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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

ज़ालिम बादशाहत को उलटा दिया तब उनका यह काम घृणा लायक नहीं, बल्कि
पूजनीय माना गया। ठीक यही बात हम 1857 में हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए
लड़ी लड़ाई के सम्बन्ध में कह सकते हैं, क्योंकि वह हमारे पहले बताये अनुसार
जुल्म या आतंक नहीं था। इस लेख से यह अर्थ निकालना कि हम एक हथियारबन्द
बग़ावत करने की प्रेरणा दे रहे हैं, बिल्कुल झूठ और बेकार होगा। आज हम
हथियारबन्द बग़ावत करने या न करने सम्बन्धी कुछ नहीं लिखते। हथियारबन्द
बग़ावत की प्रौढ़ता या विरोध अलग-अलग देशों के अलग-अलग समाचारों के
कारण होते हैं। जो लोग इस समय हथियारबन्द बग़ावत को कठिन या समयपूर्व
मानते हों, वे ‘आतंक’ शब्द की ओट लेकर उस विचार को ही त्याज्य न बनायें।
इस विचार से ही आतंक शब्द की उक्त व्याख्या की गयी है, ताकि लोग फिर वैसी
ही ख़तरनाक और ठीक न हो सकने वाली भूल न करें।
(‘श्रद्धानन्द’, बम्बई से) किरती/मई, 1928
248 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम
मई, 1928 के 'किरती' में यह लेख छपा। अमृतसर में अप्रैल में राजनीतिक
कॉन्फ़्रेंस और नौजवान सभा की कॉन्फ़्रेंस हुई थी, जिसमें धर्म की समस्या पर शहीद
भगतसिंह और उनके साथियों में जमकर विचार-विमर्श हुआ। यह लेख उसी मसले
पर प्रकाश डालता है। – स.
अमृतसर में 11-12-13 अप्रैल को राजनीतिक कॉन्फ़्रेंस हुई और साथ ही युवकों
की भी कॉन्फ़्रेंस हुई। दो-तीन सवालों पर इसमें बड़ा झगड़ा और बहस हुई। उनमें
से एक सवाल धर्म का भी था। वैसे तो धर्म का प्रश्न कोई न उठाता, किन्तु
साम्प्रदायिक संगठनों के विरुद्ध प्रस्ताव पेश हुआ और धर्म की आड़ लेकर उन
संगठनों का पक्ष लेने वालों ने स्वयं को बचाना चाहा। वैसे तो यह प्रश्न और कुछ
देर दबा रहता, लेकिन इस तरह सामने आ जाने से स्पष्ट बातचीत हो गयी और
धर्म की समस्या को हल करने का प्रश्न भी उठा। प्रान्तीय कॉन्फ़्रेंस की विषय
समिति में भी मौलाना ज़फ़र अली साहब के पाँच-सात बार ख़ुदा-ख़ुदा करने पर
अध्यक्ष पण्डित जवाहरलाल ने कहा कि इस मंच पर आकर ख़ुदा-ख़ुदा न कहें।
आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता (Irreligion) का प्रचारक हूँ। बाद में लाहौर
में भी इसी विषय पर नौजवान सभा ने एक मीटिंग की। कई भाषण हुए और धर्म
के नाम का लाभ उठाने वाले और यह सवाल उठ जाने पर झगड़ा हो जाने से डर
जाने वाले कई सज्जनों ने कई तरह की नेक सलाहें दीं।
सबसे ज़रूरी बात जो बार-बार कही गयी और जिस पर श्रीमान भाई अमर
सिंह जी झबाल ने विशेष ज़ोर दिया, वह यह थी कि धर्म के सवाल को छेड़ा
ही न जाये। बड़ी नेक सलाह है। यदि किसी का धर्म बाहर लोगों की सुख-शान्ति
में कोई विघ्न न डालता हो तो किसी को भी उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की क्या
ज़रूरत हो सकती है? लेकिन सवाल तो यह है कि अब तक का अनुभव क्या
बताता है? पिछले आन्दोलन में भी धर्म का यही सवाल उठा और सभी को पूरी
आज़ादी दे दी गयी। यहाँ तक कि कांग्रेस के मंच से भी आयतें और मन्त्र पढ़े जाने
लगे। उन दिनों धर्म में पीछे रहने वाला कोई भी आदमी अच्छा नहीं समझा जाता
था। फलस्वरूप संकीर्णता बढ़ने लगी।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 249

जो दुष्परिणाम हुआ, वह किससे छिपा है? अब राष्ट्रवादी या स्वतन्त्रता प्रेमी
लोग धर्म की असलियत समझ गये हैं और वही उसे अपने रास्ते का रोड़ा समझते
हैं।
बात यह है कि क्या धर्म घर में रखते हुए भी, लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं
बढ़ता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर
नहीं पड़ता? इस समय पूर्ण स्वतन्त्रता के उपासक सज्जन धर्म को दिमागी गुलामी
का नाम देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्चे से यह कहना कि – ईश्वर ही
सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला है – बच्चे को हमेशा
के लिए कमज़ोर बनाना है। उसके दिल की ताक़त और उसके आत्मविश्वास की
भावना को ही नष्ट कर देना है। लेकिन इस बात पर बहस न भी करें और सीधे
अपने सामने रखे दो प्रश्नों पर ही विचार करें तो भी हमें नज़र आता है कि धर्म
हमारे रास्ते में एक रोड़ा है। मसलन हम चाहते हैं कि सभी लोग एक-से हों। उनमें
पूँजीपतियों के ऊँच-नीच की छूत-अछूत का कोई विभाजन न रहे। लेकिन सनातन
धर्म इस भेदभाव के पक्ष में है। बीसवीं सदी में भी पण्डित, मौलवी जी जैसे लोग
भंगी के लड़के के हार पहनाने पर कपड़ों सहित स्नान करते हैं और अछूतों को
जनेऊ तक देने से इन्कारी है। यदि इस धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने की क़सम
ले लें तो चुप कर घर बैठ जाना चाहिए, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। लोग
यह भी कहते हैं कि इन बुराइयों का सुधार किया जाये। बहुत ख़ूब! छूत-अछूत
को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाये। भेदभाव
तो फिर भी रहा ही। गुरुद्वारे जाकर जो सिख ‘राज करेगा खालसा’ गायें और बाहर
आकर पंचायती राज की बातें करें, तो इसका मतलब क्या है?
धर्म तो यह कहता है कि इस्लाम पर विश्वास न करने वाले को फिर तलवार
के घाट उतार देना चाहिए और यदि इधर एकता की दुहाई दी जाये तो परिणाम
क्या होगा? हम जानते हैं कि अभी कई और बड़े ऊँचे भाव की आयतें और मन्त्र
पढ़कर खींचतान करने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन सवाल यह है कि
इस सारे झगड़े से छुटकारा ही क्यों न पाया जाये? धर्म का पहाड़ तो हमें हमारे
सामने खड़ा नज़र आता है। मान लें कि भारत में स्वतन्त्रता-संग्राम छिड़ जाये। सेनाएँ
आमने-सामने बन्दूकें ताने खड़ी हों, गोली चलने ही वाली हो और यदि उस समय
कोई मुहम्मद गौरी की तरह – जैसीकि कहावत बतायी जाती है – आज भी हमारे
सामने गायें, सूअर, ग्रन्थ साहिब, वेद-कुरान आदि चीजें खड़ी कर दी जायें, तो हम
क्या करेंगे? यदि पक्के धार्मिक होंगे तो अपना बोरिया-बिस्तर लपेटकर घर बैठ
जायेंगे। धर्म के होते हुए हिन्दू-सिख गाय पर और मुसलमान सूअर पर गोली नहीं
चला सकते। धर्म के बड़े पक्के इन्सान तो उस समय सोमनाथ के कई हज़ार पण्डों
की तरह ठाकुरों के आगे लौटते रहेंगे और दूसरे लोग धर्महीन या अधर्मी-काम कर
250 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

जायेंगे। तो हम किस निष्कर्ष पर पहुँचे? धर्म के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है। लेकिन
यदि धर्म के पक्ष वालों के तर्क भी सोचे जायें तो वे यह कहते हैं कि दुनिया में
अन्धेर हो जायेगा, पाप बढ़ जायेगा। बहुत अच्छा, इसी बात को ले लें।
रूसी महात्मा टॉल्स्टॉय ने अपनी पुस्तक (Essay and Letters) में धर्म पर
बहस करते हुए उसके तीन हिस्से किये हैं -

  1. Essentials of Religion, यानी धर्म की ज़रूरी बातें अर्थात सच बोलना,
    चोरी न करना, ग़रीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वग़ैरा।
  2. Philosophy of Religion, यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना
    आदि का दर्शन। इसमें आदमी अपनी मर्ज़ी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न
    करता है।
  3. Rituals of Religion, यानी रस्मो-रिवाज़ वग़ैरा। मतलब यह कि पहले
    हिस्से में सभी धर्म एक हैं। सभी कहते हैं कि सच बोलो, झूठ न बोलो, प्यार
    से रहो। इन बातों को कुछ सज्जनों ने Individual Religion कहा है। इसमें तो
    झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता। वरन यह कि ऐसे नेक विचार हर आदमी में होने
    चाहिए। दूसरा फ़िलासफ़ी का प्रश्न है। असल में कहना पड़ता है कि
    Philosophy is the outcome of Human weakness, यानी फ़िलासफ़ी आदमी
    की कमज़ोरी का फल है। जहाँ भी आदमी देख सकते हैं। वहाँ कोई झगड़ा नहीं।
    जहाँ कुछ नज़र न आया, वहीं दिमाग़ लड़ाना शुरू कर दिया और खास-खास
    निष्कर्ष निकाल लिये। वैसे तो फ़िलासफ़ी बड़ी ज़रूरी चीज़ है, क्योंकि इसके
    बग़ैर उन्नति नहीं हो सकती, लेकिन इसके साथ-साथ शान्ति होनी भी बड़ी
    ज़रूरी है। हमारे बुजुर्ग कह गये हैं कि मरने के बाद पुनर्जन्म भी होता है, ईसाई
    और मुसलमान इस बात को नहीं मानते। बहुत अच्छा, अपना-अपना विचार है।
    आइये, प्यार के साथ बैठकर बहस करें। एक-दूसरे के विचार जानें। लेकिन
    'मसला-ए-तनासुक' पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में
    लाठियाँ चल जाती हैं। बात यह कि दोनों पक्ष दिमाग़ को, बुद्धि को, सोचने-
    समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद
    भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान
    शरीफ़ में खुदा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। अपने सोचने की शक्ति
    (Power of Reasoning) को छुट्टी दी हुई होती है। सो जो फ़िलासफ़ी हर
    व्यक्ति की निजी राय से अधिक महत्त्व न रखती हो तो एक ख़ास फ़िलासफ़ी
    मानने के कारण भिन्न गुट न बनें, तो इसमें क्या शिकायत हो सकती है।
    अब आती है तीसरी बात - रस्मो-रिवाज़। सरस्वती-पूजा वाले दिन, सरस्वती
    की मूर्ति का जुलूस निकलना ज़रूरी है। उसमें आगे-आगे बैण्ड-बाजा बजना भी
    ज़रूरी है। लेकिन हैरीमन रोड के रास्ते में एक मस्जिद भी आती है। इस्लाम धर्म
    विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 251

कहता है कि मस्जिद के आगे बाजा न बजे। अब क्या होना चाहिए? नागरिक
आज़ादी का हक़ (Civil rights of citizen) कहता है कि बाज़ार में बाजा बजाते हुए
भी जाया जा सकता है। लेकिन धर्म कहता है कि नहीं। इनके धर्म में गाय का
बलिदान ज़रूरी है और दूसरे में गाय की पूजा लिखी हुई है। अब क्या हो? पीपल
की शाखा कटते ही धर्म में अन्तर आ जाता है तो क्या किया जाये? तो यही
फ़िलासफ़ी व रस्मो-रिवाज़ के छोटे-छोटे भेद बाद में जाकर (National Religion)
बन जाते हैं और अलग-अलग संगठन बनने के कारण बनते हैं। परिणाम हमारे
सामने है।
सो यदि धर्म पीछे लिखी तीसरी और दूसरी बात के साथ अन्धविश्वास को
मिलाने का नाम है, तो धर्म की कोई ज़रूरत नहीं। इसे आज ही उड़ा देना चाहिए।
यदि पहली और दूसरी बात में स्वतन्त्र विचार मिलाकर धर्म बनता हो, तो धर्म
मुबारक है।
लेकिन अलग-अलग संगठन और खाने-पीने का भेदभाव मिटाना ज़रूरी है।
छूत-अछूत शब्दों को जड़ से निकालना होगा। जब तक हम अपनी तंगदिली
छोड़कर एक न होंगे, तब तक हममें वास्तविक एकता नहीं हो सकती। इसलिए
ऊपर लिखी बातों के अनुसार चलकर ही हम आज़ादी की ओर बढ़ सकते हैं।
हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेज़ी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह
पूर्ण स्वतन्त्रता का नाम है – जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमाग़ी
गुलामी से भी आज़ाद हो जायेंगे।
252 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सत्याग्रह और हड़तालें

जून, 1928 'किरती' में इन दो विषयों पर टिप्पणियाँ छपीं। भगतसिंह 'किरती'
के सम्पादक मण्डल में थे। उस समय उनके विचारों की झलक इनसे मिल सकती
है। – स.

सत्याग्रह

1928 में हिन्दुस्तान में फिर प्राण धड़कते नज़र आने लगे हैं। एक ओर
हड़तालों का ज़ोर है और दूसरी ओर सत्याग्रह की तैयारियाँ शुरू हो रही हैं। ये
लक्षण बड़े अच्छे हैं। सबसे बड़ा सत्याग्रह बारदोली (गुजरात प्रान्त) के किसान
कर रहे हैं। तीस सालों के बाद नया बन्दोबस्त किया जाता है और हर बार
ज़मीन का लगान बढ़ा दिया जाता है। इसी तरह इस बार भी बन्दोबस्त हुआ
और मामला बढ़ा दिया गया। लोग बेचारे क्या करें? ग़रीब किसान तो पहले ही
पेट भरकर रोटी नहीं खा सकते और वे पहले से 22 प्रतिशत लगान कहाँ से
दें। सत्याग्रह की तैयारियाँ की गयीं। महात्मा गाँधी ने लाट पंजाब के साथ
पत्र-व्यवहार कर लगान कम करवाने का यत्न किया था, लेकिन जनाब, सिर्फ़
पत्र-व्यवहार से सर झुकाने वाली सरकार यह नहीं है। कुछ असर न हुआ।
सत्याग्रह करना ही पड़ा। गुजरात में पहले भी किसान एक-दो बार बड़ा भारी
सत्याग्रह करके सरकार को हरा चुके हैं। पहले-पहल 1917-18 में बारिश
अधिक होने से फ़सलें ख़राब हो गयी थीं और रुपये में चार आना भी नहीं
हुईं। क़ानून यह था कि रुपये में छह आने से कम फ़सल होने से उस साल
लगान न लिया जाये, अगले वर्ष एक साथ ले लिया जाये। उस साल लोगों ने
जब कहा कि चार आने भी फ़सल नहीं हुई तो सरकार नहीं मानी। फिर
महात्मा गाँधीजी ने काम हाथ में ले लिया। एक सभा की। लोगों को बताया
कि यदि आप लगान देने से इन्कार करोगे तो आपकी जायदाद ज़ब्त हो जायेगी,
क्या आप तैयार हैं? लोग चुपचाप बैठे रहे तो बम्बई के सत्याग्रही नेता इस बात
पर बड़े नाराज़ हुए और चल दिये। लेकिन फिर एक बुड्ढा किसान उठा और
उसने कहा कि हम सबकुछ सहन करेंगे और बाद में सभी लोग यही कहने
लगे। सत्याग्रह शुरू हुआ। सरकार ने भी जायदाद और ज़मीनें ज़ब्त करना शुरू
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 253

कर दिया, लेकिन दो महीने बाद सरकार ने सिर झुका दिया और ज़मींदारों
(?) की शर्त मान ली।
दूसरी बार जब महात्मा जी 1923-24 में जेल में थे तब सत्याग्रह हुआ। पहली
बार 600 गाँवों ने हिस्सा लिया था। इस बार 94 गाँवों का लगान बढ़ाया और इन
गाँवों ने सत्याग्रह किया। उन पर ताजीरी टैक्स लगाया गया था। वहाँ नियम था कि
सूर्यास्त होने पर जायदाद कुर्क नहीं हो सकती थी और किसान सवेरे ही
अपने-अपने घरों को ताले लगाकर चले जाते और पुलिस को कोई गवाह तक न
मिलता। अधिक तंग आकर सरकार ने टैक्स वापस ले लिया। इस बार बारदोली
में सत्याग्रह शुरू हुआ है। बारदोली में 1921-22 में आज़ादी के लिए बड़ा भारी
सत्याग्रह करने की तैयारियाँ की गयी थीं। सब क़िस्मत के खेल! बना-बनाया खेल
बिगड़ गया। खैर, उन पिछली बातों का क्या करना। अब उस इलाके का बन्दोबस्त
सरकार ने किया। बेचारे किसानों की मुसीबत, अच्छा बन्दोबस्त हुआ, 22 प्रतिशत
लगान बढ़ गया! बहुत कहा गया लेकिन सरकार कब मानती है। श्री बल्लभभाई
पटेल के नेतृत्व में काम शुरू हो गया और किसानों ने लगान देने से मना कर दिया।
अब ज़ब्ती अधिकारी और सारे ही अफ़सर बारदोली ताल्लुके की ओर इकट्ठा हुए
हैं। जो उनसे हो सकता है, लोगों को ग़लत रास्ते पर डालने के लिए कर रहे हैं।
जायदाद ज़ब्त की जा रही है, ज़मीनें ज़ब्त करने के हुक्म जारी हो रहे हैं। लेकिन
माल, सामान उठाने के लिए आदमी नहीं मिलते। इस समय काम वहाँ ज़ोरों पर
है, लेकिन एक मजे की बात यह है कि सारा काम बड़ी शान्ति से हो रहा है। वे
अफ़सर जो लोगों को तंग करने आये थे, उनके साथ बड़े प्यार का व्यवहार किया
जाता है। पहले उन्हें रोटी-पानी नहीं मिलता था, अब पटेल ने कहा कि उन्हें रोटी-
पानी ज़रूर दे दिया करो। एक दिन शराब की दुकान से चार टिन कुर्क किये गये,
लेकिन उठाने वाला कोई न मिला। जब अधिकारी ने कहा, 'बड़ी प्यास लगी है,
पानी तो दो,' तो झट एक सेवादार सत्याग्रही ने सोडे की बोतल लाकर पिलायी।
इस तरह काम बड़े ज़ोरों से, पूरी शान्ति से चल रहा है। बड़ी उम्मीद है कि सरकार
को अधिक झुकना पड़ेगा।
दूसरी जगह कानपुर है जहाँ सत्याग्रह होने वाला है। पिछले दिनों कानपुर में
हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। बाद में ताजीरी पुलिस बिठायी गयी। कुछ दिन हुए कि
कानपुर के कौंसिल सदस्य श्री गणेशशंकर जी विद्यार्थी सम्पादक 'प्रताप', कानपुर
को एक पत्र मजिस्ट्रेट से मिला कि अपने दफ़्तर के सभी कर्मचारियों की सूची
और उनका वेतन या पद लिखकर भेजें, क्योंकि तारी ताजीरी टैक्स वसूल किया
जाना है। लेकिन विद्यार्थी जी ने लिख भेजा कि मैं कोई टैक्स देने को तैयार नहीं
हूँ और न ही इस काम में कोई सहायता ही करूँगा, क्योंकि दंगा पुलिस ने करवाया
था। हमें उसका दण्ड नहीं मिलना चाहिए। लोगों ने विद्यार्थी जी से पूछा कि हम
254 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

क्या करें? आपने कहा कि मुसीबत आयेगी, नुक़सान अधिक होगा, लेकिन यह
अत्याचारी टैक्स नहीं देना चाहिए। जलसे हुए। 7000 व्यक्तियों ने टैक्स न देने के
काग़ज़ों पर हस्ताक्षर कर सरकार को भेज दिये। तैयारियाँ हो रही हैं।
तीसरी जगह मेरठ है। वहाँ भी बन्दोबस्त हुआ और लगान बढ़ गया। वहाँ भी
सत्याग्रह की घोषणा कर दी गयी है।
पंजाब में भी कुछ ऐसी ही बातें नज़र आ रही हैं। शेखूपुर और लाहौर ज़िलों
में ओले गिरने से फ़सलें नष्ट हो गयी थीं। अनाज कुछ भी नहीं हुआ, फिर लगान
कैसे दिया जाये? लेकिन यहाँ के सयाने-सयाने आदमी और ही तरह की बातें करते
हैं – “कांग्रेस के ‘बदनाम’ आदमी उन किसानों में भाषण न दें, कहीं सरकार
नाराज़ न हो जाये!” ऐसी-ऐसी बातें हो रही हैं, लेकिन उन्हें अच्छी तरह याद रखना
चाहिए कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। अंग्रेज़ पैसे के पीर और उम्मीद यह
की जाये कि वे लगान अपनेआप माफ़ कर देंगे। यह भ्रम अभी कब तक चलेगा?
हड़तालें
उधर सत्याग्रह की धूम है और इधर हड़तालों का भी कुछ कम ज़ोर नहीं। बड़ी
खुशी इस बात की है कि देश में फिर प्राण जगे हैं और पहले-पहल ही किसानों
और श्रमिकों का युद्ध छिड़ा है। इस बात का भी आने वाले बड़े भारी आन्दोलन
पर असर रहेगा। वास्तव में तो यही लोग हैं कि जिन्हें आज़ादी की ज़रूरत है।
किसान और मज़दूर रोटी चाहते हैं और उनकी रोटी का सवाल तब तक हल नहीं
हो सकता जब तक यहाँ पूर्ण आज़ादी न मिल जाये। वे गोलमेज कॉन्फ्रेंस या अन्य
ऐसी किसी बात पर रुक नहीं सकते। खैर।
आजकल लिलुआ रेलवे वर्कशाप, टाटा की जमशेदपुर मिलों, जमशेदपुर शहर
के भंगियों और बम्बई की कपड़ा-मिलों में हड़ताल हो गयी है। वास्तव में तो
मोटी-मोटी शिकायतें सबकी एक-सी होती हैं। वेतन कम, काम ज़्यादा और
व्यवहार बुरा। इस स्थिति में ग़रीब मज़दूर जैसे-तैसे गुज़ारा करते हैं, लेकिन आख़िर
असहनीय हो जाता है। आज बम्बई में डेढ़-दो लाख व्यक्ति हड़ताल किये बैठे हैं।
सिर्फ़ एक मिल चलती है। बात यह कि नये हथकरघे आये हैं, जिनमें एक आदमी
को दो हथकरघों पर काम करना पड़ता है और मेहनत ज़्यादा करनी पड़ती है। यही
काम करने वालों का वेतन ख़ासतौर से बढ़ाने, बाक़ी आम मज़दूरों का वेतन बढ़ाने
और 8 घण्टे से अधिक काम न ले सकने और कुछ व्यवहार सम्बन्धी शर्तें पेश
की गयी हैं। इस समय हड़ताल का बड़ा ज़ोर है। जमशेदपुर मिल के श्रमिकों की
भी कुछ ऐसी ही माँगें हैं। वहाँ भी हड़ताल बढ़ती जा रही है। भंगी अपनी हड़ताल
किये हुए हैं और शहर की नाक में दम हुआ है। सबसे अधिक सेवा करने वाले
भाइयों को हम भंगी-भंगी कहकर पास न फटकने दें और उनकी ग़रीबी का लाभ
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 255

उठाकर थोड़े-से पैसे देकर काम कराते रहें और बेगार भी खूब घसीटें। ख़ूब!
आख़िर उन्हें भी उठना ही था। वे तो लोगों को, विशेषतः शहरों में, दो दिन में सीधे
रास्ते पर ला सकते हैं। उनका उठना बड़ी खुशी की बात है। लिलुआ वर्कशाप से
कुछ आदमी निकाल दिये गये थे और वेतन के भी कुछ झंझट थे, इसलिए हड़ताल
हो गयी। बाद में एलान हो गया कि कई हज़ार व्यक्तियों का काम बिल्कुल ही
बन्द कर दिया जायेगा और हड़ताल ख़त्म होने पर भी उन्हें काम में नहीं लिया
जायेगा। इससे बड़ी सनसनी फैली। लेकिन हड़ताल ज़ोरों पर है। श्री स्प्रैट आदि
सज्जन खूब काम कर रहे हैं। लोगों को चाहिए कि वे उनकी हर तरह से सहायता
करें और उनकी हड़ताल तुड़वाने की जो तैयारी हो रही है, वह बन्द करायी जाये।
हम चाहते हैं कि सभी किसान और मज़दूर संगठित हों और अपने अधिकारों के
लिए यत्न करें।

256 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज

जलियाँवाला बाग़ हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक बँटवारे
की राजनीति तेज़ कर दी। इसके असर से 1924 में कोहाट में भयानक हिन्दू-मुस्लिम
दंगे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस
चली। इन्हें समाप्त करने की ज़रूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं
ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किये।
इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपने विचार
प्रस्तुत किये। भगतसिंह का यह लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा।
भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के
अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर
शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यक़ीन न हो तो लाहौर के ताज़ा दंगे ही देख
लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार
सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की
गयी कि फ़लाँ आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फ़लाँ आदमी हिन्दू है या सिख
है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा
मारे जाने के लिए काफ़ी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही
उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का
ईश्वर ही मालिक है।
ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नज़र आता है। इन
“धर्मों” ने हिन्दुस्तान का बेड़ागर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि ये धार्मिक
दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नज़रों में भारत को बदनाम
कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते
हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग़ ठण्डा
रखता है, बाक़ी सबके सब धर्म के ये नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रोब को
क़ायम रखने के लिए डण्डे-लाठियाँ, तलवारें-छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और
आपस में सर फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाक़ी बचे कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं
और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन “धर्मजनों” पर
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 257

अंग्रेज़ी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग़ का कीड़ा ठिकाने पर
आ जाता है।
जहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अख़बारों
का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली।
वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्र कराने का बीड़ा उठाया हुआ था और जो
“समान राष्ट्रीयता” और “स्वराज-स्वराज” के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही
या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले
हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है, और साम्प्रदायिकता की
ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है
कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।
दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं,
वे अख़बार वाले हैं।
पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज
बहुत ही गन्दा हो गया है। ये लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक
देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर-फुटौव्वल करवाते हैं।
एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय
अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक, जिनका दिल व दिमाग़
ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो, बहुत कम हैं।
अख़बारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना,
साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी
राष्ट्रीयता बनाना था; लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता
का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी
राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान
दशा पर विचार कर आँखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल
उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति
देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्रता की झलक सामने दिखायी देती थी
और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना-मात्र बन गया है। बस यही तीसरा
लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। वही नौकरशाही – जिसके
अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी – आज अपनी जड़ें
इतनी मज़बूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।
यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही
जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्रकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी
आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर
258 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

अविश्वास-सा हो गया, जिससे आजकल के बहुत-से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे
चौपट हो गये। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल ज़रूर
होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी
कारण से तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज
हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है।
बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक
दशा में सुधार से ही हो सकता है, क्योंकि भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा
इतनी ख़राब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित
करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख
देता है। सच है, मरता क्या न करता।
लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि
सरकार विदेशी है और यह लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों
को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिए और जब तक सरकार बदल न जाये,
चैन की साँस न लेना चाहिए।
लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब
मेहनतकश व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन
पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे
चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति,
रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम
धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और
सरकार की ताक़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों में तुम्हारा नुक़सान
कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक
स्वतन्त्रता मिलेगी।
जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि ज़ार के समय वहाँ
भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं, वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पताँग
करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक़्शा ही
बदल गया है। अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए। अब वहाँ सभी को ‘इन्सान’ समझा
जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं। ज़ार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही ख़राब थी,
इसलिए सब दंगे-फ़साद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गयी
है और उनमें वर्ग-चेतना आ गयी है, इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की
ख़बर नहीं आयी।
इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन
कलकत्ते के दंगों में एक बात बहुत खुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ
दंगों में ट्रेड यूनियनों के मज़दूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 259

गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारख़ानों आदि में
उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना
थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्ग-चेतना का यही सुन्दर
रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।
यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब
वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे
हैं और उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नज़र
से – हिन्दू, मुसलमान या सिख-रूप में नहीं, वरन सभी को पहले इन्सान समझते
हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता
है कि भारत का भविष्य सुनहला है और भारतवासियों को इन दंगों आदि को
देखकर घबराना नहीं चाहिए, बल्कि तैयार-बर-तैयार हो यत्न करना चाहिए कि
ऐसा वातावरण ही न बने, ताकि दंगे हों ही नहीं।
1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते
थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दख़ल नहीं। न
ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए, क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम
नहीं करने देता। इसीलिए ग़दर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें
सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।
इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं, जो धर्म को राजनीति से
अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम
इसका समर्थन करते हैं।
यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठा हो
सकते हैं। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।
हमारा ख़याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर ज़रूर
विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमें बचा
लेंगे।
260 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पुलिस की कमीनी चालें
पुलिस के लोग किस तरह नौजवानों को फँसाने और बरगलाने का काम करते
हैं, इस सम्बन्ध में यह लेख जून, 1928 'किरती' में छपा था। – स.
कुछ दिनों से पंजाब में बड़ी सनसनी फैली हुई है। एक अजीब कहानी का पता
चला है। पुलिस की एक अजीब करतूत का भण्डाफोड़ हुआ है। अब चूँकि
भण्डाफोड़ हो ही गया है इसलिए यह कहानी मज़ेदार लगती है, लेकिन दुर्भाग्य
से यदि भण्डाफोड़ न हुआ होता तो उसका परिणाम यह होना था कि कई नौजवान
फाँसी पर लटक गये होते और कइयों को कालापानी हो गया होता। भण्डाफोड़
लाहौर के अख़बार ट्रिब्यून (The Tribune) ने किया है।
कहानी यों है कि अप्रैल, 1927 में लाहौर स्टेशन पर एक बंगाली और एक
मेरठ निवासी नौजवान पकड़े गये। बंगाली के पास से पिस्तौल और मेरठ वाले के
पास से तेज़ाब मिला। कुछ दिन हवालात में रखने के बाद पहले तो मेरठ निवासी
नौजवान जिसका नाम मोहन सिंह रंक था, छोड़ दिया गया और बंगाली पर मुक़दमा
चलाया गया। कुछ दिनों बाद बंगाली को भी जमानत पर छोड़ दिया गया। जमानत
पाँच सौ की हुई थी। पेशी वाले दिन वह हाज़िर न हुआ, फिर भी उसकी जमानत
ज़ब्त नहीं की गयी। उसे वारण्ट निकालकर मेरठ से गिरफ़्तार कर लाया गया और
मि. हीरालाल फैलूक्स ने उसे पाँच साल की क़ैद का दण्ड दिया। लाहौर के राष्ट्रीय
कार्यकर्ताओं को उससे हमदर्दी पैदा हुई। उसके लिए अपील का प्रबन्ध किया गया।
अपील अभी पेश भी नहीं हुई थी कि वह छूटकर घर चला गया। सब लोग हैरान।
उड़ती-उड़ती बात यह सुनी जा रही थी कि वह ख़ुफ़िया पुलिस का भाड़े का टट्टू
था। लेकिन निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
अब कुछ दिन पहले उसके उन दिनों के लिखे हुए कुछ पत्र 'ट्रिब्यून' में छपे
हैं। एक पत्र तो मेरठ के पुलिस कप्तान के नाम है और एक लाहौर के पुलिस
कप्तान के नाम और एक ऐसा है जिसमें उसने अपना सारा हाल लिखा है। उसने
लिखा है कि वह ख़ुफ़िया पुलिस का एक जासूस है और कई बरसों से पुलिस
का काम कर रहा है। पुलिस को पता चला कि एक और आदमी 'एन' नाम का
मैनपुरी का रहने वाला है। जिसके पास दो पिस्तौलें हैं। के.सी. बनर्जी को, जोकि
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 261

उस बंगाली का नाम है, उसके साथ दोस्ती करने के लिए कहा गया ताकि उससे
पिस्तौलें ले ली जायें। उसने एक पिस्तौल ले लिया और पुलिस अधिकारियों ने
उससे कहा कि यह तुम अपने पास ही रखो।
एक दिन लाहौर के किसी आदमी का पत्र बंगाली के मार्फ़त मोहनलाल के
नाम लिखा हुआ गया। उसमें लिखा हुआ था कि तुम आदमी और चीजें लेकर
लाहौर पहुँचो, क्योंकि फ़िरोज़पुर में डाका डालना है। बंगाली ने वह पत्र पुलिस
अधिकारियों को दे दिया, जिन्होंने पत्र का फ़ोटो लेकर पत्र लौटा दिया, बनर्जी ने
वह पत्र मोहनलाल को दे दिया। अधिकारियों की सलाह से वह पिस्तौल साथ
लेकर मोहनलाल के साथ लाहौर आ गया। यहाँ से एक आदमी को डकैती की
जगह की देखभाल के लिए भेज दिया गया, पर न जाने किस कारण से डकैती
न हुई और दोनों मेरठ के लिए लौट पड़े, लेकिन लाहौर रेलवे स्टेशन पर गिरफ़्तार
कर लिये गये।
पकड़े जाते ही बंगाली ने पुलिस को बता दिया था कि वह खुफ़िया पुलिस
का आदमी है और पिस्तौल भी एक तरह से सरकारी है और उसे यह कहकर दिया
गया था कि तुम यह पिस्तौल किसी दूसरे के हाथ में दे देना। लेकिन स्थिति ऐसी
बन गयी कि वह स्वयं गिरफ़्तार हो गया। अब पुलिस उसे छोड़ना भी चाहती थी
लेकिन अचानक छोड़ने से सन्देह होने का ख़तरा था, सो उसे 500 रुपये की
जमानत पर रिहा कर दिया गया।
तारीख़ के दिन वह पेश न हुआ तो भी उसकी जमानत ज़ब्त न की गयी।
लेकिन मजिस्ट्रेट को पूरी कथा मालूम नहीं थी, इसलिए उसने ज़्यादा वफ़ादारी
दिखाने के लिए अधिकाधिक सम्भव सज़ा दे दी। आर्म्स एक्ट के तहत दूसरे प्रान्तों
में आमतौर पर छह महीने क़ैद होती है, लेकिन यह पंजाब जो हुआ! यहाँ पाँच साल
सज़ा हुई। अब बंगाली की साँस फूल गयी। पत्र पर पत्र लिखे। कहीं राय साहब,
लाला चुन्नीलाल, कप्तान लाहौर और कहीं कप्तान मेरठ को पत्र लिखे। पूरा हाल
बयान किया। उन्हीं में से कुछ पत्र किसी तरह ‘ट्रिब्यून’ के हाथ लग गये और वही
छपवा दिये गये। कौंसिल में इसी पर बहस हुई। सरकारी सदस्यों ने चुपचाप बात
मान ली। उन्होंने कहा कि वह हमारा जासूस था। पंजाब पुलिस को पहले पूरी बात
पता नहीं थी, पता लगने पर उसे लोगों के सन्देह से बचाने के लिए मुक़दमे का
ढोंग किया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या वह सिर्फ़ जासूस ही था या
साथ ही भड़काने वाला (Agent Provocateur) भी था? एजेण्ट प्रोवोकेटर का काम
(Investigate) या तफ़्तीश करना नहीं होता बल्कि (To create) जुर्म पैदा करना
होता है। आमतौर पर पुलिस अपनी ज़रूरत सिद्ध करने के लिए ऐसा कुछ काम
करती रहती है। लाला लाजपत राय ने एक बार तुर्की की खुफ़िया पुलिस की
करतूत की कहानी लिखी थी। रूस में एजेण्ट प्रोवोकेटर बहुत-सा काम करते रहे
262 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

हैं। लेकिन आमतौर पर पुलिस भी ऐसे षड्यन्त्र नहीं करती, स्वयं सरकारें करवाती
हैं। उदाहरणतः जब कभी बड़े भारी आन्दोलन की सम्भावना होती है, उसे दबाने
के लिए, अत्याचार करने का बहाना ढूँढ़ने के लिए वह अपने आदमियों को उनमें
मिला देती है और वे कोई न कोई ग़लती करवा देते हैं, जिससे अत्याचार का बहाना
मिल जाता है। दूर जाने की ज़रूरत नहीं, आजकल जो भी हड़तालें हुई हैं उनमें
भी ऐसे आदमी छोड़े जाते हैं जो दंगा करवाने के लिए लोगों को भड़काते रहते हैं
और अत्याचार का बहाना ढूँढ़ने का यत्न करते रहते हैं। रूस में तो इन लोगों ने कई
बार बहुत अत्याचार करवाया और हज़ारों निर्दोष लोगों को फाँसी पर लटकवा दिया।
बड़े-बड़े आन्दोलन कुचल डाले गये। लेकिन ये आखिरी चालें होती हैं, इनसे राज
प्राप्त नहीं होते, बल्कि जुल्म करने से जड़ें जल्दी उखड़ जाती हैं। ख़ैर! अंग्रेज़ी राज
भी अब ऐसी आखिरी चालों पर उतर आया है। 1923 के आखिर में जब स्वराज
पार्टी बनी, पिछला शान्तिपूर्ण आन्दोलन असफल हो गया था। तब सरकार ने इस
स्थिति से डरते हुए कि कहीं फिर आतंकवादियों की बड़ी भारी पार्टी न बन जाये,
अपने आदमी इन बातों के प्रचार के लिए छोड़े और जल्द ही नियम 1818 के
अधीन बहुत-से लोगों को गिरफ़्तार कर लिया। 25 जुलाई, 1924 को उन बन्दियों
में से दो यानी श्री भूपेन्द्रनाथ दत्त और श्री जीवनलाल चटर्जी ने एक पत्र
भारत-मन्त्री के नाम लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि बंगाल में ऐसे आदमी छोड़े गये
हैं जिनकी हम, यदि एक निष्पक्ष समिति बने तो, पूरी पोल खोल दें। लेकिन सरकार
कब सुनने वाली थी। इन बातों से सिद्ध होता है कि सरकार की अपनी नीयत भी
ऐसी ही है।
सवाल यह पैदा होता है कि के.सी. बनर्जी खुफ़िया काम करने वाला जासूस
(Spy) ही था या षड्यन्त्रकारी Agent Provocateur था? या सरकार का इस
मामले में कोई हाथ था? स्थिति पर ज़रा ध्यान से सोचें तो पता चलता है कि इन
तीन-चार आदमियों में से एक से अधिक खुफ़िया जासूस थे और सरकार ने
पंजाब के काम करने वाले होनहार नौजवानों के ख़िलाफ़ षड्यन्त्र किया था,
सौभाग्य से जिसका बड़े सुन्दर ढंग से भण्डाफोड़ हो गया। बात यह है कि
नेशनल कॉलेज के एक ग्रेज्युएट ने, जिसके बारे में ट्रिब्यून में मिस्टर पी. लिखा
है, वह पत्र लिखा था। यह नौजवान बहुत मूर्ख व कमीना है। लगता है कि वह
भी ऐसा ही एजेण्ट प्रोवोकेटर है। उसके सम्बन्ध में आमतौर पर शिकायत सुनी
गयी थी कि वह बहुत बड़ी-बड़ी डींगें हाँकता है और कहता फिरता है कि मैं
एक राज क्रान्तिकारी दल का नेता हूँ। ख़ैर, कम से कम वह मूर्ख तो बहुत था,
बुरा भले ही न हो। लेकिन आगे की स्थिति से पाठक स्वयं निष्कर्ष निकाल
लेंगे। पहले की कहानी ट्रिब्यून में छपी है। उसके बाद जो हाल पता चला है,
आगे सब उसी के आधार पर लिखा जा रहा है। उसने यह पत्र लिखा कि आओ,
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 263

डाका डालें। वे यहाँ आये। जब लौट चले और बड़ा षड्यन्त्र न बन सका और
पिस्तौल वाला बंगाली भी हाथों से निकल चला तब उसे गिरफ़्तार करवा दिया
गया। उसके पकड़े जाते ही पूरा भण्डाफोड़ हो गया। अब क्या किया जाये? फिर
पुलिस उसे छोड़ना भी चाहती थी लेकिन किसी बहाने से। उसी पत्र लिखने
वाले 'पी' को बुलाकर उसकी जमानत ले ली गयी। 'पी' के पास कोई सम्पत्ति
नहीं थी, उसका पूरा माल 5 रुपये से ज़्यादा का नहीं था, लेकिन 500 की
जमानत मंज़ूर हो गयी। खुफ़िया काम करने वाला आतंकवादी भला किस तरह
आगे आकर उस परदेशी से अपनी दोस्ती प्रकट कर षड्यन्त्र का सबूत पैदा कर
सकता था? वे तो सभी पुलिस के आदमी थे। फिर तारीख़ पर बंगाली हाज़िर न
हुआ। जमानत भी ज़ब्त न हुई। वह और तेज़ाब वाला मोहनलाल भी क्यों छूट
गया? यदि यह मान भी लें कि उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं थे, तो भी
120बी धारा के अधीन उन पर साज़िश का मुक़दमा क्यों न चलाया गया?
एक ने डाका डालने का पत्र लिखा। पुलिस ने उसका चित्र ले लिया। पत्र
पत्रवाले के पास पहुँच गया। वह भला आदमी पुलिस को पत्र नहीं देता कि मुझे
किसी ने डकैती के लिए बुलाया है, बल्कि वह एक और आदमी को पिस्तौल
सहित ले जाता है जो पिस्तौल सहित पकड़ा जाता है। क्या साज़िश का मुक़दमा
नहीं बनता था? धारा 120बी में साफ़ लिखा है कि — 'Who ever is party to a
criminal conspiracy to Commit an offence—be punished is the same
manner as if he had abetted such offence.' यानी जो भी ऐसी साज़िश का
सदस्य हो जिसने कोई जुर्म करने की साज़िश की हो, उसे ऐसे जुर्म में मदद करने
की सज़ा मिलनी चाहिए। देवघर (बिहार) में इस समय जो बड़ा भारी साज़िश का
केस चल रहा है, उसमें यही है कि — 'You—did agree with one another—
to do or cause to be done an illegal act—and thereby you committed an
offence punishable under section 120 B—' तुम लोगों ने आपस में तय किया
कि जुर्म किये जायें, इसलिए तुम पर धारा 120बी लगायी जाती है।
उन पर भी किसी जुर्म करने का आरोप नहीं लगाया गया, सिर्फ़ 'यह करने
की', 'वह करने की' साज़िश का जुर्म लगाया गया। उस मुक़दमे का पूरा हाल
पढ़ने पर तो हमारा यही विचार बनता है कि वह मुक़दमा भी पुलिस ने बनाया है।
एक व्यक्ति वीरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य के घर की तलाशी हुई। उसने पुलिस को अपने
कमरे में बुलाकर दो पिस्तौल और एक कापी दी, जिसमें साठ व्यक्तियों के पते
लिखे हुए थे। पुलिस के आने तक उसने कापी को जला डालने की भी कोशिश
नहीं की। जानबूझकर ही नहीं की। उनमें से बीस व्यक्ति पकड़कर साज़िश का
मामला बना दिया गया। एक पंजाबी नौजवान, जिसका नाम श्री इन्द्रचन्द्र नारंग है,
को भी रगड़ा जा रहा है। आप कामलियेवाली श्री पार्वती देवी के सबसे छोटे भाई
264 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

हैं। ठीक वैसा ही मुक़दमा इधर भी बन रहा था। यदि इधर अकेला के.सी. बनर्जी
ही ख़ुफ़िया पुलिस का होता तो मुक़दमा ज़रूर चल जाता। पर वहाँ तो पूरी हवा
ही बिगड़ी हुई थी और जिन आदमियों को फाँसी पर चढ़ाने की कोशिश की गयी
थी, उनके ख़िलाफ़ कोई भी सबूत नहीं मिल पाया था, इसीलिए वह मुक़दमा नहीं
चलाया गया। सरकार की यह चाल ख़राब और घृणित है। आतंकवादी आन्दोलन
को रोकने के लिए भी यह कोई अच्छा तरीक़ा नहीं। लेकिन नक़ली साज़िशों में
निर्दोषों को मारने से राज की नींवें पक्की नहीं, बल्कि खोखली हो रही हैं। (इस
सन्दर्भ में) रूस के ज़ार और फ्रांस के लुइस को नहीं भूलना चाहिए।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 265

'अछूत का सवाल'
काकीनाडा में 1923 में कांग्रेस-अधिवेशन हुआ। मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने
अध्यक्षीय भाषण में आजकल की अनुसूचित जातियों को, जिन्हें उन दिनों 'अछूत'
कहा जाता था, हिन्दू और मुस्लिम मिशनरी संस्थाओं में बाँट देने का सुझाव दिया।
हिन्दू और मुस्लिम अमीर लोग इस वर्ग-भेद को पक्का करने के लिए धन देने को
तैयार थे।
उसी समय जब इस मसले पर बहस का वातावरण था, भगतसिंह ने 'अछूत
का सवाल' नामक लेख लिखा। इस लेख में श्रमिक वर्ग की शक्ति व सीमाओं का
अनुमान लगाकर उसकी प्रगति के लिए ठोस सुझाव दिये गये हैं। भगतसिंह का यह
लेख जून, 1928 के 'किरती' में 'विद्रोही' के नाम से प्रकाशित हुआ था।
हमारे देश जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश के नहीं हुए। यहाँ अजब-अजब सवाल
उठते रहते हैं। एक अहम सवाल अछूत-समस्या है। समस्या यह है कि 30 करोड़
की जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श-मात्र
से धर्मभ्रष्ट हो जायेगा! उनके मन्दिरों में प्रवेश से देवगण नाराज़ हो उठेंगे! कुएँ से
उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो जायेगा! ये सवाल बीसवीं सदी में
किये जा रहे हैं, जिन्हें कि सुनते ही शर्म आती है।
हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है, लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते
हुए भी झिझकते हैं जबकि पूर्णतया भौतिकवादी कहलाने वाला यूरोप कई सदियों
से इन्कलाब की आवाज़ उठा रहा है। उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रान्तियों के
दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी। आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव
मिटाकर क्रान्ति के लिए कमर कसी हुई है। हम सदा ही आत्मा-परमात्मा के वजूद
को लेकर चिन्तित होने तथा इस ज़ोरदार बहस में उलझे हुए हैं कि क्या अछूत को
जनेऊ दे दिया जायेगा? वे वेद-शास्त्र पढ़ने के अधिकारी हैं अथवा नहीं? हम
उलाहना देते हैं कि हमारे साथ विदेशों में अच्छा सलूक नहीं होता। अंग्रेज़ी शासन
हमें अंग्रेज़ों के समान नहीं समझता। लेकिन क्या हमें यह शिकायत करने का
अधिकार है?
सिन्ध के एक मुस्लिम सज्जन श्री नूर मुहम्मद ने, जो बम्बई कौंसिल के
266 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सदस्य हैं, इस विषय पर 1926 में ख़ूब कहा — "If the Hindu society refuses
to allow other human beings, fellow creatures so that to attend public
schools, and if...the president of local board representing so many lakhs of
people in this house refuses to allow his fellows and brothers the
elementary human right of having water to drink, what right have they to
ask for more rights from the bureaucracy? Before we accuse people coming
from other lands, we should see how we ourselves behave toward our own
peoply... How can we ask for greater political rights when we ourselves
deny elementary rights to human beings."
वे कहते हैं कि जब तुम एक इन्सान को पीने के लिए पानी देने से भी इन्कार
करते हो, जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते तो तुम्हें क्या अधिकार है कि
अपने लिए अधिक अधिकारों की माँग करो? जब तुम एक इन्सान को समान
अधिकार देने से भी इन्कार करते हो तो तुम अधिक राजनीतिक अधिकार माँगने
के कैसे अधिकारी बन गये?
बात बिल्कुल खरी है। लेकिन यह क्योंकि एक मुस्लिम ने कही है
इसलिए हिन्दू कहेंगे कि देखो, वह उन अछूतों को मुसलमान बनाकर अपने में
शामिल करना चाहते हैं!
जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया-बीता समझोगे तो वह ज़रूर ही दूसरे
धर्मों में शामिल हो जायेंगे, जिनमें उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे, जहाँ उनसे इन्सानों
जैसा व्यवहार किया जायेगा। फिर यह कहना कि देखो जी, ईसाई और मुसलमान
हिन्दू क़ौम को नुक़सान पहुँचा रहे हैं, व्यर्थ होगा।
कितना स्पष्ट कथन है, लेकिन यह सुनकर सभी तिलमिला उठते हैं। ठीक
इसी तरह की चिन्ता हिन्दुओं को भी हुई। सनातनी पण्डित भी कुछ न कुछ इस
मसले पर सोचने लगे। बीच-बीच में बड़े ‘युगान्तरकारी’ कहे जाने वाले भी शामिल
हुए। पटना में हिन्दू महासभा का सम्मेलन लाला लाजपतराय – जोकि अछूतों के
बहुत पुराने समर्थक चले आ रहे हैं – की अध्यक्षता में हुआ, तो ज़ोरदार बहस
छिड़ी। अच्छी नोक-झोंक हुई। समस्या यह थी कि अछूतों को यज्ञोपवीत धारण
करने का हक़ है अथवा नहीं? तथा क्या उन्हें वेद-शास्त्रों का अध्ययन करने का
अधिकार है? बड़े-बड़े समाज-सुधारक तमतमा गये, लेकिन लाला जी ने सबको
सहमत कर दिया तथा ये दो बातें स्वीकृत कर हिन्दू धर्म की लाज रख ली। वरना
ज़रा सोचो, कितनी शर्म की बात होती। कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है। हमारी
रसोई में निःसंग फिरता है, लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाये तो बस
धर्म भ्रष्ट हो जाता है। इस समय मालवीय जी जैसे बड़े समाज-सुधारक, अछूतों
के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या पहले एक मेहतर के हाथों गले में हार डलवा
लेते हैं, लेकिन कपड़ों सहित स्नान किये बिना स्वयं को अशुद्ध समझते हैं! क्या
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 267