सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 76 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

२८ धनुर्वेदसंहिता
बांई ओर जानेवाली, दाहिनी ओर जानेवाली, ऊपर को और वैसे ही
नीचे को गति हो जाय, ये चार गतियां श्रीमहादेवजी ने बाणों के स्खलन
के कारण कही हैं॥३९॥
अथैतासां क्रमेणोदाहरणानि
कम्पते गुणमुष्टिस्तु मार्गणस्य तु पृष्ठतः ।
संमुखी स्याद्धनुर्मुष्टिस्तदा वामे गतिर्भवेत् ॥४०॥
गुणा की मुष्टि जो कि बाण की पीठ पर से काँपे और धनुष की मुष्टि
सामने होय तब बाण सीधा जाके नहीं लगे, किंतु बाई ओर को उसकी
चाल हो जाती है, इसलिये गुणा की मुष्टि को काँपने न दे॥४०॥
ग्रहणं शिथिलं यस्य ऋजुत्वेन विवर्जितम् ।
पार्श्वं तु दक्षिणं याति सायकस्य न संशयः ॥४१॥
जिस बाण का पकड़ना ढीला हो और सीधापन से भी रहित हो वह
दाहिनी ओर चला जाता है, इसमें संदेह नहीं॥४१॥
ऊर्ध्वं भवेच्चापमुष्टिर्गुणमुष्टिरधो भवेत् ।
स मुक्तो मार्गणो लक्ष्यादूर्ध्वं याति न संशयः ॥४२॥
धनुष की मुट्ठी ऊपर को हो और गुणा की मुष्टि निशाने से नीचे को हो
तो वह शर लक्ष्यवेध को छोड़कर ऊपर को चला जाता है इसमें कुछ
संशय नहीं॥४२॥
मोक्षणे चैव बाणस्य चापे मुष्टिरधो भवेत् ।
गुणमुष्टिर्भवेदूर्ध्वं तदाधोगामिनी गतिः ॥४३॥
बाण के छोड़ने पर धनुष की मुष्टि यदि निशाने से नीचे हो और गुणा
की मुष्टि ऊपर हो तब बाण की गति नीचे को हो जाती है, सिद्धांत यह
है कि चापमुष्टि और गुणामुष्टि से लक्ष्य को ढक लेना चाहिये तब
लक्ष्यभेद होता है अन्यथा नहीं होता॥४३॥
अथ शुद्धगतयः
लक्ष्यबाणाग्रदृष्टीनां संगतिस्तु यदा भवेत् ।