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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 788 में से

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पृष्ठ 273

सदस्य हैं, इस विषय पर 1926 में ख़ूब कहा — "If the Hindu society refuses
to allow other human beings, fellow creatures so that to attend public
schools, and if...the president of local board representing so many lakhs of
people in this house refuses to allow his fellows and brothers the
elementary human right of having water to drink, what right have they to
ask for more rights from the bureaucracy? Before we accuse people coming
from other lands, we should see how we ourselves behave toward our own
peoply... How can we ask for greater political rights when we ourselves
deny elementary rights to human beings."
वे कहते हैं कि जब तुम एक इन्सान को पीने के लिए पानी देने से भी इन्कार
करते हो, जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते तो तुम्हें क्या अधिकार है कि
अपने लिए अधिक अधिकारों की माँग करो? जब तुम एक इन्सान को समान
अधिकार देने से भी इन्कार करते हो तो तुम अधिक राजनीतिक अधिकार माँगने
के कैसे अधिकारी बन गये?
बात बिल्कुल खरी है। लेकिन यह क्योंकि एक मुस्लिम ने कही है
इसलिए हिन्दू कहेंगे कि देखो, वह उन अछूतों को मुसलमान बनाकर अपने में
शामिल करना चाहते हैं!
जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया-बीता समझोगे तो वह ज़रूर ही दूसरे
धर्मों में शामिल हो जायेंगे, जिनमें उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे, जहाँ उनसे इन्सानों
जैसा व्यवहार किया जायेगा। फिर यह कहना कि देखो जी, ईसाई और मुसलमान
हिन्दू क़ौम को नुक़सान पहुँचा रहे हैं, व्यर्थ होगा।
कितना स्पष्ट कथन है, लेकिन यह सुनकर सभी तिलमिला उठते हैं। ठीक
इसी तरह की चिन्ता हिन्दुओं को भी हुई। सनातनी पण्डित भी कुछ न कुछ इस
मसले पर सोचने लगे। बीच-बीच में बड़े ‘युगान्तरकारी’ कहे जाने वाले भी शामिल
हुए। पटना में हिन्दू महासभा का सम्मेलन लाला लाजपतराय – जोकि अछूतों के
बहुत पुराने समर्थक चले आ रहे हैं – की अध्यक्षता में हुआ, तो ज़ोरदार बहस
छिड़ी। अच्छी नोक-झोंक हुई। समस्या यह थी कि अछूतों को यज्ञोपवीत धारण
करने का हक़ है अथवा नहीं? तथा क्या उन्हें वेद-शास्त्रों का अध्ययन करने का
अधिकार है? बड़े-बड़े समाज-सुधारक तमतमा गये, लेकिन लाला जी ने सबको
सहमत कर दिया तथा ये दो बातें स्वीकृत कर हिन्दू धर्म की लाज रख ली। वरना
ज़रा सोचो, कितनी शर्म की बात होती। कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है। हमारी
रसोई में निःसंग फिरता है, लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाये तो बस
धर्म भ्रष्ट हो जाता है। इस समय मालवीय जी जैसे बड़े समाज-सुधारक, अछूतों
के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या पहले एक मेहतर के हाथों गले में हार डलवा
लेते हैं, लेकिन कपड़ों सहित स्नान किये बिना स्वयं को अशुद्ध समझते हैं! क्या
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 267