ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 528, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस भांति तन मन वचन । करता है दंड-त्याग अर्जुन ।
इसका ही होगा वहां दर्शन । सदा सर्वत्र ॥ ३१० ॥
ऐसा पुरुष है चर । ज्ञानका ही है मंदिर ।
यह है वह धनुर्धर । स्वयं ज्ञान-मूर्ति ॥ ११ ॥
करते जो अहिंसाका श्रवण । या ग्रंथोंमें होता है निरूपण ।
करना हो तो उसका दर्शन । इसीमें होगा ॥ १२ ॥
अहिंसा विवेचनमें वाग्विस्तारकी क्षमायाचना
कहना था देवका एक वचन । किया मैंने सुविस्तृत विवेचन ।
इसलिये करता क्षमा-याचन । आपसे मैं ॥ १३ ॥
हराभरा चारा देख जानवर । भूल जाता है लौट आना जो घर ।
पवन-गतिमें उड़ता अंबर । इससे दूर जाता पंछी ॥ १४ ॥
वैसे है प्रेमकी स्फूर्ति । खिलाती है रस-वृत्ति ।
बहते जाती है मति । स्वैर भावसे ॥ १५ ॥
वैसे भी नहीं अवधार । स-कारण किया विस्तार ।
वैसे शब्दके हैं अक्षर । केवल तीन ॥ १६ ॥
अजी ! शब्द है अहिंसा साधारण । उसपे पडा मतोंका आवरण ।
करनेसे उन मतोंका खंडन । स्पष्ट होता भाव ॥ १७ ॥
वैसे प्राप्त जो मत-मतांतर । उसका निरसन नहीं कर ।
अपनी भी बात कही दो-चार । न चलेगा वहां ॥ १८ ॥
अजी ! रत्न-पारखियोंके गांवमें । गांठसे गंडकी खोले बेचनेमें ।
अधुरा भान स्तवन करनेमें । न करें क्या स्तुति शारदाकी ॥ १९ ॥
सुगंध मंद है कर्पूरमें । कहते हैं जिस समाजमें ।
आटेको कपूर कहनेमें । धैर्य हो कसे ॥ ३२० ॥
इसीलिए सभामें ऐसे । मात्र बातूनी बननेसे ।
मिले आपका प्रेम कैसे । तभी बोला प्रभु ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५६