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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 495

ऐसा हुआ जब उपशम । मोक्ष-सत्रमें लिखाया नाम ।
हुआ है वह निष्काम-काम । धनंजय ॥ ८४ ॥
अर्जुन वह यहीं पर । सोऽहं भावसे भरकर ।
पहुंच चुका उस पार । द्वैत-भावके ॥ ८५ ॥
किंतु भक्ति-सुखके कारण । कर अपना दो विभाजन ।
सेवा धर्मका अंगीकरण । करता आप ॥ ८६ ॥
अन्यको है मैं कहता । फिर स्तोत्र नहीं होता ।
भक्तिका मार्ग दिखाता । योगी वह ॥ ८७ ॥
हमें है उसका व्यसन । उसका ही निज-ध्यान ।
या उसमें ही समाधान । मिलता हमको ॥ ८८ ॥
उसके लिये रूप-धारण । इस विश्वमें अवतरण ।
न्योछावर है उसपे प्राण । सर्व-भावसे ॥ ८९ ॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥
जो आत्म लाभके समान । सुन्दर कछु नहीं आन ।
तभी भोगमें न दें मन । न हो आनंदित ॥ ९० ॥
आप ही है विश्व बन गया । भेद भाव सहज धो गया ।
तब द्वेश भी है मिट गया । उस पुरुषका ॥ ९१ ॥
जो है अपना संतत्व । कल्पांतमें है अस्तित्व ।
तभी भूतका है स्वत्व । कभी न सोचता ॥ ९२ ॥
तथा उसके परे कुछ भी नहीं । अपना जो है अपने पास यहीं ।
तभी उसकी आकांक्षा है ही नहीं । कुछ भी कभी ॥ ९३ ॥

न उल्लास न संताप न चाह सोच भो नहीं ।
भला बुरा सभी छोडा भजता जो मुझे प्रिय ॥ १७ ॥
४२३ भक्तियोग