सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28
उपजन
दादू अनुभव उपजी गुणमयी, गुण ही पै ले जाइ।
गुण ही सौं गहि बंधिया, छूटै कौन उपाइ ॥ 4 ॥
द्वै पख उपजी परिहरै, निर्पख अनुभव सार।
एक राम दूजा नहीं, दादू लेहु विचार ॥ 5 ॥
दादू काया ब्यावर गुणमयी, मनमुख उपजै ज्ञान।
चौरासी लख जीव को, इस माया का ध्यान ॥ 6 ॥
आत्म उपज आकाश की, सुनि धरती की बाट।
दादू मारग गैब का, कोई लखै न घाट ॥ 7 ॥
आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ।
दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥ 8 ॥
प्रेम भक्ति जब ऊपजै, निश्चल सहज समाधि।
दादू पीवे राम रस, सतगुरु के प्रसाद ॥ 9 ॥
प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार।
दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥ 10 ॥
दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव।
सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥ 11 ॥
निन्दा
जब हम ऊजड़ चालते, तब कहते मारग मांहि।
दादू पहुंचे पंथ चल, कहैं यहु मारग नांहि ॥ 12 ॥
उपजन
पहले हम सब कुछ किया, भरम करम संसार।
दादू अनुभव उपजी, राते सिरजनहार ॥ 13 ॥
सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तव सार।
सुनतां ही साहिब मिले, मन के जाहिं विकार ॥ 14 ॥
- 269 -
श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28
परिचय जिज्ञासा उपदेश
पारब्रह्म कह्या प्राण सौं, प्राण कह्या घट सोइ ।
दादू घट सब सौं कह्या, विष अमृत गुण दोइ ॥ 15 ॥
दादू मालिक कह्या अरवाह सौं, अरवाह कह्या औजूद ।
औजूद आलम सौं कह्या, हुकम खबर मौजूद ॥ 16 ॥
दादू जैसा ब्रह्म है, तैसी अनुभव उपजी होइ ।
जैसा है तैसा कहै, दादू विरला कोइ ॥ 17 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
अट्ठाईसवां उपजन काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 28 ॥ साखी 17 ॥
- 270 -
दया निर्वैरता का अंग
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अथ दया निर्वैरता का अंग २९
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
सारमत
आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार ।
निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मत सार ॥ 2 ॥
दादू निर्वैरी निज आत्मा, साधन का मत सार ।
दादू दूजा राम बिन, बैरी मंझ विकार ॥ 3 ॥
- 271 -
श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29
निर्वैरी सब जीव सौं, संतजन सोई ।
दादू एकै आत्मा, बैरी नहिं कोई ॥ 4 ॥
सब हम देख्या शोध कर, दूजा नांही आन ।
सब घट एकै आत्मा, क्या हिन्दू मुसलमान ॥ 5 ॥
दादू नारी पुरुष का नाम धर, इहि संशय भ्रम भुलान ।
सब घट एकै आत्मा, क्या हिंदू मुसलमान ॥ 6 ॥
दादू दोनों भाई हाथ पग, दोनों भाई कान ।
दोनों भाई नैन हैं, हिंदू मुसलमान ॥ 7 ॥
दादू संशय आरसी, देखत दूजा होइ ।
भ्रम गया दुविधा मिटी, तब दूसर नाहिं कोइ ॥ 8 ॥
किस सौं बैरी ह्वै रह्या, दूजा कोई नांहि ।
जिसके अंग तैं ऊपजै, सोई है सब मांहि ॥ 9 ॥
सब घट एकै आत्मा, जानै सो नीका ।
आपा पर में चीन्ह ले, दर्शन है पीव का ॥ 10 ॥
काहे को दुख दीजिये, घट घट आत्माराम ।
दादू सब संतोषिये, यह साधु का काम ॥ 11 ॥
काहे को दुख दीजिये, साँई है सब मांहि ।
दादू एकै आत्मा, दूजा कोई नांहि ॥ 12 ॥
साहिब जी की आत्मा, दीजे सुख संतोंष ।
दादू दूजा को नहीं, चौदह तीनों लोक ॥ 13 ॥
दादू जब प्राण पिछाणै आपको, आत्म सब भाई ।
सिरजनहारा सबनि का, तासौं ल्यौ लाई ॥ 14 ॥
आत्माराम विचार कर, घट घट देव दयाल ।
दादू सब संतोषिये, सब जीवों प्रतिपाल ॥ 15 ॥
दादू पूरण ब्रह्म विचारले, द्वैत भाव कर दूर ।
सब घट साहिब देखिये, राम रह्या भरपूर ॥ 16 ॥
- 272 -
श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29
दादू मंदिर काँच का, मर्कट सुनहाँ जाइ ।
दादू एक अनेक है, आप आपको खाइ ॥ 17 ॥
आत्म भाई जीव सब, एक पेट परिवार ।
दादू मूल विचारिये, तो दूजा कौन गँवार ॥ 18 ॥
दादू सूखा सहजैं कीजिये, नीला भानै नांहि ।
काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥ 19 ॥
दया निर्वैरता
घट घट के उनहार सब, प्राण परस है जाइ ।
दादू एक अनेक है, बरतैं नाना भाइ ॥ 20 ॥
आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ ।
दादू न्यारे नांम धर, भिन्न भिन्न है जाइ ॥ 21 ॥
आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ ।
आदि अंत सब एक है, दादू सहज समाइ ॥ 22 ॥
आतम देव आराजिये, विरोधिये नहिं कोइ ।
आराधे सुख पाइये, विरोधे दुःख होइ ॥ 23 ॥
ज्यों आपै देखे आपको, यों जे दूसर होइ ।
तो दादू दूसर नहीं, दुःख न पावै कोइ ॥ 24 ॥
दादू सम कर देखिये, कुंजर कीट समान ।
दादू दुविधा दूर कर, तज आपा अभिमान ॥ 25 ॥
अदया हिंसा
दादू अर्श खुदाय का, अजरावर का थान ।
दादू सो क्यों ढाहिये, साहिब का नीशान ॥ 26 ॥
दादू आप चिणावै देहुरा, तिसका करहि जतन ।
प्रत्यक्ष परमेश्वर किया, सो भानै जीव रतन ॥ 27 ॥
मसीत संवारी माणसाँ, तिसको करैं सलाम ।
ऐन आप पैदा किया, सो ढाहैं मुसलमान ॥ 28 ॥
- 273 -
श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29
दादू जंगल मांही जीव जे, जग तैं रहैं उदास।
भयभीत भयानक रात दिन, निश्चल नाहीं वास ॥ 29 ॥
वाचा बंधी जीव सब, भोजन पानी घास।
आत्म ज्ञान न ऊपजै, दादू करहि विनास ॥ 30 ॥
काला मुँह कर करद का, दिल तैं दूर निवार।
सब सूरत सुबहान की, मुल्लां मुग्ध न मार ॥ 31 ॥
गला गुस्से का काटिये, मियाँ मनी को मार।
पंचों बिस्मिल कीजिये, ये सब जीव उबार ॥ 32 ॥
वैर विरोधे आत्मा, दया नहीं दिल मांहि।
दादू मूरति राम की, ताको मारन जांहि ॥ 33 ॥
दया निर्वैरता
कुल आलम यके दीदम, अरवाहे इखलास।
बद अमल बदकार दुई, पाक यारां पास ॥ 34 ॥
काल झाल तैं काढ कर, आतम अंग लगाइ।
जीव दया यहु पालिये, दादू अमृत खाइ ॥ 35 ॥
दादू बुरा न बांछै जीव का, सदा सजीवन सोइ।
परलै विषय विकार सब, भाव भक्ति रत होइ ॥ 36 ॥
सतगुरु संतों की यह रीत, आत्म भाव सौं राखैं प्रीत।
ना को बैरी ना को मीत, दादू राम मिलन की चीत ॥ 37 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
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मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
उन्तीसवां दया निर्वैरता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 29 ॥ साखी 37 ॥
- 274 -
सुंदरी का अंग
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अथ सुन्दरी का अंग ३०
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
सुन्दरी विलाप
आरतवन्ती सुन्दरी, पल पल चाहे पीव ।
दादू कारण कंत के, तालाबेली जीव ।। 2 ।।
काहे न आवहु कंत घर, क्यों तुम रहे रिसाइ ।
दादू सुन्दरी सेज पर, जन्म अमोलक जाइ ।। 3 ।।
- 275 -
श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30
आतम अंतर आव तूं, या है तेरी ठौर।
दादू सुन्दरी पीव तूं, दूजा नांही और ॥ 4 ॥
दादू पीव न देख्या नैन भर, कंठ न लागी धाइ।
सूती नहीं गल बाँह दे, बीच हि गई बिलाइ ॥ 5 ॥
सुरति पुकारै सुन्दरी, अगम अगोचर जाइ।
दादू विरहनी आत्मा, उठ उठ आतुर धाइ ॥ 6 ॥
साँई कारण सेज सँवारी, सब तैं सुन्दर ठौर।
दादू नारी नाह बिन, आण बिठाये और ॥ 7 ॥
कोई अवगुण मन बस्या, चित तैं धरी उतार।
दादू पति बिन सुन्दरी, हाँडै घर-घर बार ॥ 8 ॥
अन्य लगन व्यभिचार
प्रेम प्रीति सनेह बिन, सब झूठे श्रृंगार।
दादू आतम रत नहीं, क्यों मानै भरतार ॥ 9 ॥
दादू हौं सुख सूती नींद भर, जागै मेरा पीव।
क्यों कर मेला होइगा, जागै नांही जीव ॥ 10 ॥
सखी न खेलै सुन्दरी, अपने पीव सौं जाग।
स्वाद न पाया प्रेम का, रही नहीं उर लाग ॥ 11 ॥
पंच दिहाड़े पीव सौं, मिल काहे न खेले।
दादू गहली सुन्दरी, क्यों रहै अकेले ॥ 12 ॥
सखी सुहागिन सब कहैं, हौं री दुहागिन आहि।
पिव का महल न पाइये, कहाँ पुकारूँ जाहि ॥ 13 ॥
सखी सुहागिन सब कहैं, कंत न बूझै बात।
मनसा वाचा कर्मणा, मूर्च्छ मूर्च्छ जीव जात ॥ 14 ॥
सखी सुहागिन सब कहैं, पीव सौं परस न होइ।
निशवासर दुख पाइये, यहु व्यथा न जान कोइ ॥ 15 ॥
- 276 -
श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30
सखी सुहागिन सब कहैं, प्रकट न खेलै पीव।
सेज सुहाग न पाइये, दुखिया मेरा जीव ॥ 16 ॥
अन्य लग्न व्यभिचार
पुरुष पुरातन छाड़ कर, चली आन के साथ।
सो भी संग तैं बीछुट्या, खड़ी मरोड़े हाथ ॥ 17 ॥
सुन्दरी विलाप
सुन्दरी कबहुँ कंत का, मुख सौं नाम न लेइ।
अपने पीव के कारणैं, दादू तन मन देइ ॥ 18 ॥
नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण।
दादू सुन्दरी बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥ 19 ॥
तन भी तेरा, मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण।
सब कुछ तेरा, तूँ है मेरा, यहु दादू का ज्ञान ॥ 20 ॥
सुन्दरी मोहे पीव को, बहुत भाँति भरतार।
त्यों दादू रिझवै राम को, अनन्त कला करतार ॥ 21 ॥
नदियाँ नीर उलंघ कर, दरिया पैली पार।
दादू सुन्दरी सो भली, जाइ मिले भरतार ॥ 22 ॥
सुन्दरी सुहाग
प्रेम लहर गह ले गई, अपने प्रीतम पास।
आत्म सुन्दरी पीव को, विलसै दादू दास ॥ 23 ॥
सुन्दरी को साँई मिल्या, पाया सेज सुहाग।
पींव सौं खेलै प्रेम रस, दादू मोटे भाग ॥ 24 ॥
दादू सुन्दरी देह में, साँई को सेवै।
राती अपने पीव सौं, प्रेम रस लेवै ॥ 25 ॥
दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह।
दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥ 26 ॥
- 277 -
श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30
साँई सुन्दरी सेज पर, सदा एक रस होइ ।
दादू खेलै पीव सौं, ता सम और न कोइ ॥ 27 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
तीसवां सुन्दरी का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 30 ॥ साखी 27 ॥
- 278 -
कस्तूरिया मृग
का
अंग
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अथ कस्तूरिया मृग का अंग ३१
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।।
दादू घट कस्तूरी मृग के, भ्रमत फिरै उदास ।
अन्तरगति जाणै नहीं, तातैं सूंघै घास ।। 2 ।।
सब घट में गोविन्द है, संग रहै हरि पास ।
कस्तूरी मृग में बसै, सूंघत डोलै घास ।। 3 ।।
दादू जीव न जानै राम को, राम जीव के पास ।
गुरु के शब्दों बाहिरा, तातैं फिरै उदास ।। 4 ।।
- 279 -
श्री दादूवाणी-कस्तूरिया मृग का अंग 31
दादू जा कारण जग ढूंढ़िया, सो तो घट ही मांहि।
मैं तैं पड़दा भरम का, तातैं जानत नांहि ॥ 5 ॥
दादू दूर कहैं ते दूर हैं, राम रह्या भरपूर।
नैनहुं बिन सूझै नहीं, तातैं रवि कत दूर ॥ 6 ॥
ओडो हूवो पाण खे, न लघाऊं मंझ।
न जाताऊं पाण में, तांई क्या ऊंपंध ॥ 7 ॥
दादू केई दौड़े द्वारिका, केई काशी जांहि।
केई मथुरा को चले, साहिब घट ही मांहि ॥ 8 ॥
दादू सब घट मांही रम रह्या, बिरला बूझै कोइ।
सोई बूझै राम को, जे राम सनेही होइ ॥ 9 ॥
दादू जड़मति जीव जाणै नहीं, परम स्वाद सुख जाइ।
चेतन समझै स्वाद सुख, पीवै प्रेम अघाइ ॥ 10 ॥
जागत जे आनन्द करै, सौ पावै सुख स्वाद।
सूते सुख ना पाइये, प्रेम गँवाया बाद ॥ 11 ॥
दादू जिसका साहिब जागणा, सेवक सदा सचेत।
सावधान सन्मुख रहै, गिर गिर पड़े अचेत ॥ 12 ॥
दादू साँई सावधान, हम ही भये अचेत।
प्राणी राख न जानहि, तातैं निष्फल खेत ॥ 13 ॥
सगुना निगुना कृतघ्नी
दादू गोविन्द के गुण बहुत हैं, कोई न जाणै जीव।
अपणी बूझै आप गति, जे कुछ किया पीव ॥ 14 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-
सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-
सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
इकतीसवां कस्तूरिया कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 31 ॥ साखी 14 ॥
- 280 -
निंदा का अंग
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अथ निन्दा का अंग ३२
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
मत्सर ईर्ष्या
साधु निर्मल मल नहीं, राम रमै सम भाइ ।
दादू अवगुण काढ कर, जीव रसातल जाइ ॥ 2 ॥
दादू जब ही साधु सताइये, तब ही ऊँघ पलट।
आकाश धँसै, धरती खिसै, तीनों लोक गरक ॥ 3 ॥
- 281 -
श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32
निन्दा
दादू जिहिं घर निंदा साधु की, सो घर गये समूल ।
तिनकी नींव न पाइये, नांव न ठांव न धूल ॥ 4 ॥
दादू निंदा नाम न लीजिये, स्वप्नै ही जनि होइ ।
ना हम कहैं, न तुम सुनो, हमें जनि भाषै कोइ ॥ 5 ॥
दादू निन्दा किये नरक है, कीट पड़ैं मुख मांहि ।
राम विमुख जामै मरै, भग-मुख आवै जाहि ॥ 6 ॥
दादू निंदक बपुरा जनि मरै, पर उपकारी सोइ ।
हम को करता ऊजला, आपण मैला होइ ॥ 7 ॥
दादू जिहिं विधि आतम उद्धरै, परसे प्रीतम प्राण ।
साधु शब्द क्यूं निंदणां, समझैं चतुर सुजाण ॥ 8 ॥
मत्सर ईर्ष्या
अनदेख्या अनरथ कहैं, कलि पृथिवी का पाप ।
धरती अंबर जब लगै, तब लग करैं कलाप ॥ 9 ॥
अनदेख्या अनरथ कहैं, अपराधी संसार ।
जद तद लेखा लेइगा, समर्थ सिरजनहार ॥ 10 ॥
दादू डरिये लोक तैं, कैसी धरहिं उठाइ ।
अनदेखी अजगैब की, ऐसी कहैं बनाइ ॥ 11 ॥
अमिट पाप प्रचंड
दादू अमृत कूँ विष, विष को अमृत, फेरि धरैं सब नाम ।
निर्मल मैला, मैला निर्मल, जाहिंगे किस ठाम ॥ 12 ॥
मत्सर ईर्ष्या
दादू साचे को झूठा कहैं, झूठे को साचा ।
राम दुहाई काढिये, कंठ तैं वाचा ॥ 13 ॥
दादू झूठ न कहिये सच को, सच न कहिये झूठ ।
दादू साहिब मानै नहीं, लागै पाप अखूट ॥ 14 ॥
- 282 -
श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32
दादू झूठ दिखावै साच को, भयानक भयभीत ।
साचा राता साच सौं, झूठ न आनै चीत ॥ 15 ॥
साचे को झूठा कहैं, झूठा साच समान ।
दादू अचरज देखिया, यहु लोगों का ज्ञान ॥ 16 ॥
निन्दा
दादू निन्दक बुरा न कहिये, पर उपकारी अस कहाँ लहिये ।
ज्यों ज्यों निन्दैं लोग विचारा, त्यों त्यों छीजै रोग हमारा ॥ 17 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
बत्तीसवां निन्दा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 32 ॥ साखी 17 ॥
- 283 -
निगुणा का
अंग
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अथ निगुणा का अंग ३३
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥
सगुणा निगुणा कृतघ्नी
दादू चंदन बावना, बसै बटाऊ आइ ।
सुखदाई शीतल किये, तीनों ताप नसाइ ॥ 2 ॥
काल कुहाड़ा हाथ ले, काटन लागा ढाइ ।
ऐसा यहु संसार है, डाल मूल ले जाइ ॥ 3 ॥
- 284 -
श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
अज्ञ स्वभाव अपलट
सतगुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवंग।
दादू विष छाडैं नहीं, कहा करै सत्संग ॥ 4 ॥
दादू कीड़ा नरक का, राख्या चंदन मांहि।
उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नांहि ॥ 5 ॥
सतगुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ।
दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥ 6 ॥
कोटि बर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास।
दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥ 7 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि।
दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥ 8 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग।
दादू रोम का अन्तरा, पलटै नांही अंग ॥ 9 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ।
दादू मांहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥ 10 ॥
सगुणा निगुणा कृतघ्नी
मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल।
मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥ 11 ॥
सब जीव भुवंगम कूप में, साधु काढैं आइ।
दादू विषहर विष भरे, फिर ताही को खाइ ॥ 12 ॥
दादू दूध पिलाइये, विषहर विष कर लेइ।
गुण का औगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥ 13 ॥
अज्ञ स्वभाव अपलट
बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल मांहि।
दादू सूखै सींचतां, तो जल को दूषण नांहि ॥ 14 ॥
- 285 -
श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
सगुणा निगुणा कृतघ्नी
सुफल वृक्ष परमार्थी, सुख देवै फल फूल।
दादू ऊपर बैस कर, निगुणा काटै मूल ॥ 15 ॥
दादू सगुणा गुण करै, निगुणा मानै नांहि।
निगुणा मर निष्फल गया, सगुणा साहिब मांहि ॥ 16 ॥
निगुणा गुण मानै नहीं, कोटि करै जे कोइ।
दादू सब कुछ सौंपिये, सो फिर बैरी होइ ॥ 17 ॥
दादू सगुणा लीजिये, निगुणा दीजे डार।
सगुणा सन्मुख राखिये, निगुणा नेह निवार ॥ 18 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै एक।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥ 19 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा नाखै ढाहि।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा निष्फल जाइ ॥ 20 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै कोइ।
दादू साधु सब कहैं, भला कहाँ तैं होइ ॥ 21 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै नीच।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा के सिर मीच ॥ 22 ॥
साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु के घट होइ।
दादू काढै काल मुख, निगुणा न मानै कोइ ॥ 23 ॥
साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु मांही आइ।
दादू राखै जीव दे, निगुणा मेटै जाइ ॥ 24 ॥
साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु का दे संग।
दादू परलै राखिले, निगुणा न पलटै अंग ॥ 25 ॥
साहिब जी सब गुण करै, सतगुरु आडा देइ।
दादू तारै देखतां, निगुणा गुण नहिं लेइ ॥ 26 ॥
- 286 -
श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
सतगुरु दिया राम धन, रहै सुबुद्धि बताइ।
मनसा वाचा कर्मणा, बिलसै वितड़ै खाइ ॥ 27 ॥
किया कृत मेटै नहीं, गुण ही मांहि समाइ।
दादू बधै अनन्त धन, कबहुँ कदे न जाइ ॥ 28 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
तैंतीसवां निगुणा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 33 ॥ साखी 28 ॥
- 287 -
विनती का
अंग
अथ विनती का अंग ३४
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
करूणा
दादू बहुत बुरा किया, तुम्हें न करना रोष।
साहिब समाई का धनी, बन्दे को सब दोष ॥ 2 ॥
दादू बुरा बुरा सब हम किया, सो मुख कह्या न जाइ ।
निर्मल मेरा सांइयाँ, ताको दोष न लाइ ॥ 3 ॥
साँई सेवा चोर मैं, अपराधी बन्दा ।
दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गन्दा ॥ 4 ॥
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