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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 506

अहंकारसे हो एक । वह भी पूर्णायुतक ।
बुद्धिसे कार्य कृषक । कराया चराचर ॥ ४९ ॥
इस भांति है निराली । बडी संकल्पकी डाली ।
इसीलिये है वह मूली । यहां प्रपंचकी ॥ ५० ॥
ऐसे हैं यह मत-मुक्तक । व्यक्त हुए हैं जब शाब्दिक ।
जी ! आप हैं बडे विचारक । कहते हैं और ॥ ५१ ॥
स्वभाव-वादियोंकी दृष्टिसे--
अजी ! गांवमें पर-तत्वके । पर्यंकको देखें संकल्पके ।
तो क्यों प्रकृति-वादियोंके । तर्क नहीं माने ॥ ५२ ॥
किंतु ऐसा नहीं कहना । इसमें तुम्हें न पडना ।
कहा जायेगा यह पूर्ण । हमसे अब ॥ ५३ ॥
आकाश कहो है कौन । भरता मेघोंसे पूर्ण ।
अधरमें तारा-गण । कौन रखता ॥ ५४ ॥
गगनका यह वितान । किसने ताना महान ।
होता वायुका संचालन । किसकी आज्ञासे ॥ ५५ ॥
रोमोंकी बुवाई करता कौन । समुद्रको सदा भरता कौन ।
पर्जन्य धाराको गिराता कौन । कहो यहां ॥ ५६ ॥
यह क्षेत्र है ऐसा स्वाभाविक । न है कोई इसका मालक ।
पाता है जो करता देखरेख । अन्य नहीं कोई ॥ ५७ ॥
कालवादिकी दृष्टिसे--
कहता है तब और एक । तुम कहते हो बडा नेक ।
कहो कैसे भोगता है एक । केवल काल ॥ ५८ ॥
यह क्रोधी मृत्यु-सिंहका । गह्वर अपना उसका ।
नहीं क्या व्यर्थ प्रलापका । सही उत्तर ॥ ५९ ॥
सभी हैं इसकी मार । देखते हैं अनिवार ।
किंतु स्व-मतपे भार- । वे बोलते हैं ॥ ६० ॥
ज्ञा.-
नेश्वरी
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