धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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मुक्ति लीला
परिहौ नरक अघोर मेँ, अब किन चेतो अंध।
सत्त नाम जाने बिना, परो काल के फंद ॥१७॥
हुई सलीता संग, बहुत हाथी औ घोरा।
मरन की बेरिया संग, चले नहिँ एको डोरा ॥
कंचन महल धरे रहे, और सुंदरी नारि।
ज्योँ करि आये त्योँ गये, चले दोऊ कर झारि ॥१८॥
जोधा आगे उलट पुलट, यह पुहमी१ करते।
बस नहिँ रहते सोय, छिने इक मेँ बल होते ॥
सौ जोजन मरजाद सिंध कै, करते एकै फाल२।
हाथन पर्वत तौलते, तिन धरि खायो काल ॥१९॥
ऐसा यह संसार, जैसी रहटे की घरिया।
इक रीते फिरि जाय, एक आवै फिरि भरिया ॥
उपजि उपजि बिनसन कर, फिरि फिरि जमे गिरास।
यही तमासा देखि के, मनुवा भयो उदास ॥२०॥
जैसे कलपि कलपि के, भये हैं गुड़ की माखी।
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