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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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मुक्ति लीला ८३
देऊँ सुमति बिचार, सीख जो मेरी मानो।
चलो सुमारग चाल, भलो जो अपनो जानो॥
तिरिया निकट बुलाइ के, दे गइ माथे हाथ।
लेगइ रंग निचोइ के, ज्योँ तेली कै काथ१॥१२॥
जो मरि भाखा बोल, बोलि कामिन चित चोरयो।
छिनहीँ प्रीति बढ़ाय, नाम से नाता तोरयो॥
रस बस कीन्हो आइ के, गयो ठगौरी मेल।
जीव लोभ बस भ्रमि रहे, करि केवल सुख केल ॥१३॥
सोवत हो केहि नीँद, मूढ़ मूरख अज्ञानी।
भोर भये परभात, अबहिँ तुम करो पयानी॥
अब हम साँची कहत हैं, उड़ियो पंख पसार।
छुटि जैहो या दुख तैँ, तन सरवर के पार ॥१४॥
नाव भाँझरी साजि, बाँधि बैठो बैपारी।
बोझ लद्यो पाषान, मोहिँ डर लागै भारी॥
माँझ धार भव तखत मेँ, आइ परैगी भोर।
एक नाम केवटिया करि ले, सोई लगावै तीर ॥१५॥
सौ भइया की बाँह, तपै दुर्जोधन२ राना।
परे नरायन बीच, भूमि देते गरबाना३॥
जुद्ध रच्यो कुरुछेत्र मेँ, बानन बरसे मेँह।
तिनहीँ के अभिमान तैँ, गिधहुँ न खायो देँह ॥१६॥
छत्रपती भूपाल रहत, देखा नहिँ कोई।
दिन दस गये बजाइ, गर्द माँ मिलिगे सोई॥
(१) तरछट। (२) दुर्योधन कौरवों के राजा के सौ भाई थे, जो सब महाभारत
में मारे गये। (३) राजा युधिष्ठिर को थोड़ी जमीन श्रीकृष्ण ने दिलाना चाहा था पर
दुर्योधन ने शेखी से इनकार किया।