चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
११२
२६६
(रीडिङ्ग्स २१ क)
दस्तदराजी कदने चाँदा बा मैना
(चाँदका मैनासे हाथापायी करना)
अरग ठाइ हुत मैनाँ नारी। दौरि चाँद बरु बाँह पसारी ॥१
ऊपर भाग कै अभरन तानी। हार टूटि गा मोति छरियानी ॥२
एक बेर निकसा दोइ टूटी। माँग सलोनी मानिक फूटी ॥३
टूटि हार घूँघस भये। चोली चीर फाटि कै गये ॥४
रखरी खूँट दोउ धर परी। मानिक हीर पदारथ जरी ॥५
अभरन टूटि बिचर गा, मैनाँ गइ हुँबलाइ ।६
चाँद मेल देउ धर, मिली तराइन आइ ॥७
टिप्पणी—(१) अरग—अलग ।
(२) छरियानी—छितरा गयी बिखर गया।
(५) रखरी—हाथका कडा। खूँट—कानका आभूषण।
(६) बिचर—बितर।
२६७
(रीडीङ्ग्स २११)
मुहकम गिरफ्तने चाँदा सर मैना बा व मैना नीज
(मैनाका चाँदको और चाँदका मैना को पकडना)
बात चाँद मैना फिरिबिरी। बानु सँबरी सारस धरी ॥१
तानसि चीर चाँद भइ नाँगी। परा हाय गइ फाट इटौंगी ॥२
दस नरख लाग दुहुँ धनहारा। चाँद राव भइ रक्तवहिं धारा॥३
केस छूटि दुहुँ दिसि छिरमाये। जनु निसित अमर्षा अन्ह आये ॥४
सोरह कराँ चाँद के गयी। कराँ उतार घरी एक भयी ॥५
खाल रूप कै बाँगर करी, मैनाँ कढ़ि सिरान ।६
बाँध चाँद गर कापर, केसस चीर परान ॥७
टिप्पणी-(१) फिरिहिरी—चक्कर खाय। सेंबरी—सफ़री, मछली।
(३) थनहारा—स्तन।
(७) केतस-कितने ही। परान—पखान, पलायन किया, भाग खड़े
हुए।
२६८
(रौकण्डूस २१२)
दर खून शुरु शुदन चाँदा व मैना व हजीमत नमी शुदन
(रक्तरंजित होजाने पर भी चाँद-मैनाका पराजित न होना)
मिलन काम दोऊ थर अरें। जनु गीर मैमत ऊमरें ॥१
दोऊ नारि ऊमरैं सथूला। नख अंग जनु टेसू फूला ॥२
उमै फरहिं हाथापाई। थन उघार तन ढाँकहि नाहीं ॥३
मरन सींह सो तरुनिहि रीसा। चीर न सँमारहिं भूगर केसा ॥४
मुँह न बोल उतर न देहीं। सीस नाँग जनु भू दह लीहैं ॥५
आइ बहुरि भू लागीं, दुहु महँ हार न कोइ ।६
लोसँचार बिसरिगा, मैंदिर बितारैह होइ ॥७
टिप्पणी—(३) थन—स्तन। उघार—नंगा वस्त्रहीन।
(७) लोसँचार—लोक आचार। बितारैह—बितण्डा झगड़ा मारपीट।
२६९
(रौकण्डूस २१३)
गुरीख्तन बुत अज बुतखाना अज भय भश्रियान
(मन्दिरके भीतर युद्ध देख देवताकी परेशानी)
पौंदर अम्बर परनि मिळ गयउ। देखहि जीवर साँसत भयउँ ॥१
दउपर रकत भयउ सप लोही। हियें लागि डर मरउँहि न मोही ॥२
देउ कई बिध में न भुलाई। इँदरसभा कै अच्छरहिं आयीं ॥३
मन वो दुहूँ मँह एको मरी। इँदर राय महँ बिठफइँ परी ॥४
चला देउ हरुवा मन्ति-लागी। छाड़ि मैंदिर निसरा डर भागी ॥५
२१४
परायें देखि, सके न कोउ छुड़ाइ ॥६
सँबर आत बिसरिगा, बरैमा सीस डुलाइ ॥७
२७०
( रीडॅन्ड्स २१४ : पंजाब [प] )
आमदने लोरक नजदीके कुस्तराना व मालूम कर्दने रस्क कैफियत उम्ग
( लोरकका मन्दिरके निकट आकर लोगोंसे युद्धकी जानकारी
प्राप्त करना )
कँवर तरायी खरज आवा । देस लोग मिल आगें धावा¹ ॥१
बिन पैठे सो² बेगि पुलावहि । करम हमार इहैं फल जावहि ॥२
चाँदा मैनाँ के अस कही³ । अबलहि अस न काहू⁴ सो मई॥३
सुनहिन बोल काँ करहिं मनावौ⁵ । तम न कोउ सो आइ छुड़ावौ⁶ ॥४
जो रे दुहुँ मँह एक मर जाई । हत्या लागी देस बुराई ॥५
कँवर तरायी खरख, दुहूँ पैसि छुड़ावहु ।६
लाग जान¹⁰ कै हत्या, उजरत देस बसावहु ॥७
पाठान्तर—पंजाब प्रति—
शीर्षक नष्ट हो गया है ।
१—धावा । २—दूत । ३—चाँदहि मैनाहि होइ के कही । ४—काहूँ ।
५—सुनहि न बोल न केहुँ मनावा । ६—तम न कोउ ओ यत
छुडावा । ७—बल दूँह गेंद ऐको मर जाइ । ८—हत्या लागी देस
बुझाइ । ९—दुहुँ मँह पैस छुडा[बहु] । १०—जाइ ।
२७१
( रीडॅन्ड्स २१५ : बम्बई १५ )
आश्ती कर्दने लोरक मियाने चाँदा व मैना
( लोरकका चाँद-मैनामें सुलह कराना )
परे साँध के दोऊ नारी । भीतर मोरी सोबन बारी ॥१
दै संडवान दोउ पियाईं । कोहबर जरतैं छिड़क बुझाईं ॥२
बास बिरौरी पान खियाईं । एक खंडछाप आन पहिराईं ॥३
२१५
यह गियान तुम्ह चाँद न बूझउँ । मैनाँ सइँ को झूरहि झूझठँ ॥४
ओछ बात सुन चाँद न फीजइँ । उत्तर देइ[जनि*]९उत्तर लीजै ॥५
सिराजदीन सुनउ फष-छन्द, दाउद कही सँवार ।६
मरे सौध के१० दोउ नारी, लाइ घरी अँकवार ॥७
पाठान्तर—बम्बई प्रति—
शीर्षक—रिहा करने अमीर मसूद व रूप व सामान दादन मैना व मना
करदन चाँदा (अमीर मसूदको रिहा करना और मैनाको शृंगारका
सामान देना और चाँदाको बरजना) । इस शीर्षकका विषयसे कोई
सम्बन्ध नहीं है ।
१—मीर मसूद क । २—खंडवानी । ३—अरैँ । ४—कपूरैँ । ५—
सूझी । ६—मैना स्योको युझ न जूझी । ७—कीजा । ८—कन ।
९—न कीजा । १०—मीर मसूद क ।
टिप्पणी—(१) सोध—ईंग्या ।
(३) चिरौरै—(क —राखिर कटक>राउर बटक>राउर इरर>चिरौरा)
—फब्या । बण्डछाप—छापा हुआ रेशमी वस्त्र ।
२७२
( शीर्षकहस्त २१६ )
बाज़ गुजश्तने चाँदा बुतखाना सूये रानये खुद
( चाँदका मन्दिरसे घर लौटना )
चाँद सिघासन मंदिर चलाबा । देख मनाथीं लाँछन पाषा ॥१
जो बैठ मारिंहु लाँछन लागा । आनतँ चँदर मेघ सर मागा ॥२
सोरहकरो करत उनियारा । पूनेतैं रात भइ अँधियारा ॥३
चाँद फलंकी चितहि सुखानी । एक खंड नाही नौ खंड बानी ॥४
ईंट पर जाइ मंदिर उतरी । कँवर देखि तो पाछँ परी ॥५
चढ़ी चाँद घोंराइर, सिर धर पैठ तराइ ।६
एका निकरे बाद्यै, मुख मसि धोई न जाइ ॥७
टिप्पणी—(१) सिघासन—देखिये टिप्पणी १५२।३ ।
२११
२७३
(रीकैण्ड्स २१०)
बाज गुजाइतने मैना अज कुतरयाना सूये खानये खुद
(मैनाका मन्दिरस अपने घर जाना)
चढ़ी पालकी मैना नारी। बिहँसि कुँवरि सब जोभनभरी ॥१
कोऊ आनि पूछि कैस सखि आई। से सब गोहन देउघर गई ॥२
पहँहिं चाँद कर पानि उतारा। इम सँह नारिह छिनार बितारा ॥३
हँसि हँसि भानि अवाकर कहाईं। मिलइँ सहेलिन फूट कराई ॥४
पानि उतारि मसि मुख लाइ। सो मसि मुख मैं घोइन आइ ॥५
झमकत आइ पालकी, सुख सों मन्दिर पइठ। ६
गयी सहेलीं घर घर, मैना सेज बइठ ॥७
२७४
(रीकैण्ड्स २१४)
पुरसीदने ग्वेलिन मैना रा कैरियते कुलहाना
(मैनापर ग्वालिनका मन्दिरकी बात पूछना)
ग्वालिन पूंछइ कहहु धनि मनौँ। देउ बारि कस पायहु रैनौँ ॥१
हाँ तुम घूमइ देउ पठाइ। और पाठ तिंह चाँदा आइ ॥२
इम आना यह नगरी तुम्हारी। ऊपर कदारन छतव धमारी ॥३
थार बहुत प्रेम कुछ बस्तेउँ। आज मा चाँदा कें फरतेउँ ॥४
इ सब लाग क अप्सरा। पाञ्जी सामोँ देउ दुआरा ॥५
मन भयउँ गजिपाउ, चाँद महमर आइ। ६
नाँक तनक क उदलउँ, छतउँ चीर छिनाइ ॥७
२३७
२७५
( रॉकिण्डम २१९ )
तल्बीहने मैना मालिन रा व पय्यामान दर महर
( मैनाका मालिनको बुलाकर महरके घर भेजना )
मैनहिं मालिन तोहि बुलाइ । ओरहन देइ महराँ पठाई ॥१
चाँद सुरुज राइ कँ धिया । अइस न कीझ जस तैं किया ॥२
पूनिउँ सूर दखत उजियारा । आप कलंकी भा अँधियारा ॥३
महरि महर कँ भयी महि कानीं । लबतेउँ आग उतरतेउँ पानी ॥४
अमरूँ धिय दीन्हि मुकराइ । [ ] कर अन्त न जाइ ॥५
चार मुखन जग देखत, मोमेउँ पाँगर लागि ।६
जिह अगरग अस लागै, जाइ तम तज भागि ॥७
टिप्पणी—(१) ओरहन—उलाहना शिकायत ।
२७६
( रॉफेण्डम १२ )
रफ्तन गुलफरोश दर खानए राय महर व दीद ए...
( राय महरके घर मालिनका जाना )
माल्नि पुहुप करंड भर लइ । राजमंदिर खल भीतर गइ ॥१
महरहिं सीस नाइ भइ ठाढ़ी । कुसुम करी ल दसन फाढ़ी ॥२
हारपूर फूला पहराइ । आग पूज भर मन पिजाइ ॥३
फुनि माल्नि का औचारी । यह निशि दिनरइ दाम तुम्हारी ॥४
आज सूरव मंदिर पगपयउ । चाँद पद आगहन दइ पगपयउ ॥५
जस आगहन प कदा, तम हा कदी न पागे ॥६
मन बात हां दासी, फिरें नग बदन मेंमारी ॥७
२१८
२७७
( रौड्स २२१ ) -
पुरसीदने महरि बर गुलफ़रोश राज व बाज नमूदने गुलफ़रोश हवाले चाँद
( महरिका मालिनसे पूछना और मालिनका चाँदकी शिकायत करना )
महरि कहा सुन मालिन माइ । अइस तैं सुना तइस कहु आई ॥१
फाल्हि सो चाँद देउ घर गई । देउ दुआर बितारन मई ॥२
चार सुघन जग जातहिं जापा । कुछ आपन औ बहुत परापा ॥३
चाँद न आछी अपनैं बानी । बिन पानी अति सीम सुखानी ॥४
घर घर भात दस मदिराई । फारिकदयी मुँह निकर न जाई ॥५
सों राजा के धिय सो, चाँदा कैसें लोक हँसावसि ॥६
औ जो पुरखा सात गये सरग, तैं तिहँ लुआवसि ॥७
टिप्पणी—(२) फाल्हि—कल । बितारन—वितण्डा ।
(३) जातहिं—यात्राके निमित्त । आपन—अपने स्वरूप ।
(५) फारिक—फारिग़ फ़ारिग्मा ।
२७८
( रौड्स २२२ )
शर्मिन्दा शुदने महरि पूरा अज इंतामे चाँदा
( चाँदकी बदनामी पर फूल महरिका लज्जित होना )
सुनतहि फूला महरि लजानी । पर सहब जनु मेला पानी ॥१
जम तुमार पुरउँ दह दही । सम होइ महरि भात सुन रही ॥२
काँन भाँत पर गयइ भुलाई । इहँ कुरपारन लागि गँवाई ॥३
काहे करैं विष तँ भातारी । बहु आँगरस मरतेउँ पारी ॥४
अस आरदन दुनि कहुँ भइँ । जहाँ पियाही तिहि कय फइँ ॥५
दाइ कुरपारन, अगरण लाग हँसाजनहार ।६
भातैं लाग कह मालिन, डगरी आइ छिनार ॥७
२११
टिप्पणी—(१) बरे—घट।
(२) अगरम—अगणित।
(७) छिनार—छिन्नाख; पुंश्चली; व्यभिचारिणी। लोक-भाषामें नारीके प्रति
एक अति प्रचलित गाली।
२७९
(फील्ड्स २९३)
तंबीह्नन चाँदा बिरस्पत रा व फरिस्तादने बर लोरक
(चाँदका बिरस्पतको बुझाकर लोरकके पास भेजना)
चाँद बिरस्पत सों अस कहा। भासउँ कुछ जो चित महँ अहा ॥१
सरग हुतँ घरि परा उठारू। उठा सबद जग मीत न ककरू ॥२
अब यह बात देस पहिराई। औधी ढाँकी रहहिं लुकाई ॥३
हांबौं सुनतेउँ मोल परावा। जिह डरेउँ सो आग भावा ॥४
अब हा मरिहौं पेट कटारी। कै दुख सहब देस कै गारी ॥५
लोर कहसि बिरस्पत, महिँ लै नगर पराइ।६
आज राति लै निकरो, नतुर मरी मोर बिस खाइ ॥७
टिप्पणी—(५) सहब—सहूँगी।
(७) नतुर—नहीं तो; अन्यथा।
२८०
(फील्ड्स २९४)
गुफ्तन बिरस्पत लोरक रा सुखन चाँदा
(बिरस्पतका लोरकसे चाँदका सन्देश कहना)
आइ बिरस्पत कहा सँदेसू। लोर चाँद लइ [आ°] परदसू ॥१
मागन लाग दइउ घिर आये। पाउम पन्थ न हाँढी आय ॥२
नार गार नद पानि भरि रहे। यह सर्वसार जहाँ लइ अई ॥३
दुहँ लाग घर बादर रनै। दादुर रगहिं घीज लँवरून ॥४
पाउम पन्थ कउन नर पाइ। जीउ डराइ हिय फाण्ड धाई ॥५
२४
सरद सिसिर रितु हँवन्त, जात न लागे बार ।६
चलब चाँद कहु बिहफइ, होइ बसन्त उजियार ॥७
टिप्पणी—(२) रहउ—देख॰ बादल ।
(६) बार—नाला ओर—गोइ ।
(७) चळब—चलूँगा । बिहफइ—'बँसिरइ' पाठ भी सम्भव है। दोनो ही
विरस्पत (बृहस्पति) के देशज रूप हैं।
२८१
( रीछण्डस ३३५ )
तहफ़ीम कर्दने विरहसत बर गोरक रा
( बिरहसत का गोरक को समझाना )
बिहफइ आइ लोर समुझावा । बेर चाँद बिउ रूप उषावा ॥१
छाइ गोबर अस पहराउप । अरु जिउ आइ फुनि गोइ [न*] आउष॥२
मैं आपुन जिउ अस परसेना । रात दवस कहुँ बरमी दबा ॥३
पित्वैं फेर देखि पासाऊ । हाथ ऊभि सुइँ पर न पाऊ ॥४
परु गहि पानि अगका कहिय । अइस परे सर तइमै महिये ॥५
कहा बार सुनु बिहफइ, हौं ता रागि गुनाउँ ।६
काल घरी हौं जानब, धौं हा चाँद पुलाउँ ॥७
टिप्पणी—(१) बेर—डिम्ब ।
(२) अइस—इस प्रकार । पहराउब—बाहर निकलूँगा । गोइ—गोंदकी
गाँथा । आउष—आउँगा ।
( ) पानि—पाना, हाथ । अहूय—रेता । परइ—पड़ । तइम—तवा ।
(७) बाल—बर । धौं—सम्पूर्ण ।
२८२-२८६
( अनुपलब्ध )
३८१
२८७
(सदा १४४८)
-
- न दिलन का पौटा
(विरहका और के रूप क्रम)
पिरख नारि भा समुझाइ । गोद जीउ पेन पँहुचि सिरिआइ ॥१
चन्दन अमिर पिम मन मारा । परसि गपा भरि भीम गुँभारा ॥२
सिन्धु माँग नग साउर टीको। पग पान मुख पीग दीको ॥३
अछन पहिरि भउ गिय हार । हाथहि मेहँदी हिंया सिंगारु ॥४
अपर रूपे मदन भइ । भए लागि मानिन पर गइ ॥
उमगह नहगह निसि पायी, गरुह जा भाउ निहग ॥६
पउज मय पान फूलउ, भयी दुरँग दुरग ॥७
[टि०-] (१) म०नि० पृ० ६५१ ।
२८८
(संवत् १४४९)
- न दिलन का पौटा
-
- न लउतन्ह दिलन को प०८ ख
(दिल्हन के भँवर के रूप क्रम के ० ख०)
दिन का विरह भा तुयानी । भा उधारा पँचौ गनी ॥१
भए तेवँइ सिखा परा। गए सोइ मानिन घर आए ॥
सेंधुरा भा कंचु सुधार । विरख करै। गुयन निहार ॥३
विरहन दून भए पर भार । आग भइ पनि साही मार ॥४
आग्य बरइ न बुझावइ । तँह अगन भए अंगल जरइ॥
भए घरा सउर पुनि मँदा । सब जन पाइ रह खंदा ॥६
भए दिलन विरह उन सुखभन्ह कइ ।७
- न लउतन्ह दिलन को प०८ ख
१४२
२८९
( रोहीन्गुस १२३ : मनेर ३४५क )
रफ्तने लोरक दर खानये झुन्नारदार व पुरसीदने बख्ती खांद
( बाह्मणके घर जाकर लोरकका यात्राकी साइत पूछना )
रैन खेलानों भा भिनसारा । पंडितकें १ घर लोर सिधारा ॥१
पैंभरी साइके आपु बनावा २ । पाटा पान बीर कइँ ३ आवा ॥२
पाट पँसारै ४ दीन्हि असीसा । चँदर पातं ५ सूरुज मुख द[ीसा*] ६ ॥
फिरूँ चेत परमां ७ परफासू । पैंपरि पूजे कीन्हि ८ इम पासू ॥४
काइ मया हमफहिं चित घरी । मई अजोर अइस हमरी भरी ॥५
कहु जजमान सो कारन, किंह इहवाँ तुम आयहु १० ।६
चँदर जोत मुख अदबल, किंह लग चित उचायहु ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दस्तान रफ्तने लोरक बरे नक्शूथे पुरसीदन ख श (लोरकका
ज्योतिषीके पास जाकर पूछना) ।
१—रैन गोलि के । २—ते । ३—सांथों पडित जाइ अगवावा । ४—पे ।
५—पैसार पुनि । ६—चँदर भाव सुरज पैंह दीक्षा । ७—काइ फेरु
चित म्वा । ८—सुरप ओ (?) कोन्हा । ९—भाई उजियार फीर के मन्वी ।
१०—किह सग ईहवाँ आयहु ।
२९०
( रोहीन्गुस ५३ मनेर ३४५व )
गुफ्तने झुम्नारदार बख्ती नीक व साभती नूह
( ब्राह्मणका शुभ घड़ी बताना )
सुरुज कड़ा में चाँद पुराउप । सगुन पाँच दै पुरुष चलाउप ॥१
परी माँड के राहि गुनाये । सबही निभिर्य पण्डित पाये ॥२
गोर गुनित तुम तोरफ आनहु । कहउँ बोल सो सच कर मानहु १ ॥३
दिन दस तुम्ह कहँ पाट चलावहुँ । पुन इहँ पन्थ भला निधि पावहुँ ॥४
एक दोइ गाइ मैं कुछ देखेउँ । आग होइ पै नाहीं सेखेउँ ॥५
२४१
आधी रात जो आइँ, तब उठ चालहु बीर ।६
घर उपत तुम्ह उतरहु, पौरि गाँग फर तीर' ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—मुकाम कर्दने लोरक सरे नजूमी व कैफियते बग (लोरकका
जोतिषीके पास रुकना और ज्योतिषीका संकटकी बात कहना)
१—चाँदा । २—माँग । ३—लोक सबै तुम्ह मानहु । ४—फन्द
फड़ावइ । ५—पुरुष फन्द भल सिधि पावइ । ६—एक दोइ काक जैत
मैं बेलउँ । ७—औगुन । ८—देखउँ । ९—जब आवहि । १—बूड़ि
गाँगके तीर ।
टिप्पणी—(६) पाड़—संकट ।
(७) पौरि—तैर कर ।
२९१
( टीकेण्ड्स २१४ : मनेर १४६ अ )
फुस्म आवर्दने लोरक चाँदा रा व बाखुद बुर्दन
( लोरकका चाँदाको नीचे लाकर अपने साथ ले जाना)
रात परी' तो लोरक आवा । मेलि धरह कै आपु जनावा ॥१
बाट जुहत फुनि' चाँदा होती । लेतसि अभरन मानिक मोती ॥२
अँगुरी लाइ लोर तस ताँनसि' । आवत घर चाँद न जानसि' ॥३
प्रथम मेलि अरघ सब देतसि । औ पाछे चाँदा धनि लेतसि' ॥४
चाँद सुरुज कै पाँयन' परीं । सुरुज चाँद लै माथे धरी ॥५
निसि अँधियार मेघ' धन परसे, चाँद सर" लुकाइ । ६
बेगि बेगि कै चाले दोउ, जानउँ जाइ उड़ाइ' ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान आमदने लोरक दर जायगे चाँदा बर लोरक (लोरक
का चाँदके घर आर (चाँदका) लोरकक पास आना)
इस प्रतिमें पंक्ति ३ और ४ क्रमशः ४ और ३ हैं ।
१—भयी । २—बाट गहत तो । ३—तानों । ४—आवत बाद पुरुख
नै जाना । ५—पाछे पुरुख चाँदा घर लेठसि । ६—के पाँवदि । ७—
सुरुज । ८—माँच । —नीर । ९ —सुरुज । ११—बेगि बेगि चलु
चाँद कुमारी गँहि गहा दूर उड़ाइ ।
१०४
२९२
( मनेर १४०अ )
दास्तान आमदने चाँदा अज सर कस ब रस्तन
(चाँदका महलसे निकलकर रवाना होना)
लै लोरक पर पाँवर दिखाबा । देखि चाँद कुछ चितहिं न लावा ॥१
चलहु लोर पुनि हो भिनसारा । लागि गुहार सब लोग हमारा ॥२
यस सुन पावइ बावन पीरू । बिरह दगध पुनि मोर सरीरू ॥३
ओहि देखत कोई बाइ न पारइ । पोलत बोल माँछ (सँइ) मारइ ॥४
अरजुन सँस धनुष कर गइइ । ओहिर्क हाक न मनुसं सहरी ॥५
कहहि लोर सुनहु तुम्ह चाँदा, अहिसै महिं न हराउ ।६
राठ रूपचंद बाँठा मारेउँ, अब बावन पर जाउ ॥७
मूलपाठ-मह ।
टिप्पणी-(२) भिनसारा-प्रात काल सुबह ।
(३) गुहार-पुकार ।
(५) ओहिर्क-उसका ।
(६) अहिसै-इस प्रकार ।
२९३
( मनेर १४०ब : १४१अ )
दास्तान शमशीरे व गिरे लोरक गिरफ्तने मैना
(मैनाका लोरककी तलवार और डाक के लेना)
ओडन छोड़ मैना लै छूटी । सँह निसि बागि बिरह कै यूठी ॥१
दुन्दु मरुखम्महि रोइ संचारा । करहिं मइत धनु उठइ झनकारा ॥२
मैना माँजरि रूप मरारी । इहँ गुन कितहु न देखेउँ नारी ॥३
ओडन छोड़ फन्दु अस धरा । नैन नीर परु काजर सरा ॥४
कठ ऊँच न बोलसि बोलू । औगुन करब राख मोर तोलू ॥५
अति सरूप सयानी, औ कुलबन्ती नारि संजोग ।६
तुम्ह चाँदा मन राता, महिं परा बिजोग ॥७
प्रस्तुत चित्र पूर्णतः रिक्त (खाली/श्वेत) है, इसमें कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है।
२४४
टिप्पणी—(१) झगा—लम्बा ढीला कुरता अँगबरगा ।
(५) उहूँमाँ—वहाँ उस जगह ।
२९५
( रीडेन्ड्स २३ : मनेर १४८ब )
शिनाख्तने कूँवरू लोरक रा दरमियाने राह अज पस्ते च चाँदा
( मार्गमें कुँवरूका लोरक और चाँदाको पहचानना )
कुँवरू आवध¹ चीन्हौं लोरू । धावा संखि चलायहु गोरू² ॥१
पाछें हेरत³ चाँदा भाई । जिउ कुँवरू कर गयउ उड़ाई ॥२
कइसि लोर सों भला न किया । कित ले चलों महर कै धिया ॥३
तिरियहि सरम नाँग भुखि होई । तिन्ह कँ⁴ सप न लागइ कोई ॥४
धूड़ी खोलिन तुम्हरी माई । तिहँकै मया न तुम्हे चित आई ॥५
बारि बियाही मैना माँझरि , लोरक आइ तुम्हार ॥६
पारि बूड़ ररि मरियेंहि, माइ बचन हमार ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—शिनाख्तने कुँवरू लोरक रा (कुँवरूका लोरकको पहचानना)
१—अगुवत । २—रहा सखि परा सब गोरु । ३—हेरन्त । ४—
गुन्द । ५—रूख चढ़े । ६—तेउरे । ७—तिहके मयाँ न चित मूँह
आई । ८—बारि बिदाही मैना ।
९—म—करहि जिन्त तुम्हार ।
टिप्पणी—(१) आवध—आता हुआ । चीन्हौं—पहचाना । संखि—उद्यत होकर !
गोरू—ढोर, गाय भैंस आदि ।
(२) पाछे—पीछे । हेरत—देखते ही ।
(४) तिरियहि—स्त्रियों की । सरम—शर्म । नाँग—अरथ, बोदा ।
(७) ररि—रट रट कर ।
२९६
( रीडेन्ड्स २३१ बम्बई २६ मनेर १४९क )
गुफ्तने बादा कुँवरू रा हिकायते इश्क
( चाँदका कुँवरूसे अपने प्रेमकी बात कहना )
चाँद कहा कुँवरू सुनु बाता । लोर मोर धिउ एकै¹ राता ॥१
जियतेँ जीठ² न छाड़ेउँ³ काछू । दिन अस मये सो सोग पठाऊँ ॥२
२४०
हौं ठँइकै उहँ चिंतँ मोरें । काइ कुँवरू होई रोयें तोरे ॥३
इँह बिधि देखि देसन्तर लीन्हों । काह कहौं'अनउत्तर दीन्हों" ॥४
तुम तज हम जाइहँ परदेसू" । मैं देखुकीन्हि" पुरुख कर भेसू ॥५
हौं सो महर धिय चाँदा", चहूँ भुवन उजियार ।६
कौन अजोग संघ कियउ", कुँवरू भाइ तुम्हार ॥७
पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रतियाँ—
शीर्षक—(बं) जबान दादने चाँद बज कुँवर [य]। (चाँदका कुँवरूको
उत्तर) (म) गुफ्तने चाँद कुँवरू रा जवाब (चाँदका कुँवरूको जवाब)।
दोनों ही प्रतियों में पंक्ति ४ और ५ क्रमशः ५ और ४ है।
१—(ब म) सुनु कँवरू। २—(ब) कह; (म) कहि। ३—
(ब) धिय। ४—(ब, म) छाडतँ। ५—(ब) वोइ दस गवे यह
लोग पठाऊ (म) वोइ दस होन्के बाट पठाऊ। ६—(ब) हीं
ठैंहकैं तह चित्त कसाह (म) ही ठइकैं तह बिय बसि। ७—(ब)
रोये (म) हो कुँवरू रोये। ८—(ब) इह बिध देस देअन्तर लेऊँ;
(म) लेऊँ। ९—(ब) करौं। १०—(ब म) कछ ऊत्तर देउँ।
११—(ब) हम नज (?) जाब परदेसू (म) तुम तज जायब परदेसू।
१२—(ब) कीन्ह। १३—(ब) हौं महरे के धिय सो चाँदा (म)
हौं महरे के धिय चोंदा। १४—(ब) कौन अजोग संग मिक : (म)
तोर साग चित्त बाँध भयउँ।
टिप्पणी—(१) मोर—मेरा। राता—अनुरक्त।
(३) ठँइकै—ठहाका दी। उँह—वह।
(५) जाइहँ—जाऊंगी हूँ।
(७) अजोग—अयोग्य। सघ—सग साथ।
२९७
(रीर्यण्ड्स २३३ । मनेर १४१ख)
जबान दादने कँवरू या पदानत चांदा रा
(कुँवरूका चाँदाकी भर्त्सना करना)
अस चाँदा तुम लाज गँवाई । मरग हथौ सुइँ उतरी' आइ ॥१
(मुख कारी मसि) फिरसि कुँपागीं। पाग पास हाई अँधियारी ॥२
रहु न चाँदे मनहि म्जाइ । अग का न हाइगवन कें जाई ॥३
१४८
बारह मंदिर रैन अँधावसिं¹। सुरुज सेज उजियारी राखसि ॥४
तज सोफ आ रहु तुमाइ । फड़इँ मात तूं खिन न [स*]बाई ॥५
दान सुरुग कर निरमल, लोरक भाइ हमार ।६
तारै नीलञ्ज अमावस, फरि जो लिन्हि अँधियारं॥७
मूलपाठ—(१) मुग कारी मुग निसि ।
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—मलामत कर्दने कँवर चाँदा रा (कँवरका चाँदको मलाना
करना) ।
१—घर उतारि । २—मुगकारी पतराहि तिह बुझारी । ३—पास पास
दिन होइ । ४—रहनि नहिं चाँदा । ५—अस निह होइ गांयर वै बाई ।
६—रैन मूँ बाजसि । ७—अँधियारै राखसि । /—तब जो सोक मईह
रजाइ । —मन होइ तो मरे रजाइं । १ —मूँ ता मनै अस निरुञ्ज,
अमावस वै अँधियार ।
टिप्पणी—(१) इसीं—थी ।
(१) रूप—ऐसा ।
२९८
(रैकीयूस ३३३)
विदान कर्दने लोरक बा कुँवर व पेश्तर रफ्तन
( लोरकका कुँवरको विदा कर आगे बढ़ना )
धरि कँवरू लोरक कँठलावा । नैन नीर भरि गाँग बहावा ॥१
केस छोर कँवरू पाँयन परा । बिरह दगध पाथर धनु ररा ॥२
देखतहिं चाँदा चितहिं सैंखानी । मङ्गु न लोर छोड़ै लोरकानी ॥३
कातिक मास रोतु रितु गाइ । हम पुनि कँवरू खेलत आइ ॥४
ठाढ़े कँवरू सिर दइ हाथा । जान देइ चाँद संघाता ॥५
गाउ खोलिन आ मैनाँ, कहु सँदेस अस जाइ ।६
बहर जान न पावइ माँजरि, रहे खोलिन के पाइ ॥७
टिप्पणी—(१) कँठलावा—गले लगाया ।
(२) पाथर—पाथर । ररा—चिरकाया ।
२४९
(३) संभाषी—शंकित हूँ ।
(५) ढाहे—नष्ट ।
२९९
(रीडिंग्स १३७)
रवान शुदने लोरक व चाँदा बशिताम
(तेज़ी से लोरक और चाँदा जाना)
चले दोउ सुइँ पाडैं न धरहीं। पेग बेग उताबर मरहीं ॥१
चला लोर मिलि चाँदा आई। खोलिन मैना बिसरी माई ॥२
चाँदहि देखि लोरकहि कहा। कैंसैं सो मिलत जो चित अहा ॥३
औ अस कहा मइँ तूँ लोरा। नीके मन चित करिहूँ मोरा ॥४
तोर सनेह छाड़ेउँ घर बारू। कै बोरहु कै लावहु पारू ॥५
साँझ परी दिन अँथवइ, लोरक चाँदा दोइ ।६
औघट घाट गाँग कै, रहे निरिउ तर सोइ ॥७
टिप्पणी—(५) बोरहु—डुबा दो।
(७) तर—नीचे।
३००-३०३
(अनुपलब्ध)
३०४
(रीडिंग्स १३५; मनेर १५३अ)
रसीदने लोरक व चाँदा बरे गंगा व इशारत कर्दने चाँदा मल्लाह रा
(लोरुक और चाँदा का गंगा के किनारे पहुँचना और चाँदा का
मल्लाह को संकेत करना)
गाँग सरिम भभासम करनों¹। सारफ जाइ लेव² एक छरनों ॥१
चाँदा फिर फिर³ आपु दरशारा। मदु गवट मोहि दरसत आपा ॥२
मँरगा टाँउ जो गवट आवा। फर फगन भाँदि झनकाया³ ॥३
गरर दरउ अगम्भे रहा। तिरिया एक अस्तरै⁴ अहा ॥४
२५
कहै नाउ बैठु' देखउँ आइ । फटन तिरी यह ईंहवाँ आई ॥५
सँरगा बेग पलावसि, खिन खिन फिरैहि सँकाइ'' ।६
काइ कहें कस पूँछँ', कइसे ईंहाँ आइ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान नमूने चाँदा दस्ताने मल्लाह रा (मल्लाहको चाँदाका
हाय दिगराना)
१—गग खरित औरय करना । २—सोरफ गैन्द आइ । ३—फिर
फिर चाँदा । ४—सोइ बेगी महु केवट आवर । ५—सँरगा तौर
ओ केवट आवा । ६—चमैकावा । ७—केवट बैठ अचम्मो पा ।
८—अकेली । ९—से । १०—कौन नार कहँवा हुत आइ । ११—
सकार । १२—काइ कहीं केउँ पूँछउँ ।
३०५
( रीकेन्हम २३४ : मनेर १५२८ )
आशिक शुदने मल्लाह बज दीदने जमाले सूरते चाँदा
( चाँदाका सौन्दर्य देखकर मल्लाहका मुग्ध होना )
खेवट' देख बिमोहा रूप । अमरन बहुत' सुनारि सरूप ॥१
दई विधाता' पूजई आसा । जस सिरिया ओ आवइ पासा ॥२
खेवट कहा उतर दिस जाइ । बैसि सरगा नाउ रुधाइ ॥३
चाँदा नारि उतावर चली । खेवट कहा रात है भली ॥४
गई फोंद यहँ सोरफ रहा। खेवट सँरगा बैस एक अहा ॥५
गुन बाँधी यह खेवट, सँरगा फेरी आइ ।६
लेके पार उतारों सो धनि, नौलहि लोगहिं आइ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रतिमें इस कड़वककी केवल आरम्भिक तीन पंक्तियाँ हैं। शेष
पंक्तियाँ कड़वक ३०७ की हैं।
शीर्षक—दास्तान मुफ़तार शुदने केवट बज दीदने ऊ (उसे देख कर
मल्लाहका प्रेमासक्त होना)
१—केवट । २—बहुत । ३—तुम्हार । ४—कहा नाउ परबैतैं ब्यहु ।
५—लेंबर ।
९५१
टिप्पणी—(१) सँरगा—नाव ।
(७) ओऊहि—जब तक ।
३०६
( रीडेण्ड्स २१७प )
सबारी खुदने लोरक व चाँदा बर कश्ती
( लोरक व चाँदा नावमें बैठना )
माँझ गाँग हुत खेवट कहा । कउन नारि घर कइवाँ अहा ॥१
रैन कहाँ तुम्ह कीन्हि बसेरा । नदि नियर न देखेउँ गाँउ न खेरा ॥२
परहुँस मया चलेउँ रिसाई । भर एक रात गाँग हँ आई ॥३
मूँ महरी के जाति अकेली । साथ न कोऊ सखी सहेली ॥४
काह न कोउ मनावन आवा । जिंह घर आइ सो आठ न पावा ॥५
सास ननद मोर माखउँ, दीख न कुँबइँ पतार । ६
पिया सन मोर साइ बिरोधा, यहिं छाड़ेउँ घर पार ॥७
३०७
( रीडेन्ट्स २३४; मनेर १५२व )
गुजार खुदने लोरक व चाँदा अज आबे गाँग
( लोरक-चाँदाका गंगा पार करना )
चाँदहि खवट सों अस कहा । अभरन मोर बहि पारहिं अहा ॥१
मवर मँरगा साँध लै आवा । घालंतहिं लोरक माथ उचाया ॥२
दीन्हि तराइ खेवट बहे । दाइ जन चले न तीमर अहा ॥३
सार चाँद दाइ मँरगा चढ़े । एक फाठ के दोउ गढ़े' ॥४
गवर ठाइ अरवारहिं रहा' । फरिया लार आपु कइ गहा ॥५
अगों चाँद मयानी, पाछ लोरक पीर । ६
दपी मंयाग गाँग हर आयि, पूइत पारा तीर ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रतिमें केवल अन्तिम चार पंक्तियाँ हैं । इनके साथ आरम्भकी तीन
पंक्तियाँ कड़कक ३०७ की हैं।