भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 408, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंआपको याद होगा कि एक दिन मैंने आत्महत्या के विषय में आपसे चर्चा की
थी। तब मैंने आपको बताया था, कई परिस्थितियों में आत्महत्या उचित हो सकती
है, परन्तु आपने मेरे इस दृष्टिकोण का विरोध किया था। मुझे उस चर्चा का समय
एवं स्थान भली प्रकार याद है। हमारी यह बात शहंशाही कुटिया में शाम के समय
हुई थी। आपने मज़ाक़ के रूप में हँसते हुए कहा था कि इस प्रकार की कायरता
का कार्य कभी उचित नहीं माना जा सकता। आपने कहा था कि इस प्रकार का
कार्य भयानक और घृणित है, परन्तु इस विषय पर भी मैं देखता हूँ कि आपकी
राय बिल्कुल बदल चुकी है। अब आप उसे कुछ अवस्थाओं में न केवल उचित,
वरन अनिवार्य एवं आवश्यक अनुभव करते हैं। मेरी इस विषय में अब वही राय
है, जो पहले आपकी थी, अर्थात् आत्महत्या एक घृणित अपराध है, यह पूर्णतः
कायरता का कार्य है। क्रान्तिकारी का तो कहना ही क्या, कोई भी मनुष्य ऐसे कार्य
को उचित नहीं ठहरा सकता।
आप कहते हैं कि आप यह नहीं समझ सके कि केवल कष्ट-सहन करने से
आप अपने देश की सेवा किस प्रकार कर सकते हैं। आप जैसे व्यक्ति की ओर
से ऐसा प्रश्न करना बड़े आश्चर्य की बात है; क्योंकि नौजवान भारत सभा के ध्येय
‘सेवा द्वारा कष्टों को सहन करना एवं बलिदान करना’ को हमने सोच-समझकर
कितना प्यार किया था। मैं यह समझता हूँ कि आपने अधिक से अधिक सम्भव
सेवा की। अब वह समय है कि जो कुछ आपने किया है, उसके लिए कष्ट उठायें।
दूसरी बात यह है कि यही वह अवसर है, जब आपको सारी जनता का नेतृत्व करना
है।
मानव किसी भी कार्य को उचित मानकर ही करता है, जैसेकि हमने
लेजिस्लेटिव असेम्बली में बम फेंकने का कार्य किया था। कार्य करने के पश्चात
उसका परिणाम और उसका फल भोगने की बारी आती है। क्या आपका यह विचार
है कि यदि हमने दया के लिए गिड़गिड़ाते हुए दण्ड से बचने का प्रयत्न किया
होता, तो हमारा यह कार्य उचित होता? नहीं, इसका प्रभाव लोगों पर उल्टा होता।
अब हम अपने लक्ष्य में पूर्णतया सफल हुए हैं।
बन्दी होने के समय हमारी संस्था के राजनीतिक बन्दियों की दशा अत्यन्त
दयनीय थी। हमने उसे सुधारने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया। मैं आपको पूरी
गम्भीरता से बताता हूँ कि हमें यह विश्वास था कि हम बहुत कम समय के भीतर
ही मर जायेंगे। हमें उपवास की स्थिति में कृत्रिम रीति से भोजन दिये जाने का न
तो ज्ञान ही था, न हमें यह विचार सूझता ही था। हम तो मृत्यु के लिए तैयार थे।
क्या आपका यह अभिप्राय है कि हम आत्महत्या करना चाहते थे? नहीं, प्रयत्नशील
होना एवं श्रेष्ठ और उत्कृष्ट आदर्श के लिए जीवन दे देना कदापि आत्महत्या नहीं
कही जा सकती। हमारे मित्र (श्री यतीन्द्रनाथ दास) की मृत्यु तो स्पृहणीय है। क्या
402 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़