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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 494

संतका पावन चरित—
न है उसमें अपेक्षा । वैसी ही नहीं उपेक्षा ।
जीवन बिन आकांक्षा । केवल आत्मोत्कर्ष ॥ ७२ ॥
मोक्ष देनेमें उदार । काशी नामका आदर ।
किंतु उसमें शरीर । त्यजना होगा ॥ ७३ ॥
पाप हरता हिमवंत । भयभीत कर जीवित ।
संतका पावन चरित । वैसा नहीं ॥ ७४ ॥
पावन है गंगोदक । पाप तापका शामक ।
किंतु उसमें है एक । डूबनेका भय ॥ ७५ ॥
गहराई जिसकी अपार । किंतु डूबनेका है डर ।
रोकड़ मोक्षका है घर । जीवनमें ही ॥ ७६ ॥
संतोंके चरण स्पर्शसे । मुक्त है गंगा भी पापसे ।
ऐसे संत-संगके कैसे । कहना शुचित्व ॥ ७७ ॥
अजी ! यह रहने दो अब । बना तीर्थोंका आश्रय सब ।
धोकर मनका मल शुभ- । शुचित्वसे ॥ ७८ ॥
होता तन मनसे निर्मल । सूर्यके समान है उज्ज्वल ।
तत्त्वार्थिथोंमें है पायल । ब्रह्म-धनका ॥ ७९ ॥
व्यापक तथा उदास । रहता जैसे आकाश ।
वैसे उसका मानस । सदा-सर्वत्र ॥ १८० ॥
जो है संसार-व्यथासे मुक्त । निरपेक्षाळंकार-भूषित ।
मानो व्याध-बाणसे विमुक्त । विहंगमसा ॥ ८१ ॥
सुखमें जो है लीन सतत । न होती कभी टीस प्रतीत ।
न जाने जैसे लज्जाको प्रेत । उसी भांति ॥ ८२ ॥
तथा कार्यारंभका है नहीं । अहंकार तनिक भी कहीं ।
जैसा निर्इंधन होके वह्नि । बुझ जाता है ॥ ८३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२२