सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 76 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

३४ धनुर्वेदसंहिता
जाते वाऽऽश्वयुजे मासे नवमीदेवतादिने ।
पूजयेदीश्वरीं चण्डीं गुरुं शस्त्राणि वाजिनः ॥७३॥
विप्रेभ्यो दक्षिणां दत्वा कुमारीर्भोजयेत्ततः ।
देव्यै पशुबलिं दद्याद्वृतो वादित्रमंगलैः ॥७४॥
ततस्तु साधयेन्मंत्रान्वेदोक्तान्वागमोदितान् ।
अस्त्राणां कर्मसिद्ध्यर्थं जपहोमविधानतः ॥७५॥
ऐसे श्रमविधि करे, जब तक सिद्धि हो श्रमसिद्धि हुए पीछे वर्षा में धनुष
को कर में धारण न करे पूर्व अभ्यास किये हुए शस्त्रों के न भूलने के
कारण दो महीना परिश्रम करे, प्रत्येक वर्ष के शरदृतु में अथवा आश्विन
महीने में शुक्ल पक्ष की ९ नवमी देवी के दिन चण्डी ईश्वरी और गुरु
तथा हथियार और घोड़ों की राजा वा अभ्यासी पूजा करे, ब्राह्मणों को
दक्षिणा देकर पीछे कुंवारी कन्याओं को जिमावे, देवी के लिये बाजों
और मंगलों के साथ पशु की बलि दे। पीछे वेदोक्त हों वा शास्त्रोक्त हों
अस्त्रों की कर्मसिद्धि के लिये जप और होम की विधि से मंत्रों का साधन
करे॥७१-७५॥
ब्राह्मं नारायणं शैवमैन्द्रं वायव्यवारुणे ।
आग्नेयं चापरास्त्राणि गुरुदत्तानि साधयेत् ॥७६॥
मनोवाक्कर्मभिर्भाव्यं लब्धास्त्रेण शुचिष्मता ।
अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि पूरुषम् ॥७७॥
प्रयोगं चोपसंहारं यो वेत्ति स धनुर्द्धरः ।
सामान्ये कर्मणि प्राज्ञो नैवास्त्राणि प्रयोजयेत् ॥७८॥
ब्राह्म, नारायण, शैव, ऐन्द्र, वायव्य, वारुण, आग्नेय और गुरु के दिये हुए
अस्त्रों का साधन करे, पवित्र पुरुष मन, वाणी, कर्म से अनुभव करे
अस्त्रों को पाकर, अस्त्रों का प्रयोग और संहार जो जाने वह धनुर्धर है,
सामान्य काम के लिये बुद्धिमान् अस्त्रों का प्रयोग न करे॥७६-७८॥
अथास्त्राणि प्रवक्ष्यामि सावधानोऽवधारय ।
ब्रह्मास्त्रं प्रथमं प्रोक्तं द्वितीयं ब्रह्मदंडकम् ॥७९॥
ब्रह्मशिरस्तृतीयं च तुर्यं पाशुपतं मतम् ।