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सर्वकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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पृष्ठ 41

हिन्दीटीकासमेता ३५
वायव्यं पञ्चमं प्रोक्तमाग्नेयं षष्ठकं स्मृतम् ॥८०॥
नारसिंहं सप्तमञ्च तेषां भेदा ह्यनन्तकाः ।
ससंहारं सुविज्ञेयं शृणु गाधे यथातथम् ॥८१॥
वेदमात्रा सर्वशस्त्रं गृह्यते दीप्यतेऽथवा ।
तत्प्रयोगं शृणु प्राज्ञ ब्रह्मास्त्रं प्रथमं शृणु ॥८२॥
हे विश्वामित्र! अब तुम सावधान होकर धारण करो, मैं अस्त्रों को
कहूंगा, पहिला ब्रह्मास्त्र कहा, दूसरा ब्रह्मदण्ड, तीसरा ब्रह्मशिर, चौथा
पाशुपतास्त्र, पांचवाँ वायव्यास्त्र, छठवां आग्नेयास्त्र, सातवाँ नारसिंह
इनके अनंत भेद हैं, इनको संहार के साथ जानना योग्य है। हे
गाधिवंशज! जैसा है वैसा सुनो, ये सब वेदमाता गायत्रीमंत्र से ग्रहण
करना अथवा दीप्यमान करना। हे प्राज्ञ! इनका प्रयोग सुनो, इनमें से
पहिला ब्रह्मास्त्र सुनो॥७९-८२॥
अथास्त्राणि
दादिदन्ताञ्च सावित्रीं विपरीतां जपेत्सुधीः ।
जप्त्वापूर्वं निखर्वञ्चाभिमंत्र्य विधिवच्छरम् ॥८३॥
क्षिपेच्छत्रुषु सहसा नश्यंति सर्वजातयः ।
बाला वृद्धाश्च गर्भस्था ये च योद्धुं समागताः॥८४॥
सर्वे ते नाशमायान्ति मम चैव प्रसादतः ।
यथातथं दादिदन्तं जपेत्संहारसिद्धये ॥८५॥
अब अस्त्रविद्या कहते हैं, 'द' को आदि ले 'द' के अन्त तक सावित्री को
विपरीत जपे, पहिले एक निखर्व विधि से जपकर पुनः बाण को
मंत्रितकर शीघ्र शत्रुओं पर फेंके, सब जाति नष्ट हों, बालक वृद्ध
गर्भस्थ और जो कोई युद्ध करने को आये हों वे सब नाश को प्राप्त हों,
मेरी कृपा से और संहार की सिद्धि को 'द' से आदि ले 'द' के अन्त तक
जपे॥८३-८५॥
ब्रह्मदण्ड प्रवक्ष्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् ।
ततः प्रचोदयाज्ज्ञेयं ततो नोयो धियः क्रमात् ॥८६॥