धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता २९
तदानीं मुंचितो बाणो लक्ष्यान्न स्खलति ध्रुवम् ॥४४॥
अब शुद्ध गति का वर्णन ऐसा है कि, लक्ष्य और बाण का अग्रभाग तथा
दृष्टि ये तीनों एक ही हो जायें, तब छोड़ा हुआ बाण निशाने से नहीं
चूकता॥४४॥
निर्दोषः शब्दहीनश्च सममुष्टिद्वयोज्झितः ।
भिनत्ति दृढवेध्यानि सायको नास्ति संशयः ॥४५॥
दोष रहित और शब्द से हीन गुणा और धनुष इनकी समान मुष्टि से
छोड़ा हुआ बाण कठिन वस्तुओं को विदारण कर देता है, इसमें संदेह
नहीं॥४५॥
स्वाकृष्टस्तेजितो यश्च सुशुद्धो गाढमुष्टितः ।
नरनागाश्वकायेषु न तिष्ठति स मार्गणः ॥४६॥
सुंदर खैंचा हुआ तेज किया हुआ जो अच्छा स्वच्छ पक्ष आदि बँधा हो
वह बाण गाढ़ी मुष्टि से छोड़ा हुआ, मनुष्य हाथी घोड़ों के शरीरों में
नहीं ठहरता अर्थात् पार हो जाता है॥४६॥
यस्य तृणसमा बाणा यस्येन्धनसमं धनुः ।
यस्य प्राणसमा मौर्वी स धन्वी धन्विनां वरः ॥४७॥
जिसके तृण के समान बाण, और जिसके ईंधन के तुल्य धनुष और प्राण
के समान मौर्वी (प्रत्यंचा) हो वह धनुषधारी धनुषधारियों में श्रेष्ठ
है॥४७॥
अथ दृढचतुष्कम्
अयश्चर्मघटश्चैव मृत्पिंडश्च चतुष्टयम् ।
यो भिनत्ति न तस्येषुर्वज्रेणापि विदार्यते ॥४८॥
अब दृढचतुष्क कहते हैं, लोह, चमड़ा, घड़ा, मिट्टी के पिण्ड इन चारों
को जो बाण भेदन करे उसका बाण वज्र से भी न कटे॥४८॥
सार्द्धाङ्गुलप्रमाणेन लोहपत्राणि कारयेत् ।
तानि भित्त्वैकबाणेन दृढघाती भवेन्नरः ॥
डेढ़ अंगुल के मान चौड़े लोहे के पत्र करावे, उनको एक बाण से जो वेध