धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता ३९
अधःपुष्पी जिसको औंधाहूली कहते हैं, शंखाहूली, छुईमुई, वनमोगरा,
कमोदिनी, सहदेई, मूंज का और आक का पत्र, विष्णुक्रांता इन सबों की
जड़ रविवार को ग्रहण करके हाथों से बाँधे, वा शरीर पर लेपन करे तो
सब शस्त्र दूर हों, साँप बाघ आदि हिंस्रजीवों की बाधा न हो और आठ
मातृदेवियों से भी रक्षा हो॥५-७॥
गृहीतं हस्तनक्षत्रे चूर्णं छुच्छुन्दरीभवम् ।
तत्प्रभावाद्गजः पुंसः सम्मुखं नैति निश्चितम् ॥८॥
हरिमांसं गृहीत्वा च मार्गेऽश्वानां क्षिपेद्भुवि ।
तेन मार्गेण ते चाश्वा नायांति ताडनेन वै ॥९॥
हस्त नक्षत्र में छुच्छुंदरी अर्थात् सुणसुणियां का चूरा ले, उसके प्रभाव से
पुरुष के सामने हाथी नहीं आवे, यह निश्चय किया हुआ है, शेर का मांस
लेकर जहाँ घोड़ों का मार्ग हो, वहाँ पृथ्वीपर पटक दे तो उस मार्ग से वे
घोड़े कोड़े मारने से भी नहीं आते हैं॥८-९॥
छुच्छुन्दरीश्रीफलपुष्पचूर्णैरालिप्तगात्रस्य नरस्य दूरात्
॥ आघ्राय गन्धद्विरदोऽतिमत्तो मदं त्यजेत्केसरिणो
यथोग्रम् ॥११०॥
छुच्छुंदर और नारियल के पुष्प का चूरा शरीर को लपेटे हुए मनुष्य के
शरीर की गंध को सूंघकर मतवाला हाथी भी मद को छोड़ देता है जैसे
शेर के शरीर के गंध को सूँघ कर छोड़ता है॥११०॥
श्वेताद्रिकर्णिकामूलं पाणिस्थं वारयेद्गजम् ।
श्वेतकंटारिकामूलं व्याघ्रादीनां भयं हरेत् ॥१११॥
पुष्यार्कोत्पाटिते मूले पाठाया मुखसंस्थिते ।
देहं स्फुटति नो तीक्ष्णमंडलाग्रै रणे नृणाम् ॥११२॥
गंधार्या उत्तरं मूलं मुखस्थं सन्मुखागतम् ।
शस्त्रौघं वारयेत्तत्र पुष्यार्के विधिनोद्धृतम् ॥११३॥
विधिरुपवासः
शुभ्रायाः शरपुङ्खाया जटा नीलीजटाथवा ।
भुजे शिरसि वक्त्रे वा स्थिता शस्त्रनिवारिका ॥११४॥