धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता ४१
‘ अपूर्ण स्वर में शत्रु की सामग्री हो और पूर्ण में अपनी सेना तत्व से पूर्ण
करे, स्थित हो, ऐसा एक भी योद्धा सारी वसुधा को जीते॥१७॥
पृष्ठे दक्षे योगिनी राहुयुक्ता यस्यैकोयं शत्रुलक्षं निहन्ति
॥ अर्कः पृष्ठे दक्षिणे यस्य गाधे चन्द्रो वामे सन्मुखे वै
निशायाम् ॥१८॥ वायुं पृष्ठे दक्षिणे यो विदध्याद्योधा
शत्रून्नाशयत्तत्क्षणेन ॥१९॥
जिसके पीछे और दाहिने राहु सहित योगिनी हो वह अकेला लाख
शत्रुओं को मारता है, हे विश्वामित्र! और ऐसे ही सूर्य पीछे वा दाहिने
हो और रात में चन्द्रमा सामने अथवा बाँये हो और वायु को पीछे वा
दाहिने जो करे, वह योद्धा तत्काल शत्रुओं का नाश करे॥१८-१९॥
या नाडी बहते चाङ्गे तस्यामेवाधिदेवता ।
सम्मुखेपि दिशा तेषां सर्वकार्यफलप्रदा ॥१२०॥
जो नाड़ी अंग में बहती हो, उसका अधिदेवता सामने हो, उसकी दिशा
के सामने मुख करे तो सब कार्यों की फल देने वाली हो॥१२०॥
यां दिशं बहते वायुर्युद्धं तद्दिशि दापयेत् ।
जयत्येव न सन्देहः शक्रोपि यदि चाग्रतः ॥२१॥
जिस दिशा का वायु देह में चलता हो, उसी दिशा में युद्ध दे तो यदि
इन्द्र भी आगे होवे तो भी जीत होय॥२१॥
सूर्ये पूर्वे चोत्तरे च चन्द्रे पश्चिमदक्षिणे ।
सेनापतिबलं त्वेवं प्रेषयेन्नित्यमादरात् ॥२२॥
सूर्य स्वर चलता हो तो पूर्व और उत्तर में यदि चन्द्रमा होय तो पश्चिम
दक्षिण में, सेनापति आदर के साथ सेना को युद्ध के लिये
भेजे॥२२॥
यत्र नाडयां वहेद्वायुस्तदंग प्राणमेव च ।
आकृष्य गच्छेत्कर्णान्ते जयत्येव पुरंदरम् ॥२३॥
जिस नाडी में वायु बहता हो, उसी अंग में प्राण होता है उसको कानों
तक खींचकर चले तो इन्द्र को भी जीत ले॥२३॥
प्रतिपक्षप्रहारेभ्यः पूर्णांगे योभिरक्षति ।