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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
करम करीमा कीजिये, मिल पीव पियारे ॥ 1 ॥
शूल सुलाको सो सहूँ, तेग तन मारे ।
मिल सांई सुख दीजिये, तूँ ही तूँ संभारे ॥ 2 ॥
मैं शुहदा तन सोखता, विरहा दुख जारे ।
जिय तरसै दीदार को, दादू न विसारे ॥ 3 ॥
४5. शंखताल (फारसी)
संइयां तूँ है साहिब मेरा, मैं हूँ बन्दा तेरा ॥ टेक ॥
बन्दा वरदा चेरा तेरा, हुकमी मैं बेचारा ।
मीरां मेहरबान गुसांई, तूँ सिरताज हमारा ॥ 1 ॥
गुलाम तुम्हारा मुल्ला जादा, लौंडा घर का जाया ।
राजिक रिजक जीव तैं दिया, हुकम तुम्हारे आया ॥ 2 ॥
शादील बै हाजिर बंदा, हुकम तुम्हारे मांही ।
जब ही बुलाया तब ही आया, मैं मेवासा नांही ॥ 3 ॥
खसम हमारा सिरजनहारा, साहिब समर्थ सांई ।
मीरां मेरा मेहर मया कर, दादू तुम ही तांई ॥ 4 ॥
४6. करुणा । शंखताल
मुझ थीं कुछ न भया रे, यहु योंही गया रे, पछतावा रह्या रे ॥ टेक ॥
मै शीश न दीया रे, भर प्रेम न पीया रे, मैं क्या कीया रे ॥ 1 ॥
हौं रंग न राता रे, रस प्रेम न माता रे, नहिं गलित गाता रे ॥ 2 ॥
मैं पीव न पाया रे, कीया मन का भाया रे, कुछ होइ न आया रे ॥ 3 ॥
हौं रहूँ उदासा रे, मुझे तेरी आशा रे, कहै दादू दासा रे ॥ 4 ॥
४7. वैराग्य उपदेश । निसारुक ताल
मेरा मेरा छाड़ गँवारा, सिर पर तेरे सिरजनहारा ।

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
अपने जीव विचारत नांहीं, क्या ले गइला वंश तुम्हारा ॥ टेक ॥
तब मेरा कृत करता नांही, आवत है हंकारा।
काल चक्र सौं खरी परी रे, विसर गया घरबारा ॥ 1 ॥
जाइ तहाँ का संजम कीजै, विकट पंथ गिरिधारा।
दादू रे तन अपना नांहीं, तो कैसे भया संसारा ॥ 2 ॥
४४. निसारुक ताल
दादू दास पुकारे रे, सिर काल तुम्हारे रे, सर सांधे मारे रे ॥ टेक ॥
जम काल निवारी रे, मन मनसा मारी रे, यहु जन्म न हारी रे ॥ 1 ॥
सुख नींद न सोई रे, अपना दुख रोई रे, मन मूल न खोई रे ॥ 2 ॥
सिर भार न लीजी रे, जिसका तिसको दीजी रे, अब ढील न कीजी रे ॥ 3 ॥
यहु औसर तेरा रे, पंथी जाग सवेरा रे, सब बाट बसेरा रे ॥ 4 ॥
सब तरुवर छाया रे, धन जौबन माया रे, यहु काची काया रे ॥ 5 ॥
इस भ्रम न भूली रे, बाजी देख न फूली रे, सुख सागर झूली रे ॥ 6 ॥
रस अमृत पीजी रे, विष का नाम न लीजी रे, कह्या सो कीजी रे ॥ 7 ॥
सब आतम जाणी रे, अपणा पीव पिछाणी रे, यहु दादू वाणी रे ॥ 8 ॥
४९. भक्ति उपदेश । त्रिताल
पूजूं पहली गणपति राइ, पड़िहौं पावों चरणों धाइ।
आगै ह्वै कर तीर लगावै, सहजैं अपने बैन सुनाइ ॥ टेक ॥
कहूँ कथा कुछ कही न जाई, इक तिल में ले सबै समाइ ॥ 1 ॥
गुण हु गहीर धीर तन देही, ऐसा समरथ सबै सुहाइ ॥ 2 ॥
जिस दिशि देखूं ओही है रे, आप रह्या गिरि तरुवर छाइ ॥ 3 ॥
दादू रे आगै क्या होवै, प्रीति पिया कर जोड़ लगाइ ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
९०. परिचय । पंचम ताल
नीको धन हरि कर मैं जान्यौं, मेरे अखई वोही।
आगे पीछे सोई है रे, और न दूजा कोई ॥ टेक॥
कबहूँ न छाडूँ संग पिया को, हरि के दर्शन मोही।
भाग हमारे जो हौं पाऊँ, शरणै आयो तोही ॥ 1 ॥
आनन्द भयो सखी जिय मेरे, चरण कमल को जोई।
दादू हरि को बावरो, बहुरि वियोग न होई ॥ 2 ॥
९१. (फारसी) हित उपदेश । पंचम ताल
बाबा मर्दे मर्दां गोइ, ये दिल पाक कर्दम धोइ ॥ टेक॥
तर्क दुनियाँ दूर कर दिल, फर्ज फारिग होइ।
पैवस्त परवरदिगार सौं, आकिलां सिर सोइ ॥ 1 ॥
मनी मुरदः हिर्स फानी, नफ्स रा पामाल।
बदी रा बरतरफ करदः, नाम नेकी ख्याल ॥ 2 ॥
जिंदगानी मुरदः बाशद, कुंजे कादिर कार।
तालिबां रा हक, हासिल, पासबाने यार ॥ 3 ॥
मर्दे मर्दां सालिकां सर, आशिकां सुलतान।
हजूरी होशियार दादू, इहै गो मैदान ॥ 4 ॥
९२. ईश्वर चरित । त्रिताल
ये सब चरित तुम्हारे मोहना, मोहे सब ब्रह्माण्ड खंडा।
मोहे पवन पानी परमेश्वर, सब मुनि मोहे रवि चंदा ॥ टेक॥
साइर सप्त मोहे धरणी धरा, अष्ट कुली पर्वत मेरु मोहे।
तीन लोक मोहे जगजीवन, सकल भुवन तेरी सेव सोहे ॥ 1 ॥
शिव बिरंचि नारद मुनि मोहे, मोहे सुर सब सकल देवा।
मोहे इन्द्र फणीन्द्र पुनि मोहे, मुनि मोहे तेरी करत सेवा ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
अगम अगोचर अपार अपरम्परा, को यहु तेरे चरित न जानैं ।
ये शोभा तुमको सोहे सुन्दर, बलि बलि जाऊँ दादू न जानैं ॥ ३ ॥
९३. गुरु ज्ञान। त्रिताल
ऐसा रे गुरु ज्ञान लखाया, आवै जाइ सो दृष्टि न आया ॥ टेक॥
मन थिर करूँगा, नाद भरूँगा, राम रमूँगा, रस माता ॥ १ ॥
अधर रहूँगा, करम दहूँगा, एक भजूंगा, भगवंता ॥ २ ॥
अलख लखूँगा, अकथ कथूँगा, एक मथूँगा, गोविन्दा ॥ ३ ॥
अगह गहूँगा, अकह कहूँगा, अलह लहूँगा, खोजन्ता ॥ ४ ॥
अचर चरूंगा, अजर जरूंगा, अतिर तिरूंगा, आनन्दा ॥ ५ ॥
यहु तन तारूं, विषय निवारूं, आप उबारूं, साधन्ता ॥ ६ ॥
आऊँ न जाऊँ, उनमनि लाऊँ, सहज समाऊँ, गुणवंता ॥ ७ ॥
नूर पिछाणूं, तेजहि जाणूं, दादू ज्योतिहि देखन्ता ॥ ८ ॥
९४. तत्व उपदेश। पंचम ताल
बंदे हाजिरां हजूर वे, अल्लह आली नूर वे ।
आशिकां रा सिदक साबित, तालिबां भरपूर वे ॥ टेक॥
वजूद में मौजूद है, पाक परवरदिगार वे ।
देख ले दीदार को, गैब गोता मार वे ॥ १ ॥
मौजूद मालिक तख्त खालिक, आशिकां रा ऐन वे ।
गुदर कर दिल मग्ज भीतर, अजब है यहु सैन वे ॥ २ ॥
अर्श ऊपर आप बैठा, दोस्त दाना यार वे ।
खोज कर दिल कब्ज कर ले, दरूने दीदार वे ॥ ३ ॥
हुशियार हाजिर चुस्त करदा, मीरां मेहरवान वे ।
देख ले दर हाल दादू, आप है दीवान वे ॥ ४ ॥

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
95. वस्तु निर्देश। चौताल
निर्मल तत्त निर्मल तत्त निर्मल तत्त ऐसा।
निर्गुण निज निधि निरंजन, जैसा है तैसा ॥ टेक॥
उतपत्ति आकार नांही, जीव नांही काया।
काल नांही कर्म नांही, रहिता राम राया ॥ 1 ॥
शीत नांही घाम नांही, धूप नांही छाया।
बाव नांही वर्ण नांही, मोह नांही माया ॥ 2 ॥
धरणी आकाश अगम, चंद सूर नांही।
रजनी निशि दिवस नांही, पवना नहीं जांही ॥ 3 ॥
कृत्रिम घट कला नांही, सकल रहित सोई।
दादू निज अगम निगम, दूजा नहीं कोई ॥ 4 ॥
इति राग माली गौड़ सम्पूर्ण ॥ 2 ॥ पद 26 ॥

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अथ राग कल्याण ३
(गायन समय संध्या 6 से 9 रात्रि)
96. उपदेश चेतावनी। त्रिताल
मन मेरे कछु भी चेत गँवार !
पीछे फिर पछतावेगा रे, आवे न दूजी बार ॥ टेक ॥
काहे रे मन भूल्यो फिरत है, काया सोच विचार।
जिन पंथों चलना है तुझ को, सोई पंथ सँवार ॥ 1 ॥
आगै बाट बिषम जो मन रे, जिमि खांडे की धार।
दादू दास सांई सौं सूत कर, कूड़े काम निवार ॥ 2 ॥

  • 342 -

श्री दादूवाणी-राग कल्याण 3
97. परिचय । त्रिताल
जग सौं कहा हमारा, जब देख्या नूर तुम्हारा ॥ टेक ॥
परम तेज घर मेरा, सुख सागर माहिं बसेरा ॥ 1 ॥
झिलमिल अति आनन्दा, तहँ पाया परमानन्दा ॥ 2 ॥
ज्योति अपार अनन्ता, खेलें फाग बसन्ता ॥ 3 ॥
आदि अंत अस्थाना, जन दादू सो पहचाना ॥ 4 ॥
इति राग कल्याण सम्पूर्णः ॥ 3 ॥ पद 2 ॥

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अथ राग कान्हड़ा 4
(गायन समय रात्रि 12 से 3 बजे तक)
94. विरह विनती । वर्ण भिन्नताल
दे दर्शन देखन तेरा, तो जिय जक पावै मेरा ॥ टेक ॥
पीव तूँ मेरी वेदन जानै, हौं कहाँ दुराऊं छानै,
मेरा तुम देखे मन मानै ॥ 1 ॥
पीव करक कलेजे मांही, सो क्योंही निकसै नांही,
पीव पकर हमारी बांही ॥ 2 ॥
पीव रोम रोम दुख सालै, इन पीरों पिंजर जालै,
जीव जाता क्यों ही बालै ॥ 3 ॥
पीव सेज अकेली मेरी, मुझ आरति मिलणै तेरी,
धन दादू वारी फेरी ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4
99. वर्ण भिन्न ताल
आव सलौने देखन दे रे, बलि बलि जाऊँ बलिहारी तेरे ॥ टेक ॥
आव पिया तूँ सेज हमारी, निसदिन देखूं बाट तुम्हारी ॥ 1 ॥
सब गुण तेरे अवगुण मेरे, पीव हमारी आह न ले रे ॥ 2 ॥
सब गुणवंता साहिब मेरा, लाड़ गहेला दादू केरा ॥ 3 ॥
100. पंचम ताल
आव पियारे मींत हमारे, निशदिन देखूं पाँव तुम्हारे ॥ टेक ॥
सेज हमारी पीव सँवारी, दासी तुम्हारी सो धन वारी ॥ 1 ॥
जे तुझ पाऊँ अंग लगाऊँ, क्यों समझाऊँ वारणें जाऊँ ॥ 2 ॥
पंथ निहारूं बाट सँवारूं, दादू तारूं तन मन वारूं ॥ 3 ॥
101. (सिंधी) । पंचम ताल
आ वे सजणां आव, शिर पर धर पाँव।
जानी मैंडा जिन्द असाडे, तूँ रावैंदा राव वे, सजणां आव ॥ टेक ॥
इत्थां उत्थां जित्थां कित्थां, हूँ जीवां तो नाल वे।
मीयां मैंडा आव असाडे, तूँ लालों सिर लाल वे, सजणां आव ॥ 1 ॥
तन भी देवाँ, मन भी देवाँ, देवाँ पिंड पराण वे।
सच्चा सांई मिल इत्थांईं, जिन्द करां कुरबाण वे, सजणां आव ॥ 2 ॥
तूँ पाकों शिर पाक वे, सजणां, तूँ खूबों शिर खूब।
दादू भावे सजणां आवे, तूँ मिट्ठा महबूब वे, सजणां आव ॥ 3 ॥
102. विनती । राज विद्याधर ताल
दयाल अपनै चरणनि मेरा चित्त लगावहु, नीकें ही करी ॥ टेक ॥
नखशिख सुरति सरीर, तूँ नांव रहौं भरी ॥ 1 ॥
मैं अजाण मतिहीण, जम की पाश तैं रहत हूँ डरी ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4
सबै दोष दादू के दूर कर, तुम ही रहो हरी ॥ 3 ॥
103. तर्क चेतावनी । राज विद्याधर ताल
मन मतिहीण धरै, मूरख मन कछु समझत नाहीं, ऐसैं जाइ जरै ॥ टेक ॥
नाम बिसार अवर चित राखै, कूड़े काज करै ।
सेवा हरि की मनहुँ न आणै, मूरख बहुरि मरै ॥ 1 ॥
नाम संगम कर लीजे प्राणी, जम तैं कहा डरै ।
दादू रे जे राम संभारै, सागर तीर तिरै ॥ 2 ॥
104. संत सहाय रक्षा । राज मृगांक ताल
पीव तैं अपने काज सँवारे । कोई दुष्ट दीन कों मारन, सोई गहि तैं मारे ॥ टेक ॥
मेरु समान ताप तन व्यापै, सहजैं ही सो टारे ।
संतन को सुखदाई माधो, बिन पावक फँद जारे ॥ 1 ॥
तुम थैं होइ सबै विधि समर्थ, आगम सबै विचारे ।
संत उबार दुष्ट दुख दीन्हा, अंध कूप में डारे ॥ 2 ॥
ऐसा है सिर खसम हमारे, तुम जीते खल हारे ।
दादू सौं ऐसे निर्बहिये, प्रेम प्रीति पिव प्यारे ॥ 3 ॥
105. माया । मल्लिका मोद ताल
काहू तेरा मर्म न जाना रे, सब भये दीवाना रे ॥ टेक ॥
माया के रस राते माते, जगत भुलाना रे ।
को काहू का कह्या न मानै, भये अयाना रे ॥ 1 ॥
माया मोहे मुदित मगन, खानखाना रे ।
विषिया रस अरस परस, साच ठाना रे ॥ 2 ॥
आदि अंत जीव जन्त, किया पयाना रे ।
दादू सब भ्रम भूले, देखि दाना रे ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4
106. अनन्य शरण। मल्लिका मोद ताल
तूँ ही तूँ गुरुदेव हमारा, सब कुछ मेरे नाम तुम्हारा ॥ टेक॥
तुम हीं पूजा, तुम हीं सेवा, तुम हीं पाती, तुम हीं देवा ॥ 1 ॥
योग यज्ञ तूँ साधन जाप, तुम हीं मेरे आपै आपं ॥ 2 ॥
तप तीरथ तूँ व्रत स्नाना, तुम हीं ज्ञाना तुम हीं ध्याना ॥ 3 ॥
वेद भेद तूँ पाठ पुराणा, दादू के तुम पिंड पराणा ॥ 4 ॥
107. गजताल
तूँ ही तूँ आधार हमारे, सेवक सुत हम राम तुम्हारे ॥ टेक॥
माई बाप तूँ साहिब मेरा, भक्ति-हीण मैं सेवक तेरा ॥ 1 ॥
मात पिता तूँ बान्धव भाई, तुम ही मेरे सजन सहाई ॥ 2 ॥
तुम हीं तातं तुम ही मातं, तुम ही जातं, तुम्ह ही न्यातं ॥ 3 ॥
कुल कुटुम्ब तूँ सब परिवारा, दादू का तूँ तारणहारा ॥ 4 ॥
108. परिचय विनती । भंग ताल
नूर नैन भरि देखन दीजे, अमी महारस भर भर पीजे ॥ टेक॥
अमृत धारा, वार न पारा, निर्मल सारा तेज तुम्हारा ॥ 1 ॥
अजर जरंता, अमी झरंता, तार अनंता बहु गुणवंता ॥ 2 ॥
झिलमिल सांई, ज्योति गुसांई, दादू मांही नूर रहांई ॥ 3 ॥
109. परिचय । भंगताल
ऐन एक सो मीठा लागै, ज्योति स्वरूपी ठाढ़ा आगे ॥ टेक॥
झिलमिल करणां, अजरा जरणां, नीझर झरणां, तहँ मन धरणां ॥ 1 ॥
निज निरधारं, निर्मल सारं, तेज अपारं, प्राण अधारं ॥ 2 ॥
अगहा गहणां, अकहा कहणां, अलहा लहणां, तहँ मिल रहणां ॥ 3 ॥
निरसंध नूरं, सब भरपूरं, सदा हजूरं, दादू सूरं ॥ 4 ॥

  • 347 -

श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4
110. निस्पृहता । प्रतिताल
तो काहे की परवाह हमारे, राते माते नाम तुम्हारे ॥ टेक ॥
झिलमिल झिलमिल तेज तुम्हारा, परगट खेलै प्राण हमारा ॥ 1 ॥
नूर तुम्हारा नैनों मांही, तन मन लागा छूटै नांही ॥ 2 ॥
सुख का सागर वार न पारा, अमी महारस पीवनहारा ॥ 3 ॥
प्रेम मगन मतवाला माता, रंग तुम्हारे दादू राता ॥ 4 ॥
इति राग कान्हड़ा सम्पूर्ण ॥ 4 ॥ पद 13 ॥

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अथ राग अडाणा 5
(गायन समय मध्य रात्रि 12 से 3 बजे)
111. समर्थ गुरु महिमा । त्रिताल
भाई रे ऐसा सतगुरु कहिये, भक्ति मुक्ति फल लहिये ॥ टेक ॥
अविचल अमर अविनाशी, अठ सिधि नव निधि दासी ॥ 1 ॥
ऐसा सतगुरु राया, चार पदारथ पाया ॥ 2 ॥
अमी महारस माता, अमर अभय पद दाता ॥ 3 ॥
सतगुरु त्रिभुवन तारे, दादू पार उतारे ॥ 4 ॥
112. गुरुमुख कसौटी । ललित ताल
भाई रे, भानै घड़ै गुरु मेरा, मैं सेवक उस केरा ॥ टेक ॥
कंचन कर ले काया, घड़ घड़ घाट निपाया ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग अडाणा 5
मुख दर्पण मांहि दिखावै, पीव प्रकट आन मिलावै ॥ 2 ॥
सतगुरु साचा धोवै, तो बहुरि न मैला होवै ॥ 3 ॥
तन मन फेरि सँवारै, दादू कर गहि तारै ॥ 4 ॥
113. गुरुमुख उपदेश (गुजराती) । ललित ताल
भाई रे, तेन्हों रूड़ो थाये, जे गुरुमुख मार्ग जाये ॥ टेक॥
कुसंगति परिहरिये, सत्संगति अणसरिये ॥ 1 ॥
काम क्रोध नहिं आणें, वाणी ब्रह्म बखाणें ॥ 2 ॥
बिषिया तैं मन वारै, ते आपणपो तारै ॥ 3 ॥
विष मूकी अमृत लीधो, दादू रूड़ो कीधो ॥ 4 ॥
114. विनती । पंचम ताल
बाबा मन अपराधी मेरा, कह्या न मानै तेरा ॥ टेक ॥
माया मोह मद माता, कनक कामिनी राता ॥ 1 ॥
काम क्रोध अहंकारा, भावै विषय विकारा ॥ 2 ॥
काल मीच नहिं सूझै, आतमराम न बूझै ॥ 3 ॥
समर्थ सिरजनहारा, दादू करै पुकारा ॥ 4 ॥
115. चेतावनी । पंचम ताल
भाई रे यूं विनशै संसारा, काम क्रोध अहंकारा ॥ टेक॥
लोभ मोह मैं मेरा, मद मत्सर बहुतेरा ॥ 1 ॥
आपा पर अभिमाना, केता गर्व गुमाना ॥ 2 ॥
तीन तिमिर नहिं जाहीं, पंचों के गुण माहीं ॥ 3 ॥
आतमराम न जाना, दादू जगत दीवाना ॥ 4 ॥

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  1. ज्ञान । रूपक ताल
    भाई रे, तब क्या कथसि गियाना,
    जब दूसर नाहीं आना ॥ टेक ॥
    जब तत्त्वहिं तत्त्व समाना, जहाँ का तहँ ले साना ॥ 1 ॥
    जहाँ का तहाँ मिलावा, ज्यों था त्यों होइ आवा ॥ 2 ॥
    संधे संधि मिलाई, जहाँ तहाँ थिति पाई ॥ 3 ॥
    सब अंग सबही ठांहीं, दादू दूसर नांहीं ॥ 4 ॥
    इति राग अडाणा सम्पूर्ण ॥ 5 ॥ पद 6 ॥

राग केदार
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अथ राग केदार 6
(गायन समय संध्या 6 से 9 बजे )
117. विनती (गुजराती भाषा) । दीप चन्दी ताल
मारा नाथ जी, तारो नाम लेवाड़ रे । राम रतन हृदया मा राखे,
मारा वाहला जी, विषया थी वारे ॥ टेक ॥
वाहला वाणी ने मन मांहे मारे, चितवन तारो चित राखे ।
श्रवण नेत्र आ इन्द्री ना गुण, मारा मांहेला मल ते नाखे ॥ 1 ॥
वाहला जीवाड़े तो राम रमाड़े, मनें जीव्यानो फल ये आपे ।
तारा नाम बिना हौं ज्यां ज्यां बंध्यो, जन दादू ना बंधन कापे ॥ 2 ॥
118. विरह विनती । उत्सव ताल
अरे मेरे सदा के संगाती रे राम! कारण तेरे ॥ टेक ॥

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श्री दादूवाणी-राग केदार 6
कंथा पहरूँ, भस्म लगाऊँ, वैरागिनि ह्वै ढूँढूँ, रे राम ॥ 1 ॥
गिरिवर वासा, रहूँ, उदासा, चढ़ि सिर मेरु पुकारूँ, रे राम ॥ 2 ॥
यहु तन जालूूँ, यहु मन गालूँ, करवत शीश चढ़ाऊँ, रे राम ॥ 3 ॥
शीश उतारूँ, तुम्ह पर वारूँ, दादू बलि बलि जाऊँ, रे राम ॥ 4 ॥
119. विनती । गजताल
अरे मेरा अमर उपावणहार रे खालिक! आशिक तेरा ॥ टेक ॥
तुम सौं राता, तुम सौं माता, तुम सौं लागा रंग, रे खालिक ॥ 1 ॥
तुम सौं खेला, तुम सौं मेला, तुम सौं प्रेम स्नेह, रे खालिक ॥ 2 ॥
तुम सौं लेना, तुम सौं देणा, तुम्हीं सौं रत होइ, रे खालिक ॥ 3 ॥
खालिक मेरा, आशिक तेरा, दादू अनत न जाइ, रे खालिक ॥ 4 ॥
120. स्तुति । गजताल
अरे मेरे समर्थ साहिब रे अल्लह! नूर तुम्हारा ॥ टेक ॥
सब दिशि देवै, सब दिश लेवै, सब दिशि वार न पार, रे अल्लह ॥ 1 ॥
सब दिशि कर्त्ता, सब दिशि हर्त्ता, सब दिशि तारणहार, रे अल्लह ॥ 2 ॥
सब दिशि वक्ता, सब दिशि श्रोता, सब दिशि देखणहार, रे अल्लह ॥ 3 ॥
तूँ है तैसा, कहिये ऐसा, दादू आनन्द होइ, रे अल्लह ॥ 4 ॥
121. (सिंधी) विरह विलाप । मल्लिका मोद ताल
हाल असां जो लालड़े, तो के सब मालूमड़े ॥ टेक ॥
मंझे खामा मंझि बराला, मंझे लागी भाहिड़े ।
मंझे मेड़ी मुच थईला, कै दरि करियां धाहड़े ॥ 1 ॥
विरह कसाई मुं गरेला, मंझे बढ़े माइहड़े ।
सीखों करे कवाब जीला, इयें दादू जो ह्याहड़े ॥ 2 ॥

  • 353 -

श्री दादूवाणी-राग केदार 6
122. विनती । मल्लिका मोद ताल
पीवजी सेती नेह नवेला, अति मीठा मोहि भावे रे ।
निशदिन देखौं बाट तुम्हारी, कब मेरे घर आवे रे ॥ टेक ॥
आइ बनी है साहिब सेती, तिस बिन तिल क्यों जावे रे ।
दासी कों दर्शन हरि दीजे, अब क्यों आप छिपावे रे ॥ 1 ॥
तिल तिल देखूं साहिब मेरा, त्यों त्यों आनन्द अंग न मावे रे ।
दादू ऊपर दया मया करि, कब नैनहुँ नैन मिलावे रे ॥ 2 ॥
123. (गुजराती भाषा) । राज मृगांक ताल
पीव घर आवे रे, वेदन मारी जाणी रे ।
विरह संताप कौण पर कीजे, कहूँ छूं दुख नी कहाणी रे ॥ टेक ॥
अंतरजामी नाथ मारा, तुज बिण हूँ सीदाणी रे ।
मंदिर मारे केम न आवे, रजनी जाइ बिहाणी रे ॥ 1 ॥
तारी बाट हूँ जोइ थाकी, नैण निखूट्या पाणी रे ।
दादू तुज बिण दीन दुखी रे, तूं साथी रह्यो छे ताणी रे ॥ 2 ॥
124. (गुजराती) विरह विनती । राज मृगांक ताल
कब मिलसी पीव गृह छाती, हौं औराँ संग मिलाती ॥ टेक ॥
तिसज लागी तिसही केरी, जन्म जन्म नो साथी ।
मीत हमारा आव पियारा, ताहरा रंग नी राती ॥ 1 ॥
पीव बिना मने नींद न आवे, गुण ताहरा ले गाती ।
दादू ऊपर दया मया करि, ताहरे वारणे जाती ॥ 2 ॥
125. विरह (गुजराती) । राज विद्याधर ताल
म्हारा रे वाहला ने काजे, हृदये जोवा ने हौं ध्यान धरूं।
आकुल थाये प्राण मारा, कोने कही पर करूं ॥ टेक ॥
संभार्यो आवे रे वाहला, वेहला एहों जोई ठरूं।

  • 354 -

श्री दादूवाणी-राग केदार 6
साथीजी साथे थइ ने, पेली तीरे पार तरूं ॥ 1 ॥
पीव पाखे दिन दुहेला जाये, घड़ी बरसां सौं केम भरूं।
दादू रे जन हरि गुण गाता, पूरण स्वामी ते वरूं ॥ 2 ॥
126. विरह विलाप । झपताल
मरिये मीत विछोहे, जियरा जाइ अंदोहे ॥ टेक ॥
ज्यों जल विछुरे मीना, तलफ तलफ जिय दीन्हा, यों हरि हम सौं कीन्हा ॥ 1 ॥
चातक मरै पियासा, निशदिन रहै उदासा, जीवै किहि बेसासा ॥ 2 ॥
जल बिन कमल कुम्हलावै, प्यासा नीर न पावै, क्यों कर तृषा बुझावै ॥ 3 ॥
मिल जनि बिछुरो कोई, बिछुरे बहु दुख होई, क्यों कर जीवै जन सोई ॥ 4 ॥
मरणा मीत सुहेला, बिछुरन खरा दुहेला, दादू पीव सौं मेला ॥ 5 ॥
127. त्रिताल
पीव ! हौं कहा करूँ रे, पाइ परूं के प्राण हरूं रे,
अब हौं मरणे नांहि डरूं रे ।। टेक ।।
गाल मरूं कै, जालि मरूं रे, कै हौं करवत शीश धरूं रे ।। 1 ।।
खाइ मरूं कै घाइ मरूं रे, कै हौं कतहूँ जाइ मरूं रे ।। 2 ।।
तलफ मरूं कै झूरी मरूं रे, कै हौं विरही रोइ मरूं रे ।। 3 ।।
टेरि कह्या मैं मरण गह्या रे, दादू दुखिया दीन भया रे ।। 4 ।।
128. गुजराती भाषा । त्रिताल
वाहला हौं जाणूं जे रंग भर रमिये, मारो नाथ निमिष नहिं मेलूँ रे ।
अंतरजामी नाह न आवे, ते दिन आव्यो छैलो रे ।। टेक ।।
वाहला सेज हमारी एकलड़ी रे, तहँ तुजने केम न पामों रे।
आ दत्त हमारो पूरबलो रे, तेतो आव्यो सामों रे ।। 1 ।।
वाहला मारा हृदया भीतर केम न आवै, मने चरण विलम्ब न दीजे रे।

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श्री दादूवाणी-राग केदार 6
दादू तो अपराधी तारो, नाथ उधारी लीजे रे ॥ 2 ॥
129. (गुजराती) । पंचम ताल
तूँ छे मारो राम गुसांई, पालवे तारे बाँधी रे ।
तुज बिना हूँ आंतरे र-वल्यो, कीधी कमाई लाधी रे ॥ टेक ॥
जीवूं जेटला हरि बिना रे, देहड़ी दुःखे दाधी रे ।
अेणे अवतारे कांई न जाण्यूं, माथे टक्कर खाधी रे ॥ 1 ॥
छूटको मारो क्यारे थाशे, शक्यों न राम अराधी रे ।
दादू ऊपर दया मया कर, हूँ तारो अपराधी रे ॥ 2 ॥
130. (गुजराती) विनती । पंचमताल
तूँ ही तूँ तनि माहरे गुसांई, तूँ बिना तूँ केने कहूँ रे ।
तूँ त्यां तूँ ही थई रह्यो रे, शरण तुम्हारी जाय रहूँ रे ॥ टेक ॥
तन मन मांहि जोइये त्यां तूँ, तुज दीठां हौं सुख लहूँ रे ।
तूँ त्यां जेटली दूर रहूँ रे, तेम तेम त्यां हौं दुःख सहूँ रे ॥ 1 ॥
तुम बिन माहरो कोई नहीं रे, हौं तो ताहरा वैण बहूँ रे ।
दादू रे जण हरि गुण गाता, मैं मेलूँ माहरो मैं हूँ रे ॥ 2 ॥
131. केवल विनती । त्रिताल
हमारे तुम ही हो रखपाल ।
तुम बिन और नहीं को मेरे, भव-दुख मेटणहार ॥ टेक ॥
वैरी पंच निमष नहिं न्यारे, रोक रहे जम काल ।
हा जगदीश ! दास दुख पावै, स्वामी करहु सँभाल ॥ 1 ॥
तुम्ह बिन राम दहैं ये द्वन्दर, दसौं दिशा सब साल ।
देखत दीन दुखी क्यों कीजे, तुम हो दीन-दयाल ॥ 2 ॥
निर्भय नाम हेत हरि दीजे, दर्शन पर्सन लाल ।

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