ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
आत्म-रूपी गणेश वंदन—
आत्म-रूप गणेश स्मरण । जो सकल विद्याधिकरण ।
नमन करें वे श्रीचरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥
करनेसे जिसका स्मरण । शब्द-सृष्टि होती स्वाधीन ।
चढ़ता सारस्वत संपूर्ण । जिह्वा पर ॥ २ ॥
तब है वक्तृत्वकी मधुरता । हठाती अमृतकी मधुरता ।
नव-रस है चूता ही रहता । अक्षरोंसे ॥ ३ ॥
भावोंका अवतरण । स्पष्ट करता है चित्र ।
हस्तामलकसा पूर्ण । होता तत्व-भेद ॥ ४ ॥
श्रीगुरुके जब पाय । पकडता है हृदय ।
महा-भाग्यका समय । उन्मेषका वह ॥ ५ ॥
उनको करके मैं वंदन । पितामहका पिता महान ।
कहता जो श्रीलक्ष्मीरमण । कहूंगा वह ॥ ६ ॥
भगवान उवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
श्रीभगवानने कहा
इस शरीरको पार्थ कहते क्षेत्र जान तू ।
जानता यह जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञ कहते उसे ॥ १ ॥