धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ धनुर्वेदसंहिता
ॐ वज्रनखवज्रदंष्ट्रायुधाय महासिंहाय हुंफट् ।
पूर्वं जप्त्वा च लक्षं हि नरसिंहं च योजयेत् ।
सिंहरूपास्ततो बाणाः पतंति शात्रवे वने ॥१॥
पूर्वोक्तेन प्रकारेण संहारं च प्रकल्पयेत् ।
संक्षेपतो महाभाग तवोक्तानि महामते ॥२॥
भेदास्त्वेषां शिवेनैव ह्यनन्ताः परिकीर्तिताः ।
इत्यस्त्रप्रकरणम्
पूर्वोक्त मंत्र को एक लाख जपकर श्रीनृसिंहजी महाराज का ध्यान कर
योजना करे, पीछे बाण सिंहरूप हो शत्रुरूपी वन में पड़कर उनको खा
जाते हैं पूर्वोक्त प्रकार से संहार करे , हे महाभाग! मैंने तेरे आगे संक्षेप
से अस्त्र कहे, इनके भेद तो श्रीशिवजी महाराज ने परशुरामजी के प्रति
अनंत कहे हैं॥१-२॥
इत्यस्त्रप्रकरणं समाप्तम्
हस्तर्के लांगलीकन्दो गृहीतस्तस्य लेपतः ।
शूरस्यापि रणे पुंसो दर्पं हरति कातरः ॥३॥
हस्त नक्षत्र में रविवारको जलपीपल का कन्द लेकर लेप करने से कायर
पुरुष भी शूरवीर के अभिमान को दूर कर देता है॥३॥
गृहीत्वा योगनक्षत्रैरपामार्गस्य मूलकम् ।
लेपमात्रेण वीराणां सर्वशस्त्रनिवारणम् ॥४॥
पुष्य रविवार सिद्धयोग में ऊँगा, जिसे चिरचिटा द्यौ तारा भी कहते हैं
उसकी जड़ लेकर रखे जिस दिन किसी से युद्ध का काम पड़े, उस दिन
शरीर के लेप करे तो वीरों के सर्व शस्त्र न लगें॥४॥
अधःपुष्पी शंखपुष्पी लज्जालुर्गिरिकर्णिका ।
नलिनी सहदेवी च पत्रमौंजार्कयोस्तथा ॥५॥
विष्णुक्रान्ता च सर्वासां जटा ग्राह्या रवेर्दिने ।
बद्धवा भुजे विलेपाद्वा काये शस्त्रापवारकः ॥६॥
सर्पव्याघ्रादिसत्वानां भूतादीनां न जायते ।
भीतिस्तस्य स्थिता यस्य मातरोऽष्टौ शरीरके ॥७॥