भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस बंगाली का नाम है, उसके साथ दोस्ती करने के लिए कहा गया ताकि उससे
पिस्तौलें ले ली जायें। उसने एक पिस्तौल ले लिया और पुलिस अधिकारियों ने
उससे कहा कि यह तुम अपने पास ही रखो।
एक दिन लाहौर के किसी आदमी का पत्र बंगाली के मार्फ़त मोहनलाल के
नाम लिखा हुआ गया। उसमें लिखा हुआ था कि तुम आदमी और चीजें लेकर
लाहौर पहुँचो, क्योंकि फ़िरोज़पुर में डाका डालना है। बंगाली ने वह पत्र पुलिस
अधिकारियों को दे दिया, जिन्होंने पत्र का फ़ोटो लेकर पत्र लौटा दिया, बनर्जी ने
वह पत्र मोहनलाल को दे दिया। अधिकारियों की सलाह से वह पिस्तौल साथ
लेकर मोहनलाल के साथ लाहौर आ गया। यहाँ से एक आदमी को डकैती की
जगह की देखभाल के लिए भेज दिया गया, पर न जाने किस कारण से डकैती
न हुई और दोनों मेरठ के लिए लौट पड़े, लेकिन लाहौर रेलवे स्टेशन पर गिरफ़्तार
कर लिये गये।
पकड़े जाते ही बंगाली ने पुलिस को बता दिया था कि वह खुफ़िया पुलिस
का आदमी है और पिस्तौल भी एक तरह से सरकारी है और उसे यह कहकर दिया
गया था कि तुम यह पिस्तौल किसी दूसरे के हाथ में दे देना। लेकिन स्थिति ऐसी
बन गयी कि वह स्वयं गिरफ़्तार हो गया। अब पुलिस उसे छोड़ना भी चाहती थी
लेकिन अचानक छोड़ने से सन्देह होने का ख़तरा था, सो उसे 500 रुपये की
जमानत पर रिहा कर दिया गया।
तारीख़ के दिन वह पेश न हुआ तो भी उसकी जमानत ज़ब्त न की गयी।
लेकिन मजिस्ट्रेट को पूरी कथा मालूम नहीं थी, इसलिए उसने ज़्यादा वफ़ादारी
दिखाने के लिए अधिकाधिक सम्भव सज़ा दे दी। आर्म्स एक्ट के तहत दूसरे प्रान्तों
में आमतौर पर छह महीने क़ैद होती है, लेकिन यह पंजाब जो हुआ! यहाँ पाँच साल
सज़ा हुई। अब बंगाली की साँस फूल गयी। पत्र पर पत्र लिखे। कहीं राय साहब,
लाला चुन्नीलाल, कप्तान लाहौर और कहीं कप्तान मेरठ को पत्र लिखे। पूरा हाल
बयान किया। उन्हीं में से कुछ पत्र किसी तरह ‘ट्रिब्यून’ के हाथ लग गये और वही
छपवा दिये गये। कौंसिल में इसी पर बहस हुई। सरकारी सदस्यों ने चुपचाप बात
मान ली। उन्होंने कहा कि वह हमारा जासूस था। पंजाब पुलिस को पहले पूरी बात
पता नहीं थी, पता लगने पर उसे लोगों के सन्देह से बचाने के लिए मुक़दमे का
ढोंग किया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या वह सिर्फ़ जासूस ही था या
साथ ही भड़काने वाला (Agent Provocateur) भी था? एजेण्ट प्रोवोकेटर का काम
(Investigate) या तफ़्तीश करना नहीं होता बल्कि (To create) जुर्म पैदा करना
होता है। आमतौर पर पुलिस अपनी ज़रूरत सिद्ध करने के लिए ऐसा कुछ काम
करती रहती है। लाला लाजपत राय ने एक बार तुर्की की खुफ़िया पुलिस की
करतूत की कहानी लिखी थी। रूस में एजेण्ट प्रोवोकेटर बहुत-सा काम करते रहे
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