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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

४ मिश्रित
॥ शब्द १७ ॥
सइयाँ महरा१, मोर डोलिया फँदावो ॥ टेक ॥
काहे कै तोर डोलिया पालकी,
काहे कै ओहि में बाँस लगावो ॥ १ ॥
आव भाव कै डोलिया पालकी,
सत्त नाम कै बाँस लगावो ॥ २ ॥
प्रेम कै डोर जतन से बाँधो,
ऊपर खलीता२ लाल ओढ़ावो ॥ ३ ॥
ज्ञान दुलीचा भारि बिछावो,
नाम कै तकिया अरध लगावो ॥ ४ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
गगन मँदिल में पिया दुजरावो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १८ ॥
पिया परदेसिया, गवन लैजा मोर ॥ टेक ॥
आव भाव का अनवट बिछुआ,
शब्द के घुँघरू उठे घनघोर ॥ १ ॥
तन सारी मन रतन लहँगवा,
ज्ञान की अँगिया भई सरबोर ॥ २ ॥
चारि जना मिलि लेइ चले हैं,
जाइ उतारे जमुनवा के कोर ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
नगरी के लोग कहैँ कुल-बोर ॥ ४ ॥
(१) कहार। (२) ओहार।

मिश्रित ७५
॥ शब्द १९॥
गाँठ परी पिया बोले न हम से ॥ १ ॥
माल मुलुक कछु संग न जैहै,
नाहक बैर कियो है जग से ॥ २ ॥
जो मैं जनितिउँ पिया रिसियै है,
नाहक प्रीति लगाती न जग से ॥ ३ ॥
निसु बासर पिय सँग मैं सूतिउँ,
नैन अलसानी निकरि गये घर से ॥ ४ ॥
जस पनिहारि धरे सिर गागर,
सुरति न टरै बतरावत१ सब से ॥ ५ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
साहेब कबीर को पावै भाग से ॥ ६ ॥
॥ शब्द २० ॥
मेरे मन बसि गये साहेब कबीर ॥ टेक ॥
हिन्दू के तुम गुरू कहाओ, मुसलमान के पीर ।
दोऊ दीन ने झगड़ा माड़ेव, पायौ नहीं सरीर ॥ १ ॥
सील संतोष दया के सागर, प्रेम प्रतीत मति-धीर ।
बेद कितेब मते के आगर, दोउ दीनन के पीर ॥ २ ॥
बड़े बड़े संतन हितकारी, अजरा अमर सरीर ।
धरमदास की बिनय गुसाँईं, नाव लगावो तीर ॥ ३ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अमर लोक से हम चलि आये, आये जगत मँझारा हो ।
स्याही छाप पर्वाना लाये, समरथ के कढ़िहारा हो ॥ १ ॥
जीवन दुखित देखि संसारा, तेहि कारन पग धारा हो ।
बंस बयालिस थाना रोपूँ, जंबू दीप मँझारा हो ॥ २ ॥
(१) बात चीत करती है।

७६ पहाड़ा
दसो मोकाम की भक्ति दृढ़ाऊँ, चौका पान पर्वाना हो ।
बारह पंथ चलैँगे आगे, घर घर बोध पसारा हो ॥ ३ ॥
गुरू सहित सब चेला डूबे, फिर फिर गर्भ मँझारा हो ।
बचन बंस को बीरा पावै, तब होइहै निरबारा हो ॥ ४ ॥
तेरह पीढ़ी ज्ञान रजधानी, चूरामनि औतारा हो ।
उनके अंग छाँह नहिँ होइहै, देह बिदेह अपारा हो ॥ ५ ॥
उनके आगे जुग मति चलिहै, राज नोति उठि जाई हो ।
पाँच सब्द की इच्छा नाहीं, यह गति सब में आई हो ॥ ६ ॥
जब लौँ कौल पूर नहिँ आवै, तब लग भेद छिपावो हो ।
कोटिन करै बहुत को थापै, फेरि काल घर आवै हो ॥ ७ ॥
पाँच हजार पचीस के बीते, सत्त चाल ठहराई हो ।
पारस पान जबै पुनि उगिहै, जग निद्रा मिटि जाई हो ॥ ८ ॥
जो कोइ होय सत्त कै तिनुका, सोई मोहिँ पतियाई हो ।
की तो अमी अंकुरै वा में, की गुरु चरन सिधाई हो ॥ ६ ॥
ना गुरु सरन न नाम की करनी, कैसे हंस कहावै हो ।
बारह पंथ मिलैँगे आगे, छाँड़ कपट चतुराई हो ॥ १०॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, आगम तोहि लखाऊँ हो ।
जो कोइ हंसा होइ हमारा, तिन का देहु लखाई हो ॥ ११॥
॥ पहाड़ा ॥
कोई लोढ़त संत सुआन, काया बन फूलि रहा ॥ टेक ॥
एका एक मिलै गुरु पूरा, मूल मंत्र तब पावै ।
सब साधन की बानी बूझै, मन परतीत बढ़ावै ॥ १ ॥
दूआ दुई तजै मन दुबिधा, रज गुन मन से त्यागै ।
सतगुरु ऊरध१ माहीं निरखै, सोवन से उठि जागै ॥ २ ॥
(१) ऊँचे ।

नाम लीला ७७
तीआ तीन त्रिबेनी संगम, जहाँ अगम अस्थाना।
तन मन की सब त्रिस्ना त्यागै, कोइ हरिजन करै अस्नाना ३
चौआ चार चतुर्भुज सोहै, पाँचवैं पद को धावै।
प्रेम हिँडोला झूला झूलै, उपजै चित अनुरागै ॥ ४ ॥
पाँचे पाँच पचीसो बस करि, साँचे होइ ठहरावै।
इंगला पिंगला सुखमनि सोधै, तब चरनोदक पावै ॥ ५ ॥
छठएँ छैयो चक्रै बेधै, सुन्न भवन मन लावै।
बिगसै कँवल काया के भीतर, तब चंदा दरसावै ॥ ६ ॥
सतएँ सात सत्त धुनि उपजै, धुनि सुनि आनँद बाढ़ी।
सहजै दीनदयाल कृपा-निधि, बूड़त भौजल काढ़ी ॥ ७ ॥
अठएँ आठै अष्ट कँवल में, ऊरध निरखै सोई।
आतम चीन्हि परमातम चीन्है, ताहि तुलै नहिँ कोई ॥ ८ ॥
नवएँ नवो द्वार होइ निरखै, जहँ बरै जगमग जोती।
दामिनि दमकै अमृत बरसै, अजर झरै जहँ मोती ॥ ६ ॥
दसएँ दसम द्वार चढ़ि बैठे, पढ़ि लै एक पहाड़ा।
धरमदास चरनन पड़ि बिनवै, निसु दिन बारम्बारा ॥१०॥
॥ नाम लीला ॥
साहेब अबिचल नाम, दया करि पाइये ॥ टेक ॥
प्रथम बन्दौँ गुरु चरन, सीस संतन को नाऊँ।
सतगुरु होयँ दयाल, तो नाम चरित्र सुनाऊँ ॥
सत्त सुकृत हिरदे बसै, कबहुँ न आवै हारि।
अविगति से परिचै भई, तो आवागवन निवारि ॥१॥
कहा आन की सेव, जीव को भर्म न भाजै।
अलख सरूपी आप, तहाँ अनहद धुनि गाजै ॥

यह धुनि सुनि अबिचल रहो, इत उत मन नहिँ जाय ।
अमृत केरी बुन्द है, सो अमृत माहिँ समाय ॥ २ ॥
प्रथम पुरुष पग धरयो सत्त, सतजुग मेँ आये ।
परमारथ के काज, जीव की बन्दि छोड़ाये ॥
कागा तैं हंसा किया, जाति बरन कुल खोय ।
जम से तिनुका तोरि के, गंज न सकै कोय ॥ ३ ॥
सतजुग गयो व्यतीत, सुनो त्रेता की बानी ।
धरयो मुनिन्द्र को रूप, आप सत सुकृत ज्ञानी ॥
हंसन को परमोधि के, आप रह्यो नीनार ।
नाम प्रतीत बसे जो जिव को, सो जन उतरे पार ॥ ४ ॥
त्रेता गयो व्यतीत, सुनो द्वापर की बानी ।
करुनामय को रूप धरयो, सत सुकृत ज्ञानी ॥
चेतनहारा चेतियो, बहुरि न चेता जाय ।
सत्त सुकृत चीन्हे बिना, काल सबन को खाय ॥ ५ ॥
कलिजुग प्रगट कबीर, काल को देखा जोरा ।
किये कासी प्रस्थान, आप भै बन्दीछोरा ॥
मुनि पंडित सब बादहीँ, कोई न पहुंचे ज्ञान ।
निर्गुन लीला धारि के, आप पुरुष निर्बान ॥ ६ ॥
कलिजुग कर्म अपार, जीव कोइ कहा न मानै ।
सीखे साखी सब्द, उलटि के बाद बखानै ॥
बाद किये पहुँचे नहीँ, मन ममता के जोर ।
लख चौरासी जिया जोनि मेँ, भ्रमै नरक अघोर ॥ ७ ॥
कठिन काल को रूप, अंत कोइ जानि न भाई ।
जब आवै मृतु अंध, जीव कहँ जाय पराई ॥

नाम लीला ७९
नाम बिना बाचै नहीं, केतौ करै उपाथ ।
तीरथ जाय सकल भ्रमि आवै, जम को त्रास न जाय ॥ ८ ॥
बहुत ज्ञान बहु गम्य, बहुत मूरत को पूजै ।
दीपक बरै अनेक, अंध को आँखि न सूझै ॥
बहुतक जुग भरमत फिरै, कितहुँ न पावै दाद ।
सात दीप नौ खंड में, सत्य नाम बिनु बाद ॥ ६ ॥
सतगुरु का उपदेस, संत कोउ बिरला जानै ।
करे तत्त्व का खोज, बहुरि संकट नहिँ आनै ॥
ऐसे सुरति लगाइये, जैसे चन्द चकोर ।
कठिन पड़े सुख दुख सहै, प्रीत निभावै ओर ॥ १० ॥
अविगति अगम अपार, और सब दीसै बाजी ।
पढ़ि पढ़ि बेद कितेब, भुले पंडित औ काजी ॥
अगम गम्य जाने नहीं, बीचहिँ परे भुलाय ।
जैसे ज्वारी जुवा खेलि के, सरबस चले गँवाय ॥ ११॥
नहिँ सागर नहिँ सिखर, नहीं तहँ पवन न पानी ।
नहिँ धरती आकास, नहीं कछु और निसानी ॥
चन्द सूर वा घर नहीं, नहीं दिवस नहिँ राति ।
जहाँ पुरुष आपै बसै, तहँ कुल कर्म न पाँति ॥ १२॥
वहाँ नहीं तीरथ ब्रत, नहिँ तहँ बेद बिचारा ।
नहिँ देवी नहिँ देव, नहीं कछु नेम अचारा ॥
जरा मरन वा घर नहीं, नहीं लाभ नहिँ हान ।
प्रेम मगन हंसा रहै, लौ धरै पुरुष को ध्यान ॥ १३॥
जहाँ पुरुष रहै आप, तहाँ हंसन को बासा ।
तहँ नहिँ माया मोह, नहीं तहँ तृष्ना आसा ॥

८० नाम लीला
हर्ष सोक वा घर नहीं, नहीं कर्म ब्यवहार ।
हंसा परम अनंद में, (सो) छूटे भ्रम जंजार ॥ १४॥
चारो जुग के हंस, सत्य सतलोक सिधाये ।
भ्रमत फिरे सब काग, दूत बैठे रखवाये ॥
मुनि पंडित जोगी जती, घरे काल को ध्यान ।
तीन लोक के बाहरे, कोई न पाये जान ॥ १५॥
भ्रमत फिरे जुग चारि, रूप कीन्हा बिस्तारा ।
अजहुँ न समुझे अंध, परे जम काल की धारा ॥
बहुत भाँति परमोधिया, कोइ कोइ लीन्हा मान ।
आदि अंत के हंस हैं, सो प्रगट भये हैं आन ॥ १६॥
अनजाने को दूरि, जाने को निकट बिराजै ।
सब्द सनेही संत, सोई सब ऊपर छाजै ॥
मगन होय मन को गहै, हंस रूप आनन्द ।
सुमिरन दीनदयाल को, ज्यौँ उड़गन१ में चन्द ॥ १७॥
बहुत गुरू संसार रहत, घर कोइ न बतावै ।
आपन स्वारथ लागि, सीस पर भार चढ़ावै ॥
सार सब्द चीन्हें नहीं, बीचहिँ पर भुलाय ।
सत्त सुकृत चीन्हे बिना, सब जुग काल चबाय ॥ १८॥
यह लीला निर्वान, भेद कोइ बिरला जाने ।
सब जग भरमे डार, मूल कोइ बिरला माने ॥
मूल नाम एक पुरुष है, पुष्कद्वीप में बास ।
सतगुरु मिलैँ तो पाइये, पूरन प्रेम बिलास ॥ १६॥
नाम सनेही होय, दूत जम निकट न आवै ।
परमतत्त्व पहिचानि, सत्त साहेब गुन गावै ॥
(१) तारा ।

मुक्ति लीला ८१
अजर अमर बिनसै नहीं, सुख सागर में बास ।
केवल नाम कबीर है, गावै धनि धर्मदास ॥२०॥
॥ मुक्ति लीला ॥
हीरा जन्म न बारम्बार, समुझि मन चेत हो ॥ टेक ॥
जैसे कीट पतंग पषान, भये पसु पच्छी ।
जल तरंग जल माहिँ, रहे कच्छा औ मच्छी ॥
अंग उघारे रहे सदा, कबहुँ न पावै सुक्ख ।
सत्य नाम जाने बिना, जन्म जन्म बड़ दुक्ख ॥ १ ॥
सीतल पासा ढारि, दाव खेलो संम्हारी ।
जीतौ पक्की सार, आव जनि जैहौ हारी ॥
रामै राम पुकारि के, लीन्हो नरक निवास ।
मूड़ गड़ाय रहे जिव, गर्भ माहिँ दस मास ॥ २ ॥
गर्भ दुक्ख तैं काढ़ि, प्रगट प्रभु बाहर कीन्हो ।
भक्ति अंग को छापि, अंक दस्तक लिखि दीन्हो ॥
वा को नाम बिसरि गयो, जिन पठयो संसार ।
रंचक सुख के कारने, बिसरि गयो निज सार ॥ ३ ॥
नहिँ जाने केहि पुन्य, प्रगट भे मानुष देही ।
मन बच कर्म सुभाव, नाम से कर ले नेही ॥
लख चौरासी भर्मि के, पायो मानुष देह ।
सो मिथ्या कस खोवते, झूठी प्रीति सनेह ॥ ४ ॥
बालक बुद्धि अजान, कछू मन में नहिँ आने ।
खेले सहज सुभाव, जहाँ आपन मन माने ॥
अधर कलोले होइ रह्यो, ना काहू को मान ।
भली बुरी ना चित धरै, बारह बरस समान ॥ ५ ॥
११

८२ मुक्ति लीला
जोबन रूप अनूप, मसी मुख ऊपर छाई ।
अंग सुगन्ध लगाय, सीस पगिया लटकाई ॥
अंध भये सूझै नहीं, फूटि गई है चार¹।
भटके पड़े पतंग ज्यौँ, देखि बिरानी नार ॥ ६ ॥
जोबन जोर झकोर, नदी उर अंतर बाढ़ी ।
संतो हो हुसियार, कियो न बाँहू गाढ़ी ॥
दे गजगीरी प्रेम की, मूँदो दसो दुवार ।
वो साँईँ के मिलन में, तुम जनि लावो बार ॥ ७ ॥
बृद्ध भये पछिताय, जबै तीनौँ पन हारे ।
भई पुरानी प्रीति, बोल अब लागत प्यारे ॥
लच कच दुनियाँ है रही, केस भये सब सेत ।
बोलत बोल न आवई, लूटि लिये जम खेत ॥ ८ ॥
माया रंग कुसुम्म, महा देखन को नीको ।
मीठो दिन दुइ चार, अंत लागत है फीको ॥
कोटिन जतन रह्यो नहीं, एक अंग निज मूल ।
ज्यौँ पतंग उड़ि जायगो, ज्यौँ माया काफूर ॥ ६ ॥
नाम रंग मंजीठ, लगे छूटे नहिँ भाई ।
लच पच रहो समाय, सार ता मेँ अधिकाई ।
केती बार धुलाइये, देदे करड़ा धोय ।
ज्यौँ ज्यौँ भट्टी पर दिये, त्यौँ त्यौँ उज्ज्वल होय ॥१०॥
निकट जमन के जात, तबै हैगो मुख कारो ।
बोले बोल न आय, तबै तोहि करिहैं गारो² ॥
काल छली तिहुँ लोक में, नहिँ काहू की मान ।
राजा राना मारिया, सबहीँ कीन्ह दिवान³ ॥११॥
(१) दो अन्तर की दो भीतर की आँखें । (२) कारागार या जेलखाना । (३) दिवाना ।

मुक्ति लीला ८३
देऊँ सुमति बिचार, सीख जो मेरी मानो।
चलो सुमारग चाल, भलो जो अपनो जानो॥
तिरिया निकट बुलाइ के, दे गइ माथे हाथ।
लेगइ रंग निचोइ के, ज्योँ तेली कै काथ१॥१२॥
जो मरि भाखा बोल, बोलि कामिन चित चोरयो।
छिनहीँ प्रीति बढ़ाय, नाम से नाता तोरयो॥
रस बस कीन्हो आइ के, गयो ठगौरी मेल।
जीव लोभ बस भ्रमि रहे, करि केवल सुख केल ॥१३॥
सोवत हो केहि नीँद, मूढ़ मूरख अज्ञानी।
भोर भये परभात, अबहिँ तुम करो पयानी॥
अब हम साँची कहत हैं, उड़ियो पंख पसार।
छुटि जैहो या दुख तैँ, तन सरवर के पार ॥१४॥
नाव भाँझरी साजि, बाँधि बैठो बैपारी।
बोझ लद्यो पाषान, मोहिँ डर लागै भारी॥
माँझ धार भव तखत मेँ, आइ परैगी भोर।
एक नाम केवटिया करि ले, सोई लगावै तीर ॥१५॥
सौ भइया की बाँह, तपै दुर्जोधन२ राना।
परे नरायन बीच, भूमि देते गरबाना३॥
जुद्ध रच्यो कुरुछेत्र मेँ, बानन बरसे मेँह।
तिनहीँ के अभिमान तैँ, गिधहुँ न खायो देँह ॥१६॥
छत्रपती भूपाल रहत, देखा नहिँ कोई।
दिन दस गये बजाइ, गर्द माँ मिलिगे सोई॥
(१) तरछट। (२) दुर्योधन कौरवों के राजा के सौ भाई थे, जो सब महाभारत
में मारे गये। (३) राजा युधिष्ठिर को थोड़ी जमीन श्रीकृष्ण ने दिलाना चाहा था पर
दुर्योधन ने शेखी से इनकार किया।

८४
मुक्ति लीला

परिहौ नरक अघोर मेँ, अब किन चेतो अंध।
सत्त नाम जाने बिना, परो काल के फंद ॥१७॥
हुई सलीता संग, बहुत हाथी औ घोरा।
मरन की बेरिया संग, चले नहिँ एको डोरा ॥
कंचन महल धरे रहे, और सुंदरी नारि।
ज्योँ करि आये त्योँ गये, चले दोऊ कर झारि ॥१८॥
जोधा आगे उलट पुलट, यह पुहमी१ करते।
बस नहिँ रहते सोय, छिने इक मेँ बल होते ॥
सौ जोजन मरजाद सिंध कै, करते एकै फाल२।
हाथन पर्वत तौलते, तिन धरि खायो काल ॥१९॥
ऐसा यह संसार, जैसी रहटे की घरिया।
इक रीते फिरि जाय, एक आवै फिरि भरिया ॥
उपजि उपजि बिनसन कर, फिरि फिरि जमे गिरास।
यही तमासा देखि के, मनुवा भयो उदास ॥२०॥
जैसे कलपि कलपि के, भये हैं गुड़ की माखी।
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··· उक्त पुस्तको का सूचीपत्र
[ हर महात्मा का जीवन-चरित्र उनकी बानी के आदि में दिया है ]
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