भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
कोशिश करता है और यथार्थवादी हो जाता है, उसे धार्मिक विश्वास को एक तरफ़
रखकर, जिन-जिन मुसीबतों और दुखों में परिस्थितियों ने उसे डाल दिया है, उनका
एक मर्द की तरह बहादुरी के साथ सामना करना होगा।”
ईश्वर, धार्मिक विश्वास और धर्म को यह तिलांजलि भगतसिंह के लिए न तो
आकस्मिक थी और न ही उनके अभिमान या अहं का परिणाम थी। उन्होंने बहुत
पहले 1926 में ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार कर दिया था। उन्हीं के शब्दों में,
“1926 के अन्त तक मुझे इस बात पर यक़ीन हो गया था कि सृष्टि का निर्माण,
व्यवस्थापन और नियन्त्रण करने वाली किसी सर्वशक्तिमान परम सत्ता के अस्तित्व
का सिद्धान्त एकदम निराधार है।”
भावना कभी नहीं मरती
वह जुलाई, 1930 का अन्तिम रविवार था। भगतसिंह लाहौर सेण्ट्रल जेल से हमें
मिलने के लिए बोर्स्टल जेल आये थे। वे इस तर्क पर सरकार से यह सुविधा
हासिल करने में क़ामयाब हो गये थे कि उन्हें दूसरे अभियुक्तों के साथ बचाव के
तरीक़ों पर बातचीत करनी है। तो उस दिन हम किसी राजनीतिक विषय पर बहस
कर रहे थे कि बातों का रुख़ फ़ैसले की तरफ़ मुड़ गया, जिसका हम सबको
बेसब्री से इन्तज़ार था। मज़ाक़-मज़ाक़ में हम एक-दूसरे के ख़िलाफ़ फ़ैसले सुनाने
लगे, सिर्फ़ राजगुरु और भगतसिंह को इन फ़ैसलों से बरी रखा गया। हम जानते थे
कि उन्हें फाँसी पर लटकाया जायेगा।
“और राजगुरु और मेरा फ़ैसला? क्या आप लोग हमें बरी कर रहे हैं?”
मुस्कुराते हुए भगतसिंह ने पूछा।
किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
“असलियत को स्वीकार करते डर लगता है?” धीमे स्वर में उन्होंने पूछा।
चुप्पी छाई रही।
हमारी चुप्पी पर उन्होंने ठहाका लगाया और बोले, “हमें गर्दन से फाँसी के
फन्दे से तब तक लटकाया जाये जब तक कि हम मर न जायें। यह है असलियत।
मैं इसे जानता हूँ। तुम भी जानते हो। फिर इसकी तरफ़ से आँखें क्यों बन्द करते
हो?”
अब तक भगतसिंह अपने रंग में आ चुके थे। वे बहुत धीमे स्वर में बोल रहे
थे। यही उनका तरीक़ा था। सुनने वालों को लगता था कि वे उन्हें फुसलाने की
कोशिश कर रहे हैं। चिल्लाकर बोलना उनकी आदत नहीं थी। यही शायद उनकी
शक्ति भी थी।
वे अपने स्वाभाविक अन्दाज़ में बोलते रहे, “देशभक्ति के लिए यह सर्वोच्च
पुरस्कार है, और मुझे गर्व है कि मैं यह पुरस्कार पाने जा रहा हूँ। वे सोचते हैं कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 65
मेरे पार्थिव शरीर को नष्ट करके वे इस देश में सुरक्षित रह जायेंगे। यह उनकी भूल
है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को
कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी भावनाओं को नहीं कुचल सकेंगे। ब्रिटिश हुकूमत के
सिर पर मेरे विचार उस समय तक एक अभिशाप की तरह मँडराते रहेंगे जब तक
वे यहाँ से भागने के लिए मजबूर न हो जायें।”
भगतसिंह पूरे आवेश में बोल रहे थे। कुछ समय के लिए हम लोग भूल गये
कि जो आदमी हमारे सामने बैठा है वह हमारा सहयोगी है। वे बोलते जा रहे थे
: “लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ़ एक पहलू है। दूसरा पहलू भी उतना ही उज्ज्वल
है। ब्रिटिश हुकूमत के लिए मरा हुआ भगतसिंह जीवित भगतसिंह से ज़्यादा
ख़तरनाक होगा। मुझे फाँसी हो जाने के बाद मेरे क्रान्तिकारी विचारों की सुगन्ध
हमारे इस मनोहर देश के वातावरण में व्याप्त हो जायेगी। वह नौजवानों को मदहोश
करेगी और वे आज़ादी और क्रान्ति के लिए पागल हो उठेंगे। नौजवानों का यह
पागलपन ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को विनाश के कगार पर पहुँचा देगा। यह मेरा
दृढ़ विश्वास है। मैं बेसब्री के साथ उस दिन का इन्तज़ार कर रहा हूँ जब मुझे देश
के लिए मेरी सेवाओं और जनता के लिए मेरे प्रेम का सर्वोच्च पुरस्कार मिलेगा।”
भगतसिंह की भविष्यवाणी एक साल के अन्दर ही सच साबित हुई। उनका
नाम मौत को चुनौती देने वाले साहस, बलिदान, देशभक्ति और संकल्पशीलता का
प्रतीक बन गया। समाजवादी समाज की स्थापना का उनका सपना शिक्षित युवकों
का सपना बन गया और ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ का उनका नारा समूचे राष्ट्र का
युद्धनाद हो गया। 1930-32 में जनता एक होकर उठ खड़ी हुई। कारागार, कोड़े
और लाठियों के प्रहार उसके मनोबल को तोड़ नहीं सके। यही भावना, इससे भी
ऊँचे स्तर पर, ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के दौरान दिखायी दी थी। भगतसिंह का
नाम होंठों पर और उनका नारा अपने झण्डों पर लिये हुए किशोरों और बच्चों ने
गोलियों का सामना इस तरह किया मानो वे मक्खन की बनी हुई हों। पूरा राष्ट्र
पागल हो उठा था। और फिर आया 1945-46 का दौर जब विश्व ने एक सर्वथा
नये भारत को करवटें बदलते देखा। मज़दूर, किसान, छात्र, नवयुवक, नौसेना,
थलसेना, वायुसेना और पुलिस तक – सब कड़ा प्रहार करने के लिए आतुर थे।
निष्क्रिय प्रतिरोध की जगह सक्रिय जवाबी हमले ने ले ली। बलिदान और यातनाओं
को सहन करने की जो भावना 1930-31 तक थोड़े से नौजवानों तक सीमित थी,
अब समूची जनता में दिखायी दे रही थी। विद्रोह की भावना ने पूरे राष्ट्र को अपनी
गिरफ़्त में जकड़ लिया था। भगतसिंह ने ठीक ही तो कहा था, “भावना कभी नहीं
मरती।” और उस समय भी वह मरी नहीं थी।
66 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सन्दर्भ
- Quoted in the Sedition Committee (Rowlatt) Report 1919, p. 3
- वही, पृष्ठ 2
- वही, पृष्ठ 2
- मन्मथनाथ गुप्त : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास, दूसरा संस्करण, 1960,
पृष्ठ 44 - तारिणी शंकर चक्रवर्ती : भारत में सशस्त्र क्रान्ति की भूमिका, क्रान्तिकारी प्रकाशन,
मिर्ज़ापुर, पृष्ठ 142 - Budhadeva Bhattacharya (ed.), Freedom Struggle µ Anushilan Samiti, p. 48
- वही, पृष्ठ 68
- J. C. Car: Political Troubles in India 1907-1917, Preface, 1973, p. XIII
- Quoted in Sedition Committee Report, p. 7
- तारिणी शंकर चक्रवर्ती : पृष्ठ 93
- G. Adhikari: Challenge, PPH, New Delhi, Jan. 1984, p. 3
- Tridib Chaudhary: Freedom Struggle and Anushilan Samiti, Introduction, p.
XVI-XVII - अमेरिका के भारतीय क्रान्तिकारियों की गतिविधियों के बारे में अधिकतर सामग्री
एल.पी. माथुर की पुस्तक Indian Revolutionary Movement in United States
of America से ली है। यह पुस्तक एस. चाँद एण्ड क., नयी दिल्ली से 1970 में
प्रकाशित हुई थी। - Paraphrased from Ghadar Weekly, Vol. 1, No. 3 (Dec. 30, 1913) by Sohan
Singh Josh, Hindustan Ghadar Party, A Short History, p. 160 - वही, पृष्ठ 189
- वही, पृष्ठ 175
- वही, पृष्ठ 192
- वही, पृष्ठ 177
- वही, पृष्ठ 193
- वही, पृष्ठ 193
- L.P. Mathur, op. Cit., p. 23
- वही, पृष्ठ 29
- Presidential Address to Special (Calcutta) Session of the Indian National
Congress, September 1920. Quoted by R.P. Dutt; India Today, p. 280 - वही, पृष्ठ 284
- देखिये परिशिष्ट न. 1
- शचीन्द्रनाथ सान्याल की पुस्तक बन्दी जीवन से विश्वमित्र उपाध्याय द्वारा शचीन्द्रनाथ
सान्याल और उनका युग में उद्धृत, पृष्ठ 195 - वही, पृष्ठ 156
- S.N. Mazumdar: In Search of a Revolutionary Theory and a Revolutionary
Program. p. 178 - वही, पृष्ठ 177
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 67
- वही, पृष्ठ 178
- वही, पृष्ठ 154
- वही, पृष्ठ 181-2
- वही, पृष्ठ 183
- Jawaharlal Nehru: An Autobiography, John Lane, The Bodley Head, London,
1936, p. 164-5 - Quoted by Pratima Ghosh, Meerut Conspiracy Case µ the Left-Wing in India,
p. 47 - वही, पृष्ठ 53
- यह बिल सदन में बहस के लिए 21 मार्च को पेश किया गया। लेकिन अध्यक्ष ने उसे
2 अप्रैल, 1929 तक के लिए स्थगित कर दिया। 2 अप्रैल को उन्होंने निर्णय दिया कि
चूँकि बिल का आधार और मेरठ षड्यन्त्र केस में अभियुक्तों के ख़िलाफ़ लगाये गये
अभियोग एक जैसे हैं, इस स्थिति में बिल पर जो बहस होगी उससे अभियुक्तों के बचाव
पर असर पड़ेगा। इन कारणों से उन्होंने बिल पर बहस की अनुमति नहीं दी। 4 अप्रैल
को भारत सरकार ने उसे फिर सदन के सामने पेश किया और बहस की अनुमति माँगी।
11 अप्रैल को अध्यक्ष ने सरकार की अपील ठुकरा दी और अपना निर्णय बरक़रार रखा।
13 अप्रैल को वायसराय ने उसे अध्यादेश के रूप में लागू कर दिया। - Quoted by G. Adhikari in an article in Mainstream, April 29, 1981
- G. Adhikari (ed.): Documents of the History of the Communist Party of India,
Vol. II, p. 443 - वही, पृष्ठ 442
- वही, पृष्ठ 473
- S.N. Mazumdar, op. Cit. p. 176
- G. S. Deol, Sardar Bhagat Singh
- वही, पृष्ठ 113
- Bipan Chandra, Introduction to 'Why I am an Atheist?', Sardar Bhagat Singh
Research Committee, New Delhi. 1979 - वही
68 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
खण्ड एक
दस्तावेज़ और पत्र
(विषयानुसार, कालक्रमानुसार)
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I.
यह जीवन देश को समर्पित :
भगतसिंह के छह शुरुआती पत्र
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दादा जी के नाम एक पत्र
शहीद भगतसिंह का जन्म 28 सितम्बर, 1907 को हुआ। उस समय उनके चाचा
अजीत सिंह को लाला लाजपतराय के साथ किसान-आन्दोलन का प्रतिनिधित्व करने
पर अंग्रेज़ सरकार ने माण्डले (बर्मा) में निर्वासित कर रखा था। जनता के रोष के
आगे झुकते हुए नवम्बर, 1907 में उन्हें रिहा किया गया। पिता किशन सिंह को अंग्रेज़
सरकार ने नेपाल से पकड़ा था और छोड़ दिया था। सबसे छोटे चाचा स्वर्ण सिंह
पर कई मुक़दमे बनाये गये थे, और वे जमानत पर रिहा हुए थे। इसीलिए दादी ने
भगतसिंह को ‘भागाँवाला’ (भाग्यशाली) मान लिया था।
बाबा अर्जुन सिंह ने अपने पोते का पालन-पोषण अपनी देखरेख में किया। वे
शुरू से ही उसके भीतर सामाजिक चेतना और तर्क-शक्ति के विकास के लिए
प्रयत्नशील थे, और उसे सामाजिक बराबरी और प्रगति के विचारों से परिचित करा
रहे थे। भगतसिंह की पहले चार साल की पढ़ाई अपने गाँव बंगा चक्क न. 105 गुगैरा
ब्रांच (अब लायलपुर, पाकिस्तान) में हुई और आगे पढ़ने के लिए वे पिताजी के पास
लाहौर आ गये। यह भगतसिंह का पहला ख़त है, जब वे छठी कक्षा में पढ़ रहे थे।
उनका यह पत्र दादा अर्जुन सिंह को सम्बोधित है, जो उन दिनों गाँव खटकड़ कलाँ
आये हुए थे। पत्र उर्दू में है। – स.
लाहौर, 22 जुलाई, 1918
पूज्य बाबाजी,
नमस्ते।
अर्ज़ यह है कि आपका ख़त मिला। पढ़कर दिल खुश हुआ। इम्तिहान की बाबत
यह है कि मैंने पहले इस वास्ते नहीं लिखा था क्योंकि हमें बताया नहीं गया था। अब
हमें अंग्रेज़ी और संस्कृत का नतीजा बताया गया है। उनमें मैं पास हूँ। संस्कृत में मेरे
150 नम्बरों में 110 नम्बर हैं। अंग्रेज़ी में 150 में से 68 नम्बर हैं। जो 150 में से 50
नम्बर ले जाये वह पास होता है। 68 नम्बरों को लेकर मैं अच्छी तरह पास हो गया
हूँ। किसी क़िस्म की चिन्ता न करना। बाक़ी नहीं बताया गया। छुट्टियाँ, 8 अगस्त
को पहली छुट्टी होगी। आप कब आयेंगे, लिखना।
आपका ताबेदार
भगतसिंह
यह जीवन देश को समर्पित : भगतसिंह के छह शुरुआती पत्र / 73
दादा जी के नाम एक और पत्र
लाहौर, 27 जुलाई, 1919
श्रीमान पूज्य दादा जी, नमस्ते!
अर्ज़ है कि ख़ैरियत है और आपकी ख़ैरियत श्रीनारायण जी से नेक मनाया
करता हूँ। अहवाल ये है कि हमारा छमाही इम्तिहान हो गये, जो जुलाई से शुरू हुए
थे। हिसाब के परचे में बहुत लड़के फेल हो गये थे, इसलिए हमारा हिसाब का
इम्तिहान नौ अगस्त को दोबारा होगा। और सब तरह से ख़ैरियत है। आपने कब आना
है। भाइया जी को यह बताइये कि मैं छमाही इम्तिहान में सारे मजमूनों में पास हो
गया हूँ। माताजी, चाचीजी को नमस्ते। कुलतार सिंह को 24 जुलाई की रात और
25 जुलाई की शाम को बुखार था। अभी उसे आराम है, किसी क़िस्म की फ़िक़्र
न करें।
आपका ताबेदार...
भगतसिंह
भगतसिंह ने 12 साल की उम्र में दादा अर्जुन सिंह के नाम उर्दू में यह पत्र लिखा
था। — स.
74 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
दादा जी के नाम एक और पत्र
लाहौर, 14 नवम्बर, 1921
मेरे पूज्य दादा साहब जी,
नमस्ते।
अर्ज़ यह है कि इस जगह ख़ैरियत है और आपकी ख़ैरियत श्री परमात्मा जी
से नेक मतलूब हूँ। अहवाल ये है कि मुद्दत से आपका कृपा-पत्र नहीं मिला। क्या
सबब है? कुलबीर सिंह, कुलतार सिंह की ख़ैरियत से जल्दी मुत्तला फ़रमायें। बेबे
साहबा अभी मोराँवाली से वापस नहीं आयीं। बाक़ी सब ख़ैरियत है।
(कार्ड की दूसरी तरफ़)
माता जी को नमस्ते। चाची साहबा को नमस्ते। मंगू चमार अभी तक तो नहीं
आया। मैंने एक पुरानी किताब मोल ली थी, जोकि बहुत सस्ती मिल गयी थी।
(कार्ड की लाइनों के बीच उल्टे रुख़)
आजकल रेलवे वाले हड़ताल की तैयारी कर रहे हैं। उम्मीद है कि अगले हफ़्ते
के बाद जल्द शुरू हो जायेगी।
आपका ताबेदार
भगतसिंह
इस पत्र से पता चलता है कि उस समय चल रहे असहयोग आन्दोलन के प्रभाव
से भगतसिंह अनजाने नहीं थे। वे दादा को बताये बिना न रह सके कि जल्दी आरम्भ
होने वाली रेल-हड़ताल की उन्हें ख़बर है। – स.
यह जीवन देश को समर्पित : भगतसिंह के छह शुरुआती पत्र / 75
गुरुमुखी में लिखा पहला पत्र : चाची के नाम
13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग़ में अंग्रेज़ों ने बर्बर क़त्लेआम किया।
12 वर्षीय भगतसिंह दूसरे दिन वहाँ गये और रक्त-सनी मिट्टी लेकर घर लौटे, तो
कई सवाल उनके मन में थे। अपनी छोटी बहिन बीबी अमरकौर से उन्होंने अपने मन
की बातें कीं।
21 फ़रवरी, 1921 को महन्त नारायणदास ने ननकाना साहिब में 140 सिखों
को बड़ी बेरहमी से मार डाला। बहुतों को ज़िन्दा ही जला दिया। लाहौर से अपने
गाँव बंगा जाते समय भगतसिंह ने वह स्थान देखा और 5 मार्च को हुई बड़ी कॉन्फ़्रेंस
भी देखी। वे ननकाना साहिब से इस घटना सम्बन्धी एक कैलेण्डर भी लेते गये थे।
इस घटना से पूरे पंजाब के गाँवों में अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़, जिसने महन्त की
मदद की थी, एक ज़ोरदार आन्दोलन उठा। हर गाँव में काली पगड़ियाँ बाँधने और
पंजाबी पढ़ने का रिवाज़ चल पड़ा। भगतसिंह भी इसके प्रभाव में आये। भाई-बहिन
– बीबी अमरकौर और भगतसिंह – ने पंजाबी पढ़नी व लिखनी सीखी। यह पत्र
उसी समय का है, जो 1910 में जेल-यातनाओं से शहीद हुए चाचा स्वर्ण सिंह की
पत्नी चाची हुकमकौर को लिखा गया था। हिज्जे जैसे के तैसे दिये जा रहे हैं। गुरुमुखी
लिपि में लिखा भगतसिंह का यह पहला पत्र है। बाद में पंजाबी में भगतसिंह ने
बहुत-से लेख भी लिखे। – स.
15 नवम्बर, 1921
मेरी परम प्यारी चाची जी,
नमस्ते।
मुझे ख़त लिघ लिघने (लिखने) में देरी हो गयी है। सो उम्मीद है कि आप
माफ़ करोगे। भाइया जी (पिता किशन सिंह) दिल्ली गये हुए हैं। भेभे (बेबे –
माँ) मोराँवाली को गयी हुई हैं। बाक़ी सब राजी-खुशी है। बड़ी चाची जी को मत्था
टेकना। माता जी को मत्था टेकना, कुलबीर, कुलतार सिंह को सति श्री अकाल
या नमस्ते।
आपका आज्ञाकारी
भगतसिंह
76 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
चाची के नाम एक और पत्र
लाहौर, 24 अक्टूबर, 1921
मेरी प्रिय चाची जी,
नमस्ते!
मैं जलसा देखने के लिए लायलपुर गया था। मुझे गाँव आना था, लेकिन बापूजी
ने मना कर दिया था, इसलिए मैं गाँव नहीं आया। मुझे माफ़ करना यदि कोई भूल
हो गयी हो, चाचा जी (स्वर्ण सिंह) का चित्र बन गया है, मुझे साथ ही लाना था,
लेकिन तब तक वह पूरा नहीं हुआ था, इसलिए माफ़ करना। जवाब जल्दी दे देना।
बड़ी चाची जी को माथा टेकना, माता जी को भी माथा टेकना। कुलबीर और
कुलतार (छोटे भाई) को नमस्ते।
आपका पुत्र
भगतसिंह
भगतसिंह ने क़रीब 14 साल की उम्र में अपनी छोटी चाची (चाचा स्वर्ण सिंह
की विधवा हुकम कौर) को लिखा था। पंजाबी भाषा व गुरमुखी लिपि में लिखा यह
पत्र चक न. 105, ज़िला लायलपुर के पते पर भेजा गया था। पता उर्दू में लिखा है
पर ज़िला लायलपुर अंग्रेज़ी अक्षरों में है। – स.
यह जीवन देश को समर्पित : भगतसिंह के छह शुरुआती पत्र / 77
घर को अलविदा : पिता जी के नाम पत्र
1923 में भगतसिंह, नेशनल कॉलेज, लाहौर के विद्यार्थी थे। जन-जागरण के
लिए ड्रामा-क्लब में भी भाग लेते थे। क्रान्तिकारी अध्यापकों और साथियों से नाता
जुड़ गया था। भारत को आज़ादी कैसे मिले, इस बारे में लम्बा-चौड़ा अध्ययन और
बहसें जारी थीं।
घर में दादी जी ने अपने पोते की शादी की बात चलायी। उनके सामने अपना
तर्क न चलते देख भगतसिंह ने पिता जी के नाम यह पत्र लिखा और कानपुर में
गणेशशंकर विद्यार्थी के पास पहुँचकर 'प्रताप' में काम शुरू कर दिया। वहीं
बी.के. दत्त, शिव वर्मा, विजयकुमार सिन्हा जैसे क्रान्तिकारी साथियों से मुलाक़ात हुई।
उनका कानपुर पहुँचना क्रान्ति के रास्ते पर एक बड़ा क़दम बना। – स.
पूज्य पिता जी,
नमस्ते।
मेरी ज़िन्दगी मक़सदे-आला¹ यानी आज़ादी-ए-हिन्द के असूल² के लिए
वक्फ़³ हो चुकी है। इसलिए मेरी ज़िन्दगी में आराम और दुनियावी ख़ाहशात⁴ बायसे
कशिश⁵ नहीं हैं।
आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था, तो बापू जी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक़्त
एलान किया था कि मुझे ख़िदमते-वतन⁶ के लिए वक्फ़ दिया गया है। लिहाज़ा
मैं उस वक़्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूँ।
उम्मीद है आप मुझे माफ़ फ़रमायेंगे।
आपका ताबेदार
भगतसिंह
- उच्च उद्देश्य 2. सिद्धान्त 3. दान 4. सांसारिक इच्छाएँ 5. आकर्षक 6. देश-सेवा
78 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
II.
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव
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पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या
1924 के दौरान पंजाब में भाषा-विवाद चल रहा था। पंजाबी भाषा की लिपि
के प्रश्न पर उर्दू और हिन्दी के पक्षधरों में बहस जारी थी। भगतसिंह भी इस बहस
पर अपने विचार बनाने लगे थे। पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या पर यह लेख
उन्होंने पंजाब हिन्दी साहित्य सम्मेलन के आमन्त्रण पर लिखा था और अव्वल मानकर
सम्मेलन ने इस पर 50/- का ईनाम भी दिया था।
यह लेख सम्मेलन के प्रधानमन्त्री श्री भीमसेन विद्यालंकार ने सुरक्षित रखा और
भगतसिंह के बलिदान के बाद 28 फ़रवरी, 1933 के 'हिन्दी सन्देश' में प्रकाशित
किया। - स.
“किसी समाज अथवा देश को पहचानने के लिए उस समाज अथवा देश के
साहित्य से परिचित होने की परमावश्यकता होती है, क्योंकि समाज के प्राणों की
चेतना उस समाज के साहित्य में भी प्रतिच्छवित हुआ करती है।”
उपरोक्त कथन की सत्यता का इतिहास साक्षी है। जिस देश के साहित्य का
प्रवाह जिस ओर बहा, ठीक उसी ओर वह देश भी अग्रसर होता रहा। किसी भी
जाति के उत्थान के लिए ऊँचे साहित्य की आवश्यकता हुआ करती है। ज्यों-ज्यों
देश का साहित्य ऊँचा होता जाता है, त्यों-त्यों देश भी उन्नति करता जाता है।
देशभक्त, चाहे वे निरे समाज-सुधारक हों अथवा राजनीतिक नेता, सबसे अधिक
ध्यान देश के साहित्य की ओर दिया करते हैं। यदि वे सामाजिक समस्याओं तथा
परिस्थितियों के अनुसार नवीन साहित्य की सृष्टि न करें तो उनके सब प्रयत्न
निष्फल हो जायें और उनके कार्य स्थायी न हो पायें।
शायद गैरीबाल्डी को इतनी जल्दी सेनाएँ न मिल पातीं, यदि मेजिनी ने 30
वर्ष देश में साहित्य तथा साहित्यिक जागृति पैदा करने में ही न लगा दिये होते।
आयरलैण्ड के पुनरुत्थान के साथ गैलिक भाषा के पुनरुत्थान का प्रयत्न भी उसी
वेग से किया गया। शासक लोग आयरिश लोगों को दबाये रखने के लिए उनकी
भाषा का दमन करना इतना आवश्यक समझते थे कि गैलिक भाषा की एक-आध
कविता रखने के कारण छोटे-छोटे बच्चों तक को दण्डित किया जाता था। रूसो,
वाल्टेयर के साहित्य के बिना फ्रांस की राज्यक्रान्ति घटित न हो पाती। यदि
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 81
टालस्टाय, कार्ल मार्क्स तथा मैक्सिम गोर्की इत्यादि ने नवीन साहित्य पैदा करने में
वर्षों व्यतीत न कर दिये होते, तो रूस की क्रान्ति न हो पाती, साम्यवाद का प्रचार
तथा व्यवहार तो दूर रहा।
यही दशा हम सामाजिक तथा धार्मिक सुधारकों में देख पाते हैं। कबीर के
साहित्य के कारण उनके भावों का स्थायी प्रभाव दीख पड़ता है। आज तक उनकी
मधुर तथा सरस कविताओं को सुनकर लोग मुग्ध हो जाते हैं।
ठीक यही बात गुरु नानकदेव जी के विषय में भी कही जा सकती है। सिक्ख
गुरुओं ने अपने मत के प्रचार के साथ जब नवीन सम्प्रदाय स्थापित करना शुरू
किया, उस समय उन्होंने नवीन साहित्य की आवश्यकता भी अनुभव की और इसी
विचार से गुरु अंगददेव जी ने गुरुमुखी लिपि बनायी। शताब्दियों तक निरन्तर युद्ध
और मुसलमानों के आक्रमणों के कारण पंजाब में साहित्य की कमी हो गयी थी।
हिन्दी भाषा का भी लोप-सा हो गया था। इस समय किसी भारतीय लिपि को ही
अपनाने के लिए उन्होंने कश्मीरी लिपि को अपना लिया। तत्पश्चात गुरु अर्जुनदेव
जी तथा भाई गुरुदास जी के प्रयत्न से आदिग्रन्थ का संकलन हुआ। अपनी लिपि
तथा अपना साहित्य बनाकर अपने मत को स्थायी रूप देने में उन्होंने यह बहुत
प्रभावशाली तथा उपयोगी क़दम उठाया था।
उसके बाद ज्यों-ज्यों परिस्थिति बदलती गयी, त्यों-त्यों साहित्य का प्रवाह भी
बदलता गया। गुरुओं के निरन्तर बलिदानों तथा कष्ट-सहन से परिस्थिति बदलती
गयी। जहाँ हम प्रथम गुरु के उपदेश में भक्ति तथा आत्मविस्मृति के भाव सुनते
हैं और निम्नलिखित पद में कमाल आजिज़ी का भाव पाते हैं :
नानक नन्हे हो रहे, जैसी नन्हीं दूब।
और घास जरि जात है, दूब खूब की ख़ूब।।
वहीं पर हम नवें गुरु श्री तेगबहादुर जी के उपदेश में पददलित लोगों की
हमदर्दी तथा उनकी सहायता के भाव पाते हैं :
बाँह जिन्हाँ दी पकड़िये, सिर दीजिये बाँहि न छोड़िये।
गुरु तेगबहादुर बोलया, धरती पै धर्म न छोड़िये।।
उनके बलिदान के बाद हम एकाएक गुरु गोविन्द सिंह जी के उपदेश में क्षात्र
धर्म का भाव पाते हैं। जब उन्होंने देखा कि अब केवल भक्ति-भाव से ही काम
न चलेगा, तो उन्होंने चण्डी की पूजा भी प्रारम्भ की और भक्ति तथा क्षात्र धर्म का
समावेश कर सिक्ख समुदाय को भक्तों तथा योद्धाओं का समूह बना दिया। उनकी
कविता (साहित्य) में हम नवीन भाव देखते हैं।
वे लिखते हैं :
जे तोहि प्रेम खेलण का चाव, सिर धर तली गली मोरी आव।
जे इत मारग पैर धरीजै, सिर दीजै कांण न कीजै।।
82 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
और फिर -
सूरा सो पहिचानिये, जो लड़ै दीन के हेत।
पुर्ज़ा-पुर्ज़ा कट मरै, कभूँ न छाँडै खेत॥
और फिर एकाएक खड्ग की पूजा प्रारम्भ हो जाती है।
खग खण्ड विहण्ड, खल दल खण्ड अति रन मण्ड प्रखण्ड।
भुज दण्ड अखण्ड, तेज प्रचण्ड जोति अभण्ड भानुप्रभं।।
उन्हीं भावों को लेकर बाबा बन्दा आदि मुसलमानों के विरुद्ध निरन्तर युद्ध
करते रहे, परन्तु उसके बाद हम देखते हैं कि जब सिक्ख सम्प्रदाय केवल अराजकों
का एक समूह रह जाता है और जब वे गैर-क़ानूनी (Outlaw) घोषित कर दिये जाते
हैं, तब उन्हें निरन्तर जंगलों में ही रहना पड़ता है। अब इस समय नवीन साहित्य
की सृष्टि नहीं हो सकी। उनमें नवीन भाव नहीं भरे जा सके। उनमें क्षात्र-वृत्ति थी,
वीरत्व तथा बलिदान का भाव था और मुसलमान शासकों के विरुद्ध युद्ध करते रहने
का भाव था, परन्तु उसके बाद क्या करना होगा, यह वे भली-भाँति नहीं समझे।
तभी तो उन वीर योद्धाओं के समूह (मिसलें) आपस में भिड़ गये। यहीं पर
सामयिक भावों की त्रुटि बुरी तरह अखरती है। यदि बाद में रणजीत सिंह जैसा वीर
योद्धा और चालाक शासक न निकल आता, तो सिक्खों को एकत्रित करने के लिए
कोई उच्च आदर्श अथवा भाव शेष न रह गया था।
इन सबके साथ एक बात और भी ख़ास ध्यान देने योग्य है। संस्कृत का सारा
साहित्य हिन्दू समाज को पुनर्जीवित न कर सका, इसीलिए सामयिक भाषा में नवीन
साहित्य की सृष्टि की गयी। उस सामयिक भाव के साहित्य ने अपना जो प्रभाव
दिखाया वही हम आज तक अनुभव करते हैं। एक अच्छे समझदार व्यक्ति के लिए
क्लिष्ट संस्कृत के मन्त्र तथा पुरानी अरबी की आयतें इतनी प्रभावकारी नहीं हो
सकतीं जितनी कि उसकी अपनी साधारण भाषा की साधारण बातें।
ऊपर पंजाबी भाषा तथा साहित्य के विकास का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया
है। अब हम वर्तमान अवस्था पर आते हैं। लगभग एक ही समय पर बंगाल में स्वामी
विवेकानन्द तथा पंजाब में स्वामी रामतीर्थ पैदा हुए, दोनों एक ही ढर्रे के महापुरुष
थे। दोनों विदेशों में भारतीय तत्त्वज्ञान की धाक जमाकर स्वयं भी जगत-प्रसिद्ध हो
गये, परन्तु स्वामी विवेकानन्द का मिशन बंगाल में एक स्थायी संस्था बन गया,
पर पंजाब में स्वामी रामतीर्थ का स्मारक तक नहीं दीख पड़ता। उन दोनों के विचारों
में भारी अन्तर रहने पर भी तह में हम एक गहरी समता देखते हैं। जहाँ स्वामी
विवेकानन्द कर्मयोग का प्रचार कर रहे थे, वहाँ स्वामी रामतीर्थ भी मस्तानावार गाया
करते थे :
हम रूखे टुकड़े खायेंगे, भारत पर वारे जायेंगे।
हम सूखे चने चबायेंगे, भारत की बात बनायेंगे।
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 83
हम नंगे उमर बितायेंगे, भारत पर जान मिटायेंगे।
वे कई बार अमेरिका में अस्त होते सूर्य को देखकर आँसू बहाते हुए कहा करते
थे – “तुम अब मेरे प्यारे भारत में उदय होने जा रहे हो। मेरे इन आँसुओं को भारत
के सलिल सुन्दर खेतों में ओस की बूँदों के रूप में रख देना।” इतना महान देश
तथा ईश्वर-भक्त हमारे प्रान्त में पैदा हुआ हो, परन्तु उसका स्मारक तक न दीख
पड़े, इसका कारण साहित्यिक फिसड्डीपन के अतिरिक्त क्या हो सकता है?
यह बात हम पद-पद पर अनुभव करते हैं। बंगाल के महापुरुष श्री देवेन्द्र
ठाकुर तथा श्री केशवचन्द्र सेन की टक्कर के पंजाब में भी कई महापुरुष हुए हैं,
परन्तु उनकी वह कद्र नहीं और मरने के बाद वे जल्द ही भुला दिये गये, जैसे
ज्ञान सिंह जी इत्यादि। इन सबकी तह में हम देखते हैं कि एक ही मुख्य कारण
है, और वह है साहित्यिक रुचि-जागृति का सर्वथा अभाव।
यह तो निश्चय ही है कि साहित्य के बिना कोई देश अथवा जाति उन्नति नहीं
कर सकती, परन्तु साहित्य के लिए सबसे पहले भाषा की आवश्यकता होती है और
पंजाब में वह नहीं है। इतने दिनों से यह त्रुटि अनुभव करते रहने पर भी अभी तक
भाषा का कोई निर्णय न हो पाया। उसका मुख्य कारण है हमारे प्रान्त के दुर्भाग्य
से भाषा को मज़हबी समस्या बना देना। अन्य प्रान्तों में हम देखते हैं कि मुसलमानों
में प्रान्तीय भाषा को खूब अपना लिया है। बंगाल के साहित्य-क्षेत्र में कवि
नज़र-उल-इस्लाम एक चमकते सितारे हैं। हिन्दी कवियों में लतीफ़ हुसैन ‘नटवर’
उल्लेखनीय हैं। इसी तरह गुजरात में भी हैं, परन्तु दुर्भाग्य है पंजाब का। यहाँ पर
मुसलमानों का प्रश्न तो अलग रहा, हिन्दू-सिक्ख भी इस बात पर न मिल सके।
पंजाब की भाषा अन्य प्रान्तों की तरह पंजाबी ही होनी चाहिए थी, फिर क्यों
नहीं हुई, यह प्रश्न अनायास ही उठता है, परन्तु यहाँ के मुसलमानों ने उर्दू को
अपनाया। मुसलमानों में भारतीयता का सर्वथा अभाव है, इसीलिए वे समस्त भारत
में भारतीयता का महत्त्व न समझकर अरबी लिपि तथा फारसी भाषा का प्रचार
करना चाहते हैं। समस्त भारत की एक भाषा और वह भी हिन्दी होने का महत्त्व
उनकी समझ में नहीं आता। इसलिए वे तो अपनी उर्दू की रट लगाते रहे और एक
ओर बैठ गये।
फिर सिक्खों की बारी आयी। उनका सारा साहित्य गुरुमुखी लिपि में है। भाषा
में अच्छी-खासी हिन्दी है, परन्तु मुख्य पंजाबी भाषा है। इसलिए सिक्खों ने गुरुमुखी
लिपि में लिखी जाने वाली पंजाबी भाषा को ही अपना लिया। वे उसे किसी तरह
छोड़ न सकते थे। वे उसे मज़हबी भाषा बनाकर उससे चिपट गये।
इधर आर्यसमाज का आविर्भाव हुआ। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने समस्त
भारतवर्ष में हिन्दी प्रचार करने का भाव रखा। हिन्दी भाषा आर्यसमाज का एक
धार्मिक अंग बन गयी। धार्मिक अंग बन जाने से एक लाभ तो हुआ कि सिक्खों
84 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़