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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 788 में से

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हैं। लेकिन आमतौर पर पुलिस भी ऐसे षड्यन्त्र नहीं करती, स्वयं सरकारें करवाती
हैं। उदाहरणतः जब कभी बड़े भारी आन्दोलन की सम्भावना होती है, उसे दबाने
के लिए, अत्याचार करने का बहाना ढूँढ़ने के लिए वह अपने आदमियों को उनमें
मिला देती है और वे कोई न कोई ग़लती करवा देते हैं, जिससे अत्याचार का बहाना
मिल जाता है। दूर जाने की ज़रूरत नहीं, आजकल जो भी हड़तालें हुई हैं उनमें
भी ऐसे आदमी छोड़े जाते हैं जो दंगा करवाने के लिए लोगों को भड़काते रहते हैं
और अत्याचार का बहाना ढूँढ़ने का यत्न करते रहते हैं। रूस में तो इन लोगों ने कई
बार बहुत अत्याचार करवाया और हज़ारों निर्दोष लोगों को फाँसी पर लटकवा दिया।
बड़े-बड़े आन्दोलन कुचल डाले गये। लेकिन ये आखिरी चालें होती हैं, इनसे राज
प्राप्त नहीं होते, बल्कि जुल्म करने से जड़ें जल्दी उखड़ जाती हैं। ख़ैर! अंग्रेज़ी राज
भी अब ऐसी आखिरी चालों पर उतर आया है। 1923 के आखिर में जब स्वराज
पार्टी बनी, पिछला शान्तिपूर्ण आन्दोलन असफल हो गया था। तब सरकार ने इस
स्थिति से डरते हुए कि कहीं फिर आतंकवादियों की बड़ी भारी पार्टी न बन जाये,
अपने आदमी इन बातों के प्रचार के लिए छोड़े और जल्द ही नियम 1818 के
अधीन बहुत-से लोगों को गिरफ़्तार कर लिया। 25 जुलाई, 1924 को उन बन्दियों
में से दो यानी श्री भूपेन्द्रनाथ दत्त और श्री जीवनलाल चटर्जी ने एक पत्र
भारत-मन्त्री के नाम लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि बंगाल में ऐसे आदमी छोड़े गये
हैं जिनकी हम, यदि एक निष्पक्ष समिति बने तो, पूरी पोल खोल दें। लेकिन सरकार
कब सुनने वाली थी। इन बातों से सिद्ध होता है कि सरकार की अपनी नीयत भी
ऐसी ही है।
सवाल यह पैदा होता है कि के.सी. बनर्जी खुफ़िया काम करने वाला जासूस
(Spy) ही था या षड्यन्त्रकारी Agent Provocateur था? या सरकार का इस
मामले में कोई हाथ था? स्थिति पर ज़रा ध्यान से सोचें तो पता चलता है कि इन
तीन-चार आदमियों में से एक से अधिक खुफ़िया जासूस थे और सरकार ने
पंजाब के काम करने वाले होनहार नौजवानों के ख़िलाफ़ षड्यन्त्र किया था,
सौभाग्य से जिसका बड़े सुन्दर ढंग से भण्डाफोड़ हो गया। बात यह है कि
नेशनल कॉलेज के एक ग्रेज्युएट ने, जिसके बारे में ट्रिब्यून में मिस्टर पी. लिखा
है, वह पत्र लिखा था। यह नौजवान बहुत मूर्ख व कमीना है। लगता है कि वह
भी ऐसा ही एजेण्ट प्रोवोकेटर है। उसके सम्बन्ध में आमतौर पर शिकायत सुनी
गयी थी कि वह बहुत बड़ी-बड़ी डींगें हाँकता है और कहता फिरता है कि मैं
एक राज क्रान्तिकारी दल का नेता हूँ। ख़ैर, कम से कम वह मूर्ख तो बहुत था,
बुरा भले ही न हो। लेकिन आगे की स्थिति से पाठक स्वयं निष्कर्ष निकाल
लेंगे। पहले की कहानी ट्रिब्यून में छपी है। उसके बाद जो हाल पता चला है,
आगे सब उसी के आधार पर लिखा जा रहा है। उसने यह पत्र लिखा कि आओ,
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 263