भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
ही ख़ाली बैठे मौज़ मारते हैं। वे भी किसानों का लहू पीने वाली जमात में शामिल
हैं। आम लोग देशभक्तों की कुर्बानियों और योग्यता का कोई ख़ास फ़ायदा नहीं उठा
सकते। क्या यह सही न होता कि ये लोग पुराने समय के साधुओं की तरह ही सीधे
आम लोगों के पास चले गये होते और अपनी बहुमूल्य ज़िन्दगी मध्यम वर्ग को ही
अर्पित करके न गँवा दी होती। यह इतना ज़रूरी सवाल है जो कभी आँखों से
ओझल नहीं किया जा सकता। मैं हर एक बन्दे की ख़िदमत करने को अपना आदर्श
समझने वाले नौजवानों से कहूँगा कि मध्यम वर्ग के लोगों के फ़ायदों को अपनी
राह में न ठहरने दो। सीधे साधारण लोगों के पास जाओ। हम क्योंकि मध्यम वर्ग
के लोगों में से हैं, इसलिए हो सकता है कुछ भूल करें और अपनी-अपनी जमात
को कलंकित करें और दिल को तसल्ली देते रहें कि हम लोगों की सेवा कर रहे
हैं। मैं चाहता हूँ कि नौजवान इस ख़तरे से बचे रहें।
स्त्री-शिक्षा का शोर भी मध्यम वर्ग के लोगों का ही मसला है। हमारी
कन्या-पाठशालाओं में किसानों की कितनी लड़कियाँ शिक्षा ग्रहण कर रही हैं?
असल में गाँवों में तो यह सवाल ही नहीं है, क्योंकि वहाँ तो मर्द भी अनपढ़ हैं।
यह सवाल तो तालीमायाफ़्ता नौजवानों के लिए पढ़ी हुई लड़कियों की ज़रूरत से
ही पैदा हुआ कि लड़कियों को भी शिक्षा दी जाय। इससे मध्यम वर्ग के लोगों
के घर अधिक खुशहाल और आराम वाले बन गये। लेकिन कुछ एक महलों की
मौजूदगी से आम लोगों की हालत किस तरह सुधर सकती है? उन लोगों के
आराम और तरक्की से किसानों और मज़दूरों को कोई लाभ नहीं पहुँच सकता।
वह ग़रीब इन चीज़ों से कोई भी लाभ नहीं उठा सकते। यदि यह शैक्षणिक लहरें
आम लोगों की बेहतरी के लिए जारी की गयी होतीं तो सबसे पहले गाँवों में
स्कूल खोले जाते (क्योंकि) किसी भी मुल्क के आम लोगों में प्रारम्भिक शिक्षा
के बिना जागृति नहीं आ सकती। हमें अपने देश की उन्नति के लिए सबसे पहले
यही नींव डालनी पड़ेगी।
साम्प्रदायिक और भाईचारे की लहरें
इस समय हमारे देश में जो अलग-अलग साम्प्रदायिक और भाईचारे की लहरें शोर
मचा रही थीं यह भी इन्हीं मध्यम वर्ग के लोगों के दिमाग़ की उपज है। उदाहरण
के रूप में पर्दे के सवाल को ही ले लें। ग़रीब मज़दूर औरतें तो सारा-सारा दिन
सिरों पर टोकरियाँ उठाती हैं या खेतों में मेहनत-मज़दूरी करके बड़ी मुश्किल से
रोटी कमा सकती हैं। उनके आगे यह पर्दे का सवाल किस तरह पेश हो सकता
है? मध्यम वर्ग के लोगों की आराम भरी ज़िन्दगी में ही यह सवाल उठ सकते हैं।
मैं एक-एक कर ऐसी सभी साम्प्रदायिक और भाईचारे की लहरों में वर्ग-रुचि का
असर देखता हूँ।
परिशिष्ट / 535
अन्त में इतना ही कहूँगा कि वह नौजवान जो दुनिया में कुछ काम करना चाहते
हैं या जो लोग भगवान के हर बन्दे की सेवा करने के लिए अपनी क़ीमती
ज़िन्दगियाँ वक़्फ़ करना चाहते हैं, वे हिन्दुस्तानी मज़दूरों और किसानों में मिलकर
उनकी रुचि समझने की कोशिश करें और उनकी असली तकलीफ़ें दूर करते हुए
उनकी सच्ची उन्नति के लिए आन्दोलन करें। मैंने सरसरी निगाह से वर्तमान समय
की गतिविधियों के कुछेक प्रमाण देकर एक ख़ास रुचि की ओर इशारा किया है।
इसमें कुछेक नेकदिल लोगों को जोकि इन लहरों में शामिल हैं, नाराज़ नहीं होना
चाहिए। मैं उनकी हमदर्दी और सच्चाई को अनुभव करते हुए भी इस ग़लती की
ओर उनका ध्यान दिलाना अपना फ़र्ज़ समझता हूँ, क्योंकि मैं मानता हूँ कि यूरोपियन
मुदबर का यह कथन सोलह आने सही है कि एक कारकून का अपने काम से
ही अनजान होना ख़तरनाक और हलाल कर देने वाली बात है।
536 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
परिशिष्ट : आठ
एक दुर्लभ दस्तावेज़
श्रीमान जी,
मुझे 29 मई 1927 को भारतीय दण्ड विधान की धारा 302 के अन्तर्गत
गिरफ़्तार किया गया और पाँच सप्ताह तक पुलिस हिरासत में बन्द रखा गया। मुझे
4 जुलाई 1927 को जमानत पर छोड़ा गया। तब से मुझे कभी भी पुलिस द्वारा या
किसी भी अदालत द्वारा इस धारा के अन्तर्गत मुक़दमे का सामना करने के लिए
नहीं बुलाया गया, अतः मैं मान रहा हूँ कि आपकी छानबीन पूरी हो गयी है और
मेरे ख़िलाफ़ कुछ नहीं मिला है और व्यवहारतः आपने केस वापिस ले लिया है।
इन परिस्थितियों में मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि मेरी गिरफ़्तारी के समय मेरे
शरीर से बरामद सभी वस्तुएँ कृपया लौटा दें। मुझे सूचित करें कि इस उद्देश्य के
लिए मैं आपसे कब और कहाँ मिलूँ। जल्द अनुग्रह का बहुत आभार होगा।
आपका इत्यादि
भगतसिंह के मुक़दमे में इस पत्र को विशेष अदालत के जज जे. कोल्डस्ट्रीम
के समक्ष प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया। मूल ख़त व भगतसिंह के पिता
सरदार किशन सिंह का लेटरहेड अंग्रेज़ी में है। पत्र टाइप किया हुआ है जिसमें
एक-दो शब्द हाथ से लिखे गये हैं। यह पत्र एस. आई. सादिक़ अली शाह के 2
मई, 1929 के दस्तख़त के बाद अदालत में प्रस्तुत किया गया जिसे पढ़कर लाहौर
षड्यन्त्र केस की फ़ाइल से जोड़ा गया। – स.
परिशिष्ट / 537
परिशिष्ट : नौ
भगतसिंह का उर्दू हस्तलेख
دل سے تو ایسی فرزانہ پروردگار دے
جو غم کی گھڑی کو بھی خوشی سے گزار دے +
. : .
سجا کر میّتِ امید، ناکامی کے پھولوں سے
کسی ہمدرد نے رکھ دی مِرے ٹوٹے ہوئے دل میں +
. : .
چھیڑ نہ واعظ قصۂ ذکرِ غمِ پنہاں
کیوں یاد دلاتے ہو بھولا ہوا افسانہ +
. : .
538 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
परिशिष्ट : दस - भगतसिंह का अंग्रेज़ी हस्तलेख
48
Internationale
Arise, ye prisoners of starvation!
Arise, ye wretched on earth,
For justice thunders condemnation,
A better world's in birth.
No more tradition's chains shall bind us,
Arise, ye slaves! no more in thrall!
The earth shall rise on new foundations,
We have been naught, and we be all.
[Refrain]
It is the final conflict;
Let each stand in his place,
The Internationale Party
Shall be the human race.
Behold them seated in their glory,
"The kings of mine and rail and soil!
What would you read in all their story
But how they plundered toil?
Fruits of people's work are buried
In the strong coffers of a few;
In voting for their restitution,
The men will ask only their due.
[Same Refrain]
Toilers from shops and fields united,
The party we of all who work;
The earth belongs to us, the people,
No room here for the shirk,
How many on our flesh have fattened?
" But if the noisome birds of prey,
Shall vanish from our sky some morning
The blessed sunlight still will stay.
[Same refrain]
परिशिष्ट : ग्यारह – भगतसिंह को सज़ा-ए-मौत
की तामीली का ट्रिब्यूनल द्वारा जारी वारण्ट
565-w
4-4-31 WARRANT OF EXECUTION ON SENTENCE OF DEATH
Stay Execution (?)
Section 381 of the Criminal Procedure Code,
Sections 8 and 11 of Ordinance No: III of 1930.
In the Court of the LAHORE CONSPIRACY CASE TRIBUNAL,
Lahore, constituted under Ordinance No: III of 1930.
TO THE SUPERINTENDENT OF THE CENTRAL JAIL AT LAHORE
WHEREAS Bhagat Singh, son of Kishen Singh,
resident of Khawasrian, Lahore, one of the prisoners
in the Lahore Conspiracy Case, having been found
guilty by us of offences under section 121 and sec-
tion 302 of the Indian Penal Code and also under
section 4(b) of the Explosive Substances Act read
with section 6 of that Act and with section 120-B
of the Indian Penal Code at a trial commencing from
the 5th May, 1930, and ending with the 7th October,
1930, is hereby sentenced to death,
This is to authorise and require you, the said
Superintendent, to carry the said sentence into
execution by causing the said BHAGAT SINGH to be
hanged by the neck until he be dead at Lahore, on the
27th day of October, 1930, and to return this
warrant to the High Court with an endorsement certi-
fying that the sentence has been executed.
Given under our hands and the seal of the Court,
this 7th day of October, 1930.
[Sd/- J. Hilton]
PRESIDENT OF THE TRIBUNAL.
[Sd/- J. K. Tapp] [Sd/- Abdul Qadir]
MEMBER OF THE TRIBUNAL. MEMBER OF THE TRIBUNAL.
WARRANT OF EXECUTION ON SENTENCE OF DEATH
Section 381 of the Criminal Procedure Code. Sections 8 and II of Ordinance No.
III of 1930.
In the Court. of the Lahore Conspiracy Case Tribunal, Lahore, constituted under
Ordinance No. III of 1930.
TO THE SUPERINTENDENT OF THE CENTRAL JAIL AT LAHORE
WHEREAS Bhagat Singh, son of Kishen Singh. resident of Khawasrian. Lahore,
one of the prisoners in the Lahore Conspiracy Case, having been found guilty by us of
offence under section 121 and section 302 of the Indian Penal Code and also under
section 4(b) of the Explosive Substances Act read with section 5 of that Act and with
section 12-F of the Indian Penal Code at a trial commencing from the 5th May, 1930
and ending with the 7 October. 1930, is hereby sentenced to death.
This is to authorise and require you, the said Superintendent, to carry the said sentence
into execution by causing the said BHAGAT SINGH to be hanged by the neck until he to
be dead at Lahore on the 17th day of October, 1930, and to return this warrant to the
High Court with an endorsement certifying that the sentence has been executed.
Given under our hands and the seal of the Court this 7th day of October, 1930.
Seal of the tribunal,
Sd/- PRESIDENT OF THE TRIBUNAL.
Sd/- Member of the Tribunal
Sd/- Member of the Tribunal
मृत्युदण्ड पर अमल का वारण्ट
अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 381, 1930 के अध्यादेश सं. III की धारा 8 एवं II.
1930 के अध्यादेश सं. III के तहत गठित लाहौर षड्यन्त्र केस ट्रिब्यूनल की अदालत में।
लाहौर सेण्ट्रल जेल के सुपरिण्टेण्डेण्ट के लिए
भगतसिंह, वल्द किशनसिंह, निवासी खवासरियाँ, लाहौर, जो लाहौर षड्यन्त्र केस के क़ैदियों
में से एक है, को 5 मई, 1930 को शुरू होकर 7 अक्टूबर, 1930 को ख़त्म हुए मुक़दमे
में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 121 और धारा 302 के तहत और विस्फोटक पदार्थ क़ानून
की धारा 5 के साथ पठित उस क़ानून की धारा 4(बी) और भारतीय दण्ड संहिता की धारा
120-एफ़ के तहत अपराध का दोषी पाया गया है और एतद्द्वारा मृत्युदण्ड दिया जाता है।
इस आदेश द्वारा आपको, उपरोक्त सुपरिण्टेण्डेण्ट को, अधिकृत किया जाता है और
अपेक्षा की जाती है कि इस आदेश पर अमल करते हुए 17 अक्टूबर के दिन लाहौर में उपरोक्त
भगतसिंह को गरदन से तब तक लटकाया जाये जब तक उसकी मृत्यु न हो जाये, और आदेश
पर अमल के प्रमाणपत्र के साथ इस वारण्ट को हाईकोर्ट को वापस भेज दें।
हमारे हाथों से तथा अदालत की मुहर के साथ आज 7 अक्टूबर 1930 को दिया गया।
ट्रिब्यूनल की मुहर
ह. ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष
ह. ट्रिब्यूनल के सदस्य
ह. ट्रिब्यूनल के सदस्य
परिशिष्ट / 541
परिशिष्ट : बारह
भगतसिंह को फाँसी के बाद
जेल सुपरिण्टेण्डेण्ट का प्रमाणपत्र
[मुहर: ... APR. 1931 / JUDICIAL DEPTT.]
I hereby certify that the sentence of death
passed on Bhagat Singh has been duly
executed, and that the said Bhagat Singh
was accordingly hanged by the neck till he was
dead, at Lahore C. Jail on Monday the 23rd day
of March 1931; at 7.30 P.M. that the body remained
suspended for a full hour, and was not taken down
until life was ascertained by a medical officer to
be extinct; and that no accident, error or other
misadventure occurred.
[हस्ताक्षर] [हस्ताक्षर] Major I.M.S.
Superintendent of the Jail at
542 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
CERTIFICATE OF EXECUTION
OF THE DEATH SENTENCE
Seal of the
Judicial Department
I HEREBY certify that the sentence of death passed on Bhagat Singh has been duly
executed, and that the said Bhagat Singh was accordingly hanged by the neck till he
was dead, at Lahore Central Jail on Monday, the 23rd day of March, 1931, at 7 p.m.,
that the body remained suspended for a full hour, and was not taken down until life
was ascertained by a medical officer to be extinct; and that no accident, error or other
misadventure occurred.
Sd. Illegible Superintendent of the Jail.
मृत्युदण्ड पर अमल का प्रमाणपत्र
न्यायिक विभाग
की मुहर
मैं एतद् द्वारा प्रमाणित करता हूँ कि भगतसिंह को दिये गये मृत्युदण्ड की
तामील कर दी गयी है, और कि तद्नुसार उपरोक्त भगतसिंह को सोमवार 23 मार्च,
1931 को शाम 7 बजे लाहौर सेण्ट्रल जेल में गरदन से उस समय तक लटकाये
रखा गया जब तक उसकी मृत्यु न हो गयी, कि शरीर पूरे एक घण्टे तक लटका
रहा, और उसे तब तक नीचे नहीं उतारा गया जब तक मेडिकल अफ़सर द्वारा
जीवन निश्शेष होने की पुष्टि नहीं कर ली गयी; और कि कोई दुर्घटना, त्रुटि या
कोई अन्य अनिष्ट नहीं हुआ।
ह. अस्पष्ट जेल सुपरिण्टेण्डेण्ट
परिशिष्ट / 543
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खण्ड दो
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक
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भूमिका
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक को हिन्दी पाठकों के हाथों में देते हुए हमें मिश्रित
अनुभूति हो रही है। इतिहास की इस अनमोल धरोहर को आप तक पहुँचाकर हम
गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं, पर साथ ही इसमें हुई देरी की कचोट भी है।
भारतीय इतिहास के इस दुर्लभ दस्तावेज़ का महत्त्व सिर्फ़ इसकी ऐतिहासिकता
में ही नहीं है। भगतसिंह के अधूरे सपने को पूरा करने वाली भारतीय क्रान्ति आज
एक ऐसे पड़ाव पर है जहाँ से नये, प्रचण्ड वेग से आगे बढ़ने के लिए इसके
सिपाहियों को 'इन्क़लाब की तलवार को विचारों की सान पर' नयी धार देनी है।
यह नोटबुक उन सबके लिए विचारों की रोशनी से दमकता एक प्रेरणापुंज है जो
इस विरासत को आगे बढ़ाने का जज़्बा रखते हैं।
आज जब भारतीय क्रान्ति सामने उपस्थित सवालों-चुनौतियों से जूझ रही है,
युवा क्रान्तिकारियों की नयी पीढ़ी के कन्धों पर रास्ता निकालने और उस पर बढ़ने
का कार्यभार है तथा एक नये सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन का काम इतिहास
के एजेण्डे पर है, तो इस नोटबुक को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने बार-बार
उस नौजवान की छवि उभरती है जो फाँसी के फन्दे के साये में बैठकर भारतीय
इन्क़लाब के रास्ते की सही समझ हासिल करने और उसे लोगों तक पहुँचाने के
लिए आख़िरी पल तक अध्ययन-मनन और लेखन में जुटा रहा।
जेल में भगतसिंह ने चार पुस्तकें लिखी थीं। हो सकता है ये नोट्स इन पुस्तकों
की तैयारी में लिये गये हों। चारों पाण्डुलिपियाँ आज नष्ट हो चुकी हैं। लेकिन आज
भी उनके बारे में न तो कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध है और न ही किसी ने
भारतीय इतिहास के इस अँधेरे पक्ष पर शोध करने की ज़रूरत समझी है।
नोट बुक के महान ऐतिहासिक महत्त्व और आज इसकी विशेष प्रासंगिकता को
रेखांकित करने के लिए हमने आलोक रंजन और एल. वी. मित्रोखिन के दो लेख
भी शामिल किये हैं। हम चाहेंगे कि आप नोटबुक से पहले इन लेखों को अवश्य
पढ़ें। नोटबुक को सही परिप्रेक्ष्य और पृष्ठभूमि में समझने में इन लेखों से काफ़ी
मदद मिलेगी। भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन के वैचारिक विकास पर हमने
भगतसिंह के साथी शिववर्मा का विस्तृत लेख भी शामिल किया है।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 547
नोटबुक की प्रस्तुति के बारे में कुछ बातें
हमारी इच्छा थी कि जहाँ तक सम्भव हो हस्तलिखित नोटबुक की मूल
शक्ल बनी रहे, भगतसिंह ने जिस तरीक़े से नोट्स लिये हैं उन्हें लगभग उसी ढंग
से प्रस्तुत किया जाये। लेकिन किताब की शक्ल में प्रस्तुत करने के लिए कुछ
बदलाव करने पड़े हैं।
पूरी नोटबुक भगतसिंह के छोटे अक्षरों वाली लिखावट में लिखी गयी है।
ज़्यादातर नोट्स के भगतसिंह ने छोटे पर सटीक और सारगर्भित शीर्षक दिये हैं।
अनेक शीर्षक हाशिये पर भी दिये गये हैं। कहीं-कहीं कुछ महत्त्वपूर्ण वाक्यों या
वाक्यांशों को भी हाशिये में लिखा गया है।
— हमने सभी शीर्षकों तथा हाशिये पर अंकित वाक्यों को टेक्स्ट के साथ
ही रखा है पर भगतसिंह द्वारा दिये गये महत्त्व के अनुसार उन्हें छोटे या बड़े अक्षरों
में दिया गया है।
— भगतसिंह द्वारा रेखांकित किये गये हिस्सों को मोटे अक्षरों में दिया गया
है।
— भगतसिंह ने कई जगहों पर कुछ हिस्सों पर अतिरिक्त बल देने के लिए
बायीं ओर खड़ी लकीर खींची है। इसे पुस्तक में ऐसे ही दिखाया गया है।
नोटबुक में आये अधिकांश सन्दर्भों की जानकारी हमने पाठकों को देने की
कोशिश की है, फिर भी कुछ सन्दर्भ अज्ञात रह गये हैं। पाठकों से अनुरोध है कि
यदि उन्हें इस बारे में जानकारी हो तो हमें बतायें। इस सम्बन्ध में हमें श्री भूपेन्द्र
हूजा के सम्पादन में ‘इण्डियन बुक क्रॉनिकल’ द्वारा सर्वप्रथम अंग्रेज़ी में प्रकाशित
A Martyr's Notebook से काफ़ी मदद मिली जिसके लिए हम उनका आभार
व्यक्त करते हैं।
सत्यम
नई दिल्ली
548 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
प्रस्तावना
भगतसिंह की जेल नोटबुक
जो शहादत के तिरसठ वर्षों बाद छप सकी
आलोक रंजन
रूसी विद्वान एल.वी. मित्रोखिन वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1981 में प्रकाशित
अपनी पुस्तक 'Lenin and India' में पहली बार, एक अलग अध्याय में, भगतसिंह
की दुर्लभ जेल नोटबुक से विस्तृत हवाले देते हुए उनके द्वारा अन्तिम दिनों में किये
गये क्रान्तिकारी और मार्क्सवादी साहित्य के गहन अध्ययन पर प्रकाश डाला था
और उन योजक-सूत्रों को संयोजित करने की कोशिश की थी, जो भगतसिंह के
चिन्तन के संघटक अवयव थे।
भगतसिंह और उनके साथियों ने 1928 में ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट
रिपब्लिकन एसोसिएशन' की स्थापना के समय ही समाजवाद को लक्ष्य और
सिद्धान्त के रूप में स्वीकार कर लिया था, पर कमोबेश 1929 के मध्य तक
समाजवाद और मार्क्सवाद के प्रति उनका लगाव भावात्मक ही था, बुद्धिसंगत नहीं।
भगतसिंह के सहयोगी क्रान्तिकारी शिववर्मा सहित अनेक इतिहासकारों ने इस बात
का उल्लेख किया है कि 1929 में गिरफ़्तारी के बाद एच.एस.आर.ए. के युवा
क्रान्तिकारियों के एक धड़े ने, और विशेषकर भगतसिंह ने जेल में बड़ी मुश्किलों
से जुटाकर, क्रान्तिकारी साहित्य और मार्क्सवाद का गहन अध्ययन और उस पर
विचार-विमर्श किया। इसके परिणामस्वरूप वे अराजकतावादी और मध्यवर्गीय
दुस्साहसवाद को छोड़कर तेज़ी से सर्वहारा क्रान्ति के मार्क्सवादी सिद्धान्तों को
अपनाने की दिशा में आगे बढ़े। वैयक्तिक शौर्य एवं बलिदान से जनता को जगाने
और आतंकवादी रणनीति द्वारा उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष का रास्ता छोड़कर
उन्होंने अपने अतीत की आलोचना व समाहार किया तथा इस बात पर बल दिया
कि क्रान्ति की मुख्य शक्ति मज़दूर और किसान हैं, साम्राज्यवाद को केवल सर्वहारा
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 549
क्रान्ति द्वारा ही शिकस्त दी जा सकती है, मुख्यतः पेशेवर क्रान्तिकारियों पर
आधारित सर्वहारा वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी के मार्गदर्शन में व्यापक मेहनतकश
जनता व मध्यवर्ग के जनसंगठन खड़ा करके जनान्दोलन का मार्ग अपनाया जाना
चाहिए और यह कि, इसके बाद ही सशस्त्र क्रान्ति द्वारा सत्ता पलटकर सर्वहारा
अधिनायकत्व की स्थापना की जा सकती है। एच.एस.आर.ए. के सिद्धान्तकारों में
भगतसिंह सर्वोपरि थे और उनकी पूरी विचार-यात्रा को 1929 से मार्च 1931 तक
(यानी फाँसी चढ़ने तक) के उनके दस्तावेज़ों, लेखों, पत्रों और वक्तव्यों में देखा
जा सकता है। भगतसिंह के सर्वोन्नत विचार फ़रवरी 1931 के दो भाग के उस
मसविदा दस्तावेज़ में देखने को मिलते हैं जो 'क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा'
नाम से 'भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़' (सं. – जगमोहन सिंह,
चमनलाल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) में संकलित है।
भगतसिंह की जेल नोटबुक मिलने के बाद भगतसिंह के चिन्तक व्यक्तित्व
की व्यापकता और गहराई पर और अधिक स्पष्ट रोशनी पड़ी है, उनकी विकास
की प्रक्रिया समझने में मदद मिली है और यह सच्चाई और अधिक पुष्ट हुई है
कि भगतसिंह ने अपने अन्तिम दिनों में, सुव्यवस्थित एवं गहन अध्ययन के बाद
बुद्धिसंगत ढंग से मार्क्सवाद को अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाया था। एकबारगी
तो यह बात अविश्वसनीय-सी लगती है कि क्रान्तिकारी जीवन और जेल की
बीहड़ कठिनाइयों में भगतसिंह ने ब्रिटिश सेंसरशिप की तमाम दिक्क़तों के बावजूद
पुस्तकें जुटाकर इतना गहन और व्यापक अध्ययन कर डाला। महज 23 वर्ष की
छोटी-सी उम्र में चिन्तन का जो धरातल उन्होंने हासिल कर लिया था, वह उनके
युगद्रष्टा युगपुरुष होने का ही प्रमाण था। ऐसे महान चिन्तक ही इतिहास की दिशा
बदलने और गति तेज़ करने का माद्दा रखते हैं। भगतसिंह की शहादत भारतीय जनता
को आज भी क्षितिज पर अनवरत जलती मशाल की तरह प्रेरणा देती है, पर यह
भी सच है कि उनकी फाँसी ने इतिहास की दिशा बदल दी। यह सोचना ग़लत
नहीं है कि भगतसिंह को 23 वर्ष की अल्पायु में यदि फाँसी नहीं हुई होती तो
राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का इतिहास और भारतीय सर्वहारा क्रान्ति का इतिहास शायद
कुछ और ही ढंग से लिखा जाता।
बहरहाल, इतिहास की उतनी ही दुखद विडम्बना यह भी है कि आज भी इस
देश के शिक्षित लोगों का एक बड़ा हिस्सा भगतसिंह को एक महान वीर तो मानता
है, पर यह नहीं जानता कि 23 वर्ष का वह युवा एक महान चिन्तक भी था।
राजनीतिक आज़ादी मिलने के पचास वर्षों बाद भी सम्पूर्ण गाँधी वाङ्मय, नेहरू
वाङ्मय से लेकर सभी राष्ट्रपतियों के अनुष्ठानिक भाषणों के विशद्ग्रन्थ तक
प्रकाशित होते रहे पर किसी भी सरकार ने भगतसिंह और उनके साथियों के सभी
दस्तावेज़ों को अभिलेखागार, पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तिगत संग्रहों से निकालकर
550 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
छापने की सुध नहीं ली।
छुटपुट पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों, अजय कुमार घोष, शिव वर्मा,
सोहन सिंह जोश, जितेन्द्र नाथ सान्याल आदि भगतसिंह के समकालीन
क्रान्तिकारियों की विभिन्न पुस्तकों-लेखों, भगतसिंह के अनुज की पुत्री वीरेन्द्र
सिन्धु की पुस्तकों तथा गोपाल ठाकुर, जी. देवल, मन्मथनाथ गुप्त, बिपन
चन्द्र, हंसराज रहबर, कमलेश मोहन आदि इतिहासकारों-लेखकों के विभिन्न
लेखों एवं पुस्तकों से भगतसिंह के विचारक व्यक्तित्व पर रोशनी अवश्य पड़ती रही
है, पर बहुसंख्यक शिक्षित आबादी भी इससे बहुत कम ही परिचित रही है।
भगतसिंह के कुछ ऐतिहासिक बयानों-दस्तावेज़ों को सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध में
दिल्ली से कुछ क्रान्तिकारी वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों की पहल पर प्रकाशित होने
वाली ‘मुक्ति’ पत्रिका ने प्रकाशित किया। इसके बाद कई पत्रिकाओं ने और
क्रान्तिकारी ग्रुपों ने पुस्तिकाओं के रूप में भगतसिंह के चुने हुए कुछ लेखों को
छापने का काम किया। भगतसिंह के साथी शिववर्मा ने उनके चुनिन्दा लेखों का
संकलन अंग्रेज़ी और हिन्दी में प्रकाशित किया।
सबसे पहले जगमोहन सिंह (भगतसिंह की बहन के पुत्र) और चमनलाल
ने भगतसिंह और उनके साथियों के अधिकांश वक्तव्यों, लेखों, पत्रों और दस्तावेज़ों
को एक जगह संकलित किया (हालाँकि यह संकलन भी सम्पूर्ण नहीं है) जो
1986 में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ।
इस तथ्य की चर्चा भगतसिंह के कई साथियों और इतिहासविदों ने की
है कि जेल में उन्होंने चार और पुस्तकें लिखी थीं : ‘आत्मकथा’, ‘समाजवाद
का आदर्श’, ‘भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन’ तथा ‘मृत्यु के द्वार पर’।
दुर्भाग्यवश इनकी पाण्डुलिपियाँ आज उपलब्ध नहीं हैं और माना यही जाता है कि
वे नष्ट हो चुकी हैं। हालाँकि इनके ग़ायब होने की कहानी भी रहस्यमय है और
इसमें भी किसी साज़िश से पूरी तरह इन्कार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, यह
भारतीय इतिहास के सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंगों में से एक है।
अब हम भगतसिंह की उस ऐतिहासिक जेल नोटबुक की चर्चा पर आते हैं
जो पहली बार 1993 में जयपुर से ‘इण्डियन बुक क्रॉनिकल’ से 'A Martyrs
Notebook' नाम से प्रकाशित हुई। इसका सम्पादन भूपेन्द्र हूजा ने किया था। इस
डायरी के प्रारम्भ में दी गयी परिचयात्मक टिप्पणी के अनुसार, इसकी हस्तलिखित/
डुप्लीकेटेड प्रतिलिपि एक पैकेट के रूप में पहली बार जी.बी. कुमार हूजा
(गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार के तत्कालीन कुलपति) को 1981 में गुरुकुल, इन्द्रप्रस्थ
के दौरे के समय स्वामी अग्निवेश से मिली थी।
पर इससे भी पहले यह डायरी 1977 में एल.वी. मित्रोखिन ने फ़रीदाबाद में
रह रहे भगतसिंह के भाई कुलबीर सिंह के पास देखी थी और उसका विस्तृत
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 551
अध्ययन करके एक लेख लिखा था, जो 1981 में अंग्रेज़ी में प्रकाशित उनकी
पुस्तक 'Lenin and India' में एक अध्याय के रूप में शामिल किया गया। पुनः
1990 में इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद भी प्रगति प्रकाशन, मास्को से 'लेनिन
और भारत' नाम से प्रकाशित हुआ।
अब तक इस डायरी के सम्बन्ध में प्राप्त जानकारी को हम यहाँ सिलसिलेवार
प्रस्तुत कर रहे हैं।
1968 में भारतीय इतिहासकार जी. देवल ने 'पीपुल्स पाथ' पत्रिका में
भगतसिंह पर एक लेख लिखा था जिसमें 200 पन्नों की एक कापी का ज़िक्र
किया गया है। उक्त कापी में पूँजीवाद, समाजवाद, राज्य की उत्पत्ति, मार्क्सवाद,
कम्युनिज़्म, धर्म, दर्शन, क्रान्तियों के इतिहास आदि पर विभिन्न पुस्तकों के
अध्ययन के दौरान भगतसिंह द्वारा जेल में लिये गये नोट्स हैं। यह नोटबुक भगतसिंह
की फाँसी के बाद उनके परिवार वालों को सौंप दी गयी थी। देवल ने इसे
फ़रीदाबाद में रह रहे भगतसिंह के छोटे भाई कुलबीर सिंह के पास देखा था और
अध्ययन करके नोट्स लिये थे। अपने लेख में देवल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि
यह डायरी प्रकाशित की जानी चाहिए, पर ऐसा हुआ नहीं।
उक्त डायरी की जानकारी होने पर 1977 में रूसी विद्वान मित्रोखिन भारत
आये और कुलबीर सिंह के हवाले से उक्त डायरी के विस्तृत अध्ययन के बाद
एक लेख लिखा जो उनकी पुस्तक 'Lenin and India' का एक अध्याय बना।
हमें उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1979 के बाद इतिहास के कई शोधार्थियों
ने 404 पृष्ठों की उक्त जेल नोटबुक की एक फ़ोटो प्रतिलिपि तीन मूर्ति भवन
स्थित जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम व लायब्रेरी में भी देखी-पढ़ी। पर
इस पर अलग से कोई शोध निबन्ध कहीं भी प्रकाशित नहीं हुआ।
गुरुकुल कांगड़ी के तत्कालीन कुलपति जी.बी. कुमार हूजा 1981 में गुरुकुल
इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली से 20 किलोमीटर दक्षिण तुगलकाबाद रेलवे स्टेशन के निकट)
के दौरे पर गये थे। वहाँ संस्था के तत्कालीन मुख्य अधिष्ठाता स्वामी शक्तिवेश
ने गुरुकुल के 'हॉल ऑफ़ फ़ेम' के तहख़ाने में सुरक्षित इस ऐतिहासिक धरोहर की
एक हस्तलिखित/डुप्लीकेटेड प्रतिलिपि दिखलायी, जिसे जी.बी. कुमार हूजा ने
कुछ दिनों के लिए माँग लिया। बाद में स्वामी शक्तिवेश की हत्या हो गयी और
उक्त डायरी (प्रतिलिपि) हूजा जी के पास ही रह गयी।
1989 में भगतसिंह की शहादत के दिन 23 मार्च को जयपुर में कुछ
बुद्धिजीवियों ने 'हिन्दोस्तानी मंच' का गठन किया। उसी की प्रारम्भिक बैठकों
में जी.बी. कुमार हूजा ने भगतसिंह की जेल डायरी की जानकारी दी और
'हिन्दोस्तानी मंच' ने इसे प्रकाशित करने का निश्चय किया।
'इण्डियन बुक क्रॉनिकल' पत्रिका (जयपुर) के सम्पादक भूपेन्द्र हूजा को इस
552 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
परियोजना के सम्पादन की ज़िम्मेदारी दी गयी और 'हिन्दोस्तानी मंच' के महासचिव
सरदार ओबेराय, प्रो. आर.पी. भटनागर और डॉ. आर.सी. भारतीय ने उनके
सहयोगी की भूमिका निभायी। दुर्भाग्यवश, अर्थाभाव के कारण यह योजना खटाई
में पड़ गयी।
इसी दौरान डॉ. आर.सी. भारतीय को उक्त जेल नोटबुक की एक और टाइप
की हुई प्रतिलिपि प्राप्त हुई जो एक स्थानीय विद्वान डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी मास्को
अभिलेखागार से फ़ोटो-प्रतिलिपि कराकर लाये थे। 'मास्को प्रति' और 'गुरुकुल
प्रति' शब्दशः एक-दूसरे से मिल रहे थे।
1991 में भूपेन्द्र हूजा ने नोटबुक को किश्तों में अपनी पत्रिका 'इण्डियन बुक
क्रॉनिकल' में प्रकाशित करना शुरू किया। भगतसिंह की जेल नोटबुक इस रूप
में पहली बार व्यापक पाठक समुदाय तक पहुँची। डॉ. चमनलाल ने भी भूपेन्द्र हूजा
को सूचित किया कि उक्त नोटबुक की एक प्रतिलिपि उन्होंने भी नेहरू म्यूजियम
लायब्रेरी, नई दिल्ली में देखी थी।
इस तरह भूपेन्द्र हूजा व उनके सहयोगियों की नज़र में उक्त जेल नोटबुक की
आधिकारिकता और अधिक पुष्ट हुई। पहली बार 1994 में उक्त जेल नोटबुक
'इण्डियन बुक क्रॉनिकल' की ओर से ही भूपेन्द्र हूजा और जी.बी. कुमार हूजा
(बलभद्र भारती) की भूमिकाओं के साथ पुस्तकाकार प्रकाशित हुई। उक्त दोनों
भूमिकाओं से भी स्पष्ट है कि जी.बी.कुमार हूजा और भूपेन्द्र हूजा को इस तथ्य
की जानकारी नहीं थी कि उक्त डायरी की मूल प्रति भगतसिंह के भाई कुलबीर
सिंह के पास फ़रीदाबाद में भी मौजूद है। उन्हें जी. देवल के उस लेख की भी
सम्भवतः जानकारी नहीं थी जिन्होंने सबसे पहले 1968 में यह तथ्य उद्घाटित
किया था, न ही उन्हें मित्रोखिन का वह लेख (1981) ही मिला था जो उक्त
डायरी के विशद अध्ययन के बाद लिखा गया था।
बहरहाल, मित्रोखिन ने कुलबीर सिंह के पास उपलब्ध नोटबुक/डायरी से लिये
गये हवालों पर जो पृष्ठ अंकित किये हैं, उन्हें देखने से स्पष्ट हो जाता है कि जी.
बी. कुमार हूजा को प्राप्त 'गुरुकुल टेक्स्ट' उक्त मूल डायरी की ही
डुप्लीकेट/हस्तलिखित प्रतिलिपि है।
ऐसा सम्भव है कि डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी ने डायरी/नोटबुक की जो प्रतिलिपि
मास्को अभिलेखागार में देखी थी, वह मित्रोखिन ही भारत से ले गये हों। या यह
भी हो सकता है कि किसी और रूसी विद्वान ने भी डायरी का अध्ययन किया
हो।
बहरहाल, इन तथ्यों से डायरी की आधिकारिकता ही और अधिक पुष्ट होती
है।
'भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज' पुस्तक के सम्पादक-द्वय
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 553
जगमोहन सिंह और चमनलाल ने भी पुस्तक के दूसरे संस्करण की भूमिका (23
मार्च '89) में लिखा है : "भगतसिंह की जेल में लिखित 404 पृष्ठों की डायरी,
जिसमें महत्त्वपूर्ण राजनीतिक व दार्शनिक नोट्स हैं, अब भी सामान्य पाठकों की
पहुँच से बाहर है, हालाँकि इसकी फ़ोटो प्रति तीन मूर्ति स्थित जवाहरलाल नेहरू
मेमोरियल म्यूज़ियम व लायब्रेरी में सुरक्षित है। इस पर क्या कहा जा सकता है,
पाठक स्वयं ही सोचें।"
इस टिप्पणी से ऐसा लगता है कि जगमोहन सिंह और चमनलाल को भी यह
तथ्य ज्ञात नहीं था कि भगतसिंह की मूल जेल नोटबुक उनके भाई कुलबीर सिंह
के पास मौजूद है, जिसका अध्ययन 1968 में जी. देवल ने और 1977 में मित्रोखिन
ने किया था। यह विशेष आश्चर्य की बात इसलिए भी है क्योंकि जगमोहन सिंह
भी स्वयं भगतसिंह के परिवार के सदस्य हैं। वे भगतसिंह की बहन बीबी अमर
कौर के पुत्र हैं। भगतसिंह के दूसरे भाई कुलतार सिंह की पुत्री वीरेन्द्र सिन्धू ने भी
भगतसिंह पर दो पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने भी इसका उल्लेख नहीं किया है कि
भगतसिंह की जेल नोटबुक उनके परिवार के ही एक सदस्य के पास मौजूद है।
यदि इन परिवार-जनों को भी यह तथ्य नहीं पता था तो इस बारे में हमें कुछ नहीं
कहना। न ही इसकी अन्तर्कथा को जानने में हमारी कोई रुचि है।
यह सवाल हम यहाँ इसलिए उठा रहे हैं कि यह भारत में इतिहास की एक
गम्भीर समस्या है। आज़ाद भारत की कांग्रेसी सरकार ही नहीं, किसी भी पूँजीवादी
संसदमार्गी दल से हम यह अपेक्षा नहीं रखते कि उनकी सरकारें भगतसिंह के
विचारों को जनता तक पहुँचाने का काम करेंगी। उनका बस चलता तो वे भगतसिंह
की स्मृति तक को दफ़्न कर देतीं। पर यह उनके बस के बाहर की बात है।
लेकिन शहीदे-आजम भगतसिंह के परिवार-जनों का उनकी वैचारिक विरासत
के बारे में जो रुख रहा, उसके बारे में क्या कहा जाये? सीधा सवाल यह है कि
कुलबीर सिंह के पास यदि भगतसिंह की जेल नोटबुक मौजूद थी, तो उन्होंने उसे
भारतीय जनता तक पहुँचाने के लिए क्या कोशिश की? उन्होंने अख़बारों में,
इतिहासकारों को पत्र लिखकर इसे छपाने और जनता तक पहुँचाने की कोई कोशिश
क्यों नहीं की? क्या इसे प्रकाशित करने के लिए प्रकाशक नहीं मिलते? या जनता
से स्रोत-संसाधन नहीं जुटते? हमारी जानकारी के अनुसार, शहीदेआजम के परिवार
के लोग स्वयं भी इतने विपन्न नहीं हैं। उन्हें यदि भगतसिंह के आदर्शों से प्यार होता
और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की चिन्ता होती तो वे उक्त डायरी
स्वयं छपवा सकते थे। आश्चर्य तो तब होता है जब लगता है कि जेल नोटबुक के
कुलबीर सिंह के पास उपलब्ध होने का तथ्य स्वयं जगमोहन सिंह या वीरेन्द्र सिन्धू
को ही नहीं पता था। क्या यह एक शर्मनाक विडम्बना नहीं है कि भगतसिंह की
जेल नोटबुक पर आधारित पहला विस्तृत शोध-निबन्ध 1981 में एक रूसी विद्वान
554 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़