धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
२. अष्टादश अस्त्र-प्रयोग, स्थान-विधान (स्थानक) एवं लक्ष्य-वेध विद्या
हिन्दीटीकासमेता २५
नाराचास्तस्य सिध्यंति यस्य तुष्टो महेश्वरः ॥२३॥
छः महीने में मुट्ठी सिद्ध होती है और बाण एक वर्ष में सिद्ध होते हैं,
नाराच उसके सिद्ध होते हैं, जिस पर श्रीमहादेवजी प्रसन्न हों॥२३॥
पुष्पवद्धारयेद्वाणं सर्पवत्पीडयेद्धनुः ।
धनवच्चिंतयेल्लक्ष्यं यदिच्छेत्सिद्धिमात्मनः ॥२४॥
यदि अपनी सिद्धि चाहे तो फूल की तरह बाण धारण करे, साँप की
तरह धनुष को पीडन करे, धन की तरह लक्ष्य का चिंतन
करे॥२४॥
क्रियामिच्छन्ति चाचार्या दूरमिच्छन्ति भार्गवाः ।
राजानो दृढमिच्छन्ति लक्ष्यमिच्छन्ति चेतरे ॥२५॥
आचार्य तो क्रिया की इच्छा करते हैं और भृगुवंशी बाण दूर जाकर पड़े
यह इच्छा करते हैं, राजा अंग दृढ़ वस्तु कट जाय ऐसी इच्छा करते हैं
और लोग लक्ष्य (निशाना) अच्छा लगे, इसकी इच्छा करते
हैं॥२५॥
जनानां रंजनं येन लक्ष्यपातातप्रजायते ।
हीनेनापीषुणा तस्मात्प्रशस्तं लक्ष्यवेधनम् ॥२६॥
जिस लक्ष्य के मारने से मनुष्यों का चित्त प्रसन्न हो, इससे छोटे बाण से
भी लक्ष्य का बींधना अच्छा है छोटे बाण से निशाना अच्छा बिंधता है
यह बात सिद्ध हुई॥२६॥
अथ लक्ष्यास्खलनविधिः
विशाखस्थानकं हित्वा समसंधानमाचरेत् ।
गोपुच्छमुखबाणेन सिंहकर्णे न मुष्टिना ॥२७॥
आकर्षेत्कौशिकव्याये न शिखाञ्चालयेत्ततः ।
पूर्वापरौ समं कार्यौ समासौ निश्चलौ करौ ॥२८॥
चक्षुषी स्पंदयेन्नैव दृष्टिं लक्ष्ये नियोजयेत् ।
मुष्टिनाऽऽच्छादितं लक्ष्यं शरस्याग्रे नियोजयेत् ॥२९॥
मनो दृष्टिगतं कृत्वा ततः काण्डं विसर्जयेत् ॥
२६ धनुर्वेदसंहिता
स्खलत्येव कदाचिन्न लक्ष्ये योधो जितश्रमः ॥३०॥
अब निशाना न चूकने की विधि, विशाख स्थान को छोड़कर समसंधान
करे, समसंधान के लक्षण पहिले कह आये हैं, गोपुच्छमुख बाण से और
सिंहकर्ण मुष्टि से, कौशिकव्याय से खैंचे और शिखा को भी न चलावे,
पूर्व और पर समान करे, दोनों कंधे बराबर करे,और दोनों हाथों को
हिलने न दे, आँखों को किंचित् भी न चलावे निगाह को निशाने पर
जोड़े, मुट्ठी से लक्ष्य को ढ़ककर बाण के आगे करे, मन को दृष्टि से
करके अर्थात् जहाँ निशाने पर दृष्टि हो वहां ही मन देकर पीछे बाण
छोड़े, इस विधि से जितश्रम योद्धा कभी भी निशाने से नहीं चूकता है,
क्योंकि उसने श्रम से लक्ष्य को जीत लिया॥२७-३०॥
अथ शीघ्रसंधानम्
आदानं चैव तूणीरात्संधानं कर्षंणं तथा ।
क्षेपणं च त्वरायुक्तो बाणस्य कुरुते तु यः ॥३१॥
नित्याभ्यासवशात्तस्य शीघ्रसंधानता भवेत् ।
अब शीघ्रसंधान कहते हैं, जो पुरुष भाथे में से बाण लेकर संधान करके
कर्षण करे, फिर जल्दी ही क्षेपण करे वह ऐसे नित्य के अभ्यास से शीघ्र
संधानता हो जाती है॥३१॥
अथ दूरपातित्वम्
मुष्ट्यापताकया बाणं स्त्रीचिह्नं दूरपातनम् ॥३२॥
पताका नाम मुष्टि से स्त्री चिह्न वाले बाण को फेंके तो दूर
पड़े॥३२॥
अथ दृढभेदिता
प्रत्यालीढे कृते स्थाने ह्यधःसंधानमाचरेत् ।
दर्दुरस्थानमास्थाय ह्यूर्ध्वं धारणमाचरेत् ॥३३॥
स्कंधव्यायेन वज्रस्य मुष्ट्या पुंमार्गेण च ।
हिन्दीटीकासमेता २७
अत्यन्तसौष्ठवाद्वाह्वोर्जायते दृढभेदिता ॥३४॥
पत्यालीढ़ स्थान किये पीछे अधःसंधान करै और दर्दुर स्थान से स्थित
होकर ऊर्ध्वसंधान करे, स्कंधव्याय से वज्रमुष्टि और पुरुष बाण
समसंधान करै, ऐसा करने से बहुत अच्छी दृढ़भेदिता हाथों से ही बाणों
की हो जाती है॥३३-३४॥
अथ हीनगतयः
सूचीमुखा मीनपुच्छा भ्रमरी च तृतीयाका ।
शराणां गतयस्तिस्रः प्रशस्ताः कथिता बुधैः ॥३५॥
अब हीन गतियों का वर्णन करते हैं। सूचीमुख १ मीनपुच्छ २ तीसरी
भ्रमरी ३ ये बाणों की तीन चाल श्रेष्ठ कही हैं॥३५॥
सूचीमुखा गतिस्तस्य सायकस्य प्रजायते ।
पत्रं विलोकितं यस्य ह्यथवा हीनपत्रकम् ॥३६॥
जिस बाण के पर देखे हों, अर्थात् परवाला हो, अथवा पर रहित हो,
उस बाण की सूचीमुख चाल हो जाती है॥३६॥
कर्करीतन्तु चापेन यैः कृष्टो हीनमुष्टिना ।
मत्स्यपुच्छा गतिस्तस्य सायकस्य प्रकीर्तिता ॥३७॥
जिस बाण को कठिन धनुष और पूर्वोक्त हीन मुष्टि से खैंचा जाय उसकी
मत्स्यपुच्छा गति श्रीमहादेवजी महाराज ने कही है॥३७॥
भ्रमरी कथिता ह्येषा शिवेन श्रमकर्मणि ।
ऋजुत्वेन विना याति क्षेप्यमाणस्तु सायकः ॥३८॥
फेंका हुआ जो बाण सीधापन के विना ही जाय इसको शिवजी महाराज
ने श्रमकर्म में भ्रमरी कहा है पूर्वोक्त तिर्यग्गत लक्ष्य वेधन के लिये श्रेष्ठ
हैं॥३८॥
अथ बाणानां लक्ष्यस्खलनगतयः
वामगा दक्षिणा चैव ऊर्ध्वगाऽधोगमा तथा ।
चतस्रो गतयः प्रोक्ता बाणस्खलनहेतवः ॥३९॥
२८ धनुर्वेदसंहिता
बांई ओर जानेवाली, दाहिनी ओर जानेवाली, ऊपर को और वैसे ही
नीचे को गति हो जाय, ये चार गतियां श्रीमहादेवजी ने बाणों के स्खलन
के कारण कही हैं॥३९॥
अथैतासां क्रमेणोदाहरणानि
कम्पते गुणमुष्टिस्तु मार्गणस्य तु पृष्ठतः ।
संमुखी स्याद्धनुर्मुष्टिस्तदा वामे गतिर्भवेत् ॥४०॥
गुणा की मुष्टि जो कि बाण की पीठ पर से काँपे और धनुष की मुष्टि
सामने होय तब बाण सीधा जाके नहीं लगे, किंतु बाई ओर को उसकी
चाल हो जाती है, इसलिये गुणा की मुष्टि को काँपने न दे॥४०॥
ग्रहणं शिथिलं यस्य ऋजुत्वेन विवर्जितम् ।
पार्श्वं तु दक्षिणं याति सायकस्य न संशयः ॥४१॥
जिस बाण का पकड़ना ढीला हो और सीधापन से भी रहित हो वह
दाहिनी ओर चला जाता है, इसमें संदेह नहीं॥४१॥
ऊर्ध्वं भवेच्चापमुष्टिर्गुणमुष्टिरधो भवेत् ।
स मुक्तो मार्गणो लक्ष्यादूर्ध्वं याति न संशयः ॥४२॥
धनुष की मुट्ठी ऊपर को हो और गुणा की मुष्टि निशाने से नीचे को हो
तो वह शर लक्ष्यवेध को छोड़कर ऊपर को चला जाता है इसमें कुछ
संशय नहीं॥४२॥
मोक्षणे चैव बाणस्य चापे मुष्टिरधो भवेत् ।
गुणमुष्टिर्भवेदूर्ध्वं तदाधोगामिनी गतिः ॥४३॥
बाण के छोड़ने पर धनुष की मुष्टि यदि निशाने से नीचे हो और गुणा
की मुष्टि ऊपर हो तब बाण की गति नीचे को हो जाती है, सिद्धांत यह
है कि चापमुष्टि और गुणामुष्टि से लक्ष्य को ढक लेना चाहिये तब
लक्ष्यभेद होता है अन्यथा नहीं होता॥४३॥
अथ शुद्धगतयः
लक्ष्यबाणाग्रदृष्टीनां संगतिस्तु यदा भवेत् ।
हिन्दीटीकासमेता २९
तदानीं मुंचितो बाणो लक्ष्यान्न स्खलति ध्रुवम् ॥४४॥
अब शुद्ध गति का वर्णन ऐसा है कि, लक्ष्य और बाण का अग्रभाग तथा
दृष्टि ये तीनों एक ही हो जायें, तब छोड़ा हुआ बाण निशाने से नहीं
चूकता॥४४॥
निर्दोषः शब्दहीनश्च सममुष्टिद्वयोज्झितः ।
भिनत्ति दृढवेध्यानि सायको नास्ति संशयः ॥४५॥
दोष रहित और शब्द से हीन गुणा और धनुष इनकी समान मुष्टि से
छोड़ा हुआ बाण कठिन वस्तुओं को विदारण कर देता है, इसमें संदेह
नहीं॥४५॥
स्वाकृष्टस्तेजितो यश्च सुशुद्धो गाढमुष्टितः ।
नरनागाश्वकायेषु न तिष्ठति स मार्गणः ॥४६॥
सुंदर खैंचा हुआ तेज किया हुआ जो अच्छा स्वच्छ पक्ष आदि बँधा हो
वह बाण गाढ़ी मुष्टि से छोड़ा हुआ, मनुष्य हाथी घोड़ों के शरीरों में
नहीं ठहरता अर्थात् पार हो जाता है॥४६॥
यस्य तृणसमा बाणा यस्येन्धनसमं धनुः ।
यस्य प्राणसमा मौर्वी स धन्वी धन्विनां वरः ॥४७॥
जिसके तृण के समान बाण, और जिसके ईंधन के तुल्य धनुष और प्राण
के समान मौर्वी (प्रत्यंचा) हो वह धनुषधारी धनुषधारियों में श्रेष्ठ
है॥४७॥
अथ दृढचतुष्कम्
अयश्चर्मघटश्चैव मृत्पिंडश्च चतुष्टयम् ।
यो भिनत्ति न तस्येषुर्वज्रेणापि विदार्यते ॥४८॥
अब दृढचतुष्क कहते हैं, लोह, चमड़ा, घड़ा, मिट्टी के पिण्ड इन चारों
को जो बाण भेदन करे उसका बाण वज्र से भी न कटे॥४८॥
सार्द्धाङ्गुलप्रमाणेन लोहपत्राणि कारयेत् ।
तानि भित्त्वैकबाणेन दृढघाती भवेन्नरः ॥
डेढ़ अंगुल के मान चौड़े लोहे के पत्र करावे, उनको एक बाण से जो वेध
३० धनुर्वेदसंहिता
दे वह दृढ़घाती मनुष्य होता है॥
चतुर्विंशतिचर्माणि यो भिनत्तीषुणा नरः ।
तस्य बाणो गजेन्द्रस्य कायं निर्भिद्य गच्छति ॥४९॥
जो मनुष्य एक बाण से २४ चौबीस चमड़ों को बींध दे, उसका बाण बड़े
भारी हाथी के शरीर को भी भेदन कर चला जायगा॥४९॥
भ्राम्यं जले घटो वेध्यश्चक्रे मृत्पिंडकं तथा ॥
भ्रमंतं वेधयेद्यो हि दृढभेदी स उच्यते ॥५०॥
जल में घुमाकर घड़ा बींधना चाहिये और वैसे ही कुम्हार के चाक के
मिट्टी के घूमते हुए पिण्डे को, जो भ्रमण करती हुई वस्तु को वेधे वह दृढ़
भेदी कहाता है॥५०॥
अयस्तु काकतुण्डेन चर्म चारामुखेन हि ।
मृत्पिण्डं च घटं चैव विध्येत्सूचीमुखेन वै ॥५१॥
लोहे की वस्तु को काकतुण्ड से, ढाल को आरामुख से और मिट्टी के ढेले
को और घड़े को सूचीमुख बाण से वेधे॥५१॥
अथ चित्रविधिः
बाणभंगकरावर्तकाष्ठच्छेदनमेव च ।
बिंदुकं गोलकयुगं यो वेत्ति स जयी भवेत् ॥५२॥
बाण के तोड़ने की विधि और काष्ठच्छेदन, तथा बिंदी (चांदमारी)
और दो गोलों को जो बींधना जाने वह परसेना को जीतता
है॥५२॥
लक्ष्यस्थाने धृतं काण्डं सन्मुखं छेदयेत्ततः ॥
किंचिन्मुष्टिं विधाय स्वां तिर्यग्द्विफलकेषुणा ॥५३॥
सम्मुखं बाणमायान्तं तिर्यग्बाणं न संचरेत् ।
प्राप्तं शरेण यच्छिद्याद्वाणच्छेदी स उच्यते ॥५४॥
निशाने के स्थान में धारण किये हुए बाण को सामने आते २ ही मार्ग में
काट दे, कुछ अपनी मुष्टि को करके तिरछा हो, दो फलवाले बाण से वा
अर्धचन्द्र से शत्रु के शिर को मध्य से काट दे, सामने आते हुए बाण को
हिन्दीटीकासमेता ३१
तिरछा बाण न चलावे, किंतु आप तिरछा हो जाय बाण से बाण को जो
काट दे, वह बाण छेदी कहाता है॥५३-५४॥
अथ काष्ठच्छेदनम्
काष्ठेऽश्वकेशं संयम्य तत्र बध्द्वा वराटिकाम् ।
हस्तेन भ्राम्यमाणं च यो हन्ति स धनुर्धरः ॥५५॥
लक्ष्यस्थाने न्यसेत्काष्ठं सार्द्रं गोपुच्छसन्निभम् ।
यश्छिद्यात्तत्क्षुरप्रेण काष्ठच्छेदी स जायते ॥५६॥
अब काष्ठच्छेदन को कहते हैं, लकड़ी को घोड़े का बाल बाँधकर उसमें
कौड़ी बांधकर घूमती हुई कौड़ी को जो मार दे वह धनुषधारी है,
निशाने की जगह गीली लकड़ी को काली करके रखे, जो उसको
क्षुरप्रबाण से छेदन करदे वह सब काष्ठों को काट देगा और
(काष्ठच्छेदी) की पदवी मिलेगी॥५५-५६॥
लक्ष्ये बिंदुंन्यसेच्छुभ्रं शुभ्रबंधूकपुष्पवत् ।
हन्ति तं बिन्दुकं यस्तु चित्रयोधा स उच्यते ॥५७॥
लक्ष्य की जगह सफेद बिंदी शुक्लकुन्दके फूल की सदृश रखे, उस
बिन्दु को जो वेध दे वह (चित्रयोधा) कहाता है॥५७॥
काष्ठगोलयुगं क्षिप्रं दूरमूर्ध्वं पुरा स्थितैः ।
असम्प्राप्तं शरं पृष्ठे तद्गोपुच्छमुखेन हि ॥५८॥
यो हन्ति शरयुग्मेन शीघ्रसंधानयोगतः ।
स स्याद्धनुर्भृतां श्रेष्ठः पूजितः सर्वपार्थिवैः ॥५९॥
दो काष्ठ के गोलों को शीघ्रता से ऊपर को आकाश में फेंक दे वे दोनों
धरती पर गिरने न पावें उनकी पीठ को गोपुच्छमुख से जो वेध दे दो
बाणों से शीघ्रसंधान के योग से वह धनुषधारियों में श्रेष्ठ है और सब
राजाओं से पूजित है, अर्थात् सब राजाओं को उसका सत्कार करना
चाहिये॥५८-५९॥
अथ धावल्लक्ष्यम्
रथस्थेन गजस्थेन हयस्थेन च पत्तिना ।
धावता वै श्रमः कार्यो लक्ष्यं हन्तुं स निश्चितम् ॥६०॥
३२ धनुर्वेदसंहिता
रथी वा गजी अथवा सवार वा पैदल को भागते हुए पर लक्ष्य मारने का
श्रम करना चाहिये॥६०॥
अथ विधिः
वामादायाति यल्लक्ष्यं दक्षिणं हि प्रधावति ।
तच्छिंद्याच्चापमाकृष्य सव्येनैव च पाणिना ॥६१॥
तथैव दक्षिणायांतु विध्येद्वाणाद्धनुर्धरः ॥
आलीढक्रममारोप्य त्वराहन्याच्च तं नरः ॥६२॥
वायोरपि बलं दृष्ट्वा वामदक्षिणवाहतः ।
लक्ष्यं स साधयेद्देवं गाधिपुत्र नृपात्मज ॥६३॥
वायुपृष्ठे दक्षिणे च वहन्सूचयते बलम् ।
सम्मुखीनश्च वामश्च भटानां भङ्गसूचकः ॥६४॥
अब भागते हुए को मारने की विधि कहते हैं, जो निशाना बायें हाथ की
ओर से आता हुआ दाहिनी ओर भागता जाता हो, उसको बाँयें खींचकर
बाण हाथ से मारे, वैसे ही दक्षिण की ओर से आता हो उसको
धनुषधारी मनुष्य आलीढक्रम करके मारे आलीढक्रम पहले कह आये,
बांई ओर से चलता हुआ वा दाहिनी ओर से वायु चलता हो तो उसका
बल भी देख ले, यदि बांई ओर से चलता हो तो धनुष को दाहिनी ओर
झुका दे और दाहिना वायु हो तो बांई ओर बाण छोड़ दे। हे गाधि के
पुत्र! हे राजा के पुत्र! ऐसे निशाना साधन करे, जिसके पीठ पीछे का
वा दाहिनी ओर का वायु चलता हो, वही जीतता है और जिसके सामने
का व वांई ओर पवन चलता है वह हार जाता है, जोधाओं का भंग
सूचक है॥६१-६४॥
अथ शब्दवेधित्वम्
लक्ष्यस्थाने न्यसेत्कांस्यपात्रं हस्तद्वयान्तरे ।
ताडिते शर्कराभिस्तच्छब्दः संजायते यदा ॥६५॥
यत्र संद्योत्यते शब्दस्तं सम्यक्तत्र चिंतयेत् ।
कर्णेन्द्रियमनोयोगाल्लक्ष्यं निश्चयतां नयेत् ॥६६॥
हिन्दीटीकासमेता ३३
पुनः शर्करया तच्च ताडयेच्छब्दहेतवे ।
पुनर्निश्श्रयतां नेयं शब्दस्थानानुसारतः ॥६७॥
ततः किंचित्कृतं दूरं नित्यं नित्यं विधानतः ।
लक्ष्यं समभ्यसेद्ध्वाते शब्दवेधनहेतवे ॥६८॥
ततो बाणेन हन्यात्तदवधानेन तीक्ष्णधीः ।
एतच्च दुष्करं कर्म भाग्ये कस्यापि सिध्यति ॥६९॥
निशाने के स्थान में कांसे का पात्र दो हाथ दूर रखे फिर उसको बालूरेत
से ताडन करे, तब शब्द उत्पन्न हो, जहां से शब्द उत्पन्न हो उसको भली
भाँति चिंतन करे, कान इन्द्रिय और मन के योग से निशाने को निश्चय
करे फिर उसको शब्द सुनने के हेतु शब्दस्थान के अनुसार ताडन करे,
जब दो हाथ अंतर से शब्द सुनने का अभ्यास हो जाय। तब कुछ उस
कांस्यपात्र को दूर धरे, नित्य बढ़ता जाय, ऐसे शब्दवेधन के लिये
निशाने का अभ्यास अँधेरे में करे, फिर बाण से निशाने को सावधान
चित्त से हनन करे, यह दुष्कर कर्म किसी के भाग्य में हो उसको सिद्ध
होता है॥६५-६९॥
अथ प्रत्यागमनम्
खगं बाणन्तु राजेन्द्र प्रक्षिपेद्वायुसम्मुखे ।
रंजकस्य च नालाभिरतो ह्यागमनं भवेत् ॥७०॥
हे राजेन्द्र विश्वामित्र! खगनाम बाण को वायु के सामने फेंके जिसमें
रंजक की नलिका लगी हों, इससे उस बाण का फिर आगमन हो जाता
है॥७०॥
अथास्त्रविधिः
एवं श्रमविधिं कुर्याद्यावत्सिद्धिः प्रजायते ।
श्रमे सिद्धे च वर्षासु नैव ग्राह्यं धनुष्करे ॥७१॥
पूर्वाभ्यासस्य शस्त्राणामविस्मरणहेतवे ।
मासद्वयं श्रमं कुर्यात्प्रतिवर्षं शरद्ऋतौ ॥७२॥
३४ धनुर्वेदसंहिता
जाते वाऽऽश्वयुजे मासे नवमीदेवतादिने ।
पूजयेदीश्वरीं चण्डीं गुरुं शस्त्राणि वाजिनः ॥७३॥
विप्रेभ्यो दक्षिणां दत्वा कुमारीर्भोजयेत्ततः ।
देव्यै पशुबलिं दद्याद्वृतो वादित्रमंगलैः ॥७४॥
ततस्तु साधयेन्मंत्रान्वेदोक्तान्वागमोदितान् ।
अस्त्राणां कर्मसिद्ध्यर्थं जपहोमविधानतः ॥७५॥
ऐसे श्रमविधि करे, जब तक सिद्धि हो श्रमसिद्धि हुए पीछे वर्षा में धनुष
को कर में धारण न करे पूर्व अभ्यास किये हुए शस्त्रों के न भूलने के
कारण दो महीना परिश्रम करे, प्रत्येक वर्ष के शरदृतु में अथवा आश्विन
महीने में शुक्ल पक्ष की ९ नवमी देवी के दिन चण्डी ईश्वरी और गुरु
तथा हथियार और घोड़ों की राजा वा अभ्यासी पूजा करे, ब्राह्मणों को
दक्षिणा देकर पीछे कुंवारी कन्याओं को जिमावे, देवी के लिये बाजों
और मंगलों के साथ पशु की बलि दे। पीछे वेदोक्त हों वा शास्त्रोक्त हों
अस्त्रों की कर्मसिद्धि के लिये जप और होम की विधि से मंत्रों का साधन
करे॥७१-७५॥
ब्राह्मं नारायणं शैवमैन्द्रं वायव्यवारुणे ।
आग्नेयं चापरास्त्राणि गुरुदत्तानि साधयेत् ॥७६॥
मनोवाक्कर्मभिर्भाव्यं लब्धास्त्रेण शुचिष्मता ।
अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि पूरुषम् ॥७७॥
प्रयोगं चोपसंहारं यो वेत्ति स धनुर्द्धरः ।
सामान्ये कर्मणि प्राज्ञो नैवास्त्राणि प्रयोजयेत् ॥७८॥
ब्राह्म, नारायण, शैव, ऐन्द्र, वायव्य, वारुण, आग्नेय और गुरु के दिये हुए
अस्त्रों का साधन करे, पवित्र पुरुष मन, वाणी, कर्म से अनुभव करे
अस्त्रों को पाकर, अस्त्रों का प्रयोग और संहार जो जाने वह धनुर्धर है,
सामान्य काम के लिये बुद्धिमान् अस्त्रों का प्रयोग न करे॥७६-७८॥
अथास्त्राणि प्रवक्ष्यामि सावधानोऽवधारय ।
ब्रह्मास्त्रं प्रथमं प्रोक्तं द्वितीयं ब्रह्मदंडकम् ॥७९॥
ब्रह्मशिरस्तृतीयं च तुर्यं पाशुपतं मतम् ।
हिन्दीटीकासमेता ३५
वायव्यं पञ्चमं प्रोक्तमाग्नेयं षष्ठकं स्मृतम् ॥८०॥
नारसिंहं सप्तमञ्च तेषां भेदा ह्यनन्तकाः ।
ससंहारं सुविज्ञेयं शृणु गाधे यथातथम् ॥८१॥
वेदमात्रा सर्वशस्त्रं गृह्यते दीप्यतेऽथवा ।
तत्प्रयोगं शृणु प्राज्ञ ब्रह्मास्त्रं प्रथमं शृणु ॥८२॥
हे विश्वामित्र! अब तुम सावधान होकर धारण करो, मैं अस्त्रों को
कहूंगा, पहिला ब्रह्मास्त्र कहा, दूसरा ब्रह्मदण्ड, तीसरा ब्रह्मशिर, चौथा
पाशुपतास्त्र, पांचवाँ वायव्यास्त्र, छठवां आग्नेयास्त्र, सातवाँ नारसिंह
इनके अनंत भेद हैं, इनको संहार के साथ जानना योग्य है। हे
गाधिवंशज! जैसा है वैसा सुनो, ये सब वेदमाता गायत्रीमंत्र से ग्रहण
करना अथवा दीप्यमान करना। हे प्राज्ञ! इनका प्रयोग सुनो, इनमें से
पहिला ब्रह्मास्त्र सुनो॥७९-८२॥
अथास्त्राणि
दादिदन्ताञ्च सावित्रीं विपरीतां जपेत्सुधीः ।
जप्त्वापूर्वं निखर्वञ्चाभिमंत्र्य विधिवच्छरम् ॥८३॥
क्षिपेच्छत्रुषु सहसा नश्यंति सर्वजातयः ।
बाला वृद्धाश्च गर्भस्था ये च योद्धुं समागताः॥८४॥
सर्वे ते नाशमायान्ति मम चैव प्रसादतः ।
यथातथं दादिदन्तं जपेत्संहारसिद्धये ॥८५॥
अब अस्त्रविद्या कहते हैं, 'द' को आदि ले 'द' के अन्त तक सावित्री को
विपरीत जपे, पहिले एक निखर्व विधि से जपकर पुनः बाण को
मंत्रितकर शीघ्र शत्रुओं पर फेंके, सब जाति नष्ट हों, बालक वृद्ध
गर्भस्थ और जो कोई युद्ध करने को आये हों वे सब नाश को प्राप्त हों,
मेरी कृपा से और संहार की सिद्धि को 'द' से आदि ले 'द' के अन्त तक
जपे॥८३-८५॥
ब्रह्मदण्ड प्रवक्ष्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् ।
ततः प्रचोदयाज्ज्ञेयं ततो नोयो धियः क्रमात् ॥८६॥
३६ धनुर्वेदसंहिता
ततो धीमहि देवस्य ततो भर्गो वरेण्यम् ।
सवितुस्तच्च योक्तव्यममुकशत्रुं तथैव च ॥८७॥
ततो हन हन हुंफट् जप्त्वा पूर्वं द्विलक्षकम् ।
अभिमंत्र्य शरं तद्वत्प्रक्षिपेच्छत्रुषु स्फुटम् ॥८८॥
नश्यन्ति शत्रवः सर्वे यमतुल्या अपि ध्रुवम् ।
एतदेव विपर्यस्तं जपेत्संहारसिद्धये ॥८९॥
ब्रह्मदण्ड कहते हैं, पहिले प्रणव उच्चारण कर पीछे प्रचोदयात् पीछे नो
यो धियो क्रम से पीछे धीमहि देवस्य, पीछे भर्गो वरेण्यम्, पीछे सवितुः
जोड़कर अमुक शत्रु को वैसेहि जोड़े पीछे हन हन हुंफट् जपकर दो लाख
बाण का मंत्रितकर शत्रुओं पर फेंके, सारे शत्रु यदि यमराज के तुल्य हों
तो भी नाश हो इसी को संहार की सिद्ध के लिये उलटा
जपे॥८६-८९॥
ब्रह्मशिरः प्रवक्ष्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् ।
धियो यो नः प्रचोदयात् भर्गोदेवस्य धीमहि ॥९०॥
तत्सवितुर्वरेण्यं शत्रून्मे हनहनेति च ।
हुंफट् चैव प्रयोक्तव्यं क्षिपेद्ब्रह्मशिरस्ततः ॥९१॥
पुरश्चर्यां पुरः कृत्वा त्रिलक्ष्यं नियतः शुचिः ।
नश्यन्ति सर्वे रिपवः सर्वे देवाः सुरा अपि ॥९२॥
इदमेव प्रयोक्तव्यं विपर्यस्तं विकर्षणे ॥९३॥
ब्रह्मशिर अस्त्र को कहते हैं, पहिले प्रणव उच्चारण करे पीछे
तत्सवितुर्वरेण्यं शत्रून्मे हन २ हुं फट् जोड़ना चाहिये पीछे ब्रह्म शिर को
फेंके, तीन लाख का पुरश्चरण करके पवित्र होके देवता वा असुर कोई
शत्रु हो सब नाश को प्राप्त हों और इसी को संहार के निमित्त उलटा
जपे॥९०-९३॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि चास्त्रं पाशुपतं तव ।
यस्य विज्ञातमात्रेण नश्यन्ति सर्वशत्रवः ॥९४॥
दादिदन्तां च सावित्रीं प्रोच्य प्रणवमेव च ।
श्लीं पशुं हुंफट् अमुकशत्रून् हन हन हुंफट् ॥९५॥
जप्त्वा पूर्वं द्विलक्षं च ततः पाशुपतं क्षिपेत् ॥
' or 'श्लीं'? It's 'श्लीं'. 'पशुं हुंफट्'.)
Line 5:
अमुक शत्रूको (हुंफट्) ऐसा दो लाख मंत्र जपकर पीछे पाशुपतास्त्र फेंके
(Note: 'शत्रूको' with 'ू'.)
Line 6:
फिर संहार के लिये (व्यस्त) उलटा जपे, यह पाशुपतास्त्र सब शत्रुओं
Line 7:
का निवारण करने वाला है॥९४-९६॥
Line 8:
वच्मि वायव्यमस्त्रं ते येन नश्यन्ति शत्रवः ।
Line 9:
ॐवायव्यया वायव्यान्थोर्वा यया वा तथा ।
Wait, let's look at 'वायव्यान्थोर्वा' vs 'वायव्यान्त्योर्वा' vs 'वायव्यान्योर्वा':
Look at the character:
'वा' 'य' 'व्या'
Then: 'न्' (half na), then 'थ' with 'ो' and 'र्' on next letter?
Wait, look at the letter:
It has a loop at top left, curving down and up to the right stem: that is a 'थ'!
Wait, does it have a 'य'?
Look at 'र्थ्यां' in 'पुरश्चर्यां' (L22): 'श्च' has loop, 'र्यां' has 'र्'.
Look at 'न्थो': 'न्
३८ धनुर्वेदसंहिता
ॐ वज्रनखवज्रदंष्ट्रायुधाय महासिंहाय हुंफट् ।
पूर्वं जप्त्वा च लक्षं हि नरसिंहं च योजयेत् ।
सिंहरूपास्ततो बाणाः पतंति शात्रवे वने ॥१॥
पूर्वोक्तेन प्रकारेण संहारं च प्रकल्पयेत् ।
संक्षेपतो महाभाग तवोक्तानि महामते ॥२॥
भेदास्त्वेषां शिवेनैव ह्यनन्ताः परिकीर्तिताः ।
इत्यस्त्रप्रकरणम्
पूर्वोक्त मंत्र को एक लाख जपकर श्रीनृसिंहजी महाराज का ध्यान कर
योजना करे, पीछे बाण सिंहरूप हो शत्रुरूपी वन में पड़कर उनको खा
जाते हैं पूर्वोक्त प्रकार से संहार करे , हे महाभाग! मैंने तेरे आगे संक्षेप
से अस्त्र कहे, इनके भेद तो श्रीशिवजी महाराज ने परशुरामजी के प्रति
अनंत कहे हैं॥१-२॥
इत्यस्त्रप्रकरणं समाप्तम्
हस्तर्के लांगलीकन्दो गृहीतस्तस्य लेपतः ।
शूरस्यापि रणे पुंसो दर्पं हरति कातरः ॥३॥
हस्त नक्षत्र में रविवारको जलपीपल का कन्द लेकर लेप करने से कायर
पुरुष भी शूरवीर के अभिमान को दूर कर देता है॥३॥
गृहीत्वा योगनक्षत्रैरपामार्गस्य मूलकम् ।
लेपमात्रेण वीराणां सर्वशस्त्रनिवारणम् ॥४॥
पुष्य रविवार सिद्धयोग में ऊँगा, जिसे चिरचिटा द्यौ तारा भी कहते हैं
उसकी जड़ लेकर रखे जिस दिन किसी से युद्ध का काम पड़े, उस दिन
शरीर के लेप करे तो वीरों के सर्व शस्त्र न लगें॥४॥
अधःपुष्पी शंखपुष्पी लज्जालुर्गिरिकर्णिका ।
नलिनी सहदेवी च पत्रमौंजार्कयोस्तथा ॥५॥
विष्णुक्रान्ता च सर्वासां जटा ग्राह्या रवेर्दिने ।
बद्धवा भुजे विलेपाद्वा काये शस्त्रापवारकः ॥६॥
सर्पव्याघ्रादिसत्वानां भूतादीनां न जायते ।
भीतिस्तस्य स्थिता यस्य मातरोऽष्टौ शरीरके ॥७॥
हिन्दीटीकासमेता ३९
अधःपुष्पी जिसको औंधाहूली कहते हैं, शंखाहूली, छुईमुई, वनमोगरा,
कमोदिनी, सहदेई, मूंज का और आक का पत्र, विष्णुक्रांता इन सबों की
जड़ रविवार को ग्रहण करके हाथों से बाँधे, वा शरीर पर लेपन करे तो
सब शस्त्र दूर हों, साँप बाघ आदि हिंस्रजीवों की बाधा न हो और आठ
मातृदेवियों से भी रक्षा हो॥५-७॥
गृहीतं हस्तनक्षत्रे चूर्णं छुच्छुन्दरीभवम् ।
तत्प्रभावाद्गजः पुंसः सम्मुखं नैति निश्चितम् ॥८॥
हरिमांसं गृहीत्वा च मार्गेऽश्वानां क्षिपेद्भुवि ।
तेन मार्गेण ते चाश्वा नायांति ताडनेन वै ॥९॥
हस्त नक्षत्र में छुच्छुंदरी अर्थात् सुणसुणियां का चूरा ले, उसके प्रभाव से
पुरुष के सामने हाथी नहीं आवे, यह निश्चय किया हुआ है, शेर का मांस
लेकर जहाँ घोड़ों का मार्ग हो, वहाँ पृथ्वीपर पटक दे तो उस मार्ग से वे
घोड़े कोड़े मारने से भी नहीं आते हैं॥८-९॥
छुच्छुन्दरीश्रीफलपुष्पचूर्णैरालिप्तगात्रस्य नरस्य दूरात्
॥ आघ्राय गन्धद्विरदोऽतिमत्तो मदं त्यजेत्केसरिणो
यथोग्रम् ॥११०॥
छुच्छुंदर और नारियल के पुष्प का चूरा शरीर को लपेटे हुए मनुष्य के
शरीर की गंध को सूंघकर मतवाला हाथी भी मद को छोड़ देता है जैसे
शेर के शरीर के गंध को सूँघ कर छोड़ता है॥११०॥
श्वेताद्रिकर्णिकामूलं पाणिस्थं वारयेद्गजम् ।
श्वेतकंटारिकामूलं व्याघ्रादीनां भयं हरेत् ॥१११॥
पुष्यार्कोत्पाटिते मूले पाठाया मुखसंस्थिते ।
देहं स्फुटति नो तीक्ष्णमंडलाग्रै रणे नृणाम् ॥११२॥
गंधार्या उत्तरं मूलं मुखस्थं सन्मुखागतम् ।
शस्त्रौघं वारयेत्तत्र पुष्यार्के विधिनोद्धृतम् ॥११३॥
विधिरुपवासः
शुभ्रायाः शरपुङ्खाया जटा नीलीजटाथवा ।
भुजे शिरसि वक्त्रे वा स्थिता शस्त्रनिवारिका ॥११४॥
४० धनुर्वेदसंहिता
भूपाहिचोरभीतिघ्नी गृहीता पुष्यभास्करे ।
सफेद विष्णुकान्ता की जड़ हाथ में रखने से हाथी को दूर कर देती है,
सफेद कटहली की जड़ व्याघ्रादिकों के भय को हरती है, पुष्यरविवार
को पाढ़र की जड़ उखाड़कर मुख में रखे तो देह नहीं फटे, तीव्र तलवार
वा चक्रधारा से, गांधारी के उपार की जड़ मुख में होय तो सन्मुख आये
हुए शस्त्रों के समूह को हटा देती है। विधि से उपजी हुई हो, उसको
उपवास करके लावे, सफेद झोझुरू की जड़ हो अथवा नीली की जटा
को, हाथ शिर मुख में रखने से सब शस्त्रों का निवारण करती है। राजा,
चोर, साँप के डर का नाश करती है पुष्यार्क में ग्रहण की हुई
हो।।११-१४।।
अथ संग्रामविधिः
आदौ तु क्रियते मुद्रा पश्चाद्युद्धं समाचरेत् ।
सर्पमुद्रा कृता येन तस्य सिद्धिर्न संशयः ।।१५।।
अब संग्राम करने की विधि लिखते हैं, आदि में शत्रु की सेना के सन्मुख
खड़ा होकर मुद्रा करे, पीछे युद्ध का आरम्भ करे, जिसने पहिले सर्पमुद्रा
करी हो उसकी सिद्धि हो इसमें संदेह नहीं।।१५।।
रुद्रं ध्यात्वा मन्त्रं जपेत्
ॐ नमः परमात्मने सर्वशक्तिमते विरूपाक्षाय भालनेत्राय
रं हुं फट् स्वाहा । ततो हैमवतीं ध्यात्वा प्रणम्य
युद्धमारभेत् ॥ ॐ ह्रीं श्रीं हैमवतीश्वरीं ह्रीं स्वाहा ॥ ॐ
ह्रीं वज्रयोगिन्यै स्वाहा । सिंहासनस्थां रुद्राणीं
ध्यायेत् ।।१६।।
रुद्र का ध्यान करके मंत्र जपे, जो पहिले लिख आये हैं। पीछे हैमवती
भगवती का ध्यानकर प्रणामकर युद्ध का आरम्भ करे, हैमवती मंत्र
उच्चारण करके, फिर वज्र योगिनी का ध्यान करके सिंह पर चढ़ी हुई
रुद्राणी को ध्यावे।।१६।।
अपूर्णे शत्रुसामग्री पूर्णे वैश्यबलं तथा ।
कुरुते पूर्णसत्त्वस्यो जयत्येको वसुंधराम् ।।१७।।
हिन्दीटीकासमेता ४१
‘ अपूर्ण स्वर में शत्रु की सामग्री हो और पूर्ण में अपनी सेना तत्व से पूर्ण
करे, स्थित हो, ऐसा एक भी योद्धा सारी वसुधा को जीते॥१७॥
पृष्ठे दक्षे योगिनी राहुयुक्ता यस्यैकोयं शत्रुलक्षं निहन्ति
॥ अर्कः पृष्ठे दक्षिणे यस्य गाधे चन्द्रो वामे सन्मुखे वै
निशायाम् ॥१८॥ वायुं पृष्ठे दक्षिणे यो विदध्याद्योधा
शत्रून्नाशयत्तत्क्षणेन ॥१९॥
जिसके पीछे और दाहिने राहु सहित योगिनी हो वह अकेला लाख
शत्रुओं को मारता है, हे विश्वामित्र! और ऐसे ही सूर्य पीछे वा दाहिने
हो और रात में चन्द्रमा सामने अथवा बाँये हो और वायु को पीछे वा
दाहिने जो करे, वह योद्धा तत्काल शत्रुओं का नाश करे॥१८-१९॥
या नाडी बहते चाङ्गे तस्यामेवाधिदेवता ।
सम्मुखेपि दिशा तेषां सर्वकार्यफलप्रदा ॥१२०॥
जो नाड़ी अंग में बहती हो, उसका अधिदेवता सामने हो, उसकी दिशा
के सामने मुख करे तो सब कार्यों की फल देने वाली हो॥१२०॥
यां दिशं बहते वायुर्युद्धं तद्दिशि दापयेत् ।
जयत्येव न सन्देहः शक्रोपि यदि चाग्रतः ॥२१॥
जिस दिशा का वायु देह में चलता हो, उसी दिशा में युद्ध दे तो यदि
इन्द्र भी आगे होवे तो भी जीत होय॥२१॥
सूर्ये पूर्वे चोत्तरे च चन्द्रे पश्चिमदक्षिणे ।
सेनापतिबलं त्वेवं प्रेषयेन्नित्यमादरात् ॥२२॥
सूर्य स्वर चलता हो तो पूर्व और उत्तर में यदि चन्द्रमा होय तो पश्चिम
दक्षिण में, सेनापति आदर के साथ सेना को युद्ध के लिये
भेजे॥२२॥
यत्र नाडयां वहेद्वायुस्तदंग प्राणमेव च ।
आकृष्य गच्छेत्कर्णान्ते जयत्येव पुरंदरम् ॥२३॥
जिस नाडी में वायु बहता हो, उसी अंग में प्राण होता है उसको कानों
तक खींचकर चले तो इन्द्र को भी जीत ले॥२३॥
प्रतिपक्षप्रहारेभ्यः पूर्णांगे योभिरक्षति ।
४२ धनुर्वेदसंहिता
न तस्य रिपुभिः शक्तिर्बलिष्ठैरपि हन्यते ॥२४॥
शत्रुओं के प्रहारों से जो पूर्ण अंगों की रक्षा करते हैं उनकी शक्ति को
बलवान् शत्रु भी नहीं हनन कर सकते हैं॥२४॥
अगुष्ठतर्जनीवंशे पादाङ्गुष्ठे तथा ध्वनिः ।
युद्धकाले प्रकर्तव्या लक्षयोधजयी भवेत् ॥२५॥
अँगूठा तर्जनी के बाँस में और पैर के अँगूठे में वैसे ही ध्वनि करनी
चाहिये ऐसा करने से लाख योद्धाओं को जीतने वाला हो॥२५॥
भूतत्वे ह्युदरं रक्षेत्पादौ रक्षेज्जलेन च ।
ऊरू च वह्नितत्वेन करौ रक्षेच्च वायुना ॥
व्योमतत्वे शिरो रक्षेदेवं योधो जयी भवेत् ॥२६॥
जब पृथ्वी का तत्व हो, तब उदर में चोट लगती है इससे चाहिये कि,
जब पृथ्वीतत्व हो तब पेट की रक्षा ढाल आदि से करे, जल के बहने में
पादों की रक्षा करे, अग्नितत्व के समय ऊरुओं को बचावे, वायु से हाथों
को बचावे, आकाश हो जब शिर की रक्षा करे तो ऐसा योद्धा जीतने
वाला होता है॥२६॥
सूर्ये पूर्वे चोत्तरे च मुखं कृत्वा जयेन्नरः ।
चन्द्रे मुखं सदा कुर्याद्दक्षिणे पश्चिमे सुधीः ॥२७॥
चिरयुद्धे शुभश्चन्द्रः शीघ्रयुद्धे रविस्तथा ॥
दूरयुद्धे जयी चन्द्रः समीपस्थे दिवाकरः ॥२८॥
सूर्य में पूर्व और उत्तर दिशा में मुख करके जीते, चन्द्रमा में सदा दक्षिण
और पश्चिम में मुख करे तो जीते, बहुत देर तक युद्ध करना हो तो
चन्द्रमा का स्वर अच्छा है, और जल्दी करना हो तो सूर्य का और दूर के
युद्ध में चन्द्र और समीप के युद्ध में सूर्य जीतने वाला होता
है॥२७-२८॥
आकृष्य प्राणपवनं समारोहेत्तु वाहनम् ।
समुत्तरेत्पदं दद्यात्सर्वकार्याणि साधयेत् ॥२९॥
प्राण पवन को खैंचकर सवारी पर चढ़े, अर्थात् कुम्भक करके चढ़े, रेचक
करता हुआ उतरे तो सब कामों की सिद्धि करे॥२९॥
हिन्दीटीकासमेता ४३
न कालो विविधं घोरं न शस्त्रं न च पन्नगाः ।
न शत्रुव्याधिचौराद्याःशून्यस्था नाशितुं क्षमाः ॥१३०॥
न तो काल, न विविध प्रकार के शस्त्र, न साँप, न शत्रु, न शरीर का
रोग, न चोर आदि क्रूर स्वभाव वाले शून्य स्वर में स्थित हुए नाश
करने को समर्थ हो सकते हैं॥१३०॥
अयनतिथिदिनेशैः स्वीयतत्वेश्चयुक्तो यदि वहति कदा-
चिद्दैवयोगेन पुंसाम् ॥ स जयति रिपुसैन्यं स्तम्भमात्र-
स्वरेण प्रभवति न च विघ्नं केशवस्यापि लोके ॥१३१॥
उत्तरायण सूर्य की तिथि और सूर्यस्वर अग्नि तत्व वा वायु तत्व से युक्त
होकर कदाचित् दाहिना स्वर अपने आप चले जिस किसी का वह स्वर
के स्तम्भ मात्र से ही शत्रु की सेना को जीते और केशव के लोक में भी
विघ्न न हो॥१३१॥
जीवेन शस्त्रं बध्नीयाज्जीवेनैव विकाशयेत् ।
जीवेन प्रक्षिपेच्छस्त्रं युद्धे जयति सर्वदा ॥१३२॥
स्वर से ही शस्त्र बाँधे और स्वर से ही निकाले तथा स्वर से ही फेंके तो
युद्ध में सदा जीते॥१३२॥
वामनाड्युदये चन्द्रः कर्तव्यो वामसम्मुखः ।
सूर्यचारे तथा सूर्यः पृष्ठे दक्षिणगो जयेत् ॥१३३॥
जब बायाँ स्वर चलता हो तब चन्द्रमा बायें वा सम्मुख करना चाहिये,
सूर्य के चलते समय सूर्य को वैसे ही पीठ पीछे अथवा दाहिने
करे॥१३३॥
दीप्ते कार्ये नाडी परदिशि जीविता सदा कुर्यात् ।
शान्ते च जीवसहिता त्वेवं सिद्ध्यन्ति कार्याणि ॥१३४॥
क्रूर काम में दूसरे की ओर सदा निर्जीव नाड़ी करे और शान्तकर्म में
चलती हुई नाड़ी करे तो कार्य सिद्ध हो॥१३४॥
तत्त्वबलान्नाडीबलमधिकं प्रोक्तं कपर्दिना नियतम् ।
ज्ञात्वैनं स्वरचारं नरो भवेत्कार्यनिपुणमतिः ॥१३५॥
अब इस शंका को दूर करते हैं, कि तत्वज्ञान तो बड़ा कठिन है, किसी
४४ धनुर्वेदसंहिता
किसी को होता है तो वशिष्ठजी विश्वामित्र से कहते हैं, कि तत्वबल से
नाड़ी बल अधिक है, यह बात श्रीजटाधारी महादेवजी महाराज ने
परशुरामजी से निश्चय ही कह दी है, इस स्वर की गति को जानकर
मनुष्य अपने कार्य करने में निश्चय ही चतुर बुद्धि होता है॥३५॥
इति स्वरबलयुद्धम्
अथ राहुयुक्तयोगिनीबलयुद्धं
व्याख्यास्यामः
न देयमिदं क्रूराय कुबुद्धयेऽशांताय गुरुद्रोह्यभक्तायेति ।
देयमिदं ब्रह्मचारिणे धर्मतः प्रजापालदुष्टदण्डविधारिणे
साधुरक्षकाय इत्येव प्रवचनमिति ॥३६-३७॥
अब राहुयुक्त योगिनी बल युद्ध को कहते हैं यह (बुद्धि) युद्ध प्रकार
क्रूरबुद्धि शांति रहित गुरुद्रोही अभक्त को न देना और ब्रह्मचारी जो हो
और धर्म से प्रजा का पालन जो करे (दुष्ट) खोटे पुरुषों को जो दण्ड दे
(साधु) अच्छे पुरुषों की जो रक्षा करे ऐसे को दे, इतना ही वचन
है॥३६-३७॥
राहुयुक्त योगिनीबल
प्रतिपन्नवम्यां प्रथमेर्धयामे राहुयुक्ता योगिनी पूर्वस्यां
दिशि स्थिता भवति ॥१॥ द्वितीया दशम्यां पञ्चमेर्धयामे
राहुसहिता शिवा प्रतीच्यामुदेति ॥२॥ तृतीयैकादश्यां
तृतीये अर्धयामे तमःसंमिलिता पार्वती याम्यां परिभ्रमति
॥३॥ चतुर्थ्यां द्वादश्यां तु सप्तमेऽर्धयामे राहुणा सहनगजा
चोत्तरे ज्ञेया ॥४॥ पञ्चम्यामथ त्रयोदश्यामष्टमेऽर्धयाम
स्वर्भानुयुता गौरी नैर्ऋत्यामटति ॥५॥ गुहतिथौ
चतुर्दश्यां च कात्यायनी पवनालये चायाति ॥६॥
सप्तमीपूर्णिमायां चतुर्थेऽर्धप्रहरे विधुंतुदेन साकं योगिनी
मैशान्यां जानीयात् ॥७॥ अष्टम्यमायां षष्ठेऽर्द्धयामे