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धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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३२ धनुर्वेदसंहिता
रथी वा गजी अथवा सवार वा पैदल को भागते हुए पर लक्ष्य मारने का
श्रम करना चाहिये॥६०॥
अथ विधिः
वामादायाति यल्लक्ष्यं दक्षिणं हि प्रधावति ।
तच्छिंद्याच्चापमाकृष्य सव्येनैव च पाणिना ॥६१॥
तथैव दक्षिणायांतु विध्येद्वाणाद्धनुर्धरः ॥
आलीढक्रममारोप्य त्वराहन्याच्च तं नरः ॥६२॥
वायोरपि बलं दृष्ट्वा वामदक्षिणवाहतः ।
लक्ष्यं स साधयेद्देवं गाधिपुत्र नृपात्मज ॥६३॥
वायुपृष्ठे दक्षिणे च वहन्सूचयते बलम् ।
सम्मुखीनश्च वामश्च भटानां भङ्गसूचकः ॥६४॥
अब भागते हुए को मारने की विधि कहते हैं, जो निशाना बायें हाथ की
ओर से आता हुआ दाहिनी ओर भागता जाता हो, उसको बाँयें खींचकर
बाण हाथ से मारे, वैसे ही दक्षिण की ओर से आता हो उसको
धनुषधारी मनुष्य आलीढक्रम करके मारे आलीढक्रम पहले कह आये,
बांई ओर से चलता हुआ वा दाहिनी ओर से वायु चलता हो तो उसका
बल भी देख ले, यदि बांई ओर से चलता हो तो धनुष को दाहिनी ओर
झुका दे और दाहिना वायु हो तो बांई ओर बाण छोड़ दे। हे गाधि के
पुत्र! हे राजा के पुत्र! ऐसे निशाना साधन करे, जिसके पीठ पीछे का
वा दाहिनी ओर का वायु चलता हो, वही जीतता है और जिसके सामने
का व वांई ओर पवन चलता है वह हार जाता है, जोधाओं का भंग
सूचक है॥६१-६४॥
अथ शब्दवेधित्वम्
लक्ष्यस्थाने न्यसेत्कांस्यपात्रं हस्तद्वयान्तरे ।
ताडिते शर्कराभिस्तच्छब्दः संजायते यदा ॥६५॥
यत्र संद्योत्यते शब्दस्तं सम्यक्तत्र चिंतयेत् ।
कर्णेन्द्रियमनोयोगाल्लक्ष्यं निश्चयतां नयेत् ॥६६॥