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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

८२ मुक्ति लीला
जोबन रूप अनूप, मसी मुख ऊपर छाई ।
अंग सुगन्ध लगाय, सीस पगिया लटकाई ॥
अंध भये सूझै नहीं, फूटि गई है चार¹।
भटके पड़े पतंग ज्यौँ, देखि बिरानी नार ॥ ६ ॥
जोबन जोर झकोर, नदी उर अंतर बाढ़ी ।
संतो हो हुसियार, कियो न बाँहू गाढ़ी ॥
दे गजगीरी प्रेम की, मूँदो दसो दुवार ।
वो साँईँ के मिलन में, तुम जनि लावो बार ॥ ७ ॥
बृद्ध भये पछिताय, जबै तीनौँ पन हारे ।
भई पुरानी प्रीति, बोल अब लागत प्यारे ॥
लच कच दुनियाँ है रही, केस भये सब सेत ।
बोलत बोल न आवई, लूटि लिये जम खेत ॥ ८ ॥
माया रंग कुसुम्म, महा देखन को नीको ।
मीठो दिन दुइ चार, अंत लागत है फीको ॥
कोटिन जतन रह्यो नहीं, एक अंग निज मूल ।
ज्यौँ पतंग उड़ि जायगो, ज्यौँ माया काफूर ॥ ६ ॥
नाम रंग मंजीठ, लगे छूटे नहिँ भाई ।
लच पच रहो समाय, सार ता मेँ अधिकाई ।
केती बार धुलाइये, देदे करड़ा धोय ।
ज्यौँ ज्यौँ भट्टी पर दिये, त्यौँ त्यौँ उज्ज्वल होय ॥१०॥
निकट जमन के जात, तबै हैगो मुख कारो ।
बोले बोल न आय, तबै तोहि करिहैं गारो² ॥
काल छली तिहुँ लोक में, नहिँ काहू की मान ।
राजा राना मारिया, सबहीँ कीन्ह दिवान³ ॥११॥
(१) दो अन्तर की दो भीतर की आँखें । (२) कारागार या जेलखाना । (३) दिवाना ।