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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

२ आल्हखण्ड । ३६वां
साँचौँ माता अरु त्राता तुम धाता सृष्टि माँझ यहिकाल ॥
लखियै ऐसे नर दुर्बल को माता जानु आपनो बाल ५
छूटि सुमिरनी गै देवीकै लाखनिब्याहसुनोयहिकाल ॥
गंगाधर बूँदी का राजा ता घर ब्याह होयगो हाल ६
अथ कथाप्रसंग ॥
कुसुमा बेटी गंगाधरकी राजा बूँदी का सरदार ॥
खेलत देखा सो बेटी का यौवन जानिपरा त्यहिबार १
लाग विचारन मन अपने मा बेटी ब्याहन के अनुसार ॥
नव अरु आठ दशै वर्षनमा ज्योतिपशास्त्रदीनअधिकार २
फिरि तौ गिनती ना कन्याकी यह मन कीन्ह्यो खूब विचार ॥
म्वती जवाहर दो बेटाथे तिनका बोलिलीन त्यहिबार ३
हाल बतावा मन अपने का राजा बार [बार समझाय] ॥
घरवर नीको जहँ तुम देखो त्यहिघर टीका [दीजो जाय]
एक मोहोवे तुम जायो ना तहँपर रहें [बनाफर राय] ॥
जाति बनाफर की हीनी है हल्ला देश दे[श महँ] काय ५
इतना कहिकै महराजा ने सबियाँ सामा दीन मँगाय ॥
चला जवाहर तब बूँदी ते राजै बार बार शिरनाय ६
तीनिलाख को टीका लै कै दील्लीशहर पहुँचा जाय ॥
हाल जानिकै पृथीराज ने टीका तुरत दीन लौटाय ७
चौरीगढ़ में वीरशाह घर पहुंचा फेरि जवाहरजाय ॥
सोऊ जादूकी शंका ते टीका तुरत दीन लौटाय ८
तहँतेचलिकै फिरिविसहिनगा जहँपर बसैं बिसेनेराय ॥
लागि कचहरी गजराजा की शोभा कही बूत ना जाय ६
सोने सिंहासनपर सोहत है राजा बिसहिन का सरदार ॥

लाखनिका विवाह । ३६६ ३

दीन जबाहिर तहँ चिट्ठी को, राजा पढ़नलाग त्यहिबार १०
पढ़िकै चिट्ठी गंगाधरकै टीका तुरत दीन लौटाय ॥
तबै जबाहिर मन खिसियाने पहुँचे फेरि कनौजै जाय ११
लागि कचहरी तहँ जयचँदकै भारी लाग राज दरबार ॥
आल्हा ऊदन तहँ बैठे हैं बैठे बड़े बड़े सरदार १२
दीन जबाहिर तहँ चिट्ठी को जयचँद आँकु आँकु पढ़िलीन ॥
पढ़िकै चिट्ठी वापस दीन्ह्यो हाँहूँ कछू नहीं नृप कीन १३
तबै जबाहिर यह बोलत भा दोऊ हाथजोरि शिरनाय ॥
लाखनि काँरे हैं तुम्हरे घर यह हम आयनपताल गाय १४
आयसु पावैं महाराजा को तौ हम टीका देयँ चढ़ाय ॥
इतना सुनिकै जयचँद बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय १५
ब्याह न करिबे हम तुम्हरे घर डाँपर जादू को अधिकाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १६
टीका आयो घर तुम्हरे है राजन लीजै आप चढ़ाय ॥
कौन दुसरिहा नृप तुम्हरो है ज्यहिभयकरौ कनौजीराय १७
औरो बोले त्यहि समया मा साँची कहौ बनाफरराय ॥
सम्मत सब का जयचँद लै कै तब पण्डितते कहा सुनाय १८
देखो साइति यहि समया मा टीका लीनजाय चढ़वाय ॥
सुनिकै वातैं महाराजा की पंडित साइति दीन बताय १९
पाख अँधरिया तिथि तेरसिऔ फागुन मास सुनो महराज ॥
भौरिन केरी शुभ साइति है ह्वैहैं सुफल आपके काज २०
पै यहि बिरिया शुभ साइति में टीका आप लेउ चढ़वाय ॥
इतना सुनिकै महराजा ने महलन खबरिदीन पठवाय २१
खबरि पायके महरानी ने चौका तुरत लीन लिपवाय ॥
२४

४ आल्हखण्ड । ३७०
चौक पुराई गजमोतिन सों चन्दन पीढ़ा दीन डराय २१
तापर बैठे लखराना जब गावन लगीं सुहागिल आय ॥
द्यो जवाहिर गंगाधर का तहँ पर टीका दीन चढ़ाय २३
बीरा दीन्ह्यो जब लाखनि को सम्मुख छींक भई तब आय ॥
रानी तिलका त्यहि समया में बोली राजै वचन सुनाय २४
ब्याह न करिबे हम बूँदी मा टीका आप देयँ लौटाय ॥
परम पियारे लखराना के बीरा लेत छींकमै आय २५
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
जो कछु होवै इनके जीका हमरो लीन्ह्यो मूडकटाय २६
टीका फेरयो महरानी ना जान्यो शकुन छींककामाय ॥
सो सवरमा यहि मानुष का पौवन नाक गिगवतजाय २७
यहिकी छींकनका अशकुन ना माता भरम देउ बिसराय ॥
राजा बोले फिरि रानी ते साँची कहै बनाफरराय २८
जो अस हालत सबहोती ना टीका तुरत देत लौटाय ॥
इतना सुनिकै तिलका रानी अपनो भरमदीन विसराय २६
फेरि जवाहिर सब नेगिन को सुवरण कड़ा दीन पहिराय ॥
जितनी सामारह टीका की सो आँगनमा दीन धराय ३०
राजाजयचंद उन नेगिन का सुवरण कड़ा दीन पहिराय ।
साल दुसाला मोहनमाला इनहून दीन तहाँपर आय ३१
बड़ी खुशानी दुहुँ तरफाके नेगिन मनै भई अधिकाय ।
विदामँगिकै चला जवाहिर बूँदी शहर पहूँचा जाय ३२
हाल बतायो महराजा का जाविधि टीका भयो चढ़ाय ॥
भई खुशहाली गंगाधर के फूले अंग न सके समाय ३३
नामी राजा कनउज वाले बेटा कीनकाज खुबजाय ॥

लाखनिका बिवाह । ३७१ ५
भई तयारी ह्‍वाँ ब्याहे की फागुन मास पहूँचा आय ३४
न्यवत पठावा सब राजन को राजा कनउज के सरदार ॥
पावत चिट्ठी के राजा सब कनउज आयगये त्यहिबार ३५
तेल औ मायन नहखुरआदिक ब्याहन कुँवाँक्यार व्यवहार ॥
नेग चार सब पूरन ह्वैगे लागे सजन शूर सरदार ३६
झीलमबखतर पहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥
सुमिरि भवानीसुत गणेश को राजा जयचंद भये तयार ३७
आल्हा बैठे पचशब्दापर ऊदन बेंदुल पर असवार ॥
गंगापाँवर कुड़हरि दाला मामा लाखनि का सरदार ३८
सूरज राजा परहुल वाला सोऊ बेगि भयो तय्यार ॥
सिर्गी घोड़े की पीठि पर सय्यद बनरस का सरदार ३६
पूंजि गोबर्द्धनि संदोहिनि अरु लाखनि फूलमती त्यहिबार ॥
सुमिरि भवानीसुत गणेश को पलकी ऊपर भये असवार ४०
बाजे डङ्का अहतक के बारालाख फौज तैयार ॥
आगे हलका भा हाथिन का पाछे चलन लागि असवार ४१
चले सिपाही त्यहि पीछेसों रब्बाचले पवन की चाल ॥
मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ४२
गर्द उड़ानी अति मारग में लोपे अन्धकार सों भान ॥
हाथी चिघरैं घोड़ा हींसैं घूमत जावैं लाल निशान ४३
भयो कलाहल अति मारग में जंगल जीव गये थर्राय ॥
उनइस दिन के फिरि अर्सा में बूँदी पास गये नगच्याय ४४
चार कोस जब बूँदी रहिगै जयचंद तम्बू दीन गड़ाय ॥
गड़िगे तम्बू सब राजन के सब रंग ध्वजा रहे फहराय ४५
अपने अपने सब तम्बुन में राजा नृत्य रहे करवाय ॥

६ आल्हाखण्ड । ३७२
गमकैं तबला सब तम्बुन में सावन यथा मेघ गहरायँ ४६
ओढ़े सारी काशमीर की धारी शिरन सोहनी भाय ॥
बनी मोहनी अति मूरति है मूरति वरण नहीं कछु जाय ४७
ऊदन बोले तब रूपन ते ऐपनवारी दे पहुँचाय ॥
रूपनबारी तब बोलत भा दोऊ हाथ जोरि शिरंनाय ४८
ऐपनवारी बारी लैके आपन मूड़ कटावै जाय ॥
आये बारी बहु कनउज के ऐपनवारी देउ पठाय ४६
बातें सुनिकै ये रूपन की बोला फेरि बनाफरराय ॥
बाना राखै रजपूती का बारी कौन बतावै भाय ५०
इतना सुनिकै रूपन बोले बेंदुल घोड़ देउ मँगवाय ॥
सुनिकै बातें उदयसिंह ने बेंदुल बाग दीन पकराय ५१
ऐपनवारी बारी लैके बेंदुल उपर भयो असवार ॥
सवापहर के फिरि अर्सा मा पहुँचाजाय नृपति के द्वार ५२
सवैया ॥
देखिकै रूपनि को दरवानि कहा इमि बानि सो बेगि सुनाई।
कौनसो देश बसौ क्यहिग्राम औ कौनसोकाज गये तुम आई॥
जायकहाँ नृपसों चलिकै भलिकै निजहाल जो देउ बताई।
बानि सुन्यो ललिते जब रूपनि बोलि उठ्यो तब मोदबढ़ाई ५३
ऐपनवारी बारी लावा राजै खबरि सुनावो जाय ॥
हमें पठावा आल्हा ऊंदन ब्याहनअये कन्नौजीराय ५४
इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि दीन बतलाय ॥
सुनिकै बातें द्वारपाल की राजा गये दुआरे आय ५५
द्वारे आगे जब गंगाधर रूपन बोला शीश नवाय ॥

लाखनिका विवाह । ३७३ ७

ब्याहन आये लखनाको अगुआकार बनाफरराय ५६
आल्हा ऊदन के बारीहन रूपन जानो नाम हमार ॥
ऐपनवारी लै आयन है पावैं नेग आपके द्वार ५७
कीरति गावत रूपनबारी जावैं आल्हाके दरबार ॥
इतना सुनिकै राजा बोले चाहिये नेग काह तब द्वार ५८
रूपन बोले महराजाते चाहैं यही आपके द्वार ॥
दुइघंटाभरि चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ५६
कीरति गावत रूपन जावै होवै जगमें नाम तुम्हार ॥
बारी आवा बघऊदन का द्वारे कठिन कीन तलवार ६०
इतना सुनिकै गंगाधर ने फाटक बन्द लीन करवाय ॥
जाय न पावै रूपन बारी आरी होय लोहके घाय ६१
इतना सुनिकै रजपूतन ने अपनी खैंचिलीन तलवार ॥
रूपन बारी बेंदुल परते गरुई हाँक दीन ललकार ६२
प्राणपियारे ज्यहि होवैं ना सोई लड़ै आय सरदार ॥
धावा कीन्ह्यो रजपूतनने बेंदुल भली मचाई रार ६३
टापन मारे रजपूतन का काहू दाँतन लेय चबाय ॥
जब मनपावै सो रूपनका तड़पत उड़ा दूरलगजाय ६४
का गति वरणौं तहँ रूपनकौ दूनों हाथ करै तलवार ॥
बड़े लड़ैया बूँदीवाले तेऊ हनैं अपनी वार ६५
दुइ दश पन्द्रह बीसक तीसक गिरिगे समरभूमि मैदान ॥
देखि तमाशा गंगाधर जी द्वारे बहुत भये हैरान ६६
क्रोधित हैकै महराजा ने आपै खैंचिलीन तलवार ॥
ऐंड़ लगायो तब रूपन ने घोड़ा चला गयो वापार ६७
मारु मारु औ हल्ला करिकै पाछे चले बहुत सरदार ॥

८ आल्हखण्ड । ३७४
उड़ा बेंडुला त्यहि समया मा तम्बुनपास गयो असवार ६८
क्षत्री लौटे बूँदी वाले बैठे आय राज दरबार ॥
रूपन बारी को देखत खन बोला उदयसिंह सरदार ६६
कैसी गुजरी कहु बूँदी में रूपन रङ्ग विरङ्गा ज्वान ॥
इतना सुनिकै रूपन बोले भैया भलो कीन मैदान ७०
नामी ठाकुर का बारी है जान्यो सबै राजदरबार ॥
दुइ घण्टा भरि चली सिरोही द्वारे बही रक्तकी धार ७१
मातु शारदा तुम्हरी बशिमा लाला देशराज के लाल ॥
सरबर तुम्हरी का दुनिया मा दूसर नहीं आज नरपाल ७२
सुनो हकीकति अब बूँदी कै भारी लाग राजदरबार ॥
रूपन बारी की चरचा का खरचाहोनलाग त्यहिवार ७३
म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा पास लीन बैठाय ॥
कही हकीकति सब ऊदन की पुत्रन वार वार समुझाय ७४
जाति बनाफर की हीनी है अगुवाकार भये सो आय ॥
कैसे व्याहब हम बेटीका हँसि हैं जातिपांतिकेभाय ७५
लड़िकै जितिबे नहिं ऊदनते यहहू साँच दीन बतलाय ॥
धोखा दैकै लखराना का अब हम कैदलेयँ करवाय ७६
तौ तौ इज्जत हमरी रहिहै नहिं सब जैहै काम नशाय ॥
तुम अब जावो त्यहि तम्बूमा जहँ पर बैठ कनौजीराय ७७
समय आयगा अब भौरिनका इकलो लड़का देउ पठाय ॥
देश हमारे यह रीती है कहियो वारंवार समुझाय ७८
इतना सुनिकै चला जवाहर चारो नेगी संग लिवाय ॥
जहाँ कनौजी का तम्बूथा पहुँचा तहाँ जवाहरआय ७६
कही हकीकति सब राजा सों दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥

लाखनिका विवाह । ३७५

देश हमारे की रीती यह इकलो लड़का देउ पठाय ८०
नाई बारी दूनों नेगी इनको लेवें संग लिवाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोउ हाथ जोरि शिरनाय ८१
ग्यारह नेगी औ सहिबाला इतने पठै देउ महराज ॥
इतना सुनिकै राजा बोले भावै करो तौन तुमकाज ८२
जो मन भावै सो करु ऊदन तुमको दीन पूर अधिकार ॥
बनि सहिबाला तब ऊदन गे नेगी बने और सरदार ८३
बैठि पालकी में लखराना अपनी लिये ढालतलवार ॥
संग जवाहर के चलि दीन्हे नेगीबने शूर सरदार ८४
आसा लीन्हे कोउ हाथेमा मुरछल कोऊ डुलावत जाय ॥
झण्डी लीन्हे कोऊ नेगी कोऊ रहे मशाल दिखाय ८५
बूँदी केरे नर नारी सब भारी भीर कीन अधिकाय ॥
रूप देखिकै लखराना का मनमें कामदेव शर्माय ८६
धरी पालकी गै फाटक पर बैठे सबै शूर सरदार ॥
यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एकेतलवार ८७
बाहर आये तब गंगाधर औ लाखनिते कह्यो सुनाय ॥
जल्दी चलिये तुम भीतर को भौंरीसमयगयो नगच्याय ८८
इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर नेगी लीन्हे संग लिवाय ॥
भीतर पहुँचा जब मन्दिर के तहँ नहिंखम्भपरादिखराय ८६
लौटन लाग्यो जब बाहर को आये शूरवीर तब धाय ॥
मारु मारु कै हल्ला करिकै ऊदन उपर पहुँचे आय ६०
चली सिरोही तब आँगनमा हाहाकार शब्दगा छाय ॥
नेगी बनिकै जे क्षत्री गे तेसब दीन्ह्यो जूझ मचाय ६१
तेरा क्षत्री कनउजवाले बूँदी केर पाँचमै जवान ॥

१० | आल्हाखण्ड । १७६
मारे मारे तलवारिन के मचिगा घोर शोर घमसान ६१
ऊदन मारैं ज्यहि क्षत्री को सो मुहभरा तुरत गिरि जाय ॥
पास न जावै कोउ ऊदन के रणमा बढ़ा बनाफरराय ६३
कागति वरणौं तहँ लाखनि कै दूनों हाथ करै तलवार ॥
मारे मारे तलवारिन के आँगन बही रक्तकी धार ६४
मोती जवाहिर दोनों भाई आँगन खूनकीन मैदान ॥
लड़ै बहादुर भीपमवाला देवा मैनपुरी चौहान ६५
घायल ह्वैकै ग्यारह नेगी आँगन गिरे पछाराखाय ॥
लाखनि ऊदन त्यहि समयमा चालिस क्षत्री दीनगिराय ६६
तबै जवाहिर सम्मुख आवा गरई हाँक देत ललकार ॥
काह सिपाहिन का मारो तुम हमरे साथ करौ तलवार ६७
इतना सुनिकै लाखनि ऊदन सम्मुख चले तुरतही धाय ॥
आगे पीछे चौगिर्दा ते परिगे गाँस फाँसमें आय ६८
लाखनि ऊदन दोऊ ठाकुर मोती कैदलीन करवाय ॥
घैहानेगी जे आँगन में तिनहुन तुरतलीन बँधवाय ६९
लाखनि ऊदन दोउ क्षत्रिनको राजै खंदक दीनडराय ॥
यह सुधिपाई जब मालिनिने कुसुमा पास पहुँची जाय १००
हाल बतायो त्यहि बेटी को मालिनि बार बार समुझाय ॥
ब्याहन तुमका लाखनि आये राजै खन्दक दीन डराय १०१
देश देश में जब फिरि आये टीका लीन कनौजीराय ॥
ऐस मुनासिब नहिं राजाको जोअबदीन्हेनिजझमचाय १०२
गली गली में यह चरचाहै नीकिन कीन बात महराज ॥
रूप उजागर सब गुण आगर खन्दक परे तुम्हारेकाज १०३
इतना सुनिकै कुसुमा बेटी मनमें बारबार पछिताय ॥

लाखनका विवाह । ३७७ ११-
हमें न भाई यह आली है तुमते साँच दीन बतलाय १०४
बयस बराबरीकी मालिनि हौ अब गाढ़े माँ होउ सहाय ॥
राति अँधेरिया की बिरिया है खन्दक मोहिंदेइ दिखराय १०५
मोरे कारण महराजा सुत कैदी भये यहांपर आय ॥
उत्तम शय्या केरि स्ववैया खन्दकदीन बाप डरवाय १०६
मोहिं दिखावै त्यहि क्षत्री को जियरा धीरधरा ना जाय ॥
इतना सुनिकै मालिनि दौरी पलकीलाई तुरतलिआय १०७
बैठि पालकी मा दूनो फिरि खन्दक पास गई नियराय ॥
दीन अशर्फी तहँ चकरन का तिनफिरतहाँदीनपहुँचाय १०८
कुसुमा बोली तहँ लाखनि ते स्वामी बार बार बलिजायँ ॥
मोहिं अभागिनि के कारणसों तुमपरबिपतिपरीअधिकाय१०६
अब तुम निकरो यहि खन्दकते रस्ता देउँ कन्त लटकाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय ११०
जो तुम चाहौ लखराना को फौजन खबरि देउ पहुँचाय ॥
चहै सहारा जो नारी को तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय १११
शंका लावो मन अन्तर ना महलन जाउ तड़ाका धाय ॥
खबरि पायकै आल्हा ठाकुर हमरीबिपतिविदरिहैंआय११२
कुसुमा बोली फिरि ऊदन ते क्षत्री भोजन देउँ पठाय ॥
ऊदन बोले तब कुसुमा ते यहनहिंउचितयहाँपरआय११३
चोरी चोरा कछु दैहै ना शाहंशाह कनौजीराय ॥
भोर भवरहरे मुरगा बोलत फौजन खबरिदेउ पठवाय ११४
और न चाहें कछु तुमते ये साँचे हाल दीन बतलाय ॥
इतना सुनिकै कुसुमा बेटी महलनफेरिपहुँची आय ११५
सोचत सोचत राति पारभे प्रातःकाल गयो नगणाय ॥

१२ आल्हखण्ड । ३७८
कहि समुझावा तब मालिनिको फौजन तुरतदीन पठवाय ११६
नाइनि बारिनि तेलि तँबोलिनि मालिनिधोबिनि के समुदाय ॥
साँची दूती रस ग्रन्थन में भाषा चतुरन खूब बनाय ११७
सोई मालिनि चलि बूँदी ते फौजन अटी तड़ाका धाय ॥
पता लगायो तहँ आल्हा को चँकरन तम्बूदीन बताय ११८
बेला चमेलिन के हरवा को मालिनि तुरत दीन पहिराय ॥
कह्यो सँदेशा तहँ ऊदन का मालिनि वारवार सब गाय ११९
जो सुधि पावैं बूँदी वाले हमरो पेट देयँ फरवाय ॥
भुसा भरावैं ते पेटेमा तुमकासाँच दीन बतलाय १२०
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर मुहरें सात दीन पकराय ॥
मालिनि चलिभै तब फौजनते बेटी पास पहुँची आय १२१
खबरिसुनाई सब जयचँद को आल्हा वार वार समुझाय ॥
तब महराजा कनउज वाला डंका तुरतदीन बजवाय १२२
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न मे असवार ॥
झीलमबख्तर पहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार १२३
तोपैं चढ़ि गईं सब चर्खन मा गोला तुरत दीन छुटवाय ॥
चढ़े जवाहर औ मोती दोउ तोपनआगिदीनलगवाय १२४
तोपैं छूटीं दुहुँ तरफा ते धुवना रहा सरग में छाय ॥
बड़ी दुर्दशा भै तोपन मा तबफिरिमारुवन्द है जाय १२५
गोली ओला सम वर्षत भइँ सननन सन्न सन्न सन्नाय ॥
दुनो गोल आगे का बढ़िगे सम्मुख भये समरमें आय १२६
भाला बलछी तलवारिन की लागी होन भड़ाभड़ मार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १२७
ना मुहँ फेरैं बूँदी वाले ना ई कनउज के सरदार ॥

लाखनिका विवाह। ३७५ १३
शूर सिपाही सम्मुख रहिगे कायरछोड़िभागि हथियार १२८
कटि कटि मूड़ गिरैं धरणीमा उठि उठि रुण्ड करें तलवार ॥
मूड़न केरे मुड़चौरा भे औरुरुडूनके लाग पहार १२६
सात कोस के तहँ गिर्दा मा कौवा गीध रहे मड़राय ॥
घैहा करहैं समरभूमि मा दैया बापू रहे मचाय १३०
हाय रुपैया बैरी द्वैगे हमरे गई प्राणपर आय ॥
सात रुपैया के कारण ते छूटे लोग कुटुम औभाय १३१
तहिले बिरिया मै संध्या कै तब फिरि मारु बन्द है जाय ॥
जीबे लायक जितने घैहा तिनकीलोथिल्रीनउठवाय १३२
दईलाख दल कनउज वाला बूँदी डेढ़लाख सरदार ॥
इतने जूझे दुहुँ तरफा ते करिकरि मारुतहाँपरयार १३३
आल्हा आये जब तम्बू मा आसनअगलगीनबिछवाय ॥
श्वास चढ़ाई फिरि ऊपर का शारदसुमिरिबनाफरराय १३४
बिनती कीन्ही भल शारद की आल्हा बार बार शिरनाय ॥
तव अवलम्बा जगदम्बा है दूसर करिहै कौन सहाय १३५
बिनती करिकै आल्हा ठाकुर सोये सेज आपनी जाय ॥
देबी शारदा महिरवाली निशिमास्वप्न दिखायो आय १३६
मलखे ब्रह्मा को बुलगाओ द्वैहै जीति बनाफरराय ॥
स्वपन देखिकै आल्हा ठाकुर प्रातःकाल उठे हर्षाय १३७
लिखिकै चिट्ठी मलखाने को धावन हाथ दीन पठवाय ॥
चढ़ा साँड़िया मा धावन तब सिरसागढ़ै पहुँवाजाय १३८
चिट्ठी दीन्ही मलखाने को धावन बार बार शिरनाय ॥
पढ़िकै चिट्ठी मलखेठाकुर औ यहबोले वचनसुनाय १३९
हम समुझावा भल ऊदन का सिरसा बसो बनाफरराय ॥

१४ आल्हाखण्ड । ३८०
कहा न माना आल्हा ऊदन खन्दकपरे लहुरवाभाय १४०
मनते हमरे यह आवति है की बूँदी का जाय वलाय ॥
जैसो कीन्हेोनि तस फलपायनि दूनोभाय बनाफरराय १४१
करैं तयारी नहिं बूँदी की तवहूं ठीक नहीं ठहराय ॥
इतना कहिकै मलखेठाकुर फौजनहुकुमदीनकरवाय १४२
करो तयारी सब बूँदी की खन्दक परा लहुरवाभाय ॥
इतना कहिकै मलखेठाकुर अपने महल पहुँचेजाय १४३
पढ़िकै चिट्ठी गजमोतिनि को मलखे हाल दीन समुझाय ॥
हम ना जैबै अब बूँदी का प्यारी साँच दीन बतलाय १४४
इतना सुनिकै प्यारी बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
आजु साँकरा बघऊदन का स्वामीगाढ़े होउ सहाय १४५
बिना सहायक अब दादा को स्वामीदुःख होय अधिकाय ॥
आजु साँकरा है दादापर यहुदिनपरीरोज ना आय १४६
ब्याना सहिबे घबरानिन का होई पीर रोज अधिकार ॥
धर्म विहीनी हीनी ह्वैकै जीनो जन्मजनमधिकार १४७
धर्म न रहै जब देही मा करि है कौन्दकाहि उपकार ॥
धर्म निशाना मर्दाना है अर्जुनसकदीनोकसरदार १४८
सारथि कीन्ह्यो नारायण जे ध्रुव कृष्ण कहि दीन्ह्यो महराज ॥
बुद्धीद्वारा करि दिखलावा ताकी राखि लई सबके काज १४६
करौं किहानी जो पूरी मैं ताको सिन्ध बड़ा विस्तार ॥
सुनी किहानी जो विप्रन ते सोई कहौ सत्य भतार १५०
ह्रवै दवाई दुखदाई यह नींवी हरै अनेकन रोग ॥
जो कोउ पीवै चंगा होवै याको कैस नीक संयोग १५१
धर्म दवाइन के पीने मा स्वामिन सत्य सत्य आरोग ॥

लाखनिका विवाह । ३८१ १५
ताते जावो तुम बूँदी को होवै पूर हमारो भोग १५२
बातैं सुनिकै गजमोतिनि की मलखे धरा पीठिपर हाथ ॥
होय पियारी अस नारी जो तवहीं रहे धर्म की पाथ १५३
बड़ी पियारी निज नारी को मलखे बार बार समुझाय ॥
गये दुवारा फिरि माता घर चलिभेचरणकमलशिरनाय १५४
घोड़ी कबूतरीपर चढ़ि बैठे डंका तुरत दीन बजवाय ॥
लैके लश्कर मोहबे आये जहँ पर रहें चँदेलेराय १५५
आय सिंहासन के लगभग में ठाढ़े भये शीश को नाय ॥
आल्हा ऊदन की गाथा को मलखे गये तहाँ परगाय १५६
भयो बुलौवा हम ब्रह्माका आयसु कहामिलै महराज ॥
परम दयालू चित तुम्हरो है स्वामीपूँछि करौं मैं काज १५७
गुरु पितु भ्राता अरु त्राता तुम हमरे सदा चँदेलेराय ॥
आज्ञापावों महराजा कै तौ ऊदनका लवों छुड़ाय १५८
सुनिकै बातैं मलखाने की आयसु दीन रजापरिमाल ॥
लैके ब्रह्माको जावो तुम दूनों बहू हमारेबाल १५६
माथनाइ कै महराजा को मल्हना महल पहुँचे जाय ॥
चिट्ठी पढ़ि तँह आल्हा की मलखेदीनसकलसमुझाय १६०
विपदा सुनिकै बघऊदन कै मल्हना रोयदीन त्यहिबार ॥
हाथ पकरिकै फिरि ब्रह्माको बोली लेउ पूत तलवार १६१
क्षत्री द्वैकै समर सकावै जावै तुरत नरक के द्वार ॥
परम पियारे सुतजावो तुम हमरो पूरहोय उपकार १६२
इतना सुनिकै ब्रह्मा ठाकुर अपनी लीन ढाल तलवार ॥
बिदा मांगिकै पितु मातासों दोऊ चलत भये सरदार १६३
सजिगा घोड़ा हरनागर जो तापर ब्रह्मा भये सवार ॥

१६ आल्हखण्ड । ३८२
घोड़ी कबूतरी की पीठोपर मलखे सिरसाका सरदार १६४
बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर त्यहि बार ॥
शङ्का फंका करि डंका तहँ बाजे घोर शोर ललकार १६५
रहा कलङ्का नहिं देही माँ ऐसे कहत चलैं सब यार ॥
पंद्रादिनका धावा करिकै बूँदी निकट गये सरदार १६६
झील देखिकै मलखाने ने तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ॥
लाले पीले नीले काले सबरँग ध्वजा रहे फहराय १६७
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण कछु चमकन लागे पक्षी चले बसेरन धाय १६८
परे आलसी खटिया तकि तकि संतन धुनी दीन परचाय ॥
भस्म लगायो सब अंगन में ध्यायो चरित पुरातन गाय १६६
शिवा रमा ब्रह्माणी पति के मनमें चरित रहे सुलगाय ॥
बड़े यशस्वी पितु अपने के दोऊचरणकमलकोध्याय १७०
करों तरंग यहां सों पूरण दोऊ गणपतिचरण मनाय ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं लेवैं आपन मोहिं बनाय १७१
इति श्रीलखनऊनिवसि (सी,आई,ई) मुंशी नवलकिशोरात्मजवाबू प्रयाग
नारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि
मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखान
बड़ाईवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
सवैया ॥
सत्यहैं वेद पुराण सबै मति एक असत्य यहै लखिपावा ।
मतिही के असत्य असत्य सबै यह सत्यहि २ सत्य बतावा ॥
बेद पुराण भूलनहीं यह भूल असत्य मती ठहरावा ।
ललिते मति सत्यासत्य निवारण वेद पुराणन ने दर्शावा १

लाखनिका विवाह । ३८३ :१७
सुमिरन ॥
बेदन ध्यावों सामबेद को बिप्रन परशुराम महराज ॥
क्षत्रिन ध्यावों रामकृष्ण को बैश्यन नन्दभये शिरताज १
शूद्रन ध्यावों मैं निषाद को कीशन पवनतनय बलवान ॥
ईशन ध्यावों शिवशङ्कर को शीशनबढ़ा दशानन ज्वान २
ध्याय नदीशनमें बड़वानल पक्षिन बैनतेय महराज ॥
ध्याय गिरीशन में हिमपर्वत नारिन जनकसुता शिरताज ३
कुँवारिन ध्यावैं हम राधाको राखैं सदा हमारी लाज ॥
परम पियारी यदुनन्दन की हमरी माननीय शिरताज ४
सबै पुस्तकन में दुर्गा जी अबहूं बिप्रन की रखवार ॥
खूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब बूँदी हाल सुनो यहिबार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
देखिकै फौजै मलखाने की बोला तुरत कनौजीराय ॥
फौजै आई हैं बूँदी ते आल्हा देखु भीर अधिकाय १
चिट्ठी पठई तुम सिरसा को आये नहीं वीर मलखान ॥
कैसी करिहौ यहि समया में आल्हा समरभूमि मैदान २
सुनिकै बातैं महराजा की आल्हा बोले शीश नवाय ॥
मुर्चा बन्दी अब करवावो चर्खन तोप देउ चढ़वाय ३
तर्बलंग धावन सिरसावाला आल्हा फौज पहुंचा आय ॥
शीश नाय कै सो आल्हा को मलखे आवन दीन बताय ४
दीन इनामै त्यहि धावन को ब्रह्मा मलखे लीन बुलाय ॥
खबरि पाय कै सो आल्हा की दूनों गये तहाँ पर आय ५
बड़ी खातिरी जैचँद कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥
खबरि बताई सब बूँदी की जयचँद बार बार पछिताय ६

१८ आल्हाखण्ड । ३८४
मलखे बोले तब राजा ते साँची सुनो कनौजीराय ॥
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम चारो दिशा लेउ घ्यग्वाय ७
तुमतो लड़ियो उत्तर दिशिको दक्षिण समर करब हम आय ॥
कछुदल पठवो पूरब पश्चिम बूँदी शहर लेउ घिराय ८
इतना कहिकै मलखे ब्रह्मा फोजन फेरि पहूँचे आय ॥
बाजे डंका कनौजिया के हाहाकार शब्दगा छाय ६
बिनही डंका के मलखाने दक्षिण दिशा पहूँचे जाय ॥
म्वती जबाहिर उत्तर दिशिमाँ लै कै फौजगयो फिरिआय १०
तोपैं धरिगइँ फिरि चर्खेन में तिनमें बत्तीदई लगाय ॥
छूटे गोला हाहाकारी धुवनारहा सरगमें छाय ११
लागे गोला ज्यहि क्षत्री के मानो गिरह कबूतरखाय ॥
गोला लागै ज्यहि घोड़ाके आधे सरगलिहे मड़राय १२
लागै गोला ज्यहि हाथी के झुप्पे देवै भूमि बिछाय ॥
जौने ऊंटके गोला लागै सो मुहभरा तुरतगिरिजाय १३
अरर अरर गोला छूटैं जैसे प्रलय मेघ घहराय ॥
जौने रथमाँ गोला लागै पहियाधुरीसहितउड़िजाय १४
बड़ी दुईशा भै तोपन में तब फिरि मारुबन्द द्वैजाय ॥
दुनो गोल आगे का बढ़िगे मुर्चा परा बरोबरि आय १५
कल्ला भिड़िगे असवारन के घोड़न भिड़ी रानमें रान ॥
सूंडि लपेटा हाथी भिड़िगे लाग्यो होन घोर घमसान १६
कउँधालपकनिविजुलीचमकनि रणमाँ चमाचम्म तलवार ॥
झल् झल् झल् झल् छुरी झलकैं भारी ढालनकी ठनकार १७
धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ॥
न् सन् सन् सन् गोली सनकैं तेगा मन्न मन्न मन्नाय १८

लाखनिका विवाह। ३८५
मारु मारु करि मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥
बड़ी लड़ाई भै बूँदीमाँ जूझे बड़े बड़े नरपाल १६
पैदल पैदल कै बरणी मै औ असवार साथ असवार ॥
कोताखानी चलैं कटारी ऊनाचलै बिलाइति क्यार २०
कटिकटि कल्ला गिरैं खेतमाँ उठि उठि फेरि करैं तलवार ॥
ना मुहँ फेरैं कनउज वाले ना ई बूँदी के सरदार २१
ब्रह्मा मलखे दक्षिण दिशिसों पहुँचे बीच शहरमें आय ॥
बड़ा कुलाहल भा बूँदी माँ काहू धीर धरा ना जाय २२
लीन्हे फौजै मलखाने फिरि फाटक उपर पहुँवा जाय ॥
औ कहि पठवा गंगाधर को सबकी कैद देउ छुटवाय २३
नाहीं बचिहौ ना महलन माँ बूँदी शहर देउँ फुँकवाय ॥
सुना सँदेशा महराजा जब मनमाँ बार बार पछिताय २४
पै जब सूझी कछु मनमाँ ना सबकी कैद दीन छुटवाय ॥
घायल करहति ऊदन लाखनि मलखे पास पहुँचे आय २५
मिला भेंट करि सब आपस में उत्तर दिशा चले हर्षाय ॥
एक तरफ सों जयचंद राजा दूसरी तरफ बनाफरराय २६
मोती जवाहरि परे बीचमाँ सबके गयी प्राणपर आय ॥
बड़ी लड़ाई भै बूँदी मा अद्भुत समर कहा ना जाय २७
मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार ॥
मुण्डन केरे मुड़चौड़ा भै औ रुण्डन के लगे पहार २८
घोड़मनोहर की पीठी सों देवा गरू देय ललकार ॥
चढ़ा कबूतरी पर मलखाने ऊदन बेंदुलपर असवार २९
भयो जवाहरि फिरि सम्मुख माँ लीन्हे तीनिलाख असवार ॥
का गति बरणों मैं मोती कै दूनों हाथ करै तलवार ३०

२० आलहखण्ड । ३८६
मीराताल्हन बनरस वाला सिर्गा घोड़े पर असवार ॥
अल्ला अल्ला औ बिसमिल्ला करिकै खूब मचाई रार ३१
झुके सिपाही बूँदी वाले दोऊ हाथ करैं तलवार ॥
बड़े लड़ैया मुहबेवाले एकते एक शूर सरदार ३२
येऊ मारैं औ ललकारैं हारैं नहीं तहाँ पर ज्वान ॥
छोड़ि आसरा जिंदगानी का क्षत्रिन खून कीन मैदान ३३
दूनों दिशि की तहँ मारुन माँ क्षत्री बूँदी के हैरान ॥
तीनि लाख बूँदीके ठाकुर ह्वैगै समर भूमि वैरान ३४
मती जवाहर त्यहिसमया माँ दूनों भाय गये घबड़ाय ॥
मलखे ठाकुर त्यहि औसर माँ तिनका कैदलीन करवाय ३५
भागि सिपाही अरझ्वारातब अपने अपने लिहे परान ॥
जीति के डंका तब बजवाये नाहर समरधनी मलखान ३६
राजा जयचँद के तम्बू माँ पहुँचे सबै शूर सरदार ॥
को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी लाग राजदरबार ३७
जितने घायल अपनी दिशिके सबको तुरतलीन उठवाय ॥
मलहम पट्टी तिन क्षत्रिन के घायन ऊपर दीन कराय ३८
सुनी हकीकति जब गंगाधर मनमाँ बारबार पछिताय ॥
मेलछाँड़िकै त्यहि औसर माँ और न कछू ठीक ठहराय ३६
लिखिकै चिट्ठी त्यहि समयामाँ जयचँद पास दीनपठवाय ॥
कैदी छोड़ो दोउ पुत्रनको भाँवरि तुरत लेउ करवाय ४०
जहँना तम्बू महराजा का धावन तहाँ पहुँचा आय ॥
चिट्ठी दीन्ह्यो महराजाको दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४१
पढ़िकै चिट्ठी जयचँदराजा तुरतै सबका दीनसुननाय ॥
सम्मत सबके तब याही भै कैदी देउ पुत्र छुड़वाय ४२

लाखनिका विवाह । ३८७ २१
म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा तुरत लीन बुलवाय ॥
लिखी हकीकति जो गंगाधर तिनको तुरतदीन बतलाय ४३
गंगा कैलेउ तुम तम्बुन माँ तुम्हरी कैद देइँ छुड़वाय ॥
सुनिकै बातें ये जयचंदकी दोऊ गंगा लीन उठाय ४४
तब छुड़वायो जयचंद राजा पहुँचे धाम आपने जाय ॥
सम्मत कीन्ह्यो फिरि गंगाधर मड़ये मूड़ लेब कटवाय ४५
अकसर लड़काको लै आवो जावो पूत जवाहरलाल ॥
सुनिकै तुरतै सो गमनत भा आयो जहाँ बैठ नरपाल ४६
कहि समुझायो सब राजा को दोऊ चरणन शीश नवाय ॥
अकसर लड़का को पठवावो सबियाँ शंका देउ भुलाय ४७
इतना सुनिकै मलखे बोले राजन हुकुम देउ फरमाय ॥
पांच सात मिलि हमअब जैबे भौंरी तुरत देब करवाय ४८
सुनिकै बातें मलखाने की आयसु दीन कनौजीराय ॥
बैठि पालकी में लखराना देबी फूलमती को ध्याय ४६
आल्हा ऊदन मलखे ब्रह्मा देवा बनरस का सरदार ॥
गंगा मामा लखराना का सोऊ बांधि लीन हथियार ५०
सवैया ॥
ते सरदार सबै चलिकै फिरि भीतर भौन के जाय सिधाये ।
सुन्दर आसन डारितहाँ नृप आदर भाव किये अधिकाये ॥
पण्डित आयकै बैठि गयो गठिबन्धन हेतु सुता बुलवाये ।
सातसुहागिल आय तहाँ ललिते मन मोदन गीत सुनाये ५१
पहिली भाँवरिके परतै खन क्षत्री आये आध हजार ॥
आल्हा ऊदन मलखे ब्रह्मा इनहुन खैंचि लीन तलवार ५२