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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 504 में से

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पृष्ठ 346

श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4
सबै दोष दादू के दूर कर, तुम ही रहो हरी ॥ 3 ॥
103. तर्क चेतावनी । राज विद्याधर ताल
मन मतिहीण धरै, मूरख मन कछु समझत नाहीं, ऐसैं जाइ जरै ॥ टेक ॥
नाम बिसार अवर चित राखै, कूड़े काज करै ।
सेवा हरि की मनहुँ न आणै, मूरख बहुरि मरै ॥ 1 ॥
नाम संगम कर लीजे प्राणी, जम तैं कहा डरै ।
दादू रे जे राम संभारै, सागर तीर तिरै ॥ 2 ॥
104. संत सहाय रक्षा । राज मृगांक ताल
पीव तैं अपने काज सँवारे । कोई दुष्ट दीन कों मारन, सोई गहि तैं मारे ॥ टेक ॥
मेरु समान ताप तन व्यापै, सहजैं ही सो टारे ।
संतन को सुखदाई माधो, बिन पावक फँद जारे ॥ 1 ॥
तुम थैं होइ सबै विधि समर्थ, आगम सबै विचारे ।
संत उबार दुष्ट दुख दीन्हा, अंध कूप में डारे ॥ 2 ॥
ऐसा है सिर खसम हमारे, तुम जीते खल हारे ।
दादू सौं ऐसे निर्बहिये, प्रेम प्रीति पिव प्यारे ॥ 3 ॥
105. माया । मल्लिका मोद ताल
काहू तेरा मर्म न जाना रे, सब भये दीवाना रे ॥ टेक ॥
माया के रस राते माते, जगत भुलाना रे ।
को काहू का कह्या न मानै, भये अयाना रे ॥ 1 ॥
माया मोहे मुदित मगन, खानखाना रे ।
विषिया रस अरस परस, साच ठाना रे ॥ 2 ॥
आदि अंत जीव जन्त, किया पयाना रे ।
दादू सब भ्रम भूले, देखि दाना रे ॥ 3 ॥

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