ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहा कल्पके उस ओर । यकायक झपट्टा मार ।
प्रहार भद्र जाती पर । किया सत्य लोकके ॥ ६१ ॥
नित-नव नव लोकपाल । तथा दिग्गजोंको यह काल ।
स्वर्ग-काननमें जा विपुल । तोड़ता रहता ॥ ६२ ॥
शरीर-समीरसे इसके । गर्तमें जनम-मरणके ।
भूमिष्ठ पडे निर्जीव होके । जीव-मृग हैं ॥ ६३ ॥
फैला है इसका पंजा । मानो यह है शिंकजा ।
बनाके आकर गज- । करता है ग्रास ॥ ६४ ॥
इसीलिये कालकी सत्ता । कहते हैं हम निश्चित ।
ऐसा वाद है पांडुसुत । इस क्षेत्रका ॥ ६५ ॥
इस क्षेत्रके विषयमें सभी अज्ञानमें हैं—
कर चुका है वाद विपुल । नैमिशारण्यमें ऋषि-कुल ।
पुराण इसके अनुकूल । आधार रूप हैं ॥ ६६ ॥
हैं अनुष्टुप आदि छंद । इस विषयमें विविध ।
होते हैं आधार स-श्रध्द । आज भी लोगोंके ॥ ६७ ॥
वेदोंके बृहत्साम-सूत्र । जो हैं अतिशय पवित्र ।
उसको भी है यह क्षेत्र । अज्ञात-रूप ॥ ६८ ॥
अन्य और अगणित । महा-कवि बुद्धिमंत ।
इसपे अपना मत । देते रहते हैं ॥ ६९ ॥
किंतु यह किसका है । किसके स्वामित्वमें है ।
समझमें न आता है । किसीक भी ॥ ७० ॥
अजी ! यह है जैसे । अब क्षेत्र है कैसे ।
कहता मैं तुझसे । सुन सायन्त ॥ ७१ ॥
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥
पंच भूत अहंकार बुद्धि अव्यक्त मूल जो ।
एकादश इंद्रियोंको खींचे विषय पंचक ॥ ५ ॥
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क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग