सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
सुख सागर सूभर भर्या, उज्जवल निर्मल नीर।
प्यास बिना पीवै नहीं, दादू सागर तीर ॥ 63 ॥
शून्य सरोवर हंस मन, मोती आप अनंत।
दादू चुगि चुगि चंचुभरि, यौं जन जीवैं संत ॥ 64 ॥
शून्य सरोवर मीन मन, नीर निरंजन देव।
दादू यहु रस विलसिये, ऐसा अलख अभेव ॥ 65 ॥
शून्य सरोवर मन भँवर, तहाँ कमल करतार।
दादू परिमल पीजिए, सन्मुख सिरजनहार ॥ 66 ॥
शून्य सरोवर सहज का, तहँ मर जीवा मन।
दादू चुणि चुणि लेयगा, भीतर राम रतन ॥ 67 ॥
दादू मंझि सरोवर विमल जल, हंसा केलि करांहि।
मुक्ताहल मुक्ता चुगैं, तिहिं हंसा डर नांहि ॥ 68 ॥
अखंड सरोवर अथग जल, हंसा सरवर न्हाँहि।
निर्भय पायाआप घर, अब उड़ि अनत न जांहि ॥ 69 ॥
दादू दरिया प्रेम का, तामें झूलैं दोइ।
इक आतम परआतमा, एकमेक रस होइ ॥ 70 ॥
दादू हिण दरियाव, माणिक मंझेई।
डुबि डेई पाण मैं, डिठो हंजेई ॥ 71 ॥
परआतम सौं आत्मा, ज्यूँ हंस सरोवर मांहि।
हिलि मिलि खेलैं पीव सौं, दादू दूसर नांहि ॥ 72 ॥
दादू सरवर सहज का, तामें प्रेम तरंग।
तहँ मन झूलै आत्मा, अपणे सांई संग ॥ 73 ॥
दादू देखौं निज पीव को, दूसर देखौं नांहि।
सबै दिसा सौं सोधि करि, पाया घट ही मांहि ॥ 74 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू देखौं निज पीव को, और न देखौं कोइ।
पूरा देखौं पीव को, बाहिर भीतर सोइ ॥ 75 ॥
दादू देखौं निज पीव को, देखत हि दुख जाइ।
हूँ तो देखौं पीव को, सब में रह्या समाइ ॥ 76 ॥
दादू देखौं निज पीव को, सोई देखन जोग।
परगट देखौं पीव को, कहाँ बतावैं लोग ॥ 77 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश
दादू देखु दयालु को, सकल रह्या भरपूर।
रोम रोम में रमि रह्या, तूँ जनि जानै दूर ॥ 78 ॥
दादू देखु दयालु को, बाहरि भीतरि सोइ।
सब दिसि देखौं पीव को, दूसर नाहीं कोइ ॥ 79 ॥
दादू देखु दयालु को, सनमुख सांई सार।
जीधरि देखौं नैन भरि, तीधरि सिरजनहार ॥ 80 ॥
दादू देखु दयालु को, रोक रह्या सब ठौर।
घट घट मेरा सांइयाँ, तूँ जनि जानै और ॥ 81 ॥
उभै असमाव
तन मन नाहीं, मैं नहीं, नहीं माया, नहीं जीव।
दादू एकै देखिए, दह दिसि मेरा पीव ॥ 82 ॥
दादू पाणी मांहीं पैसि करि, देखै दृष्टि उघारि।
जलाबिंब सब भरि रह्या, ऐसा ब्रह्म विचारि ॥ 83 ॥
सदा लीन आनन्द में, सहज रूप सब ठौर।
दादू देखै एक को, दूजा नाहीं और ॥ 84 ॥
दादू जहाँ तहँ साथी संग है, मेरे सदा अनंद।
नैन बैन हिरदै रहै, पूरण परमानंद ॥ 85 ॥
जागत जगपति देखिये, पूरण परमानंद।
सोवत भी सांई मिलै, दादू अति आनन्द ॥ 86 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू दह दिश दीपक तेज के, बिन बाती बिन तेल।
चहुँ दिसि सूरज देखिये, दादू अद्भुत खेल ॥ 87 ॥
सूरज कोटि प्रकास है, रोम रोम की लार।
दादू ज्योति जगदीश की, अंत न आवै पार ॥ 88 ॥
ज्यों रवि एक आकाश है, ऐसे सकल भरपूर।
दादू तेज अनन्त है, अल्लह आली नूर ॥ 89 ॥
सूरज नहीं तहँ सूरज देख्या, चंद नहीं तहँ चन्दा।
तारे नहीं तहँ झिलमिल देख्या, दादू अति आनन्दा ॥ 90 ॥
बादल नहीं तहँ बरषत देख्या, शब्द नहीं गरजंदा।
बीज नहीं तहँ चमकत देख्या, दादू परमानन्दा ॥ 91 ॥
आत्म बेलीतरु
दादू जोति चमकै झिलमिलै, तेज पुंज प्रकाश।
अमृत झरै रस पीजिए, अमर बेलि आकाश ॥ 92 ॥
परिचय अंग
दादू अविनाशी अंग तेज का, ऐसा तत्त्व अनूप।
सो हम देख्या नैन भरि, सुन्दर सहज स्वरूप ॥ 93 ॥
परम तेज प्रगट भया, तहाँ मन रह्या समाइ।
दादू खेलै पीव सौं, नहीं आवै नहीं जाइ ॥ 94 ॥
निराधार निज देखिये, नैनहुँ लागा बन्द।
तहँ मन खेलै पीव सौं, दादू सदा आनन्द ॥ 95 ॥
आत्म बेलितरु
ऐसा एक अनूप फल, बीज बाकुला नांहि।
मीठा निर्मल एक रस, दादू नैनहुँ मांहि ॥ 96 ॥
परिचय
हीरे हीरे तेज के, सो निरखै त्रय लोइ।
कोइ इक देखै संत जन, और न देखै कोइ ॥ 97 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
नैन हमारे नूर मां, तहाँ रहै ल्यौ लाइ ।
दादू उस दीदार को, निसदिन निरखत जाइ ॥ 98 ॥
दादू नैनहुँ आगे देखिये, आत्म अंतर सोइ ।
तेज पुंज सब भरि रह्या, झिलमिल झिलमिल होइ ॥ 99 ॥
अनहद बाजे बाजिये, अमरापुरी निवास ।
जोति स्वरूपी जगमगै, कोइ निरखै निज दास ॥ 100 ॥
परम तेज तहँ मन रहे, परम नूर निज देखे ।
परम जोति तहँ आतम खेले, दादू जीवन लेखे ॥ 101 ॥
दादू जरै सु जोति स्वरूप है, जरै सु तेज अनंत ।
जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥ 102 ॥
परिचय पति पहचान
सतगुरु अलख अलाह का, कहु कैसा है नूर ।
दादू बेहद हद नहीं, सकल रह्या भरपूर ॥ 103 ॥
वार पार नहिं नूर का, दादू तेज अनंत ।
कीमत नहीं करतार की, ऐसा है भगवंत ॥ 104 ॥
निरसंध नूर अपार है, तेज पुंज सब मांहि ।
दादू जोति अनंत है, आगो पीछो नांहि ॥ 105 ॥
खंड खंड निज ना भया, एकलस एकै नूर ।
ज्यूं था त्यूं ही तेज है, ज्योति रही भरपूर ॥ 106 ॥
परम तेज प्रकास है, परम नूर निवास ।
परम ज्योति आनन्द में, हंसा दादू दास ॥ 107 ॥
परिचय साक्षात्कार
नूर सरीखा नूर है, तेज सरीखा तेज ।
ज्योति सरीखी ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥ 108 ॥
तेज पुंज की सुन्दरी, तेज पुंज का कंत ।
तेज पुंज की सेज पर, दादू बन्या बसंत ॥ 109 ॥
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पुहप प्रेम बरसै सदा, हरि जन खेलैं फाग।
ऐसा कौतुक देखिये, दादू मोटे भाग ॥ 110 ॥
परिचय रस
अमृतधारा देखिए, पारब्रह्म बरषंत।
तेज पुंज झिलमिल झरै, को साधु जन पीवंत ॥ 111 ॥
रस ही में रस बरषि है, धारा कोटि अनंत।
तहाँ मन निश्चल राखिये, दादू सदा बसंत ॥ 112 ॥
घन बादल बिन बरषि है, नीझर निर्मल धार।
दादू भीजै आत्मा, को साधु पीवनहार ॥ 113 ॥
ऐसा अचरज देखिया, बिन बादल बरषै मेह।
तहँ चित चातक है रह्या, दादू अधिक स्नेह ॥ 114 ॥
महारस मीठा पीजिये, अविगत अलख अनन्त।
दादू निर्मल देखिये, सहजैं सदा झरंत ॥ 115 ॥
परिचय कामधेनु
कामधेनु दुहि पीजिये, अकल अनुपम एक।
दादू पीवै प्रेम सौं, निर्मल धार अनेक ॥ 116 ॥
कामधेनु दुहि पीजिये, ताको लखै न कोइ।
दादू पीवै प्यास सौं, महारस मीठा सोइ ॥ 117 ॥
कामधेनु दुहि पीजिये, अलख रूप आनन्द।
दादू पीवै हेत सौं, सुखमन लागा बंद ॥ 118 ॥
कामधेनु दुहि पीजिये, अगम अगोचर जाइ।
दादू पीवै प्रीति सूं, तेज पुंज की गाइ ॥ 119 ॥
कामधेनु करतार है, अमृत सरवै सोइ।
दादू बछरा दूध को, पीवै तो सुख होइ ॥ 120 ॥
ऐसी एकै गाइ है, दूझै बारह मास।
सो सदा हमारे संग है, दादू आतम पास ॥ 121 ॥
श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय आत्मबली तरु
तरुवर साखा मूल बिन, धरती पर नांही ।
अविचल अमर अनंत फल, सो दादू खांही ॥ 122 ॥
तरुवर साखा मूल बिन, धर अंबर न्यारा ।
अविनाशी आनन्द फल, दादू का प्यारा ॥ 123 ॥
तरुवर साखा मूल बिन, रज बीरज रहिता ।
अजरा अमर अतीत फल, सो दादू गहिता ॥ 124 ॥
तरुवर साखा मूल बिन, उत्पति परलै नांहि ।
रहिता रमता राम फल, दादू नैनहुँ मांहि ॥ 125 ॥
प्राण तरुवर सुरति जड़, ब्रह्म भूमि ता मांहि ।
रस पीवै फूलै फलै, दादू सूखै नांहि ॥ 126 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश (प्रश्न)
ब्रह्म सुनि तहँ क्या रहै ? आतम के अस्थान ?
काया अस्थल क्या बसै ? सतगुरु कहो सुजान ॥ 127 ॥
देह अध्यासियों के लक्षण (उत्तर)
काया के अस्थल रहैं, मन राजा पंच प्रधान ।
पच्चीस प्रकृति तीन गुण, आपा गर्व गुमान ॥ 128 ॥
आत्म जिज्ञासु के लक्षण
आतम के स्थान हैं, ज्ञान ध्यान विश्वास ।
सहज सील संतोष सत, भाव भक्ति निधि पास ॥ 129 ॥
ब्रह्मनिष्ठ के लक्षण
ब्रह्म शून्य तहँ ब्रह्म है, निरंजन निराकार ।
नूर तेज तहँ ज्योति है, दादू देखणहार ॥ 130 ॥
अबुल फज़ल के प्रश्न
मौजूद खबर, माबूद खबर, अरवाह खबर औजूद ।
मुकाम चिः चीज हस्त, दादनी सजूद ॥ 131 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
औजूद मकामे हस्त - देह अध्यासी के लक्षण
नफ़्स गालिब किब्र काबिज, गुस्सः मनी एस्त ।
दुइ दरोग, हिर्स हुज्जत, नाम नेकी नेस्त ॥ 132 ॥
अरवाह मकामे हस्त - आत्मवादी के लक्षण
इश्क इबादत बंदगी, यगानगी इखलास ।
मिहर मुहब्बत, खैर खूबी, नाम नेकी पास ॥ 133 ॥
माबूद मकामे हस्त - ब्रह्मवादी के लक्षण
यके नूर खूबे खूबां, दीदनी हैरान ।
अजब चीज खुरदनी, पियालए मस्तान ॥ 134 ॥
मौजूद खबर (शरीयत - मंजिल)
हैवान आलम गुमराह गाफिल, अव्वल शरीयत पंद ।
हलाल हराम नेकी बदी, दर्से दानिशमंद ॥ 135 ॥
तरीकत मंजिल
कुल फारिग तर्क दुनिया, हररोज हरदम याद ।
अल्हः आली इश्क आशिक, दरूने फरियाद ॥ 136 ॥
मार्फत मंजिल
आब आतश अर्श कुर्सी, सूरते सुबहान ।
शिरर सिफ़्त करद बूद, मारफत मकाम ॥ 137 ॥
हकीकत मंजिल
हक हासिल नूर दीदम, करारे मकसूद ।
दीदार दरिया अरवाहे आमद, मौजूदे मौजूद ॥ 138 ॥
चारों मंजिलें
चहार मंजिल बयां गुप्तम, दस्त करदः बूद ।
पीरां मुरीदां खबर करदः, जां राहे माबूद ॥ 139 ॥
पहली प्राण पशु नर कीजे, साच झूठ संसार ।
नीति अनीति भला बुरा, शुभ अशुभ निरधार ॥ 140 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
सब तज देखि विचार कर, मेरा नाहीं कोइ।
अनुदिन राता राम सौं, भाव भक्ति रत होइ ॥ 141 ॥
दादू अंबर धरती सूर शशि, सांई, सब लै लावै अंग।
यश कीरति करुणा करै, तन मन लागा रंग ॥ 142 ॥
दादू परम तेज तहँ मैं गया, नैनहुँ देख्या आइ।
सुख संतोष पाया घणा, ज्योतिहिं ज्योति समाइ ॥ 143 ॥
अर्थ चार अस्थान का, गुरु सिष कह्या समझाइ।
मारग सिरजनहार का, भाग बड़े सो जाइ ॥ 144 ॥
नमाज सिजदा
अरवाहे सिजदा कुनंद, औजूद रा चि कार।
दादू नूर दादनी, आसिकां दीदार ॥ 145 ॥
आशिकां रहः कब्ज करदां, दिल वजां रफतंद।
अलह आले नूर दीदम, दिल है दादू बंद ॥ 146 ॥
आशिकां मस्ताने आलम, खुरदनी दीदार।
चंद दह चिः कार दादू, यारे मां दिलदार ॥ 147 ॥
ब्रह्म साक्षात्कार धारणा
दादू दया दयालु की, सो क्यों छानी होइ।
प्रेम पुलक मुलकत रहै, सदा सुहागनी सोइ ॥ 148 ॥
दादू बिगसि बिगसि दर्शन करै, पुलकि पुलकि रस पान।
मगन गलित माता रहै, अरस परस मिलि प्राण ॥ 149 ॥
दादू देखि देखि सुमिरण करै, देखि देखि लै लीन।
देखि देखि तन मन विलै, देखि देखि चित्त दीन ॥ 150 ॥
दादू निरखि निरखि निज नाम ले, निरखि निरखि रस पीव।
निरखि निरखि पिव कौं मिलै, निरखि निरखि सुख जीव ॥ 151 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय स्मरण नाम पारख लक्षण
तन सौं सुमिरण सब करैं, आत्म सुमिरण एक ।
आत्म आगै एक रस, दादू बड़ा विवेक ॥ 152 ॥
दादू माटी के मुकाम का, सब कोइ जाणै जाप ।
एक आध अरवाह का, बिरला आपै आप ॥ 153 ॥
दादू जब लग असथल देह का, तब लग सब व्यापै ।
निर्भय असथल आत्मा, आगै रस आपै ॥ 154 ॥
जब नांही सुरति शरीर की, बिसरै सब संसार ।
आतम न जाणैं आप को, तब एक रह्या निरधार ॥ 155 ॥
तन सौं सुमिरण कीजिये, जब लग तन नीका ।
आत्म सुमिरण ऊपजै, तब लागै फीका ॥
आगै आपैं आप है, तहाँ क्या जी का ।
दादू दूजा कहन को, नाहीं लघु टीका ॥ 156 ॥
परिचय अंग
चर्म दृष्टि देखै बहुत, आतम दृष्टि एक।
ब्रह्म दृष्टि परचै भया, तब दादू बैठा देख ॥ 157 ॥
ये ही नैनां देह के, ये ही आत्म होइ ।
ये ही नैनां ब्रह्म के, दादू पलटे दोइ ॥ 158 ॥
घट परचै सब घट लखै, प्राण परचै प्राण ।
ब्रह्म परचै पाइये, दादू है हैरान ॥ 159 ॥
सूक्ष्म सौंज अरचा बंदगी
दादू जल पाषाण ज्यों, सेवै सब संसार ।
दादू पाणी लूंण ज्यों, कोइ बिरला पूजणहार ॥ 160 ॥
नाम पारिख लक्षण
अलख नाम अंतर कहै, सब घट हरि हरि होइ ।
दादू पाणी लूण ज्यों, नाम कहीजे सोइ ॥ 161 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
लै लक्षण सहज
छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ।
दादू ऐसैं मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 162 ॥
सुरति रूप शरीर का, पीव के परसे होइ।
दादू तन मन एक रस, सुमिरण कहिये सोइ ॥ 163 ॥
राम कहत राम ही रह्या, आप विसर्जन होइ।
मन पवना पंचों विलै, दादू सुमिरण सोइ ॥ 164 ॥
जहँ आतम राम संभालिये, तहँ दूजा नांही और।
देही आगे अगम है, दादू सूक्ष्म ठौर ॥ 165 ॥
पर आतम सौं आतमा, ज्यों पाणी में लूंण।
दादू तन मन एक रस, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 166 ॥
तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों पाणी में लूंण।
जीव ब्रह्म एकै भया, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 167 ॥
तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों घृत लागे घाम।
आतम कमल तहँ बंदगी, जहँ दादू प्रकट राम ॥ 168 ॥
नख शिख स्मरण
कोमल कमल तहँ पैसि कर, जहाँ न देखै कोइ।
मन थिर सुमिरण कीजिये, तब दादू दर्शन होइ ॥ 169 ॥
नखसिख सब सुमिरण करैं, ऐसा कहिये जाप।
अन्तर बिगसै आत्मा, तब दादू प्रगटै आप ॥ 170 ॥
अंतरगत हरि हरि करे, तब मुख की हाजत नांहि।
सहजैं धुनि लागी रहै, दादू मन ही मांहि ॥ 171 ॥
दादू सहजैं सुमिरण होत है, रोम रोम रमि राम।
चित्त चहूँट्या चित्त सौं, यों लीजे हरि नाम ॥ 172 ॥
दादू सुमिरण सहज का, दीन्हा आप अनंत।
अरस परस उस एक सौं, खेलैं सदा बसंत ॥ 173 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नखसिख सकल शरीर ।
सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥ 174 ॥
हुण दिल लग्गा हिकसां, मे कूं येहा ताति ।
दादू कम्म खुदाय दे, बैठा डी है राति ॥ 175 ॥
दादू माला सब आकार की, कोई साधु सुमिरै राम ।
करणी कर तैं क्या किया, ऐसा तेरा नाम ॥ 176 ॥
सब घट मुख रसना करै, रटै राम का नाम ।
दादू पीवै रामरस, अगम अगोचर ठाम ॥ 177 ॥
दादू मन चित सुस्थिर कीजिये, तो नख सिख सुमिरण होइ ।
श्रवण नेत्र मुख नासिका, पंचों पूरे सोइ ॥ 178 ॥
साध महिमा
आतम आसन राम का, तहाँ बसै भगवान ।
दादू दोन्यूं परस्पर, हरि आतम का थान ॥ 179 ॥
राम जपै रुचि साधु को, साधु जपै रुचि राम ।
दादू दोनों एक टग, यहु आरम्भ यहु काम ॥ 180 ॥
जहाँ राम तहाँ संतजन, जहाँ साधु तहाँ राम ।
दादू दोन्यूं इकट्ठे, अरस परस विश्राम ॥ 181 ॥
दादू हरि साधु यों पाइये, अविगति के आराध ।
साधु संगति हरि मिलै, हरि संगति तैं साध ॥ 182 ॥
दादू राम नाम सौं मिलि रहै, मन के छाड़ि विकार ।
तो दिल ही माँहैं देखिये, दोनों का दीदार ॥ 183 ॥
साधु समाना राम में, राम रह्या भरपूर ।
दादू दोनों एक रस, क्यों कर कीजै दूर ॥ 184 ॥
सत्संग महात्म
दादू सेवक सांई का भया, तब सेवक का सब कोइ ।
सेवक सांई को मिल्या, तब सांई सरीखा होइ ॥ 185 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
मिश्री मांही मेल कर, मोल बिकाना बंस।
यों दादू महँगा भया, पारब्रह्म मिल हंस ॥ 186 ॥
मीठे मांही राखिये, सो काहे न मीठा होइ।
दादू मीठा हाथ ले, रस पीवै सब कोइ ॥ 187 ॥
सत्संगति-कुसंगति
मीठे सौं मीठा भया, खारे सौं खारा।
दादू ऐसा जीव है, यहु रंग हमारा ॥ 188 ॥
साध महिमा महात्म्य
मीठै मीठे कर लिये, मीठा मांही बाहि।
दादू मीठा ह्वै रह्या, मीठे मांहि समाहि ॥ 189 ॥
राम बिना किस काम का, नहीं कौड़ी का जीव।
सांई सरीखा ह्वै गया, दादू परसै पीव ॥ 190 ॥
पारिख अपारिख
हीरा कौड़ी ना लहै, मूरख हाथ गँवार।
पाया पारिख जौहरी, दादू मोल अपार ॥ 191 ॥
अंधे हीरा परखिया, कीया कौड़ी मोल।
दादू साधू जौहरी, हीरे मोल न तोल ॥ 192 ॥
साध महिमा
मीरां कीया महर सौं, परदे थैं लापर्द।
राखि लिया दीदार में, दादू भूला दर्द ॥ 193 ॥
दादू नैन बिन देखबा, अंग बिन पेखबा,
रसन बिन बोलबा ब्रह्म सेती।
श्रवण बिन सुनबा, चरण बिन चालबा,
चित्त बिन चिन्तबा, सहज एती ॥ 194 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
पतिव्रत
दादू देख्या एक मन, सो मन सब ही मांहि।
तिहि मन सौं मन मानिया, दूजा भावै नांहि ॥ 195 ॥
पुरुष प्रकाशी
दादू जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 196 ॥
पतिव्रत
दादू दिल अरवाह का, सो अपणा ईमान।
सोई साबित राखिये, जहँ देखै रहमान ॥ 197 ॥
अल्लह आप ईमान है, दादू के दिल मांहि।
सोई साबित राखिये, दूजा कोई नांहि ॥ 198 ॥
प्राण पवन ज्यों पतला, काया करै कमाइ।
दादू सब संसार में, क्योंहि गह्या न जाइ ॥ 199 ॥
नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यो होइ।
दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥ 200 ॥
काया सूक्ष्म कर मिलै, ऐसा कोई एक।
दादू आत्म ले मिलैं, ऐसे बहुत अनेक ॥ 201 ॥
सुन्दरी सुहाग
आडा आत्म तन धरै, आप रहै ता मांहि।
आपण खेलै आप सौं, जीवन सेती नांहि ॥ 202 ॥
अध्यात्म
दादू अनभै थैं आनन्द भया, पाया निर्गुण नांव।
निश्चल निर्मल निर्वाण पद, अगम अगोचर ठांव ॥ 203 ॥
दादू अनभै वाणी अगम को, ले गई संग लगाइ।
अगह गहै, अकह कहै, अभेद भेद लहाइ ॥ 204 ॥
जो कुछ बेद कुरान थैं, अगम अगोचर बात।
सो अनभै साचा कहै, यहु दादू अकह कहात ॥ 205 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू जब घट अनुभै उपजै, तब किया कर्म का नाश।
भय अरु भ्रम भागे सबै, पूरण ब्रह्म प्रकाश ॥ 206 ॥
दादू अनुभै काटै रोग को, अनहद उपजै आइ।
सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौलाइ ॥ 207 ॥
दादू वाणी ब्रह्म की, अनुभै घट परकास।
राम अकेला रहि गया, शब्द निरंजन पास ॥ 208 ॥
जे क बहूँ समझै आत्मा, तौ दृढ़ गह राखै मूल।
दादू सेझा राम रस, अमृत काया कूल ॥ 209 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश
दादू मुझ ही मांही मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार।
मुझ ही मांही मैं बसूँ, आप कहै करतार ॥ 210 ॥
दादू मैं ही मेरा अर्श में, मैं ही मेरा स्थान।
मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहमान ॥ 211 ॥
दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार।
मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥ 212 ॥
दादू मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अंग।
मैं ही मेरा जीव में, आप कहै प्रसंग ॥ 213 ॥
दादू सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन।
सबै दिशा श्रवणहुँ सुने, सबै दिशा कर नैन ॥ 214 ॥
सबै दिसा पग सीस हैं, सबै दिसा मन चैन।
सबै दिसा सन्मुख रहै, सबै दिसा अंग ऐन ॥ 215 ॥
बिन श्रवणहुँ सब कुछ सुनै, बिन नैनहुँ सब देखै।
बिन रसना मुख सब कुछ बोलै, यहु दादू अचरज पेखै ॥ 216 ॥
सब अंग सब ही ठौर सब, सर्वंगी सब सार।
कहै गहै देखै सुनै, दादू सब दीदार ॥ 217 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
कहै सब ठौर, गहै सब ठौर, रहै सब ठौर, जोति परवाने ।
नैन सब ठौर, बैन सब ठौर, ऐन सब ठौर, सोई भल जाने ॥
सीस सब ठौर, श्रवण सब ठौर, चरण सब ठौर, कोई यहु माने ।
अंग सब ठौर, संग सब ठौर, सबै सब ठौर, दादू ध्याने ॥ 218 ॥
तेज ही कहना, तेज ही गहना, तेज ही रहना सारे ।
तेज ही बैना, तेज ही नैना, तेज ही ऐन हमारे ।
तेज ही मेला, तेज ही खेला, तेज अकेला, तेज ही तेज सँवारे ।
तेज ही लेवे, तेज ही देवे, तेज ही खेवे, तेज ही दादू तारे ॥ 219 ॥
नूर हि का धर, नूर हि का घर, नूर हि का वर मेरा ।
नूर हि मेला, नूर हि खेला, नूर अकेला, नूर हि मंझ बसेरा ।
नूर हि का अंग, नूर हि का संग, नूर हि का रंग मेरा ।
नूर हि राता, नूर हि माता, नूर हि खाता दादू तेरा ॥ 220 ॥
सूक्ष्म सौंज अर्चा बन्दगी
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ बसै माबूदं ।
तहँ बंदे की बंदगी, जहाँ रहै मौजूदं ॥ 221 ॥
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहँ खालिक भरपूरं ।
आली नूर अल्लाह का, खिदमतगार हजूरं ॥ 222 ॥
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहँ देख्या करतारं ।
तहँ सेवक सेवा करै, अनन्त कला रवि सारं ॥ 223 ॥
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ निरंजन वासं ।
तहँ जन तेरा एक पग, तेज पुंज प्रकाशं ॥ 224 ॥
दादू तेज कमल दिल नूर का, तहाँ राम रहमानं ।
तहँ कर सेवा बंदगी, जे तूँ चतुर सयानं ॥ 225 ॥
तहाँ हजूरी बंदगी, नूरी दिल में होइ ।
तहँ दादू सिजदा करै, जहाँ न देखै कोइ ॥ 226 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू देही मांहि दोइ दिल, इक खाकी इक नूर।
खाकी दिल सूझै नहीं, नूरी मंझि हजूर ॥ 227 ॥
नमाज सिजदा
दादू हौज हजूरी दिल ही भीतरि, गुसल हमारा सारं ।
उजू साजि अलह के आगे, तहाँ नमाज गुजारं ॥ 228 ॥
दादू काया मसीत कर पंच जमाती, मन ही मुल्ला इमामं ।
आप अलेख इलाही आगे, तहँ सिजदा करे सलामं ॥ 229 ॥
दादू सब तन तसबी कहै करीमं, ऐसा करले जापं ।
रोजा एक दूर कर दूजा, कलमा आपै आपं ॥ 230 ॥
दादू आठों पहर अलह के आगै, इकटक राहिबा ध्यानं ।
आपै आप अर्श के ऊपर, जहाँ रहै रहमानं ॥ 231 ॥
दादू अट्ठे पहर इबादती, जीवण मरण निबाहि ।
साहिब दर सेवै खड़ा, दादू छाड़ि न जाहि ॥ 232 ॥
साधु महिमा महात्म
अट्ठे पहर अर्श में, ऊभोई आहे ।
दादू पसे तिनके, अल्लह गाल्हाये ॥ 233 ॥
अट्ठे पहर अर्श में, बैठा पीरी पसन्नि ।
दादू पसे तिन्न के, जे दीदार लहन्नि ॥ 234 ॥
अट्ठे पहर अर्श में, जिन्हीं रूह रहन्नि ।
दादू पसे तिन्न के, गुझ्यूं गाल्हि कन्नि ॥ 235 ॥
अट्ठे पहर अर्श में, लुड़ींदा आहीन ।
दादू पसे तिन्न के, असां खबर दीन ॥ 236 ॥
अट्ठे पहर अर्श में, वजी जे गाह्रीन ।
दादू पसे तिन्न के, कितेई आहीन ॥ 237 ॥
रस प्रेम प्याला
प्रेम प्याला नूर का, आशिक भर दीया ।
दादू दर दीदार में, मतवाला कीया ॥ 238 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
इश्क सलूनां आशिकां, दरगह तैं दीया।
दर्द मोहब्बत प्रेम रस, प्याला भर पीया ॥ 239 ॥
दादू दिल दीदार दे, मतवाला कीया।
जहाँ अर्श इलाही आप था, अपना कर लीया ॥ 240 ॥
दादू प्याला नूर दा, आशिक अर्श पीवन्न।
अट्ठे पहर अल्लह दा, मुँह दिट्ठे जीवन्न ॥ 241 ॥
आशिक अमली साधु सब, अलख दरीबे जाइ।
साहिब दर दीदार में, सब मिल बैठे आइ ॥ 242 ॥
राते माते प्रेम रस, भर भर देहु खुदाइ।
मस्तान मालिक कर लिये, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥ 243 ॥
लांबी भक्ति अगाध
दादू भक्ति निरंजन राम की, अविचल अविनाशी।
सदा सजीवन आतमा, सहजैं परकाशी ॥ 244 ॥
दादू जैसा राम अपार है, तैसी भक्ति अगाध।
इन दोनों की मित नहीं, सकल पुकारैं साध ॥ 245 ॥
दादू जैसा अविगत राम है, तैसी भक्ति अलेख।
इन दोनों की मित नहीं, सहस मुखां कहै शेष ॥ 246 ॥
दादू जैसा निर्गुण राम है, तैसी भक्ति निरंजन जाणि।
इन दोनों की मित नहीं, संत कहैं परमाणि ॥ 247 ॥
दादू जैसा पूरा राम है, तैसी पूरण भक्ति समान।
इन दोनों की मित नहीं, दादू नांही आन ॥ 248 ॥
सेवा अखंडित
दादू जब लग राम है, तब लग सेवक होइ।
अखंडित सेवा एक रस, दादू सेवक सोइ ॥ 249 ॥
दादू जैसा राम है, तैसी सेवा जाणि।
पावेगा तब करेगा, दादू सो परमाणि ॥ 250 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
सांई सरीखा सुमिरण कीजे, सांई सरीखा गावै।
सांई सरीखी सेवा कीजे, तब सेवक सुख पावै ॥ 251 ॥
परिचय करुणा विनती
दादू सेवग सेवा कर डरै, हम थैं कछु न होइ।
तूँ है तैसी बन्दगी, कर नहिं जाणै कोइ ॥ 252 ॥
दादू जे साहिब मानै नहीं, तऊ न छाडूं सेव।
इहि अवलंबन जीजिये, साहिब अलख अभेव ॥ 253 ॥
सूक्ष्म सौंज अरचा बन्दगी
आदि अंति आगे रहे, एक अनुपम देव।
निराकार निज निर्मला, कोई न जाणे भेव ॥ 254 ॥
अविनासी अपरंपरा, वार वार नहीं छेव।
सो तूँ दादू देखि ले, उर अंतर कर सेव ॥ 255 ॥
दादू भीतर पैसि कर, घट के जड़े कपाट।
सांई की सेवा करै, दादू अविगत घाट ॥ 256 ॥
घट परिचै सेवा करै, प्रत्यक्ष देखै देव।
अविनाशी दर्शन करै, दादू पूरी सेव ॥ 257 ॥
भ्रम विध्वंस
पूजनहारे पास हैं, देही माहिं देव।
दादू ताकौं छाड़ कर, बाहर मांडी सेव ॥ 258 ॥
परिचय
दादू रमता राम सौं, खेलैं अन्तर मांहि।
उलट समाना आप में, सो सुख कतहूँ नाहिं ॥ 259 ॥
दादू जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव।
उलट समाने आप में, अंतर नांही पीव ॥ 260 ॥
परगट खेलैं पीव सौं, अगम अगोचर ठांव।
एक पलक का देखना, जीवण मरण का नांव ॥ 261 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी
आत्म मांही राम है, पूजा ताकी होइ ।
सेवा वंदन आरती, साध करें सब कोइ ॥ 262 ॥
परिचै सेवा आरती, परिचै भोग लगाइ ।
दादू उस प्रसाद की, महिमा कही न जाइ ॥ 263 ॥
मांहि निरंजन देव है, मांहि सेवा होइ ।
मांहि उतारै आरती, दादू सेवक सोइ ॥ 264 ॥
दादू मांहि कीजै आरती, मांहि पूजा होइ ।
मांहि सतगुरू सेविये, बूझै विरला कोइ ॥ 265 ॥
संत उतारैं आरती, तन मन मंगलचार ।
दादू बलि बलि वारणैं, तुम पर सिरजनहार ॥ 266 ॥
दादू अविचल आरती, जुग-जुग देव अनन्त ।
सदा अखंडित एक रस, सकल उतारैं संत ॥ 267 ॥
॥ सौंज मंत्र ॥
सत्यराम, आत्मा वैष्णव, सुबुद्धि भूमि, संतोष स्थान, मूल मंत्र, मन माला,
गुरु तिलक, सत्य संयम, शील शुचिता,ध्यान धोवती, काया कलश, प्रेम
जल, मनसामंदिर,निरंजन देव, आत्मा पाती, पुहुप प्रीति, चेतनाचंदन, नवधा
नाम, भाव पूजा, मति पात्र, सहज समर्पण, शब्द घंटा, आनन्द आरती, दया
प्रसाद, अनन्य एक-दशा, तीर्थ सत्संग, दान उपदेश, व्रत स्मरण, षट्गुण
ज्ञान, अजपा जाप, अनुभव आचार, मर्यादा राम, फल दर्शन, अभि अन्तर
सदा निरन्तर सत्य सौंज दादू वर्तते, आत्मा उपदेश, अंतर्गति पूजा ॥268 ॥
पीव सौं खेलूँ प्रेम रस, तो जियरे जक होइ ।
दादू पावै सेज सुख, पड़दा नाहीं कोइ ॥ 269 ॥
सूक्ष्म सौंज
सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ ।
दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥ 270 क ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू सूतां पीछे सुरति निरति सूं, बालक ज्यूं पय पीवे।
ऐसेअन्तर लगन नाम सूं, आतम जुग-जुग जीवे ॥ 270 ख ॥
ज्यों रसिया रस पीवतां, आपा भूलै और।
यों दादू रह गया एक रस, पीवत पीवत ठौर ॥ 271 ॥
जहाँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि।
दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥ 272 ॥
दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार।
तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥ 273 ॥
तेज पुंज “को बिलसना”, मिलि खेलैं इक ठांव।
भर भर पीवै राम रस, सेवा इसका नांव ॥ 274 ॥
अरस परस मिल खेलिये, तब सुख आनंद होइ।
तन मन मंगल चहुँ दिशि भये, दादू देखे सोइ ॥ 275 ॥
सुन्दरी सुहाग
मस्तक मेरे पांव धर, मंदिर माहीं आव।
सैंयां सोवै सेज पर, दादू चम्पै पांव ॥ 276 ॥
ये चारों पद पलंग के, साँई की सुख सेज।
दादू इन पर बैस कर, साँई सेती हेज ॥ 277 ॥
प्रेम लहर की पालकी, आतम बैसे आइ।
दादू खेलै पीव सौं, यहु सुख कह्या न जाइ ॥ 278 ॥
अर्चना भक्ति
दादू देव निरंजन पूजिये, पाती पंच चढाइ।
तन मन चंदन चर्चिये, सेवा सुरति लगाइ ॥ 279 ॥
भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने कोइ।
दादू भक्ति भगवंत की, देह निरन्तर होइ ॥ 280 ॥
देही मांही देव है, सब गुण तैं न्यारा।
सकल निरंतर भर रह्या, दादू का प्यारा ॥ 281 ॥
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