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धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

३० धनुर्वेदसंहिता
दे वह दृढ़घाती मनुष्य होता है॥
चतुर्विंशतिचर्माणि यो भिनत्तीषुणा नरः ।
तस्य बाणो गजेन्द्रस्य कायं निर्भिद्य गच्छति ॥४९॥
जो मनुष्य एक बाण से २४ चौबीस चमड़ों को बींध दे, उसका बाण बड़े
भारी हाथी के शरीर को भी भेदन कर चला जायगा॥४९॥
भ्राम्यं जले घटो वेध्यश्चक्रे मृत्पिंडकं तथा ॥
भ्रमंतं वेधयेद्यो हि दृढभेदी स उच्यते ॥५०॥
जल में घुमाकर घड़ा बींधना चाहिये और वैसे ही कुम्हार के चाक के
मिट्टी के घूमते हुए पिण्डे को, जो भ्रमण करती हुई वस्तु को वेधे वह दृढ़
भेदी कहाता है॥५०॥
अयस्तु काकतुण्डेन चर्म चारामुखेन हि ।
मृत्पिण्डं च घटं चैव विध्येत्सूचीमुखेन वै ॥५१॥
लोहे की वस्तु को काकतुण्ड से, ढाल को आरामुख से और मिट्टी के ढेले
को और घड़े को सूचीमुख बाण से वेधे॥५१॥
अथ चित्रविधिः
बाणभंगकरावर्तकाष्ठच्छेदनमेव च ।
बिंदुकं गोलकयुगं यो वेत्ति स जयी भवेत् ॥५२॥
बाण के तोड़ने की विधि और काष्ठच्छेदन, तथा बिंदी (चांदमारी)
और दो गोलों को जो बींधना जाने वह परसेना को जीतता
है॥५२॥
लक्ष्यस्थाने धृतं काण्डं सन्मुखं छेदयेत्ततः ॥
किंचिन्मुष्टिं विधाय स्वां तिर्यग्द्विफलकेषुणा ॥५३॥
सम्मुखं बाणमायान्तं तिर्यग्बाणं न संचरेत् ।
प्राप्तं शरेण यच्छिद्याद्वाणच्छेदी स उच्यते ॥५४॥
निशाने के स्थान में धारण किये हुए बाण को सामने आते २ ही मार्ग में
काट दे, कुछ अपनी मुष्टि को करके तिरछा हो, दो फलवाले बाण से वा
अर्धचन्द्र से शत्रु के शिर को मध्य से काट दे, सामने आते हुए बाण को