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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 788 में से

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ही ख़ाली बैठे मौज़ मारते हैं। वे भी किसानों का लहू पीने वाली जमात में शामिल
हैं। आम लोग देशभक्तों की कुर्बानियों और योग्यता का कोई ख़ास फ़ायदा नहीं उठा
सकते। क्या यह सही न होता कि ये लोग पुराने समय के साधुओं की तरह ही सीधे
आम लोगों के पास चले गये होते और अपनी बहुमूल्य ज़िन्दगी मध्यम वर्ग को ही
अर्पित करके न गँवा दी होती। यह इतना ज़रूरी सवाल है जो कभी आँखों से
ओझल नहीं किया जा सकता। मैं हर एक बन्दे की ख़िदमत करने को अपना आदर्श
समझने वाले नौजवानों से कहूँगा कि मध्यम वर्ग के लोगों के फ़ायदों को अपनी
राह में न ठहरने दो। सीधे साधारण लोगों के पास जाओ। हम क्योंकि मध्यम वर्ग
के लोगों में से हैं, इसलिए हो सकता है कुछ भूल करें और अपनी-अपनी जमात
को कलंकित करें और दिल को तसल्ली देते रहें कि हम लोगों की सेवा कर रहे
हैं। मैं चाहता हूँ कि नौजवान इस ख़तरे से बचे रहें।
स्त्री-शिक्षा का शोर भी मध्यम वर्ग के लोगों का ही मसला है। हमारी
कन्या-पाठशालाओं में किसानों की कितनी लड़कियाँ शिक्षा ग्रहण कर रही हैं?
असल में गाँवों में तो यह सवाल ही नहीं है, क्योंकि वहाँ तो मर्द भी अनपढ़ हैं।
यह सवाल तो तालीमायाफ़्ता नौजवानों के लिए पढ़ी हुई लड़कियों की ज़रूरत से
ही पैदा हुआ कि लड़कियों को भी शिक्षा दी जाय। इससे मध्यम वर्ग के लोगों
के घर अधिक खुशहाल और आराम वाले बन गये। लेकिन कुछ एक महलों की
मौजूदगी से आम लोगों की हालत किस तरह सुधर सकती है? उन लोगों के
आराम और तरक्की से किसानों और मज़दूरों को कोई लाभ नहीं पहुँच सकता।
वह ग़रीब इन चीज़ों से कोई भी लाभ नहीं उठा सकते। यदि यह शैक्षणिक लहरें
आम लोगों की बेहतरी के लिए जारी की गयी होतीं तो सबसे पहले गाँवों में
स्कूल खोले जाते (क्योंकि) किसी भी मुल्क के आम लोगों में प्रारम्भिक शिक्षा
के बिना जागृति नहीं आ सकती। हमें अपने देश की उन्नति के लिए सबसे पहले
यही नींव डालनी पड़ेगी।
साम्प्रदायिक और भाईचारे की लहरें
इस समय हमारे देश में जो अलग-अलग साम्प्रदायिक और भाईचारे की लहरें शोर
मचा रही थीं यह भी इन्हीं मध्यम वर्ग के लोगों के दिमाग़ की उपज है। उदाहरण
के रूप में पर्दे के सवाल को ही ले लें। ग़रीब मज़दूर औरतें तो सारा-सारा दिन
सिरों पर टोकरियाँ उठाती हैं या खेतों में मेहनत-मज़दूरी करके बड़ी मुश्किल से
रोटी कमा सकती हैं। उनके आगे यह पर्दे का सवाल किस तरह पेश हो सकता
है? मध्यम वर्ग के लोगों की आराम भरी ज़िन्दगी में ही यह सवाल उठ सकते हैं।
मैं एक-एक कर ऐसी सभी साम्प्रदायिक और भाईचारे की लहरों में वर्ग-रुचि का
असर देखता हूँ।
परिशिष्ट / 535