ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस पर भी हे पार्थ । मेरे भजनमें आस्था ।
उसको करू मैं माथा । पर मुकुट ॥ १४ ॥
उत्तमको मस्तक । नमाना क्या कौतुक ।
मान देता त्रिलोक । पद रेणुको ॥ १५ ॥
श्रद्धा वस्तुका आदर । करना जानो प्रकार ।
होता है यदि शंकर । श्री गुरु ॥ १६ ॥
रहने दो यह भाषा । करनेमें है प्रशंसा ।
शंभुकी होती सहसा । आत्म-स्तुति ॥ १७ ॥
रहने दो यह उक्ति । कहता है रमापति ।
लेकर करता स्तुति । माथेपे उसे ॥ १८ ॥
अपने भक्तके अलिंगनके लिये दो हाथ कम पडे—
सिद्धि चौथा पुरुषार्थ । लेकर अपने हाथ ।
चला है जो भक्ति-पंथ । देते विश्वको ॥ १९ ॥
कैवल्यका ले अधिकार । करे मोक्षका व्यवहार ।
रहता नम्र जैसा नीर । स्वभावसे ॥ २२० ॥
उसको करूंगा नमस्कार । मुकुट धरूंगा सिरपर ।
चरण हृदय पीठ पर । पूजूंगा मैं ॥ २१ ॥
उसके गुणका भूषण । होगा मेरी वाणीका गान ।
उसकी कीर्तिका श्रवण । प्रेमसे करूंगा ॥ २२ ॥
उसके दर्शनका प्रलोभन । बने मुझ अचक्षुके नयन ।
करूं लीला सुमनसे पूजन । उसका मैं ॥ २३ ॥
अजी ! दो पर दो और । कर लेकर मैं चार ।
आलिंगनार्थ आतुर । आया उसके ॥ २४ ॥
उसके संगके सुखके लिये । आया हूं विदेही मैं देह लिये ।
उसके प्रेम बखानके लिये । वाणी है असमर्थ ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२६