषण । या गर्दभको डाला प्रयाग-स्नान ।
कडुवी तुंबी पर मधु-लेपन । किया वैसे ॥ ६८ ॥
या उजाड-घरमें बंधनवार । अन्न लगाया भूखोंके पेट पर ।
अथवा बिंदी लगायी माथे पर । विधवाने जैसे ॥ ६९ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६८
कलश चढाया कत्थीका पोला । ऊपर चमकता सोना-सा पीला ।
वैसे क्या कामका है चित्रका फल । अंदर है गोबर ॥ ४७० ॥
वैसे है कर्म बाहरका । हीन-वस्तु नहीं मोलका ।
गंगामें धोनेसे मलका । घडा न होता शुद्ध ॥ ७१ ॥
अजी ! अंतर होता ज्ञानसे उज्ज्वल । तभी बाहर होता है कर्म निर्मल ।
किंतु कहां होता ज्ञान-कर्मका मेल । ऐसे संभव ॥ ७२ ॥
इसीलिये बाह्य-भाग । धोया कर्मसे सर्वांग ।
ज्ञानसे मिटाया जंग । अंतरंगका ॥ ७३ ॥
इससे अंतर बाह्य गया । एक निर्मलत्व ही भया ।
अथवा मात्र रह गया । शुचित्व ही ॥ ७४ ॥
सद्-भाव जो जीवगत । बाहर होता है प्रकटित ।
स्फटिक सदनमें स्थित । दीपक जैसे ॥ ७५ ॥
जिससे विकल्प उपजते । व्यर्थके विकार भी उठते ।
कु-प्रवृत्ति-बीजमें फूटते । अंकुर अनेक ॥ ७६ ॥
बात ऐसी सुन या देखता । चितपे तरंग न उठता ।
जैसे आकाश नहीं मलता । बादलोंसे ॥ ७७ ॥
वैसे इंद्रियां भोग-लिप्त । विषय-रत हो सतत ।
किंतु विकार नहीं स्फूर्ते । होते वहां ॥ ७८ ॥
किसी पथ पर किसी दिन । हो भली बुरी स्त्रीका दर्शन ।
नहीं होते विकार उत्पन्न । उसी भांति ॥ ७९ ॥
या पति-पुत्रसे आलिंगन । करे एक ही तरुणांगना ।
पुत्र-भावमें वहां स्फुरण । होता नहीं कामका ॥ ४८० ॥
जिसका हृदय है वैसे निर्मल । संकल्प-विकल्प ज्ञानमें कुशल ।
कृत्य-अकृत्य जानता जो सकल । सभी प्रकारके ॥ ८१ ॥
पानीमें जैसे हीरा नहीं भीगता । उबालनेसे कंकड नहीं गलता ।
वैसे जिसका चित्त नहीं लीपर्ता । विकल्पसे कभी ॥ ८२ ॥
४६९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इसका नाम शुचिता । सार्थ है जान तू पार्थ ।
जहां देखो वहां बसता । निःशंक-ज्ञान ॥ ८३ ॥
८ ज्ञानका लक्षण, स्थैर्य—
तथा स्थैर्य जहां बसता । चित्तका घर बना लेता ।
वह पुरुष जान पार्थ । जीवन ज्ञानका ॥ ८४ ॥
लदा देह कार्य-रत । चलता अपना पथ ।
किंतु होता स्थिर-चित्त । अंतरंगमें ॥ ८५ ॥
बछडे परसे गायकी जैसे । न आती ममता वनमें वैसे ।
सती जानेमें पतिके भोगसे । प्रिय नहीं होते ॥ ८६ ॥
अथवा लोभी जाता है दूर । चित्त रहता गांठ ही पर ।
वैसे चलनेसे भी शरीर । चित्तसे वे अचल ॥ ८७ ॥
चलते रहते हैं बादल । रहता है आकाश निश्चल ।
भ्रमण-चक्रमें अचल । ध्रुव है जैसे ॥ ८८ ॥
पथिकोंका होता आवागमन । साथ पथ न चलता अर्जुन ।
वृक्ष भी नहीं छोडते स्वस्थान । वैसे जान तू ॥ ८९ ॥
वैसे ही चलन-वलनात्मक । शरीर है यह पंच भौतिक ।
पंच-भूतोर्मियोंमें वह एक । रहता है स्थिर ॥ ४९० ॥
जैसे बवंडरका कल्लोल । पृथ्वीको न करते चंचल ।
वैसे उपद्रवोंके उबाल । उसको डिगाते नहीं ॥ ९१ ॥
दैन्य-दुःखमें जो नहीं तपता । भय-शोकमें जो नहीं कांपता ।
शरीरके नाशमें नहीं ढलता । भयसे कभी ॥ ९२ ॥
आशा-आसक्तिके भारसे । वार्धक्य-व्याधिके विशेष भयसे ।
आगे औ' पीछे लगे रहनेसे । रहता जो निश्चल ॥ ९३ ॥
निंदा या तेजोवधसे अपमानित । काम-लोभादिकसे भी जो आच्छादित ।
किंतु अंतरंगमें रहता है शांत । रोम भी हिलता नहीं ॥ ९४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७०
आकाश भी है यदि टूटता । भूमिका मध्य-बिंदु ढलता ।
तो भी परावृत्त नहीं होता । चित्तसे वह ॥ ९५ ॥
हाथी पे किया फूलसे प्रहार । उसको नहीं लगता है मार ।
वैसे तीखे दुर्वचन प्रहार । उसको न करें अशांत ॥ ९६ ॥
जैसे क्षीरार्णव-कल्लोल । न कंपाता मंदराचल ।
या प्रचंड अग्निका ज्वाल । नहीं जलाता आकाश ॥ ९७ ॥
आती जाती है मानो लहर । किंतु चित्त न होता अस्थिर ।
क्षमा-धैर्यका वह आधार । कल्पांतमें भी ॥ ९८ ॥
स्थैर्यकी यह परि-भाषा । कही है मैंने सविशेष ।
देख यह लक्षण-दशा । अति स्पष्ट ॥ ९९ ॥
पराक्रम-पूर्ण यह स्थिरता । अपनेमें जो अंतर्बाह्य पाता ।
ज्ञानका सागर ही बनता । अपने आप ॥ ५०० ॥
९ ज्ञानका लक्षण, इंद्रिय-निग्रह—
सांप जैसे शत्रु का घर । सैनिक अपना हत्यार ।
लोभी अपना भंडार । नहीं भूलते ॥ १ ॥
अथवा इकलौता बालक । माताका सर्वस होता नेक ।
मधुपे जैसे मधु-मक्षिका । लोभिन होती ॥ २ ॥
इस भांति जो अर्जुन । करता स्वचित्त जतन ।
उन्हे न देता कभी स्थान । इन्द्रिय-द्वारमें ॥ ३ ॥
कहुता काम-भकाऊ सुनेगी । या आशाकी चुडैल देखेगी ।
अंतःकरणकी स्थिति जानेगी । इससे डरता हूं ॥ ४ ॥
बाहरकी ढीलको जैसे । साहसी पुरुष भी वैसे ।
मुट्ठीमें ही रखता वैसे । अपनी वृत्तिको ॥ ५ ॥
रखता है संयममें नित । अंतरको रखके सचेत ।
रखता तनको नियमित । आजीवन ॥ ६ ॥
४७१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग