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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 788 में से

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पृष्ठ 270

डाका डालें। वे यहाँ आये। जब लौट चले और बड़ा षड्यन्त्र न बन सका और
पिस्तौल वाला बंगाली भी हाथों से निकल चला तब उसे गिरफ़्तार करवा दिया
गया। उसके पकड़े जाते ही पूरा भण्डाफोड़ हो गया। अब क्या किया जाये? फिर
पुलिस उसे छोड़ना भी चाहती थी लेकिन किसी बहाने से। उसी पत्र लिखने
वाले 'पी' को बुलाकर उसकी जमानत ले ली गयी। 'पी' के पास कोई सम्पत्ति
नहीं थी, उसका पूरा माल 5 रुपये से ज़्यादा का नहीं था, लेकिन 500 की
जमानत मंज़ूर हो गयी। खुफ़िया काम करने वाला आतंकवादी भला किस तरह
आगे आकर उस परदेशी से अपनी दोस्ती प्रकट कर षड्यन्त्र का सबूत पैदा कर
सकता था? वे तो सभी पुलिस के आदमी थे। फिर तारीख़ पर बंगाली हाज़िर न
हुआ। जमानत भी ज़ब्त न हुई। वह और तेज़ाब वाला मोहनलाल भी क्यों छूट
गया? यदि यह मान भी लें कि उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं थे, तो भी
120बी धारा के अधीन उन पर साज़िश का मुक़दमा क्यों न चलाया गया?
एक ने डाका डालने का पत्र लिखा। पुलिस ने उसका चित्र ले लिया। पत्र
पत्रवाले के पास पहुँच गया। वह भला आदमी पुलिस को पत्र नहीं देता कि मुझे
किसी ने डकैती के लिए बुलाया है, बल्कि वह एक और आदमी को पिस्तौल
सहित ले जाता है जो पिस्तौल सहित पकड़ा जाता है। क्या साज़िश का मुक़दमा
नहीं बनता था? धारा 120बी में साफ़ लिखा है कि — 'Who ever is party to a
criminal conspiracy to Commit an offence—be punished is the same
manner as if he had abetted such offence.' यानी जो भी ऐसी साज़िश का
सदस्य हो जिसने कोई जुर्म करने की साज़िश की हो, उसे ऐसे जुर्म में मदद करने
की सज़ा मिलनी चाहिए। देवघर (बिहार) में इस समय जो बड़ा भारी साज़िश का
केस चल रहा है, उसमें यही है कि — 'You—did agree with one another—
to do or cause to be done an illegal act—and thereby you committed an
offence punishable under section 120 B—' तुम लोगों ने आपस में तय किया
कि जुर्म किये जायें, इसलिए तुम पर धारा 120बी लगायी जाती है।
उन पर भी किसी जुर्म करने का आरोप नहीं लगाया गया, सिर्फ़ 'यह करने
की', 'वह करने की' साज़िश का जुर्म लगाया गया। उस मुक़दमे का पूरा हाल
पढ़ने पर तो हमारा यही विचार बनता है कि वह मुक़दमा भी पुलिस ने बनाया है।
एक व्यक्ति वीरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य के घर की तलाशी हुई। उसने पुलिस को अपने
कमरे में बुलाकर दो पिस्तौल और एक कापी दी, जिसमें साठ व्यक्तियों के पते
लिखे हुए थे। पुलिस के आने तक उसने कापी को जला डालने की भी कोशिश
नहीं की। जानबूझकर ही नहीं की। उनमें से बीस व्यक्ति पकड़कर साज़िश का
मामला बना दिया गया। एक पंजाबी नौजवान, जिसका नाम श्री इन्द्रचन्द्र नारंग है,
को भी रगड़ा जा रहा है। आप कामलियेवाली श्री पार्वती देवी के सबसे छोटे भाई
264 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़